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लेख

आत्म, इतिहास और जनवाद : ऐरिक हाब्सबाम
सत्यम कुमार सिंह


समय इतिहास नहीं होता। सापेक्षतावादी समय की अवधारणा को अगर दूसरे शब्दों में कहें तो समय अनंत विस्तृत ब्रह्मांड का भूगोल है या धरती के किसी हिस्से का समय ब्रह्मांड में उसका पता बता रहा होता है।

"जो भी समय के साथ हस्तक्षेप करना चाहता है वह कोई भी हो, कोई भी जो उसे खींच कर लंबा करना चाहता है, उसका प्रवाह रोकना चाहता है, उससे एक अलग धारा निकालना चाहता है, यह जान ले कि मेरा विधान चरम है, कि मेरी निरंकुश सुइयाँ क्षणभंगुर अस्तित्वविहीन 'अब' को दर्शाती हैं, जैसा कि वे सदा करती हैं। वे भ्रष्टकारी विभाजन से, अध्येयताओं के 'अब' की वेश्यावृत्ति से ऊपर हैं, मेरा 'अब' ही वास्तविक है।' '...समय एक ऐसी प्रणाली है जिसे हर वस्तु को एक साथ होने से रोकना है" - सेस नूटेबुम

और इतिहास 'समय की उस प्रणाली का, जिसमें सब कुछ एक साथ घटित नहीं होता', की ज्ञानमीमांसा और तत्वमीमांसा है। इतिहास अनंत विस्तृत ब्रह्मांड के बहुत सूक्ष्म समय का भूगोल भी है। दरअसल जिस नियतिवाद को हम द्वंद्वात्मक कहते हैं वह ऐसे ही समय की प्रणाली के विरुद्ध चलता है और इसकी नियति सब कुछ को एक साथ पा लेने (यूटोपिया) की तरफ संघर्षरत रहती है। मार्क्स ने कहा था - "व्यक्ति अपने इतिहास के फलन से ज्यादा कुछ नहीं होता"। निश्चित रूप से इतिहास का मनुष्यों पर वर्चस्व रहा है किंतु इतिहास अपने स्वनिर्मिति में इसकी वर्जनाओं के टूटने को ही दर्ज करता है क्योंकि यही सामाजिक विचलन का कारक भी होता है। यह अर्थ निकाला जा सकता है कि इतिहास के इतिहासकार अनिवार्य रूप से प्रचलित एवं वर्चस्वशाली सामूहिक-बोध को उसके षड्यंत्रकारी भूमिका से बाहर निकालने की जिम्मेदारी में होते हैं। समय की 'अब' के वर्चस्वशाली धारणा को मानवी चेतना ने चुनौती दी है और इतिहास को जानने की कोशिश में प्रचलित इतिहास-दर्शन (Historiography) के प्रतिमानों में बदलाव ले आई है।

उपरोक्त संदर्भों को अगर 20वीं सदी के इतिहासकार से जोड़ा जाए तो सबसे अग्रणी एवं प्रभावशाली नाम एरिक हाब्सबाम का होगा। 2012 में एरिक हाब्सबाम के निधन पर रोमिला थापर ने ई.पी.डब्लू. में श्रद्धांजलि देते हुए लिखा कि - "मार्क्स से प्रभावित शुरुआती इतिहासकारों में एरिक हाब्सबाम, रांके (Ranke) के सौ साल बाद, इतिहास-दर्शन (Historiography) को बदलने वाले इतिहासकार माने जा सकते हैं"। रांके एक ऐसे इतिहासकार थे जो इतिहास को निरपेक्षवादी धारणा से देखते थे और इतिहास लेखन को, विशेष कर विश्व इतिहास, को असंभव मानते थे। रांके इस पर बिल्कुल यकीन नहीं करते थे कि कोई साधारण सिद्धांत किसी देश-काल को प्रतिबिंबित कर सकता है। इसके विपरीत उन्होंने संदर्भित समय के बारे में उसके प्राथमिक स्रोत से कुछ उक्तियों का वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा - "प्रमुख विचारों के बारे में मेरी समझ बिलकुल सादा है कि प्रत्येक सदी में वे प्रमुख विचार वर्चस्वशाली प्रवृत्तियाँ होती हैं।" रांके ने इतिहास दर्शन का नकार किया खास कर हेगलवादी इतिहास लेखन अभ्यास का लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि मार्क्स ने हेगल के सर के बल खड़े सिद्धांत को सीधा कर दिया ठीक उसी तरह हाब्सबाम ने इतिहास लेखन की इस बृहद दृष्टि को संभावना दी और विश्व इतिहास लेखन किया। हालाँकि एक तरह से इस धारणा से हाब्सबाम खुद भी सहमत थे -

"वास्तव में किसी अकेले व्यक्ति के लिए वर्तमान सदी की पुरावृत - रचना की पूरी जानकारी, किसी एक ही प्रमुख भाषा में एकत्र कर पाना असंभव है। इस तरह कहें तो प्राचीन शास्त्रीय काल, अथवा बाईजेंतीन साम्राज्य के इतिहासकार जानते थे कि इन लंबे युगों के विषय में कहाँ और क्या कुछ लिखा गया है।"

आम तौर पर हाब्सबाम के बृहद कार्य को तीन विस्तृत भागों में बाँटा जा सकता है। पहला, 19वीं सदी की कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रवृत्तियों को रेखांकित करने वाले लेखन जिसका फलक सार्वभौमिकता के साथ ज्यादा बनता है। ऐसे लेखन में द ऐज ऑफ रेवोल्यूशन, द ऐज ऑफ कैपिटल और द ऐज ऑफ एंपायर को रखा जा सकता है। आज की वर्तमान परिस्थितयों में जब धरती की लगभग जनसंख्या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एक से आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक चुनौतियों से गुजर रही है, तब ऐसे अर्थशास्त्रीय, विज्ञान और तकनीकी विश्लेषण वाले इतिहास का विशेष महत्व बन जाता है। ये इतिहास लेखन एक खास समय में दुनिया भर में प्रकट हो रहे प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं।

दूसरे भाग में उस इतिहास लेखन को रखा जा सकता है जो हाब्सबाम को पूरी दुनिया में चर्चित बनाता है। उपरोक्त श्रृंखला में ही लिखी गई पुस्तक द ऐज ऑफ एक्सट्रीम्स, एक ऐसी पुस्तक है जो कई भाषाओं में अनुदित हुई और कहा जा सकता है कि इतिहास लेखन में 'लिटररी बेस्ट सेलर' की लोकप्रियता को हासिल हुई। द ऐज ऑफ एक्सट्रीम्स इतिहास में रचनात्मक लेखन का बेहतरीन नमूना है। इसी पुस्तक की प्रस्तावना में हाब्सबाम ने कहा है कि बीसवीं सदी को लगभग सहभागी अवलोकनकर्ता (participant observer) की तरह लिखा है। सन 2002 में हाब्सबाम की आत्मकथा 'इंटरेस्टिंग टाइम्स : ए ट्वेंटीएथ-सेंचुरी लाइफ' प्रकाशित होती है। एक मायने में यह आश्चर्य पैदा होता है कि एक इतिहासकार की आत्मकथा कैसी होगी? प्रचलित इतिहासकारों में शायद ही किसी इतिहासकार ने अपनी आत्मकथा लिखी है। सबसे दिलचस्प बात यह कि लगभग साढ़े चार सौ पृष्ठों में फैली इस आत्मकथा की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा है - "एक अर्थ में यह किताब द ऐज ऑफ एक्सट्रीम्स का फ्लिप साइड है। (इन वन सेंस दिस बुक इज फ्लिप साइड ऑफ ऐज ऑफ एक्सट्रीम्स : नॉट वर्ल्ड हिस्ट्री इलस्ट्रेटेड बाय द इक्स्पेरियेंसेस ऑफ एन इंडिविजुअल, बट वर्ल्ड हिस्ट्री शेपिंग दैट इक्स्पेरियेंसेस)"

तीसरे प्रकार के कार्य में ब्रिटिश/यूरोपीय इतिहास की केंद्रीयता है। प्रिमीटिव रीबेल (1959), लेबरिंग मेन (1964) और बैंडिट्स (1973) इन तीनों कार्यों को इतिहास लेखन, खास कर मार्क्सवादी इतिहास लेखन का 'टर्निंग पॉइंट' माना जा सकता है और यह भी के यह अपने ऐतिहासिक संदर्भों से योरोपीय/ब्रिटिश होने के बावजूद इतिहास लेखन के ऐसे सूत्र पकड़ता है जिससे बहुत बड़े साम्राज्य के शासनाधीन तीसरी दुनिया की इतिहास दृष्टि प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकती है। तीनों ही पुस्तकों ने साम्राज्य से जुड़े देशों के इतिहासकारों को काफी प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए प्रिमीटिव रीबेल में यूरोपीय पूँजीवाद के उभार के साथ-साथ दस्तकारों, श्रमिकों और खेतिहर मजदूरों के विद्रोह को उन्ही के 'वेंटेज प्वाइंट' से देखने की नई प्रविधि भी प्रदान करता है। इसे हम 'सबाल्टर्न' के बीज कह सकते हैं (हिस्ट्री फ्रॉम बिलो)। अपने लेखन में, जो 'द एज ऑफ एक्स्ट्रीम्स' में खुलकर सामने आती है, यही से यह मार्क्सवादी इतिहासकार मार्क्सवादी इतिहास लेखन अथवा अर्थशास्त्री इतिहास दृष्टि में नए आयाम को जोड़ते हैं। इस किताब (प्रिमिटिव रीबेल) की भूमिका में वो लिखते है - 'दस्तकारों, कृषकों या श्रमिकों के विद्रोह को केवल दस्तावेजों से नहीं जाना जा सकता है बल्कि इतिहासकार जिस स्थान और लोगों के बारे में लेखन करता है, उस स्थान और जीवन शैली के मुश्किल हालात और परिस्थिति को भी जानना पड़ेगा।

इसलिए प्रिमिटिव रीबेल अर्थात दस्तकार, कृषक और श्रमिकों के विद्रोह को लेखक ने "गैर-राजनैतिक लोगों का विद्रोह" कहा जिन्हें अभी अपनी राजनैतिक चेतना की भाषा नहीं आई थी और अभी इन्होंने अपनी दुनिया को पहचानना ही शुरू किया था। पूँजीवाद के साथ उभरे वर्गों में एक राजनैतिक चेतना बन रही थी (जैसे के मिल मजदूर इत्यादि) और दुसरी तरफ औद्योगिक-पूर्व उत्पादन साधनों पर आश्रित श्रमिकों में इस नई राजनैतिक चेतना का उभार नहीं हुआ था और यही उनके विद्रोह की त्रासदी भी बन जाती है। यथार्थ का यह चित्र लगभग पूँजीवाद के फैलने के साथ वाले समय और स्थानों में सामान थे और यही कारण था कि एरिक हाब्सबाम को भारत और लैटिन-अमेरिका में सामान रूप से प्रसिद्धि और स्वीकृति मिलती है। हाब्सबाम के इस प्रकार के लेखन बौद्धिकों और शोधार्थियों में अपना स्थान ज्यादा बनाते हैं बजाय आम पाठकों के, बल्कि यही एक गुत्थी है कि आखिर अपने बृहत और राजनैतिक रूप से प्रभावशाली समकालीन ब्रिटिश इतिहासकारों के मुकाबले हाब्सबाम दुनिया भर में इतने प्रचलित और प्रभावकारी क्यों हुए। राष्ट्रवादी भाषा में अगर इस सवाल को (जो स्वयं ही एक ऐतिहासिक उत्पाद है) अगर किया जाए तो यह कि आखिर राष्ट्र/राष्ट्र-राज्य/भारत के इतिहास में इनका योगदान क्या है अथवा कि भारत के राष्ट्रवादी इतिहास लेखन में हाब्सबाम के इतिहास से क्या दृष्टि मिलती है? राष्ट्रवादी चेतना बनाम इतिहास चेतना में क्या संबंध है? साथ ही इन दोनों मे अंतर्विरोध और ऐतिहासिक सातत्यता कैसे बनती है?

वर्तमान समय की राष्ट्रवादी वैश्विक व्यवस्था और इसके अतीत के जटिल यथार्थवाद में ऐसे कई सवाल है और एक बहुत सीधा सरल जवाब "प्रिंट-कैपिटलिज्म" और हाब्सबाम की लोकप्रियता की आलोचना की जा सकती है। ऐसे कई सवालों के बीच घिरे एरिक हाब्सबाम वालों के अनुशासनात्मक परिधि का अतिक्रमण करते हुए एक 'अवॉगर्द' नजर आते है। वो मानते हैं कि जब मानवीय क्रिया-व्यापार के वास्तविक मामले समस्या समाधान आधार पर तकनीकी द्वारा संचालित हो जिसके लिए यह बिल्कुल अप्रासंगिक हो, कि इतिहास हमारे दुनिया को समझने का आज से पहले कभी भी का सबसे महात्वपूर्ण हिस्सा हो गया है। अतीत की वस्तुपरकता अस्तित्व के ऐसे तर्कों के बीच डार्विनवाद, विज्ञान और ब्रह्मांडीय दृष्टि में इतिहास प्रमुख परिवर्तनकारी तत्व बन जाता है। डी.एन.ए. की खोज ने इसमें क्रांतिकारी परिवर्तन लाया। वो लिखते है कि -

"एक लाख वर्ष पहले हमने अफ्रीका छोड़ा समग्र रूप से जिसे हम इतिहास वर्णित करते है वो, शहरों एवं कृषि के आविष्कारों के बाद, मुश्किल से चार सौ मनुष्यों की पीढ़ियाँ या दस हजार साल है - ब्रह्मांडीय समय की मात्र एक झपकी।"

उपरोक्त कथन बीसवी सदी के "संक्षिप्त इतिहास" और उनके द्वारा संरचित आत्म को उद्घाटित करती है। और इसी की परिणति में अर्थात संक्षिप्त बीसवीं सदी के पुरावृत्त में एक इतिहासकार का आत्म पहली बार कलाकार की तरह आकार ग्रहण करता है।

"मेरे मित्र पियरे बॉरदियु ने एक बार अपने बौद्धिक विकास के बारे में बातचीत करते हुए कहा था कि मैं अपने बौद्धिक जीवन को कलाकारों के जीवन के कुछ ज्यादा नजदीक पाता हूँ बजाय अनुशासित आकादमिक जीवन के... सभी बौद्धिक उपक्रमों के प्रारूपों में समाजशास्त्री का आभ्यास निःसंदेह एक ऐसा अभ्यास है जो मुझे खुशियाँ प्रदान करता है - शब्दों के सभी अर्थ में। पाठक समाजशास्त्री की जगह इतिहासकार प्रतिस्थापित कर ले और मैं कहूँगा आमीन।"

यही बात उन तमाम ऐतिहासिक सवालों में इतिहासकार को 'अवॉगर्द/इतिहास व्यक्ति/सच्चा कम्युनिस्ट बनाती है। कला और इतिहास विज्ञान के बृहत विभाजन में हाब्सबाम की यह 'चेतना' रचनात्मकता और सामाजिक परिस्थितियों में मानवीय जीवन की तलाश करता है।

जैसा कि हम पहले ही चर्चा कर चुके है कि राष्ट्रवादी चेतना बनाम इतिहास चेतना और हाब्सबाम के इतिहास से राष्ट्रवादी इतिहास से क्या कोई रिश्ता बनता है?

हाब्सबाम आजीवन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन के सदस्य रहे और उनके इतिहास लेखन को भी मार्क्सवादी इतिहास लेखन के दायरे में रखा जाता है। फिर भी राष्ट्रीय चेतना में और इतिहास चेतना में एक मौलिक सैद्धांतिक भेद यह होता है कि इतिहास चेतना राष्ट्रवादी विचारधारा को संचालित करती है और पुनः उसके स्वरूप का निर्धारण भी करती है। ऐसे में मार्क्सवादी इतिहास लेखन सीधे तौर पर राष्ट्रवादी चेतना के खिलाफ होते हुए भी हाब्सबाम के लेखन ने एक तरफ तो वि-औपनिवेशी राष्ट्र-राज्यों के उनके सीमांत लोगों को अपने ऐतिहासिक प्रतिफलन में 'राष्ट्र' में एक स्थान तलाशने और उसके राजनीति का मजबूत आधार प्रदान करता है। बृहत्तर स्तर पर आज के समय में बहुत सारे राष्ट्रीय इतिहास की मौजूदगी यथार्थ पर एक पर्दा भी डालती। इसके पीछे के ऐतिहासिक कारणों में एक साझे शासन के विरुद्ध संघर्ष और उससे उपजे राष्ट्र-राज्य की भिन्नता को रखा जा सकता है। इस तरह के बहुत सारे राष्ट्रवादी लेखकों ने भी हाब्सबाम के इस शैली की नकल की है। ऐरिक हाब्सबाम की प्रमुख आलोचना भी यही है कि वो आजीवन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने रहे। सन १९५६ में जब सोवियत रूस ने हंगरी में उठे बगावत को शक्ति के साथ कुचला तब दुनिया भर के बहुत सारे मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दिया किंतु ऐरिक हाब्सबाम ने पार्टी सदस्यता नहीं छोड़ी। एक इतिहासकार के तौर पर उनसे अपेक्षा की जा रही थी वो सदस्यता त्यागें।

एक बड़े इतिहासकार के लिए यह सवाल काफी गंभीर हो जाते हैं बल्कि हाब्सबाम का यह लगाव कई बार 'भावनाओं का अतिरेक' लगने लगता है क्योंकि आत्मकथा इंटरेस्टिंग टाइम्स में भी यह लगाव स्पष्टता से देखा जा सकता है - "बोल्शेविक क्रांति ने जब दुनिया को हिला दिया तब उनका जन्म हुआ था। हिटलर सत्ता में आया जब हाब्सबाम बर्लिन में स्कूल से घर जा रहे थे और जब वह न्युयॉर्क में अपना सेमीनार प्रस्तुत कर रहे थे तब सोवियत संघ टूटा।"

साफ पता चलता है बोल्शेविक क्रांति और सोवियत पतन से कितने अचेत किंतु गहरे तौर पर जुड़े थे। यह इतनी बड़ी ऐतिहासिक निष्पत्ति थी जो इतिहासकार के मन पर ऐसा असर छोड़ती है। यथार्थ से वास्तविक तौर पर सोवियत रूस के आंतरिक राजनीति से वो मुकर रहे थे या अनदेखा कर रहे थे ऐसा नहीं कहा जा सकता कि 'वो आजीवन मार्क्सवादी बने रहे जबकि पूर्व सोवियत रूस के अधिकारियों ने उनकी उपेक्षा की। "एक ओर तो भूतपूर्व सोवियत संघ के अधिकारी मेरी किसी किताब का रूसी अनुवाद कराने को राजी नहीं हुए। बावजूद इसके कि उनका लेखक यानि मैं वास्तव में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में जाना जाता था। - इन अधिकारियों की पुराणपंथी कसौटी के मुताबिक मेरी पुस्तकें मार्क्सवादी नहीं थीं।" (हाब्सबाम, इतिहासकार की चिंता, 2007, पृ. 14)

सोवियत पतन के बाद नए परिस्थितियों में जब अमेरिकी वर्चस्व और 'इतिहास के अंत' या कहें कि एक 'अंतवाद' को जिस तरह से फैलाया गया ऐसे में सोवियत के जन्म के साथ वृद्ध हुए इस इतिहासकार ने 'इतिहास के अंत' और 'सभ्यताओं की टकराहट?' को न केवल खारिज कर दिया बल्कि मानवीयता को एक रोशनी दी। 2004 में भारत दौरे पर आए हाब्सबाम ने 'द हिंदू' को दिए साक्षात्कार में कहा 'अमेरिकी सत्ता की सीमाएँ हैं। समस्या यह है कि ऐसी परिस्थितियों का कोई ऐतिहासिक सातत्यता अथवा परंपरा नहीं है।' ...और यह कि किसी एक सुपर पॉवर के लिए समय के किसी भी लंबाई में मैं सचमुच के बहुत विशाल दुनिया पर वर्चस्व स्थापित करना बहुत जटिल है भले ही उसकी सैन्य और आर्थिक क्षमता बहुत महान हो। प्रसिद्ध राजनैतिक अर्थशास्त्री और वर्ल्ड सिस्टम थिओरी के रचियता इमानुएल वालेर्स्तिन हाब्सबाम के गहरे वैचारिक मित्र रहे किंतु अपने मतभेद को स्पष्ट करते हुए वो उनके इस मान्यता का जिक्र करते हैं कि हाब्सबाम इस प्रकार के अंतवादी सिद्धांतों पर भड़क उठते थे। दरअसल यह भड़कना भी उनके साम्यवादी लगाव को ही दर्शाता है। समाजवाद में आस्था, आलोचना के बावजूद पार्टी सदस्य बने रहना और अंतवाद जैसे सिद्धांतों पर भड़क उठना एक सूत्रबद्धता को खोलता है और ये एक सूत्रबद्धता साधारण सवाल - आखिर हाब्सबाम स्वयं 'कम्युनिस्ट' होना किस अर्थ में लेते थे? - से जुड़ता है। बीसवीं सदी के लगभग आधे सदी तक दुनिया भर के लोगों को आखिर इतना ज्यादा क्यूँ आकर्षित करता रहा? यह सवाल बीसवीं सदी के केंद्रीय सवालों में से एक हैं। "उस सदी (बीसवीं सदी) में इससे ज्यादा कोई और लक्षण नहीं था जैसा कि मेरे एक मित्र का कहना था - बीसवीं सदी के महान दानवों में एक था; राजनैतिक जुनून और इसकी सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति थी - साम्यवाद।" (Hobsbawn, Interesting Times : A Twentieth-Century Life , 2002, पृ। 127)

इतिहासकार से अलग व्यक्ति

इतिहासकारों की यह आदत रही है - जिसमें यह इतिहासकार भी शामिल है। कि कला चाहे समाज के भीतर उसकी जड़ कितनी ही गहरी और स्पष्ट क्यों न रही हो, उसके समकालीन संदर्भ से अलग करके मानवीय गतिविधियों की एक ऐसी शाखा के रूप में देखा जाय जिसके अपने नियम कायदे हैं और जिसका आकलन उनके ही आधार पर किया जा सकता है। (हाब्सबाम, अतिरेकों का युग-II, 2009, पृ. 327)

कला के बारे में कही गई यह उक्ति हाब्सबाम ने बतौर इतिहासकार कही है। इसके विपरीत उनका एक दिलचस्प व्यक्तित्व 'द जैज सीन (The Jazz Scene,1959)' के रूप में सामने आते हैं। दिलचस्प इसीलिए क्योंकि उपरोक्त कथन के ठीक विपरीत कथन संगीत के बारे में वो कहते हैं। वो बताते है "जैज संगीत केवल एक प्रकार का संगीत नहीं बल्कि जिस समाज में हम रहते हैं उस समाज का विशेष लक्षण है न कि मनोरंजन उद्योग का हिस्सा।" (Hobsbawn, Interesting Times : A Twentieth-Century Life , 2002, पृ. 225)

जैज सीन पुस्तक हाब्सबाम के बौद्धिक व्यक्तित्व के अलावे समकालीन सांस्कृतिक व कला आलोचक के व्यक्तित्व की झलक मिलती है। बीस के दशक में जैज नए फैशन के रूप में जाना जाता था। शुरुआती तौर पर हाब्सबाम न्यु स्टैट्समैन एंड नेशन में जैज आलोचक के रूप में लिखते रहे परंतु वो अपनी इस पहचान को विश्वविद्यालय में नहीं बताना चाहते थे इसलिए उन्होंने छद्म नाम फ्रांसिस न्यूटन के नाम से लिखना शुरू किया। फ्रांसिस न्यूटन नाम फ्रंकी न्यूटन का छद्म नामकरण था। फ्रंकी न्यूटन को सराहते हुए वो बताते है कि - वो उन चंद कलाकारों में से थे जो कम्युनिस्ट के रूप में जाने जाते थे और सुपरस्टार न होते हुए भी एक बेहतरीन कलाकार थे।

नाम बदलकर लिखना पहचान और भाषा प्रति सजगता को भी दर्शाता है। इस नाम में भविष्य के बड़े इतिहासकार का एक अलग व्यक्तित्व छुपा था। एक बार जो वह एक ऐतिहासिक प्रामाणिकता के साथ कहना चाहते थे वो यह कहा जा सकता है - सोवियत रूस का दिया बुझ गया, विकल्प मरा नहीं बिखर गया।

संदर्भ ग्रंथ-सूची

1. Hobsbawn, E. (1959)। Primitive Rebels. Manchester.

2. Hobsbawn, E. (2002)। Interesting Times : A Twentieth-Century Life . UK: Abacus .

3. Hobsbawn, E. (2004, dec. 19). There is limits of American power. (A. Barhua, Interviewer)

4. Thapar, R. (2002). Remembering Eric Hobsbawn. Economical Political Weekly, XLVII (nov.).

5. हाब्सबाम, ऐ. (2007). इतिहासकार की चिंता. (क. चैतन्य, &ग. प्रधान, Trans.) नई दिल्ली : ग्रंथ शिल्प.

6. हाब्सबाम, ऐ. (2009)। अतिरेकोंकायुग-II (Vols. 1-2) (प. दीक्षित, Trans.) मुंबई : संवाद प्रकाशन।


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