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कहानी

जैक, जैक, जैक रूदाद-ए-नीरस प्रेम कहानी
विमल चंद्र पांडेय


कहानी शुरू करने से पहले बता दूँ, यह एक निखालिस प्रेम कहानी है। मैं पूरी कोशिश करूँगा कि कोई तत्व जबर्दस्ती अतिक्रमण करके इस प्रेम कहानी का हिस्सा न बने। यह आपको अच्छी लगे, इसके लिए मैं जान लड़ा दूँगा। श्रृंगार रस की ज्यादा गुंजाइश न होने के बावजूद मैं वादा करता हूँ कि जहाँ भी मौका मिलेगा, तबीयत से प्रयोग करूँगा।

प्रेम कहानी कमसिन नायक-नायिका की नहीं है। खसरे की तरह प्रेम जीवन में एक बार जरूर होता है और नायक का अट्ठाईस साल की उमर में यह पहला प्रेम है। उमर ज्यादा होने के कारण इस प्रेम में कथित रूप से ठंडी हवा के झोंके नहीं हैं, बल्कि प्रेम बुझी आग में चिनगारी की तरह मौजूद है। वैसे आजकल के प्रेम में ठंडी हवा के झोंके होते भी हैं या नहीं, यह शोध का दिलचस्प विषय हो सकता है। लुब्बेलुआब यह है कि यह मेरी पहली प्रेम कहानी है और इसे आप पसंद करें, इसके लिए मैं इसे सुंदर और रोचक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ूँगा। आइए, कहानी की शुरुआत मुख्य पात्रों के परिचय से करते हैं।

सर्वप्रथम नायक का परिचय। नायक का नाम कृष्ण मुरारी है। प्रेम कहानियों के हिसाब से यह नाम बहुत गैर-रूमानी और गैर-परंपरागत है पर नायक की मजबूरी है कि अब नाम के साथ कुछ नहीं किया जा सकता। मुझे आभास है कि पाठकों के लिए प्रेम कहानी के नाम पर यह एक निहायत ही भौंडा मजाक है पर नायक की तरह मैं भी मजबूर हूँ। नायक का मुंगेर से दिल्ली (वाया बनारस, परास्नातक बी.एच.यू. से) पदार्पण पत्रकारिता की पढ़ाई के सिलसिले में हुआ है। मुंगेर में उसे अपने नाम का उतना मलाल नहीं था, पर दिल्ली आकर उसे नामों की सार्थकता का बोध हुआ है और उसने इस दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। शुरू में ही उसने उन मक्कार दोस्तों को खूब चाय पिलाई है जो खाकर थाली में छेद करने के लिए कुख्यात हैं। यानी जिसके साथ ज्यादा रहेंगे, जिसका ज्यादा खर्च कराएँगे, उसी के नाम को बिगाड़ देंगे। इसके पीछे नायक का मंतव्य यह था कि इस भक्तिकालीन नाम को जितना बिगाड़ कर पेश करेंगे, वह मौजूदा स्थिति से बेहतर ही होगा। शुरू में नायक का नाम मुर्री हुआ, फिर मुर्रू। वह निराश हुआ और कुछ दोस्तों को नई रिलीज फिल्म ‘किसना’ दिखाने ले गया। कुछ काइंया दोस्त नायक की मंशा भाँप गए और नायक से बीयर बर्गर का भोज लेते हुए उसका नामकरण ‘किसना’ कर दिया, हालाँकि ज्यादातर नमकहराम उसे मुर्रू ही बुलाते हैं। नायक बहुत उत्साह या भीषण दुख में (जो प्रायः दारू पीने के बाद प्रकट होता है) अंग्रेजी बोलने लगता है। शायद अधिकतर पुरबियों की तरह अंग्रेजी उसका भी इनफ्रियॉरिटी कांप्लेक्स है। उसके कमरे से रेन एंड मार्टिन कृत ग्रामर और नॉर्मन लुइस द्वारा रचित ‘वर्ड पॉवर मेड इजी’ इजी वे में बरामद की जा सकती है। नायक का सेंस ऑव ह्यूमर अच्छा है।

नायिका भी नायक के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही है। नायक की तुलना में नायिका का नाम साहित्यिक सौंदर्य लिए हुए है और उसमें प्रेम की भी प्रबल संभावनाएँ हैं। उसका नाम वेदिका है और उसकी आवाज बड़ी प्यारी है। वह मूल रूप से बनारस की रहनेवाली है और पिछले चार-पाँच वर्षों से मयपरिवार दिल्ली के पास नोएडा में रह रही है। स्नातक की पढ़ाई उसने यहीं से की है। चार-पाँच वर्षों के अथक प्रयास से उसने बनारस का कस्बाई चोला उतार दिया है और दिल्ली के ‘ओ शिट’ चोले में घुस चुकी है। यह दीगर बात है कि कभी-कभी उसका हाथ बाहर रह जाता है और कभी पैर। गो उसे उम्मीद है कि वह जल्दी ही पूरी तरह दिल्लीवाली यानी ‘डेलहाइट’ हो जाएगी। (उसके बाद वह क्या करेगी, यह उससे किसी ने पूछा नहीं है।) बस थोड़ी सी कसर रह जाती है जब वह संस्कारों से ग्रस्त होकर जींस-टॉप पर दुपट्टा या दुपट्टानुमा कोई चीज टाँगकर चली आती है भले ही वह फैशन से बहुत बाहर की चीज हो।

नायक का एक मित्र भी है जिसका परिचय आवश्यक है। यह पात्र नायक के सबसे करीब है। नाम है विमल पांडे। वह भी बनारस से आया है। एक ही शहर का होने के कारण नायिका से उसकी अच्छी दोस्ती हो गई है। यह कहानियाँ लिखता है। कहानियाँ इसलिए लिखता है क्योंकि और कोई काम करना, खास तौर पर मेहनतवाला, करना इसके वश का नहीं है (उम्र अट्ठाईस साल, वजन चौवालिस किलोग्राम)। कम बोलता है, क्योंकि जब ज्यादा बोलता है तो अनर्गल बोलने लगता है। जब कहानियाँ पत्रिकाओं से बिना छपे लौट आती हैं तो किसी से चर्चा भी नहीं करता, पर जब दस वापस लौटने के बाद एक किसी टुच्ची पत्रिका (कृपया संपादकगण अन्यथा न लें) में छप जाती है तो वह पत्रिका पूरे कॉलेज में दिखाता है और अपने मित्रों को पढ़वाता रहता है, खास तौर पर लड़कियों को। जब कोई लड़की उसके सामने ही कहानी पढ़ने लगती है, तो वह निर्विकार सा चेहरे पर यह भाव लिए सिगरेट पीता रहता है कि ऐसी कहानियाँ तो वह चुटकियों में लिख सकता है, पर साला वक्त किसके पास है। कहानी खत्म होने से पहले ही कहता है - ‘पढ़के किताब दे देना, अभी निधि जिद कर रही थी घर ले जाने की।’ मित्रों के बीच अक्सर ऊँची-ऊँची फेंकता रहता है। बातों में अक्सर जबरदस्ती ब्रेख्त, नेरुदा, काफ़्का, सार्त्र और दिदेरो आदि का जिक्र ले आता है। मित्रों को बल भर आतंकित करता रहता है। चूँकि उन्होंने पत्रिकाओं में इसके नाम और चित्र देखे हैं, इसलिए चुप रहते हैं। हमेशा अपनी आजादखयाली की दुहाई देता रहता है। अपनी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा और स्वभाव पर इसे गर्व है। ब्राह्मण होने के बावजूद अपने बीफ खाने का वर्णन गर्व से करता है (इसे पता है कि क्रांतिकारी कहलाने के लिए और कुछ करो या नहीं, पहले अपना धर्म तो भ्रष्ट कर ही डालो)। कई स्तरों पर मित्रों में इसका आतंक व्याप्त है। कुछ आतंकित मित्रों ने इसका नाम साहित्यकार रख दिया है और कुछ मूर्ख तो यहाँ तक कहते हैं कि विमल नींद में भी लिख देगा तो सही ही होगा। यही मूर्ख इसकी ताकत हैं। नायक के नाम के विषय में इसका मत है कि इस नाम के साथ नायक को अध्यापक बनना चाहिए न कि पत्रकार।

तो कथा शुरू होती है दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के लॉन से। पत्रकारिता का यह कोर्स पूरे दो वर्ष का है, जिसे पूरा कर लेने के बाद नौकरी मिलने की रही-सही संभावना भी समाप्त हो जाती है। पर चूँकि अभी यह इनका प्रथम सेमेस्टर है, इन्हें न इस सच्चाई का पता है न ये जानना चाहते हैं।

पहले सेमेस्टर का दूसरा महीना खत्म होने को है। सभी का आपस में परिचय ताजा-ताजा है। कुछ आनंद जैसे छात्र हैं जिन्होंने प्रवेश लेते ही कन्या फाँसने के एकसूत्री कार्यक्रम पर परिश्रम करना शुरू कर दिया है।

लॉन में आठ-दस लोग बैठे हैं। सभी आपस में धीरे-धीरे खुल रहे हैं। लड़कों में नायक कृष्ण मुरारी, नायक का मित्र विमल, विभव, आनंद, शशि, झा जी और लड़कियों में रजनी, शीतल, बबली और निधि वगैरह बैठी हैं। झा जी करीब अड़तीस वर्ष के प्रौढ़ हैं जो विवाह न होने के कारण लड़के कहे जाते हैं। इस कोर्स के लिए उम्र की संभवतः अधिकतम कोई सीमा नहीं है और न्यूनतम सीमा इक्कीस वर्ष है। इसलिए विद्यार्थियों में शीतल, बबली, सुंदर और नरेंदर जैसे बच्चों से लेकर झा जी जैसे बुजुर्ग भी हैं। इनके आधे से ज्यादा बाल सफेद हो चुके हैं और दाढ़ी भी बहुमत की ओर जा रही है। इनका इंफ्रास्ट्रक्चर देखकर लगता है कि अब ये हमेशा लड़के ही रहेंगे। आप हिंदी साहित्य से एम.ए. हैं और बोरियत की हद तक शरीफ हैं। खास तौर पर लड़कियों से बात करते समय चुतियापे की हद तक सौम्य एवं भद्र बन जाते हैं। सभी विद्यार्थी इनका बहुत सम्मान करते हैं और इन्हें इनके पूरे नाम से न पुकार कर झा जी कहते हैं (वैसे ज्यादातर को इनका पूरा नाम पता ही नहीं है, इनकी सौम्यता और गरिष्ठता देखकर लगता है कि बचपन से ही इनका नाम झा जी ही है)। ये कहीं अनुवादक की नौकरी भी करते हैं, इसलिए चाय अक्सर ये ही पिलाते हैं। जब झुंड में कोई लड़की भी मौजूद हो, तक झा जी से चाय की फरमाइश की जाती है और ये सहर्ष हाथ बटुए पर ले जाते हैं। यदि साक्षात किसी लड़की ने फरमाइश की हो तो झा जी प्रायः समोसे भी मँगा ही लेते हैं। अभी झा जी जाने के लिए उठ खड़े हुए हैं।

‘अब मैं चलूँगा।’

‘अरे झा जी, बैठिए न।’ एक की जिद।

‘कार्यालय जाने को विलंब हो रहा है।’

‘झा जी, पाँच-दस मिनट बैठिए, फिर मैं भी चलूँगा। मुझे भी उधर ही जाना है।’ एक का प्रस्ताव।

‘आप लोग बैठें। मुझे अनुमति दें।’ झा जी का निश्चय पक्का है।

ठीक इसी समय नायिका की एंट्री होती है। नीली जींस और सफेद कुरते पर उसने काला दुपट्टा बेपरवाही से फेंक रखा है। वह आती है, एक नजर सबकी खाली हो चुकी चाय की प्यालियों पर डालती है और एक नजर जाने को तत्पर झा जी पर। उसके दोनों हाथ जुड़ जाते हैं और जलतरंग सी आवाज आती है।

‘नमस्कार झा जी। जा रहे हैं? हमें चाय नहीं पिलाएँगे?’

झा जी इस वार से बच नहीं पाते।

‘क्यों नहीं वेदिका, बैठो।’ झा जी आधे दिन की तनख्वाह प्रत्यक्ष कटती देखते हुए भारी कदमों से चाय लाने चले जाते हैं। इस क्षण उसके मन में एक अजीब प्रश्न कौंधता है कि चाय की खोज किसने की।

पाठकों, इस क्षण को ध्यान से पकड़िए। यही वह क्षण है जब नायक के मन की प्रेमकली खिलकर फूल बनती है। नायक नायिका पर बुरी तरह आसक्त होता है। नायिका नायक के बगल में बैठने को उद्यत होती है और उससे मुस्कराकर कहती है, ‘मुरारी जी, जरा खिसकिए।’

नायक बेहाल, नायक निढाल, नायक हलाल। मुरारी जी, मुरारी जी, मुरारी जी, यह शब्द उसे इतना प्रिय लग रहा है कि उसे विश्वास नहीं हो रहा कि यह वही सड़ेला नाम है जिसे बदलने के वह सपने देखा करता है। इसके बाद वहाँ कुछ और उल्लेखनीय नहीं हुआ। क्या आप होनेवाली घटना का इंतजार कर रहे हैं? साहेबान, घटना होकर खत्म हो चुकी है। यह मुख्तसर सी घटना और यह एक पंक्ति से भी छोटा संवाद ‘मुरारी जी, जरा खिसकिए’ ऐतिहासिक महत्व पा चुका है। इस घटना के बाद ही सभी सहपाठियों ने मुरारी जी यानी नायक के हाव-भाव में क्रांतिकारी और हाहाकारी परिवर्तन देखा है। कुछ करीबियों, जैसे नायक के मित्र विमल का, जो नायक की हर पीड़ा से परिचित है, कहना है कि ‘मुरारी जी जरा खिसकिए’वाली घटना के बाद से मुरारी जी जरा के बजाय बहुत ज्यादा खिसक गए हैं।

नायक पांडव नगर में रहता है जो यमुना पार पड़ता है और बिहारियों का गढ़ कहा जाता है। पांडव नगर में घुसने पर पहले-पहल नायक को मुगालता हो जाता था कि वह मुंगेर के बेलन बाजार में घुस रहा है। यहाँ जो दिल्लीवासी हैं वे भी यहाँ के बिहारियों से आक्रांत हैं। नायक कुछ समय पहले तक अपने मुहल्ले में हुई एक घटना के कारण उदास था। उसके मकान के सामनेवाले मकान में एक लड़की रहती है, जिसे शुरू-शुरू में नायक लाइन मारा करता था और विकल्पहीनता की स्थिति में खूबसूरत कहा करता था। एक दिन सुबह-सुबह न जाने किस बात पर लड़की का अपनी माँ से झगड़ा हो गया और माँ-बेटी झगड़ते-झगड़ते गली में निकल आईं। नायक उस समय अपनी बालकॅनी में खड़ा होकर सिगरेट पी रहा था और बेरोजगारी के बाद युवाओं की सबसे ज्वलंत समस्या कब्ज पर चिंतन करते हुए प्रेशर बना रहा था। लड़की की माँ चिल्लाकर लड़की को गालियाँ दे रही थी। लड़की भी नहले पर दहला फेंक रही थी। लड़की ने अचानक जोर से चिल्ला कर अपनी माँ से कहा, ‘गौर से सुन ले, अब जो तूने मुझे गालियाँ दीं तो मैं किसी बिहारी के साथ भाग जाऊँगी, हाँ।’

माँ बेटी के ब्रह्मास्त्र से पराजित होकर चुप हो गई और अंदर चली गई। कहने की जरूरत नहीं कि भाग जाना गौण धमकी थी और बिहारी के साथ भाग जाना मुख्य धमकी। माँ के अंदर जाने के बाद लड़की ने नायक की ओर एक कातिल मुस्कान फेंकी और वह भी अंदर चली गई। नायक का सुबह-सुबह सिगरेट का जायका बिगड़ गया। उसने सिगरेट फेंकी और लैट्रिन में चला गया।

नायक इस घटना के बाद कई दिनों तक विरक्त सा रहा पर क्लास में जब उसका सबसे परिचय हुआ तो उसकी निगाहें नायिका पर अटक गईं। उसने नायिका से बात करने की बहुतेरी कोशिशें की पर नहीं कर पाया। इसी बीच वह ‘खिसकिए’वाली घटना हो गई।

नायक अब अपने मित्र विमल से नायिका का दिल जीतने की तरकीब जानना चाह रहा है। उसका मानना है कि साहित्यकार होने के नाते विमल के पास नायिका का दिल जीतने का कोई तरीका जरूर होगा। विमल की समस्या इधर दूसरी है। अधिकांशतः साहित्यिक पत्रिकाओं में लेखक के परिचय के साथ चित्र छापने का भी प्रावधान है। उसके अब तक जो फोटो छपे हैं, उसमें उसका पिचका बदरंग चेहरा और उड़े-उड़े खिचड़ी बाल पहले दिख रहे हैं (फोटो वैसी ही खिंच गई है जैसा वह है)। उसकी इच्छा एक सुंदर फोटो खिंचवाकर अगली कहानी के साथ भेजने की है, जो कि असंभव है क्योंकि परिचय के साथ केवल और केवल लेखक की ही फोटो छापने का नियम है।

समस्या की वजह यह है कि उसकी कहानी पढ़कर तो उसे एक भी पाठक ने आज तक प्रशंसा पत्र नहीं लिखा और उसे महत्वाकांक्षा है पाठिकाओं के कोमल, नरम, पुचकारते पत्रों की। तो उसकी समस्या भी नायक से कम विकराल नहीं है पर वह नायक की सहायता के लिए सहर्ष तैयार हो जाता है क्योंकि नायक अभी-अभी कैंटीन से चाय और समोसे लेकर आया है। इस मामले में वह जरूर साहित्यकार है। जिसका खाता है, उसका गाता भले न हो, उसकी सहायता के लिए जरूर तत्पर रहता है।

चूँकि यह सत्यगाथा कहानी के रूप में प्रस्तुत की जा रही है न कि उपन्यास के रूप में, इसलिए हर जगह वार्तालाप के मुख्य और संपादित अंश ही दिए जा रहे हैं। प्रस्तुत हैं वार्तालाप के मुख्य अंश।

‘मुझे आजकल रातों को नींद नहीं आती।’ नायक की गंभीर समस्या।

‘घर से पैसे नहीं आए क्या?’ साहित्यकार का वाजिब प्रश्न।

‘नहीं, वह बात नहीं है। हर समय उसी का खयाल आता रहता है।’ नायक का रहस्योद्घाटन।

विमल गंभीर होकर सोचने लगता है। गंभीर होकर सोचने के लिए गंभीर दिखना भी पड़ता है। इसे ध्यान में रखते हुए विमल एक सिगरेट भी सुलगा लेता है। एक हाथ में चाय और दूसरे हाथ में सिगरेट लेकर शून्य में देखने लगता है (बीच में उसने कुशलता से समोसे का भी संयोजन कर लिया है)। समोसा खाता है, चाय सुड़कता है, कश लगाता है और शून्य में घूरता हुआ कुछ सोचता है। सिगरेट आधी से ज्यादा खत्म हो गई है पर विमल अभी तक कुछ बोला नहीं है। नायक व्यग्र कि अब इतनी सिगरेट तो उसे मिलनी ही चाहिए पर वह खतरा नहीं उठाना नहीं चाहता। क्या पता सिगरेट खत्म होने से ठीक पहले कोई आयडिया आ जाय। बहुत से साहित्यकार एक से एक क्रातिंकारी विचार, कहानियाँ और कविताएँ शून्य में ही घूरकर पैदा करते हैं, नायक यह बात भली-भाँति जानता है।

आखिर विमल अंतिम कश लेकर सिगरेट दूर फेंकता है। नायक सिगरेट की दिशा में गर्दन घुमाता है और सिगरेट को गिरकर सुलगते देखता रहता है। साले ने एक कश भी नहीं लगाने दिया। खैर अब किसी क्रांतिकारी विचार के लिए विमल की ओर देखता है।

‘मेरा खयाल है कि अब हमें फ्रीलांसिंग के लिए कुछ अच्छे अखबारों में बात करनी चाहिए।’ विमल का क्रांतिकारी विचार।

नायक क्रोध से भन्ना उठा है। विश्वविद्यालय की शब्दावली के अनुसार कहें तो उसकी सुलग गई है। वह गालियों से नवाजते हुए विमल को चाय पीने से पहले का छिड़ा हुआ मुद्दा याद दिलाता है। विमल भूल जाने के लिए क्षमायाचना करता फिर से सोचने लगता है। वह गंभीर होकर सोचना चाहता है कि नायक झपट कर सिगरेट जला लेता है और खुद पीने लगता है। अब दोनों अलग-अलग शून्यों की तरफ देख रहे हैं और समस्या पर विचार कर रहे हैं। विमल बीच-बीच में कनखियों से नायक के हाथ की तरफ देख ले रहा है कि सिगरेट आधी रह जाय तो वह माँग ले और गंभीर से गंभीरतर होकर सोच सके। वैसे उसे पता है ऐसी समस्याओं में गंभीरतर हो कर सोचने से काम नहीं बनता बल्कि गंभीरतम होकर सोचना पड़ता है। और सिगरेट के साथ भी कोई भला गंभीरतम होकर सोच सकता है। कभी नहीं।

तो गंभीरतम होकर सोचने के लिए दोनों अपने मित्र शशि के कमरे पर पहुँचते हैं। शशि और विभव क्रमशः बिहार और उत्तर प्रदेश से हैं और हरिनगर में एक शानदार कमरा लेकर रहते हैं। इनके मकान मालिक दिल्ली के मकान मालिकों के विपरीत बहुत अच्छे और उदार दुर्लभ किस्म के जीव हैं। कमरे के साथ टेबल कुर्सी, पंखा ओर बिस्तरा उन्होंने फोकट में दे रखा है। कमरा बहुत अच्छा, सुविधायुक्त और हवादार है। वरना विभव और शशि पूरी दिल्ली में अच्छा कमरा खोजते-खोजते अवसाद से इतना भर गए थे कि खाली कमरों के बाहर लगे टु लेट के बोर्ड पर टु और लेट के बीच आई लिख कर अपनी निराशा दूर करते थे।

कमरे पर सभी एकमत से सहमत हैं कि नायक की समस्या का समाधान होना इस समय सबसे जरूरी है। तो आज की रात पीते हुए विचारणीय ज्वलंत मुद्दा न तो इराक पर अमेरिकी आक्रमण है न सेंसेक्स चढ़ने के पीछे की वजह बल्कि नायक की प्रेम पीड़ा सब पर भारी है।

तो उस रात छक कर पीने के बाद नायक कृष्ण मुरारी के प्रेम पर व्यापक चर्चा हुई और उसी रात यह रहस्योद्घाटन हुआ कि नायक का मित्र शशि भी क्लास की एक सुंदर छात्रा निधि पर जी जान से मर मिटा है। ध्यातव्य है कि यह वही निधि है जो न्यूज रायटिंग की कक्षा में एंटी करप्शन ब्यूरो को गैर भ्रष्टाचारी विभाग लिखकर अध्यापक का विशेष आकर्षण और कक्षा में अपार ख्याति अर्जित कर चुकी है। वह खोजी पत्रकार बनना चाहती है क्योंकि उसके दादा खोजी पत्रकार थे और पिता भी। अपनी खानदानी पत्रकारिता पर उसे गर्व है।

यदि आप जानना चाहते हैं कि उस रात क्या-क्या बातें हुईं तो आपको निराशा होगी। मेरा मकसद रोज की लंबी चौड़ी बातें सुनाकर आपको बोर करना नहीं है। उस रात पीने के बाद तीनों में गहरी छनी और महसूस किया कि पीने के बाद वे ज्यादा विद्वतापूर्ण तरीके से समस्याओं का विश्लेषण कर पा रहे हैं फलतः वे हर दो-तीन दिन पर समस्याओं का विश्लेषण कर उनका समाधान निकालने लगे। न गंभीर समस्याओं की कमी थी न धन की। धन विमल और नायक के लिए समस्या हो सकती है शशि के लिए नहीं। शशि के पूज्य पिताजी लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता हैं और उसके घर से पैसे तकिए के खोल में भर के आते हैं। तो तीनों ने पीकर ‘प्रेम में सफलता कैसे पाएँ’ नामक गोष्ठी को घंटों चलाया। तीनों, यानी नायक, शशि और विमल। यहाँ यह बताना भूल जाने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ कि विभव नहीं पीता। उसका कहना यह है कि जिस दिन वह इस लायक हो जाएगा कि रोज ब्लैक डॉग का खर्च वहन कर सके, उस दिन पीना शुरू करेगा (न पीनेवालों के तर्क पीनेवालों के तर्कों से कमजोर थोड़े ही होते हैं)। पीने के बाद उस रात क्या बातें हुईं, यह जानने के लिए किसी भी एक रात की बातचीत देख लीजिए, चित्त शांत हो जाएगा। चूँकि बिल्कुल यही तस्वीर दूसरे सेमेस्टर तक खिंच आई यानी नायक-नायिका की बातचीत औपरचारिक स्तर से आगे नहीं बढ़ पाई, इसलिए पेश है दूसरा सेमेस्टर खत्म होने के कुछ दिनों पहले की दारू पीने के बाद चली गोष्ठी के मुख्य एवम यथासंभव संपादित अंश।

पहला आधा घंटा

शशि : यार मुरारी, कब तक आँखों ही आँखों में बातें करते रहोगे? अब उसको बता दो।

नायक : यार, उसके सामने जाते ही जबान बंद हो जाती है।

विमल : अरे यार, डरना क्या, एक बार प्रपोज तो करो उसे। जो होगा, देखा जाएगा।

शशि : अच्छा, उसने हाँ कर दी तो...?

नायक : (मुस्कराहट ऐसी, जैसे हाँ कर दी हो) तो क्या...? प्यार को अंजाम तक पहुँचाएँगे। कोर्स खत्म होते ही किसी बढ़िया चैनल में नौकरी ज्वाइन कर लूँगा... फिर शादी।

दूसरा आधा घंटा

नायक : आइ लव हर हिक्... वेरी मच यार।

विमल : तो बताओ उसे हिक्... यह काम तो तुम्हीं करोगे हिक्... कोई दूसरा थोड़ी...।

नायक : एवरी नाइट आइ सेंड हिक्... एस एम एस टु हर... इन विच आइ राइट दैट आइ हिक्... लव यू बट...

शशि : बट क्या, भोसड़ीवाले... हिक्... (शशि अक्सर पीकर आपे से बाहर होने लगता है)।

यहाँ विभव का हस्तक्षेप होता है। इन पीनेवालों के बीच इस न पीनेवाले का काम यही है कि वह बाउंड्री वॉल तोड़नेवालों को डाँटकर सीमा में रखे। कोई गालियाँ देने या मार-झगड़े में न पड़े। पीने के बाद सब उससे डरते भी हैं। वह डाँट कर कड़े शब्दों में चेतावनी देता है, ‘शशि, संसदीय भाषा का प्रयोग मत करो। यह संसद नहीं है। अगल-बगल शरीफ लोग भी रहते हैं।’

विमल : बट क्या यार हिक्... थोड़ा नमकीन हिक्... इधर करना।

नायक : बट फेल्ड... माई मोबाइल शोज दैट मैसेज सेंडिंग फेल्ड...।

तीसरा आधा घंटा

शशि : यार निधि भी मुझे हिक्... बहुत पसंद करती ...है हिक्।

नायक : एवरी नाइट हिक्... आइ सेंड... हिक्... टु हर... हिक्... बट फेल्ड हिक्...।

विमल : बी बोल्ड... हिक् बोथ ऑफ यू। ...एक-एक हिक् लाल... गुलाब हिक् लो... और हिक् कह दो... आइ लव हिक् यू... शशि मेरा थोड़ा लार्ज बनाना हिक्...।

शशि : केवल मैं ही नहीं... हिक्... उसे नहीं चाहता। वह भी मुझे हिक् चाहती है। आज उसने मुझसे... पूछा हिक्... कि आज तारीख क्या है... हिक्...?

नायक : एवरी नाइट हिक्... आइ... सेंड हिक्... बट फेल्ड...।

विमल : फिल्म दिखाने हिक्... ले जाओ... हिक्... दोनों को और दिल की बात हिक् कह दो...। थोड़ा हिक्... नमकीन इधर करना...।

शशि : मुझसे ही तारीख हिक्... क्यों पूछी... और लोग भी तो... हिक् थे वहाँ... हिक् हिक्।

नायक : एवरी नाइट हिक्... आइ सेंड... हिक्... बट फेल्ड...।

विमल : प्रपोज हर... हिक्। मेरा हिक्... थोड़ा लार्ज बनाना ...यार।

शशि : मुझसे हिक्... ही क्यों हिक्...? शी... हिक् लव्स मी... हिक् मी।

नायक : एवरी नाइट... आइ हिक्... बट फेल्ड...।

ये बातचीत के मुख्य अंश आपके सामने हैं। क्या केवल बातचीत सुनकर आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि तीनों में से लेखक कौन है? खैर उसका कहानी से कोई सरोकार नहीं। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि निधि ने आगेवाली पंक्ति से सिर घुमाकर पीछे की तीसरी पंक्ति में बैठी बबली से समय पूछा था जो ठीक शशि के पीछे बैठी थी और शशि प्रसन्नता से इतना फूल उठे थे कि छाती फटते-फटते बची थी। भरसक सौम्य मुस्कराहट (जो कि बहुत अश्लील लगी थी) चेहरे पर लाकर बोले थे - नौ अप्रैल। रही नायक के मोबाइल से नायिका के नंबर पर मैसेज न पहुँचने की समस्या, तो पता नहीं यह हरकत वह रोज क्यों करता है। शायद उसे यकीन है कि सच्चे प्यार में चमत्कार भी हो सकते हैं, वरना उसे अच्छी तरह पता है कि एम टी एन एल के लैंड लाइन फोन पर मैसेज पहुँचे, यह सुविधा अभी प्रकाश में नहीं आई है, अस्तु।

अब चलते हैं तीसरे सेमेस्टर में। नायक के घर से आजकल फोन बहुत ज्यादा आ रहे हैं। नायक आजकल रोज अपने पिता से बात करता है। बात क्या करता है, दोनों सुपरहिट सार्वभौमिक फिल्म ‘बाप और बेटा’ के सुपरहिट संवादों का अभ्यास करते हैं।

बाप : पढ़ाई कैसी चल रही है?

बेटा : जी, अच्छी चल रही है।

बाप : पैसे हैं या खत्म हो गए हैं?

बेटा : ‘जी अभी हैं’ या ‘जी खत्म हो गए, भेज दीजिए’।

बाप : ये कोर्स पूरा करने पर नौकरी तो मिल जाएगी न?

बेटा : हाँ, हाँ, दिल्ली विश्वविद्यालय का नाम ही काफी है।

बाप : चैनल में या अखबार में...?

बेटा : उहूँ, अखबार में कौन जाना चाहता है अब? ...चैनल में।

बाप : चलो, जल्दी किसी अच्छे चैनल में नौकरी लग जाए तो तुम्हारी शादी कर दी जाए।

बेटा : अभीऽऽऽऽऽऽऽऽऽ कहाँ शादी...?

बाप : अरेऽऽऽऽऽ अब उमर सरक रही है बेटा...।

लगभग रोज उनके संवादाभ्यास यही पर समाप्त हो जा रहे हैं। नायक अपनी शादी के बारे में सोचकर चिंतित हो जा रहा है। जब चिंतित हो जा रहा है, तो रात को मित्रों के साथ शराब पीने लग रहा है। जब पी रहा है, तो नायिका के लैंड लाइन पर अपने मोबाइल से ‘आइ लव यू’ के मैसेज भेजने लग रहा है... बट फेल्ड।

एक और अति महत्वपूर्ण घटनाक्रम के दौरान नायक के मित्र विभव का यह परदाफाश हुआ है कि वह शादीशुदा है और उसकी पत्नी गाँव में रहती है। इस बार विभव जब गाँव गया था तो पत्नी से समागम के दौरान उसे शीघ्र स्खलन की समस्या का सामना करना पड़ा। हर बार पत्नी के फॉर्म में आने से पहले विभव बाबू आउट हो चुके होते थे। इस समस्या से बचने के लिए उन्होंने बुजुर्गों के कहे अनुसार समागम करते हुए किसी और विषय पर ध्यान लगाने की पद्धति अपनाई और ‘आज की पत्रकारिता’ पर गहन चिंतन करते हुए सेक्स करने लगे। मगर ऐसा करते ही समस्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई।

यहाँ आने के बाद उसकी समस्या ने बड़ा अजीबोगरीब रूप ले लिया है। पत्रकारिता के विषय में चर्चा होते ही पत्नी की निर्वसन देह आँखों के सामने नाचने लगती है। आज की पत्रकारिता पर विचार करते ही निवर्सन देहों का झुंड कल्पना में कल्पनातीत ढंग से विचरण करने लगता है, जिसका खामियाजा वह कई बार सपनों में भुगत चुका है।

नायक की आयु के हिसाब से उसके प्रेम का ढंग निहायत ही बचकाना है। यह संकोचपूर्ण अभिव्यक्ति-अनाभिव्यक्ति उन किशोरों के पहले प्रेम के लिए (या भूमंडलीकरण के कठिन दौर को देखते हुए ज्यादा से ज्यादा दूसरे प्रेम के लिए) मान्य होती है, जिनकी मूँछें उगने के प्रथम चरण में होती हैं। हालाँकि अब प्रेम इन सब बातों से इतना ऊपर उठ चुका है कि अब प्रेम में पड़ने के लिए मूँछें उगने की अघोषित शर्त बेमानी हो चुकी है। मगर नायक के बचकाने प्रेम और उसकी मिली-जुली हरकतोंवाला उसका समूह इसके बावजूद बुद्धिजीवियों का समूह कहा जाता है। अट्ठाईस-उंतीस की उमर होने के बावजूद अगर वे पढ़ाई कर रहे हैं और इसके लिए बाकायदा घर से पैसे भी खींच रहे हैं तो यह उनकी बुद्धि का ही कमाल है, जिसके बल पर वे जी रहे हैं (बुद्धि$जीवी = बुद्धिजीवी)। मित्रों द्वारा बुद्धिजीवी संबोधन दिए जाने के गहरे कारण हैं। वैसे कक्षा के कुछ डेलहाइट जो जन्म से लेकर आज तक दिल्ली से बाहर नहीं गए, (गए भी तो सोनीपत या गुड़गाँव) इस समूह को ‘बिहारी समूह’ कहते हैं, जबकि विमल, विभव और आनंद क्रमशः बनारस, कानपुर और भोपाल से हैं। इन महात्माओं के लिए दिल्ली छोड़कर पूरा हिंदी भाषी क्षेत्र बिहार है।

कारण से पहले संक्षिप्त इतिहास। नायक हो, नायक का मित्र विमल, विभव या शशि, सबने स्नातक होते ही ढेर सारे सपने पाल लिए थे। इन सपनों को वे अपना खून पिलाकर पाल रहे थे और स्नातक होते ही वे आई आई एम से प्रबंधन का डिप्लोमा लेने के लिए चिंताजनक रूप से गंभीर हो गए थे। किसी को एक ही प्रयास में औकात पता चल गई और किसी की आँखें खुलने में दो प्रयास लगे। बकौल नायक, उसकी रीजनिंग थोड़ी कमजोर थी और साली अंग्रेजी ने धोखा दे दिया वरना अहमदाबाद या बंगलौर नहीं तो इंदौर तो कहीं नहीं गया था। इसके बाद बकौल विभव, वह भौतिकतावादी महत्वकांक्षाओं से बाहर निकल आया। इस दौरान वह देश की नकारात्मक परिस्थितियों से दो-चार हुआ और ठीक इसी दौरान उसके मन में देश के लिए कुछ करने का जज्बा जागा। इसी के थोड़ा आगे-पीछे सबने प्रशासनिक सेवाओं में जाने की तैयारी की और देश सेवा के इस रास्ते में प्रतिद्वंदिता और संघर्ष ज्यादा पाने पर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनकर देश सेवा करने की सोची। ईश्वर की लीला देखिए कि ये टकराए भी तो देश की राजधानी में जहाँ से देश की सेवा करना कितना आसान है। (आपस में बहुत कम समय में इनकी इतनी बनने लगी कि इतनी मिलती-जुलती कहानियाँ देखकर इन्हें आश्चर्य हुआ कि ये अकेली मेधा नहीं हैं जिनकी प्रतिभा को नहीं पहचाना गया)। लुब्बेलुआब ये कि प्रशासनिक सेवा के बारे में कुछ समय के लिए गंभीर होने के कारण इनका सामान्य ज्ञान कक्षा के अन्य बच्चों से काफी अच्छा है और वे इनकी बौद्धिक चर्चाएँ सुनकर दहशत में रहते हैं।

विमल की कहानी पढ़कर एक पाठिका ने उसे प्रशंसा पत्र भेजा है। प्रशंसा पत्र क्या, छोटा-मोटा प्रेम पत्र है। कहानी के बारे में सिर्फ एक वाक्य लिखा हुआ है - आपकी कहानी अच्छी लगी। विमल के भीतर का लेखक उत्साहित होकर जानना चाहता है - कौन सी कहानी, किस पत्रिका में पढ़ी, कहानी में क्या अच्छा लगा, क्या बुरा, लेकिन आगे कुछ नहीं लिखा है। अलबत्ता शेर बहुत लिखे हैं - ‘लिखती हूँ खून से स्याही न समझना, मरती हूँ तुम्हारी याद में जिंदा न समझना।’ यह शेर खत्म होते ही लाइन खींचकर दूसरा शेर लिखा है - ‘पत्र मेरा जा रहा है दिल के तार-तार से, पसंद अगर ना हो तो फाड़ देना प्यार से’। फिर तीसरा - ‘दोस्ती करते हैं ये लोग कसम खाते हैं, प्यार हमसे करते हैं गले किसी और को लगाते हैं।’ विमल औचक ही भौंचक हो गया है। किससे दोस्ती, किसकी कसम, किसे गले लगाया, ये कौन पाठिका है यार, ऊपर से मात्रा की इतनी गलतियाँ...। विमल का मूड हत्थे से उखड़ गया है। सारा कार्ड ‘चलती है गाड़ी तो उड़ती है धूल’ के शायर के शाहकारों से भरा हुआ है। ले-देकर यही एक प्रशंसक का पत्र आया है जिसकी चर्चा इसने न किसी से की है न करेगा।

तीसरे सेमेस्टर की यही कुछ घटनाएँ हैं। कुछ प्रक्रियाएँ भी हुई हैं, जैसे नायक-नायिका की बातचीत अब कुछ हद तक अनौपचारिक स्तर पर आ चुकी है। शशि ने अपना प्रेम प्रस्ताव निधि के सामने रख दिया है जो अभी तक पारित नहीं हुआ है। आनंद ने कक्षा की ही एक छात्रा शीतल को फाँस लिया है और दोनों हर शाम एक साथ शीतल पेय पीते आनंद करते देखे जा रहे हैं। विभव को किसी ने, उसके तर्कों से ऊबकर, ब्लैक डॉग पिलाने का कलेजा दिखा दिया था और अब उसका यह कहना है कि वह पीना तब शुरू करेगा जब रोज शैंपेन का खर्च वहन करने लायक हो जाएगा। झा जी आजकल इस ग्रुप के पास नहीं फटकते, जबकि भावी खोजी पत्रकारों का यह ग्रुप उनको खोजी कुत्तों की तरह सूँघता फिरता है। वैसे झा जी पत्रकारिता का क्षेत्र छोड़ने के विषय में कहते सुने गए हैं क्योंकि उनकी अतिशुद्ध हिंदी के कारण उन्हें हिंदी अखबारों में नौकरी मिलने में बड़ी बाधा आ रही है।

चौथा सेमेस्टर आ गया है। सभी एकाएक बड़े हो गए हैं। सबको अपनी जिम्मेदारियों का अहसास है। मस्ती करने के दिन अब चले गए। अब नौकरी ढूँढ़ना शुरू कर दो। अब सीरियस हो जाओ। कहीं इंटर्नशिप के लिए प्रयास करो। ऐसे जुमले ग्रुप में क्या पूरी कक्षा में तैरने लगे हैं। पत्रकारिता पाठ्यक्रमों का अलिखित नियम सभी जानते हैं कि पाठ्यक्रम समाप्त होने से पहले-पहले कहीं व्यवस्थित हो गए तो ठीक वरना पाठ्यक्रम समाप्त करके आप खाली बैठे हैं तो संभावनाएँ धीरे-धीरे शून्य होती जाती हैं।

चौथे सेमेस्टर में ग्रुप एक चैनल द्वारा संवाददाता के पद के लिए आयोजित साक्षात्कार में शिरकत करके लौटा है। साक्षात्कार में नायक से पूछे गए प्रश्नों में से कुछ निम्नलिखित हैं -

प्रश्न - अच्छा, तो आपकी रुचि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में है? यह बताइए, अमरीका से जो रक्षा समझौता हो रहा है, उसमें क्या-क्या शामिल है ?

नायक ने खुश होकर उत्तर दिया। विषय पर उसकी पूरी पकड़ है।

प्रश्न - अगर यह रक्षा समझौता हुआ तो बोलिविया से हमारे संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?

नायक ने कुछ उत्तर दिया पर विषय पर उसकी पकड़ ढीली हो रही है।

प्रश्न - इथोपिया और इरिट्रिया में खराब संबंधों की वजह क्या है?

नायक ने कुछ उत्तर तो जरूर दिया पर समझ लिया कि मामला पहुँच से बाहर जा रहा है।

प्रश्न - अच्छा, यदि इथोपिया में हमास जैसा संगठन होता और इरिट्रिया में एडवर्ड सईद होते तो स्थिति कैसी होती? पचास शब्दों में लिख कर बताइए।

मामला खत्म। नायक जानता है चैनलों में नौकरी के लिए ज्ञान से ज्यादा जरूरत है अच्छी यानी मिश्रित अशुद्ध भाषा और स्वच्छ उच्चारण की। नायक का व्यक्तित्व तो अच्छा है, पर भाषा और उच्चारण उसे मार दे रहे हैं। भाषा का बिहारी टच उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। साक्षात्कार देकर निकलते समय चैनल के एक प्रकांड पत्रकार से नायक की मुलाकात हो गई। नायक ने जब उससे इथोपिया और इरिट्रिया के खराब संबंधों की वजह तस्दीक करनी चाही तो वह सिगरेट सुलगाते हुए दार्शनिक अंदाज में बोला, ‘इथोपिया देश का नाम तो मैंने सुना है, पर यह इरिट्रिया कहाँ हैं बंधु?’

लगे हाथ विमल के साक्षात्कार के भी कुछ अंश देख लेते हैं।

प्रश्न - अच्छा, तो आप कहानियाँ लिखते हैं... बहुत अच्छे। आप तो साहित्य के आदमी हैं, आपका पत्रकारिता में क्या काम?

कोई उत्तर नहीं।

प्रश्न (जो कि प्रश्न नहीं विचार है) - क्या आपको पता नहीं कि साहित्य में रुचि पत्रकारिता के लिए विष के समान है?

कोई उत्तर नहीं (हालाँकि उत्तर था विमल के पास, पर आत्मविश्वास नहीं था)

प्रश्न - किन पत्रिकाओं में छपी हैं आपकी कहानियाँ?

उत्तर बहुत ही बुझे मन से दिया गया।

प्रश्न - कोई फायदा नहीं होता पांडेजी, इनमें लिखने से। वहाँ आप बड़े लेखक भी बन जाएँगे तो भी यहाँ छोटा सा टीवी पत्रकार बनने के लिए आपको नाक रगड़नी पड़ेगी। अरे, कौन जानता है आपको लिखने की वजह से पांडेजी...?

उत्तर तो कोई नहीं पर जातिसूचक शब्द वाकई अपमानजनक होते हैं (भले ही क्यों होते हैं इसका संतोषजनक उत्तर विमल ढूँढ़ नहीं पा रहा), यह विमल को बड़ी शिद्दत से महसूस हुआ है। जानने का जिक्र आते ही उसे उस पाठिका द्वारा भेजा गया कार्ड याद आ गया है और उसका रहा-सहा मानसिक संतुलन भी बिगड़ गया है।

प्रश्न : अच्छा आप चिली में चुनावों की पूरी प्रक्रिया को समझाते हुए पिछले पाँच राष्ट्रपतियों के नाम बताइए।

उत्तर : जी, मुझे ठीक से पता नहीं।

प्रतिक्रिया : तो, छीलो। (ऐसा साक्षात्कारकर्ता ने मुँह से नहीं भाव-भंगिमाओं से कहा)

ऐसा नहीं कि वहाँ किसी की नौकरी लगी ही नहीं। निधि को एंकर की नौकरी उसी चैनल में लग गई। दस दिन के भीतर ही उसका बुलावा आ गया। चूँकि वह बारोजगार हो गई है, उत्सुकतावश उससे पूछे गए दो-चार प्रश्न भी देख लेते हैं।

प्रश्न : जर्मनी के चांसलर कौन हैं?

उत्तर : सॉरी सर, आइ डोंट नो। (प्रश्नकर्ता की ओर ऐसी निगाहों से देखते जैसे वह उत्तर के लिए विकल्प देगा)

प्रश्न : अच्छा बताइए, अमरीका के राष्ट्रपति कौन हैं?

उत्तर : सर क्लिंटन। सॉरी-सॉरी जॉर्ज बुश।

प्रश्न : यू.पी.ए. का अध्यक्ष कौन है?

उत्तर : सोनिया गांधी, आइ थिंक।

प्रश्न : श्योर?

उत्तर : सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह।

प्रश्न : सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह?

उत्तर : मनमोहन सिंह।

प्रश्न : आपको पूरा विश्वास है?

उत्तर : यस सर, आयम श्योर।

प्रश्न : हंड्रेड परसेंट श्योर?

उत्तर : यस्सर, हंड्रेड परसेंट श्योर।

प्रश्नकर्ता : वेरी गुड, आपका यह उत्तर तो सही नहीं है, पर आपका आत्मविश्वास काबिल-ए-तारीफ है। यदि संवाददाता का पद न मिले तो क्या आप एंकर की नौकरी करना चाहेंगी?

उत्तर : या सर, श्योर।

तो निधि शर्मा, जिनकी लंबाई पाँच फीट सात इंच है, जो काफी खूबसूरत हैं और जिनकी आवाज बहुत मधुर है, आजकल उस चैनल में एंकर हैं। ग्रुप में नौकरी की बात करें तो कुछ दिन बाद एक चमत्कार की तरह आनंद की भी कॉल आ गई। इसके पीछे की राजनीति यह है कि आनंद किसी सत्तारूढ़ केंद्रीय मंत्री के नाम का पत्र लेकर साक्षात्कार में आया था। एक, अणे मार्ग और दस जनपथ के मधुर संबंधों का उसने पूरा लाभ उठाया और नायक व उसका पूरा ग्रुप उसकी सफलता से उत्साहित व प्रसन्न है। नायक अपनी कमजोरी जानता है। वह आनंद के लिए मित्र धर्म के कारण प्रसन्न है वरना अपनी असफलता उसे खुश नहीं होने दे रही है। निधि का चयन भी उसे खिन्न कर गया है। जिस रात निधि का चयन हुआ, नायक दारू पीकर कहते सुना गया - एंकर... हुँह, यही वो एंकर होती हैं जो संवाददाता द्वारा यह सूचना दिए जाने पर कि जगुआर दुर्घटनाग्रस्त हो गया है, सवाल पूछती हैं हमारे दर्शक जानना चाहते हैं उसमें कितने यात्री सवार थे?

कुछ भी हो, नायक निराश नहीं है। हाल ही में उसे साक्षात्कारवाले दिन नायिका के पास बैठ अंतरंगता से बातें करते देखा गया है। पास जाने पर पता चला कि दोनों इंटरव्यू कला पर चर्चा कर रहे थे। नायिका का भी साक्षात्कार अच्छा नहीं रहा। खैर, अभी तो मंजिलें और भी हैं। राज की बात यह है कि नायक ईश्वर से अपनी नौकरी के लिए प्रार्थना नहीं करता, उसकी विनती है कि नायिका को जल्दी नौकरी मिल जाए, क्योंकि नायिका नौकरी के लिए बहुत परेशान है। अपने पर पता नहीं कैसे उसे विश्वास है कि जब भी वह नौकरी के लिए गंभीर हो जाएगा, नौकरी मिल जाएगी। बल्कि कुछ लोगों ने उसे यह तक कहते हुए सुना है कि अगर उसका किसी चैनल से बुलावा आया और एक ही स्थान हो तो वह खुद नहीं जाएगा बल्कि नायिका को भेज देगा। (इसी पर बनारस में एक कहावत प्रचलित है – गाँड़ी में गू नाहीं, नौ सियार के नेवता)

इसी बीच उसे पता चला कि निधि को नौकरी ऐसे ही नहीं मिल गई, उसने बहुत तगड़ा जैक लगवाया था।

‘ये जैक क्या होता है बे?’ नायक ने बस में खड़े-खड़े आनंद से पूछा था।

‘भक्साले, जैक नहीं जानते? अबे जुगाड़, सोर्स, पउआ, भौकाल... अबे पैरवी यार। जैसे मैंने करवाई थी।’ आनंद ने समझाया।

‘जैक’ के इतने सारे पर्यायवाची सुनकर नायक को यह शब्द भगवान कृष्ण के अनंत नामों की तरह सुहावना और चमत्कारिक लगा, पर इसके विषय में थोड़ा सोचते ही यह शब्द भगवान शंकर के अनंत नामों की तरह खतरनाक और प्रलयंकारी लगने लगा।

‘बिना जैक के किसी का कुछ उखड़ने वाला नहीं है बे।’ आनंद ने कड़े शब्दों में फैसला सुना दिया था और तभी सामने स्पीड ब्रेकर आ गया था और नायक का सिर बस की छत से जा टकराया था।

चौथा सेमेस्टर समाप्ति की ओर अग्रसर है। सभी चैनलों और अखबारों के दफ्तरों में चक्कर काटते नजर आने लगे हैं। नायक-नायिका थोड़ा और निकट आ गए हैं पर निकटता देखकर अंधा भी बता देगा कि इसमें प्रेम नहीं दोस्ती का ही तत्व है। नायिका हर बार नायक को अभिवादन करते हुए मुस्कराती है और नायक हर बार पीछे देखकर आश्वस्त हो लेता है। नायक का अमर और पवित्र प्रेम जो समय की आँच पाकर और पवित्र हो गया है, उसके चेहरे से दिखाई नहीं देता। जब नायिका आसपास बैठी होती है, चेहरे से वह उतना ही मूर्ख और निरीह दिखाई देता है, जितना पहले सेमेस्टर में, जब वह अपना प्रेम छिपाकर रखता था। अब उसका प्रेम छिपा नहीं है। पूरी क्लास को पता है। कारण हैं विमल और विभव। दोनों बड़े मुँहफट किस्म के इनसान हैं और खुलेआम नायक का नाम लेकर नायिका को छेड़ते रहते हैं। उनकी मंशा ये है कि नायिका के मन में नायक के लिए प्रेम अंकुर फूटें, पर मजाक ज्यादा हो जाने पर नायिका गुस्से में कहती है, ‘ये क्या स्टूपिड सी हरकतें करते रहते हो तुम लोग? विमल तो राइटर है, पर विभव तुम भी...?’ विमल समझ जाता है कि चूँकि वह राइटर है, लिचड़ई पर उसका तो हक है, पर विभव की छेड़खानी से गलत असर पड़ सकता है। आजकल वह अकेला ही नायिका के मन में नायक के प्रति प्यार जगाने की कोशिश कर रहा है।

दो दिन बाद नायिका का जन्मदिन है। पिछली बार तो जन्मदिन बीतने के बाद नायक को पता चला था और उसी दिन यह तारीख उसके मानस पटल पर जम गई थी जिसे ईमेल आई डी बनाते समय नायक ने पासवर्ड बनाया था। नायिका किताबों की बड़ी शौकीन है, इसलिए उपहार में किताब ही दी जाएगी पर कौन सी? विभव बहुत मेहनत से विमल की बातों से अंदाजा लगाकर बताता है कि नायिका को गोर्की की मदर देनी चाहिए। दरअसल नायिका को हिंदी के लेखकों के आत्मविश्वास के बारे में पता नहीं है। वह यह मानकर कि विमल लेखक है तो जरूर बहुत पढ़ता होगा, उससे दुनिया भर की किताबों के बारे में बताती रहती है। जिसे पढ़ने की जहमत वह कभी नहीं उठाएगा क्योंकि ऐसी तो वह जब चाहे तब लिख दे। तो इधर नायिका मदर पढ़ने की इच्छा जता रही थी। नायक दरियागंज से मदर खरीदता है, सुंदर सी पैकिंग कराता है और एक लाल गुलाब के साथ समय से पहले कॉलेज पहुँच जाता है। भले ही आज नायिका का जन्मदिन हो, वह आएगी अपने नियत समय पर ही। तब तक नायक कैंटीन के बाहर खड़ा होकर चाय पीते हुए समय काट सकता है।

कैंटीन के सामने वही रोज का मंजर है। कुछ झुंड खड़े हैं और चाय नाश्ते के साथ अपने मित्रों से गपशप कर रहे हैं। जिस झुंड में लड़कियाँ ज्यादा हैं उसमें से चिड़ियों के चहचहाने की अवाजें आ रही हैं। कुछ अध्यापक भी खड़े हैं। इनमें से कुछ को नायक पहचानता है। ये हिंदी विभाग के अध्यापक हैं जो अपने छात्रों के सौजन्य से चाय पी रहे हैं और बदले में उन्हें ‘राम की शक्तिपूजा’ में हनुमान के अतिमानवीय कार्यों की व्यंजना समझा रहे हैं। कुछ के चेहरों से टपकती बेचारगी देखकर लगता है कि यदि छात्र कुछ नाश्ता भी करा दें तो ये ‘अँधेरे में’ के काव्यगत वातावारण को मूर्त बनाने वाले अँधेरे की पूरी पोल खोल कर रख दें (पर समस्या यह है कि ये शोधछात्र न होकर साधारण छात्र हैं इसलिए गुरू वंदना मौखिक ज्यादा है)। इसी समय नायिका का गुलाबी रंग के कपड़ों (जिसके बारे में मिथक है कि यह लड़कियों का पसंदीदा रंग होता है और जिसे देखकर नायक ने उसी दिन जनपथ से तीन गुलाबी टी शर्टें खरीदीं) में आगमन होता है और नायक का ध्यान अध्यापकों से हट कर इधर आकर्षित होता है।

जन्मदिन की ढेरों बधाइयाँ। सब ने नायिका को मुबारकबाद दी है। जन्मदिन मुबारक हो वेदिका। थैंक्यू मुरारी। अब नायक कृष्ण मुरारी नायिका वेदिका को गोर्की कृत ‘मदर’ उपहार में देने ला रहा है। कैसा अर्थवान उपहार है यह? कैसा महान प्रेम है यह? इस प्रेम में एक महाकाव्य पनप सकता है बशर्ते यह प्रेम सफल हो जाय... आमीन। नायक के आगे बढ़ते ही शॉट फ्रीज हो गया है। सबकी निगाहें नायक पर हैं। नायक जैसे चाँद पर कदम उठा रहा है। उसका भार छठवाँ हिस्सा ही बच रहा है।

यह तुम्हारे लिए वेदिका। नहीं, नहीं मैं नहीं ले सकती। नायक थोड़ा निराश हो गया है। साहित्यकार मित्र दिमाग लगाता है। रख लो वदिका, तुम्हारी फेवरिट किताब है। नहीं विमल प्लीज सॉरी। नायिका तैयार नहीं है, उसे डर है उपहार रख लेने पर उसकी तरफ से प्रेम की स्वीकृति मान ली जाएगी। अरे रख लो, हम सबने मिलकर खरीदा है, विभव का मास्टरमाइंड। ‘मिलकर खरीदा है’वाला हथियार काम कर गया है। ओके थैंक्यू। नायक फूल देता है, लाल गुलाब। थैंक्यू मुरारी। नायिका फूल लेकर सूँघती है। नायक अति प्रसन्न है। फूल सूँघना मतलब नायक की विजय। वह खुशी जाहिर करना चाह रहा है पर नायिका के सामने नहीं, कहीं दूर जाकर। वह विमल को लेकर लाइब्रेरी के सामनेवाले झंखाड़ की तरफ जाता है जहाँ ‘कॉलेज के सौ मीटर के दायरे में तंबाकूजनित पदार्थ न बिकने का आदेश’ पारित होने के बाद से सिगरेट भी मिलने लगी है। दोनों झंखाड़ में घुसकर सिगरेट खरीदते हैं और सुलगाकर देर तक बातें करते रहते हैं। इस समय नौकरी-फौकरी जैसी वाहियात बात किसी के दिमाग में दूर-दूर तक नहीं है।

नायक कॉलेज से निकलता है तो ऐसा लगता है उसे थोड़ा-थोड़ा नशा हो आया हो। नायिका ने जाते वक्त नायक को दुबारा थैंक्यू कहा है और उसे एक चाबी का रिंग उपहार में दिया है। अब वह इस चाबी रिंग का क्या करेगा? पूछिए मत, वह इस समय उसके लिए दुनिया की सबसे कीमती वस्तु है। हो सकता है वह एक कार खरीदे और उसकी चाबी इस रिंग में लगा दे या फिर एक बंगला खरीद ले और उसकी चाबी इस रिंग में फँसा दे। कुछ भी... कुछ भी... कुछ भी।

रास्ते से गुजरते हुए वह 392 नंबर की बस देखकर रुक जाता है (इसी नंबर की बस से नायिका रोज अपने घर नोएडा जाती है)। सभी मित्र उसे रुका देख रुक जाते हैं। वह बस को इस कदर प्यार से देखता है गोया इससे कुचल कर जान दे देगा। यही सवाल पूछने पर वह अंग्रेजी में जवाब देता है कि इस बस से कुचल कर वह सीधा स्वर्ग पहुँचेगा। अंग्रेजी में...? पर अंग्रेजी तो नायक दारू पीने के बाद बोलता है, नशे में। ये दूसरा नशा है पाठकों। ये इतनी जल्दी नहीं उतरनेवाला जितनी जल्दी दारूवाला उतरता है। ये प्रेम का नशा है।

यहाँ से प्रेम कहानी में एक दुखद मोड़ आता है जो हर सफल प्रेम कहानी के लिए आवश्यक है। मुझे आशा है मेरी प्रेम कहानी भी एक दुखद मोड़ से गुजरकर सुखद परिणति को प्राप्त कर एक सुपरहिट कहानी बनेगी। मैं दावे से कह सकता हूँ कि आप इस कहानी को पढ़ने के बाद मेरे लेखन के कायल हो जाएँगे और मैं प्रेम कहानी विशेषज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित हो जाऊँगा।

नायक ने उसी रात नायिका को फोन किया। शाबाश नायक। सभी मित्रों की ओर से उसे फिल्म देखने के लिए आमंत्रित किया पर नायिका ने उसे दूसरी ही खुशखबरी सुना दी। उसने एक चैनल में साक्षात्कार दिया था, वहाँ से उसका बुलावा आया है, साथ ही कल शाम उसे शादी के लिए लोग देखने आ रहे हैं। नायक दहल गया। अभी तो प्रेम धीरे-धीरे परवान चढ़ना शुरू हुआ था, अभी इतना बड़ा झटका...? क्या नायिका ने उसे संकेत किया है कि...? क्या नायिका भी उससे...? क्या...? क्या...?

सभी ने मिलकर चर्चा की। काफी देर चर्चा के बाद यह निष्कर्ष निकला कि नायक जल्दी से जल्दी किसी समाचार चैनल में नौकरी पकड़े और अपने पिता को घिसे-पिटे संवादों से इतर नए संवाद दे। नायक को आनन-फानन में नौकरी पाना बहुत जरूरी है ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके। नायक एक अनोखे जोश से भर गया है।

सभी मित्रों ने एक-एक करके सभी समाचार चैनलों के दफ्तर जाना शुरू कर दिया है। हर जगह आवेदन पत्र मुख्य द्वार पर ही जमा कर लिए जाते हैं। जमा कौन करता है, जानना चाहते हैं तो दिल थाम के बैठिए। इन भावी पत्रकारों के आवेदन मुख्य द्वार पर तैनात गेटकीपर लेता है। वे कुछ निराश हुए। एक चैनल ऑफिस के गेटकीपर ने तो ये दया भी नहीं दिखाई।

‘आप लोग एप्लीकेशन कूरियर से भेजिए, बाइ हैंड नहीं लिया जाएगा।’ उसने खैनी मलते हुए फरमान सुनाया।

‘अच्छा, यहाँ हो सकता है हमारा ?’ नायक ने पूछा था। हैरानी होती है सोचकर कि नायक कुछ समय पहले तक इतना अपरिपक्व था कि ऐसे प्रश्न पूछता था।

‘जैक-वैक होगा तो हो ही जाएगा।’ गेटकीपर मुस्करा कर बताता है।

जैक, जैक, जैक... हर जगह जैक। नायक आवेदन करता रहा और हर जगह से बुलावे का इंतजार करता रहा। कहीं से कोई बुलावा नहीं आया जैसे किसी अंधे कुएँ में पत्थर फेंका गया हो। सभी इंतजार में थे कि बुलावा आएगा पर नायक के पास वक्त नहीं। ठीक है, उसकी कुछ कमजोरियाँ हैं, उसका कोई जैक भी नहीं, पर चैनल में ही जाना कोई जरूरी तो नहीं। वह प्रिंट की पत्रकारिता करेगा जो कि असली पत्रकारिता होती है (ऐसा उसके उन सीनियरों ने बताया है जो हर चैनल से दुत्कारे जाने के बाद प्रिंट में काम कर रहे हैं।)

नायक ने पहले राष्ट्रीय स्तर के अखबरों की खाक छानी फिर राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं की। सवाल वही था, यदि कोई जैक हो, किसी मंत्री-वंत्री से सोर्स लगाओ तो बात बने। नायक हैरान था। मीडिया में तो उसने सुना था अभी बहुत मौके हैं। रोज नए चैनल खुल रहे हैं, अखबार छप रहे हैं, पत्रिकाएँ निकल रही हैं, फिर ये हर जगह जैक...? बिहार से आए नायक और यूपी, एमपी से आए मित्रों के लिए इस बूमिंग इंडस्ट्री की हालत बहुत धक्का पहुँचानेवाली और स्वप्नतोड़ू थी।

नायक छोटे-छोटे क्षेत्रीय अखबारों के ऑफिस पहुँचने लगा। वह सच्चाई की ताकत, दैनिक सच्चाई, झूठ को जला दो, सांध्य बारूद, दैनिक तोप जैसे अखबारों में भी गया जो प्रथम बार में धर्मेंद्र की हिंसात्मक फिल्मों के टाइटिल लगते थे। इन अखबारों में उससे कहा गया कि वह दो महीना बिना पैसे लिए काम करे, दो महीने उसकी योग्यता को परखने के बाद कोई फैसला लिया जाएगा। सांध्य सच्चाई और सनसनीखेज खुलासा जैसे चार पन्ने के अखबारों में, जिनका दफ्तर एक कमरे का था, उससे कोई सनसनीखेज खुलासा करके लाने को कहा गया। उसके सामने सबसे सनसनीखेज खुलासा यह हुआ कि हर हफ्ते चार विज्ञापनों की व्यवस्था करने से इन अखबारों में नौकरी मिल जाती है। जैसा कि नाम से ही जाहिर है, ये अखबार पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं मिशन मानकर काम कर रहे थे और इनके एक कमरे के छोटे दफ्तरों में भी कई गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबू पराड़कर खैनी मलते या बीड़ी सुलगाते प्रायः दिख जाते थे।

वह गलती से कुछ ऐसे अखबारों के ऑफिस भी चला गया जो किसी व्यक्ति ने अपने पड़ोसी से बदला लेने के लिए निकालना शुरू किया था। पड़ोसी के पास शायद कोई तोप रही होगी जिसके मुकाबले में यह अखबार निकला होगा। इन अखबारों में ऊपर ऐश्वर्य राय या रानी मुखर्जी सरीखी सुंदरियों की कम कपड़ों में मोहक तस्वीरें होतीं और नीचे बलात्कार की खबर एक डरावने शीर्षक के साथ होती। चित्र व शीर्षक का खबर से ऐसा सुंदर सामंजस्य बैठाया जाता कि एकबारगी तो रानी या ऐश्वर्य के बलात्कार होने का भ्रम हो जाता। अगले पृष्ठों पर अपने शत्रु पर ऐसी भाषा में कीचड़ उछाला गया होता जिसमें प्रूफ की बहुत गलतियाँ होतीं। यहाँ काम करने के लिए उपरोक्त शर्तों के साथ एक मौलिक शर्त यह भी थी कि हर रोज एक बलात्कार की खबर लेकर आओ। कोई खबर न हो तो खुद बलात्कार करो और खबर बनाओ लेकिन अखबार का नियम नहीं टूटना चाहिए। नायक धीरे-धीरे हताश होने लगा था। उसकी नाक के नीचे दुनिया में इतना अंधेर हो रहा है और वह कुछ नहीं कर सकता। उसे वो नौकरियाँ याद आईं जो उसने मात्र इसलिए ठुकरा दी थीं कि उसे सिर्फ और सिर्फ पत्रकार ही बनना था।

ऊपरवाले के घर देर है अंधेर नहीं। नायक को बिल्कुल ऐसा ही लगा जब एक समाचार चैनल ने उसे इंटर्नशिप पर रख लिया। व्यवसायिक मंडी ने शोषण का नया पर्यायवाची शब्द ढूँढ़ निकाला है, इंटर्नशिप। यह इंटर्नशिप भी उसे एक जैक लगाने पर मिली है। इंटर्नशिप के लिए बड़े नहीं छोटे जैकों की जरूरत होती है (कथा लिखे जाने तक सत्य तथ्य) जैसे प्रोडक्शन असिस्टेंट या संवाददाता। नायक के दूर के एक भाई ने, जो काफी समय से इस चैनल में संवाददाता है, उसका जैक लगाया है। नायक अपने इस दूर के भाई का जो नायक के स्कूल के दिनों में अक्सर उससे ‘गिलहरी नमक खाती है’ का संस्कृत अनुवाद पूछा करता था, इंटर्नशिप दिलवाने के लिए तहेदिल से शुक्रगुजार है। नायक प्रसन्न था कि दो महीने की इंटर्नशिप के दौरान वह इतनी मेहनत करेगा कि चैनलवाले उसे निकाल ही नहीं सकेंगे बल्कि प्रभावित होकर नौकरी दे देंगे। वहाँ वह ऐसे कई लोगों से मिला जिनकी मेहनत देखकर चैनल उन्हें निकाल नहीं सका था और इंटर्नशिप दो महीने और बढ़ा दी गई थी। कुछ अति मेहनती लोगों से चैनल दो-दो महीने पर तीन-चार बार प्रभावित हो चुका था। खैर... नायक ने पूरी हिम्मत से काम शुरू किया। हिम्मत-ए-मर्दा, मदद-ए-खुदा।

क्या आपको भी लग रहा है कि प्रेम कहानी रास्ते से भटक गई है, शुष्क और नीरस हो गई है? क्षमा करें, सब कुछ इतनी जल्दी हो गया है कि मैं स्वयं हतप्रभ हूँ। ऐसे प्रश्न कहानी में आने ही नहीं चाहिए वरना मैंने देखा है कि एक समय ऐसा आता है जब पात्र इतने बेचैन हो जाते हैं कि कहानीकार की कलम की नोक से फिसल जाते हैं अपना प्रारब्ध खुद लिखने लगते हैं। मैं निस्संदेह आपका अपराधी हूँ कि आपको विश्वास में लेकर इस प्रेमकथा का हिस्सा बनाया और इस समय मैं ही पूरी तरह नहीं अंदाजा लगा सकता कि आगे क्या होगा। पात्र मेरी पहुँच से बाहर हो गए हैं। वे क्या सोच रहे हैं, उनकी मनःस्थिति में कैसे बदलाव हो रहे हैं, शर्मिंदा हूँ कि ये सब मैं नहीं पकड़ पा रहा हूँ। फिर भी पात्र हैं तो मेरे सामने ही। आपको आश्वस्त करता हूँ कि उनकी गतिविधियों को मिलाकर आपके समक्ष इस प्रेम कथा को पूरा तो करूँगा ही।

नायक आजकल बहुत परेशान है। इस चैनल में उससे कम से कम बारह घंटे काम लिया जाता है। सुबह नौ बजे पहुँचने के बाद वह रात नौ के बाद ही खाली हो पाता है। एक महीने पूरे होने को हैं और वह अपने दोस्तों के साथ एक बार भी फुर्सत से नहीं बैठ पाया है (फुर्सत से यानी मयबोतल) हालाँकि बीच में मुलाकातें हुई हैं। बातें भी हुई हैं। दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि प्रेम से संबंधित बातें कम हुई हैं। जिन तथ्यों के के इर्द-गिर्द बातें हुई हैं उनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं -

1. मीडिया (खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) में लड़कियाँ (खासकर सुंदर लड़कियाँ) प्रतिभावान छात्रों के पेट पर रोज लात मार रहीं हैं।

2. मीडिया पूरे समाज पर नजर रखता है। मीडिया की धाँधलियों पर नजर रखने के लिए कोई तगड़ा संगठन होना चाहिए।

3. चूँकि सत्ता का केंद्र दिल्ली है, यहाँ मीडिया में जगह पाना सबसे कठिन है।

4. यदि पत्रकारों पर स्टिंग ऑपरेशन किया जाए तो अस्सी प्रतिशत पत्रकारों को भूमिगत होना पड़ेगा।

5. मीडिया में चमचागिरी और भाई-भतीजावाद सबसे ज्यादा है।

6. मीडिया से आश्चर्यजनक रूप से ऊँचे पदों पर ज्यादातर तथाकथित सवर्ण हैं जो भयंकर रूप से जातिवाद फैला रहे हैं।

7. पत्रकार बनने का मतलब सुंदर चेहरा और साफ आवाज बनकर ही क्यों रह गया है? हम पत्रकार बनना चाहते हैं, एंकर नहीं।

8. नायक ने नायिका को प्रपोज कर दिया है शालीन तरीके से, नायिका ने मना कर दिया है शालीन तरीके से, अब दोनों में बड़ी अच्छी दोस्ती पल्लवित हो रही है, शालीन तरीके से।

अंतिम तथ्य के बारे में जानकर नायक के मित्रों को भी आश्चर्य हुआ। नायक ने हिम्मत कर दी, इस पर तो उन्हें एक बार विश्वास भी हो जाय, पर इसके बाद भी दोनों की दोस्ती परवान चढ़ रही है, इस पर विश्वास करना थोड़ा कठिन है। पर कहते हैं न कि प्रत्यक्षं किं प्रमाणं। उन्होंने देखा, सुना, महसूस किया और ईश्वर की लीला मानकर इसे स्वीकर कर लिया। हालाँकि इसके बावजूद उसके सच्चे दोस्तों ने उसे विश्वास दिलाया कि इनकार ही इकरार की पहली सीढ़ी है और अच्छी दोस्ती से ही प्यार की शुरुआत होती है। इसलिए नायक हिम्मत न हारे और अपनी मंजिल-ए-मकसूद को प्राप्त कर के ही रहे।

इस बीच कई घटनाएँ हो चुकी हैं। कक्षा की तीन और लड़कियाँ नौकरी पा चुकी हैं। नायक के लिए एक अच्छी खबर यह है कि उसके करीबी मित्र शशि की मेधा और चाचा का जैक काम आया है उसे एक अच्छे चैनल में नौकरी मिल गई है। यह शशि का आदर्श ‘सबसे तेज’ तो नहीं है पर इसके स्लोगन पर विश्वास करें तो यह भी कम तेज नहीं है और इसे सच दिखाने का जुनून है। मगर नायक यह सुनकर दुखी हुआ है कि शशि ने नौकरी पाते ही अपने उन उसूलों से समझौता कर लिया है जिनके कारण नायक उसकी बहुत इज्जत करता था। आनंद को अपराध जैसी प्रमुख बीट दे दी गई है और नायक पुनः यह जानकर दुखी हुआ है कि आनंद जिस हिम्मत से व्यवस्था की खामियाँ दूर करने की बात करता था, उसकी जगह व्यवस्था की चाटुकारिता करने लगा है।

नायक को रिपोर्टिंग के दौरान ऐसी कई घटनाओं का सामना करना पड़ा है जिसने उसे हिला कर रख दिया है। उस दिन एक नृशंस बलात्कार की रिपोर्टिंग करने के बाद नायक सीधा विभव के कमरे पर चला आया। वह बहुत परेशान था। विभव और विमल पहले से ही मौजूद थे। शशि कुछ देर में आने वाला था और आनंद को फोन करके बुला लिया गया। मैकडॉवल का एक खंबा और एक अद्धा लाया गया। सभी पीने बैठे। नायक बहुत देर से खामोश था। खामोश तो विमल भी था पर नायक से कम। हर बार की तरह विभव को भी न्यौता दिया गया और उसने शैंपेनवाला तर्क देकर मना कर दिया।

रात गहराने लगी है। आनंद ने फ्रेंच कट दाढ़ी की नींव डाली है और रह-रह कर दाढ़ी पर हाथ फेर ले रहा है। सभी तीन-तीन पैग ले चुके हैं पर कोई कुछ बोल नहीं रहा हैं। घूम फिर कर बात गिलास में कम या ज्यादा पानी डालने को लेकर हो रही है। विभव भयभीत है। उसे चिंता है कि कहीं यह तूफान के पहलेवाली शांति तो नहीं। वह बात शुरू करने के लिए सबकी ओर देख कर कहता है, ‘एक बात पता है तुम लोगों को? विमल की एक अखबार में नौकरी लग गई है।’

सभी आश्चर्य से विभव की ओर देखते हैं फिर विमल की ओर। विमल सकपका गया है। उसे उम्मीद नहीं थी कि विभव यह राज अचानक बता देगा जिसे वह सबसे छिपा रहा था। पर आखिर खुशी की बात वह सबसे छिपा ही क्यों रहा है?

‘किस अखबार में?’ शशि पूछता है।

विमल चुप।

‘किस अखबार में बे?’

विमल चुप जैसे बताने और न बताने में से निर्णय ले रहा हो।

‘कौन सा अखबार पकड़ा है लेखक महोदय?’ नायक का कटाक्ष।

‘...पाँचजन्य।’ विमल के जवाब से सन्नाटा छा गया है। सभी उसे ध्यान से देख रहे हैं कि यह वही विमल है या दूसरा।

‘सारी आइडियोलॉजी हिक्... गाँड़ में घुस गई साले।’ और ये शशि हुआ आपे से बाहर।

‘ऐ... संसदीय भाषा नहीं। संसद में नहीं मेरे कमरे में बैठे हो।’ विभव की फटकार।

‘क्या करता...? छोटे बड़े, हर चैनल, हर अखबार में गया। सब जगह मादरचोद एक ही समस्या...। जैक लगाओ, जैक लगाओ... हिक् अरे नहीं है मेरा हिक् जैक... तो क्या करूँ? कहीं न कही हिक् तो... समझौता करना ही पड़ेगा हिक्...। मेरे पिताजी अब पैसे नहीं भेज सकते हिक्...। उनकी पेंशन घर के लिए ही हिक्... कम पड़ रही है। मैं घर का हिक्... बड़ा बेटा हूँ... आइडियोलॉजी का क्या हिक् अचार... डालूँगा। ये कम से कम हिक् ढाई हजार तो हिक्... दे रहे हैं। तीन महीने मेरा काम देखेंगे... हिक्... पसंद आया तो स्थायी नियुक्ति कर पाँच हजार कर देंगे... हिक् हिक्।’ विमल ने बोलना बंद कर दिया है। ऐसा लगता है थोड़ी देर और बोला तो रो पड़ेगा।

सभी खामोश हो गए हैं। ऐसा लगता है वे काफी बातें बिना कहे ही समझ गए है। नायक की आँखों की कोरों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। वे थोड़ी गीली हैं। दो पैग और खत्म हो चुके हैं। सन्नाटा कायम है।

‘अच्छा मुर्रू... ये बताओ... मेरी दोनों तरफ की मूँछों में क्या अंतर है?’ आनंद का परम चूतियापेवाला बेतुका सवाल सन्नाटे में देर तक तैरता रहता है। नायक कभी उस सवाल को देखता है, कभी आनंद को, बोलता कुछ नहीं।

‘अरे यार हिक्... यही अंतर है कि दाईंवाली दाढ़ी में मिल गई है और बाईंवाली नहीं मिली... हिक्।’ आनंद खुद अपने बेतुके सवाल का जवाब देता है और अँगूठे व तर्जनी से दोनों तरफ की मूँछों को खींचकर नीचे दाढ़ी की तरफ ले जाता है।

‘तुमने लाठी चार्जवाली घटना में हिक्... पीड़ित पक्ष को ही दोषी दिखा दिया... ऐसा क्यों आनंद?’ नायक का प्रश्न।

आनंद अवाक् है। वह इन्हीं मुद्दों से बचना चाह रहा था।

‘क्या करूँ यार... न्यूज एडीटर का यही ऑर्डर था।’ आनंद के स्वर में हताशा है।

‘तुम्हारी नौकरी दो साल के कांट्रैक्ट पर है ना? तुम्हें कोई हिक् निकाल... थोड़े ही सकता है। सच्चाई को क्यों दबाया तुमने? हमने तय किया था कि मीडिया में आएँगे तो इसकी गंदगियाँ साफ करेंगे और हिक्... तुम साले खुद... गंदगी का हिक् हिस्सा बन गए। साले, झूठे... यही करने आए थे हम इस लाइन में...?’

आनंद चुप है। शशि हस्तक्षेप करता है।

‘जाने दो यार मुर्रू। टीवी पत्रकारिता में हिक्... यह सब चलता है हिक्...। हम अकेले क्या कर हिक् ...सकते हैं?’

‘क्या जाने दो... क्या जाने दो... क्या चलता है हिक्? तुम साले दिखाते हो कि हिक्... पुलिस एक्सीडेंट के तुरंत बाद पहुँची थी जबकि... हिक्... पुलिस पैसे लेकर बाद में पहुची थी। भोसड़ी के... बिकने लगे हो तुम लोग हिक्... बिकने लगे हो। यार विभव... मैं नहीं कर सकता हिक्... ऐसी गंदी पत्रकारिता...।’

विभव उसके पास आता है। उसे लगता है नायक ने बहुत ज्यादा पी ली है। वह पत्रकारिता के संदर्भ में एक वाक्य कहता है जो उस दिन के बाद से दक्षिण परिसर के इतिहास में एक कोटेशन की तरह से प्रयोग किया जाता है।

‘जाने दो मुरारी। आज की पत्रकारिता को शीघ्रपतन की बीमारी हो गई है।’ विभव ने अपनी समस्या अब तक किसी को नहीं बताई। पर इसका पत्रकारिता के पतन से क्या ताल्लुक...?

‘क्या हुआ यार, तुम रो क्यों रहे हो?’ विभव नायक की गीली आँखें देख लेता है।

‘मैं तंग आ गया हूँ विभव...। कभी कत्ल... कभी बलात्कार... मगर हिक् कहीं सही रिपोर्टिंग नहीं। हर जगह वही टीआरपी की लिचड़ई...। मैं जान गया हूँ यार... मैं भोसड़ी का पत्रकार बनने के हिक्... लायक ही नहीं हूँ। मैं हिक् बहुत कमजोर इनसान हूँ यार। आज हम एक बलात्कार हिक् की... रिपोर्टिंग करने गए थे... लड़की और उसके घरवाले कैमरे के सामने नहीं आना चाहते थे और हिक्... हम लोगों ने उनसे ऐसे-ऐसे हिक् सवाल पूछे कि वह हिक् हिक्...। यार हम लोगों ने उसका हिक् दुबारा बलात्कार... हिक् कर दिया और हिक् उसे प्रसारित भी हिक् किया। बड़े बलात्कारी तो... हिक् हम हैं यार। मैं बहुत कमजोर हूँ यार... हिक्। मुझसे नहीं हिक् होगी... ऐसी पत्रकारिता।’

‘जाने दो मुरारी, दुनिया में बहुत गंदगी है। तुम यह क्षेत्र ही छोड़ देना। पर इसमें रोनेवाली क्या बात है ?’

‘रो कौन रहा है साले... चूतिया हो क्या? मुझे तो बस गुस्सा आ रहा है।’ नायक सामान्य दिखने की कोशिश में बहुत असामान्य दिखने लगा है। वह बहुत देर तक कुछ न कुछ बकता रहता है। विभव चूँकि नहीं पीता, सबसे बाद में टुन्न होनेवाले से सिर चटवाना उसकी मजबूरी है। नायक सबसे बाद में सोया, विभव उसके बाद।

अगली सुबह जब नायक सोकर उठा तो आनंद व शशि ऑफिस जा चुके थे। विभव चाय बना रहा था और विमल अखबार पढ़ रहा था। उसका मूड अप्रत्याशित रूप से ताजा और अच्छा था।

‘क्यों मुर्रू, नौकरी नहीं करोगे चैनलवाली...?’ विभव ने चाय छानते हुए हँसी उछाली। हँसी में एक सवाल लिपटा था।

‘वाकई नहीं, कल रात मैं सीरियस था। ये टीआरपी वाली गंदगी मुझसे नहीं झेली जाएगी। प्रिंट में कोई अच्छा अखबार मिला तो... मगर पाँचजन्य नहीं।’ नायक ने सवाल पकड़ लिया और हँसी वापस विमल की तरफ उछाल दी। विमल भी हँसा।

‘अगर अखबार न मिला तो...?’ विभव ने चाय थमाते हुए पूछा।

‘तो क्या, टीचिंग लाइन में मेरे बहुत से दोस्त हैं। मास्टर डिग्री किस दिन काम आएगी? कहीं किसी प्राइवेट कॉलेज में पढ़ा लूँगा पर विचारधारा से समझौता... कभी नहीं।’ अंतिम लाइन बोलते हुए नायक फिर विमल की ओर देखकर हँसा है।

‘कोई नई कहानी लिखी है इधर लेखक महोदय?’ नायक पूछता है।

‘अब मैंने कहानियाँ लिखना बंद कर दिया है।’ विमल का इतना कहना है कि नायक जोरों से हँसने लगा है - ‘अबे शुरू कब की थीं जो बंद कर दीं? साले चार कहानियाँ क्या छप गईं, चले हैं लेखक की झाँट बनने।’

दोनों हँसते हैं। विभव बाथरूम में घुस गया है। दोनों तैयार होकर अपने-अपने ठिकानों के लिए निकल जाते हैं। विभव भी किसी जैक के जुगाड़ में निकल लेता है। कहानी खत्म।

मुझे कहानी को जारी रखने में वाकई कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि यह प्रेम कहानी जिस खूबसूरती से मैं खत्म करना चाहता था, वह अब संभव नहीं। कहानी मेरे हाथों से फिसल चुकी है। सभी पात्र मेरी बनाई लीक को तोड़ कर जाने कहाँ-कहाँ भटकने लगे हैं। पर चूँकि आपके मन में नायक की नौकरी और प्रेम के विषय में थोड़ी बहुत जिज्ञासा जरूर है, इसलिए मैं थोड़े बहुत तथ्य बता कर आपकी जिज्ञासा तो शांत कर ही दूँ हालाँकि कहानी के सफल होने के अवसर तो अब डूब ही गए हैं।

देखिए प्रेम प्रसंग का तो ऐसा है कि लड़केवाले नायिका को पसंद कर चुके हैं। नायक को जब यह बात पता चली तो वह हल्के से मुस्कराया। आप विक्रम की तरह इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ते रहिए कि नायक क्यों मुस्कराया। क्या उसे किसी पीपल बरगद के नीचे बैठकर जीवन के सत्य का पता चल गया है? क्या जीवन के थपेड़ों ने उसकी समझ को अचानक बहुत प्रौढ़ कर दिया है? क्या यह प्रेम नहीं आकर्षण मात्र था? क्या...? क्या...?

रही बात नौकरी की तो आजकल मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में किसी को काम तो आसानी से मिलता नहीं, ऐसे में कोई भला मिला मिलाया काम छोड़ता है? पर नायक चूँकि नायक है, वह छोड़ सकता है। सचमुच हिंदी फिल्में देखकर आपकी आदतें बहुत बिगड़ गई हैं और अपेक्षाएँ बहुत अवास्तविक हो गई हैं। नायक टीआरपी की लड़ाई में मानवता भूल चुके इन चैनलों में काम करने में घुटन महसूस करता है, पर वह ये क्षेत्र ही छोड़ देगा, इसमें मुझे संदेह है। और क्या यह सही होगा कि अव्यवस्था और अराजकता की वजह से इनसान पलायन की राह पकड़ ले? क्या इसकी जगह ये ठीक नहीं होगा कि नायक वहीं बना रहे, कुछ स्वयं को बदले और कुछ व्यवस्था को बदलने का प्रयास करे। अपनी भावुकता को थोड़ा कम करे और सच्चाई के लिए लड़े। मैं वाकई कहानी को यहीं खत्म कर देना चाहता था क्योंकि इतना लंबा लेक्चर देने के बावजूद मुझे यह अंदाजा नहीं कि नायक आगे क्या करेगा। पर कहानी सिर्फ आपके लिए आगे बढ़ा रहा हूँ कि आपको ये प्रेम कहानी थोड़ी तो पसंद आए वरना मेरी पूरी मेहनत बेकार जाएगी।

कहानी चूँकि आपके लिए आगे बढ़ा रहा हूँ, यह आपको थोड़ी पसंद आए, यह दबाव भी मुझ पर है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि कहानी का यह अंश ऊपर से थोपा हुआ लगे, पर इसे असली अंश मानना जरूरी भी नहीं। यह मैं नहीं लिख रहा हूँ, आप वही देख रहे हैं जो देखना चाहते हैं, वरना कोई लेखक अपने नायक को परिस्थितियों से हारता हुआ दिखा कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारेगा?

कुछ महीनों बाद नायक अचानक कनॉट प्लेस पर विमल से मिल रहा है। बीच की काफी सारी औपचारिक बातें आपसे इजाजत लेकर काट देता हूँ।

विमल : तो क्या चैनल छोड़ दिया? तुम्हारी नौकरी तो दो महीने बाद स्थायी हो गई थी न?

नायक (मुस्कराते हुए) : हाँ, हो गई थी, पर छोड़ दी।

विमल : यार तुम्हारे हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। अब क्या कर रहे हो? ( इसी बीच विमल ने शीतल पेय की दो बोतलें खरीद ली हैं)

नायक : एक डिग्री कॉलेज में अस्थायी तौर पर पढ़ा रहा हूँ। तुम्हीं कहते थे न कि मेरा नाम अध्यापक बनने के लिए सर्वोत्तम है। (नायक ने अपनी बोतल नायिका के दिए हुए चाबीरिंग से खोली है जिसके पीछे ओपनर लगा है और रिंग विमल की ओर बढ़ा दिया है)

विमल (उसी रिंग से बोतल खोलते हुए) : बहुत अच्छे यार। कितने पैसे मिल जाते हैं?

नायक : लगभग नौ हजार।

विमल (उसकी आँखें इतनी फैल गई हैं कि पुतलियाँ बाहर चू जाने का खतरा हो गया है) नौऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हजार????

नायक (मुस्कराते हुए) : पूरा कैश नहीं। साढ़े चार हजार तनख्वाह है और लगभग उतने की ही इज्जत। दिन भर लड़के-लड़कियाँ सर-सर कहके प्रणाम करते रहते हैं। तुम क्या कर रहे हो? पाँचजन्य में ही हो? कहानियाँ फिर से लिखनी शुरू कर दो। एक से एक घूरहू कतवारू हाथ पाँव मार रहे हैं। तुम भी हाथ पाँव मारते रहा करो।

विमल (अब मुस्कराने की बारी उसकी है) : पाँचजन्य छोड़ दिया गुरू। एक साप्ताहिक लोकल अखबार पकड़ा है और दो ट्यूशन्स। कहानी तो लिख ही रहा हूँ। उसके बिना जी ही नहीं सकता। बल्कि तुम्हें जानकर खुशी होगी कि आजकल जो कहानी लिख रहा हूँ वह अपने मतलब हमारे जीवन के ऊपर है।

नायक : सच ? छप जाय तो पढ़वाना।

विमल : हाँ, हाँ बिल्कुल। अच्छा वेदिका की शादी तय हो रही थी। क्या हुआ?

नायक : हाँ, दो महीने बाद है। कार्ड पहुँचाने का जिम्मा मेरा ही होगा। उसने पहले ही कह दिया है। हम अच्छे दोस्त हैं आखिर...।

विमल (हँसते हुए) : यानी साले, तुम्हारा प्रेम असफल और अधूरा ही रह गया?

नायक (उससे भी तेज हँसते हुए) : अरे तुम्हीं तो कहा करते हो कि असफल प्रेम ही जीवित रहता है। लैला-मजनूँ, शीरी-फरहाद, हीर-राँझा की तरह शायद मुरारी-वेदिका का नाम भी...।

दोनों हँसते हैं। उसके बाद दोनों अपने-अपने रास्ते निकल गए होंगे।

अब शायद आपको अच्छा लगा होगा। ओह... अब भी नहीं। मैं पहले ही समझ गया था कि पूरी कहानी पढ़ने के बाद आप यही कहेंगे - छिः, ये भी कोई प्रेम कहानी है?


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हिंदी समय में विमल चंद्र पांडेय की रचनाएँ