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कहानी

बाबा एगो हइए हउएँ
विमल चंद्र पांडेय


कुछ भी कहना शुरू करने से पहले अगर फि़ल्मों की तरह यह कहने का रिवाज होता कि जो कुछ भी यहाँ लिखा जा रहा है, वह काल्पनिक है और इसकी सत्यता से कोई समानता संयोग मात्र है, तो मैं यह कहानी नहीं लिखता। बाबा का खास आग्रह था कि उनकी कहानी लिखी न जाय और अगर लिखी जाय तो वह इसकी जात की कहानी न हो, बवाल हो।

बाबा पर कहानी लिखने के लिए पिछले कई सालों में कई लोगों ने प्रेरित किया, सलाहें दीं और धमकियाँ-चेतावनियाँ तक दे डालीं कि अगर बाबा के ऊपर कलम नहीं चलाई तो इधर-उधर की लिखने का कोई मतलब नहीं है। मेरा डर भी सिर्फ इतना था कि बाबा को कहानी में समेटना किसी सिद्धहस्त कहानीकार के बस की बात है वरना बाबा महाकाव्य के नीचे कुछ डिजर्व करते हैं तो कम से कम उपन्यास। मैं जब तक बाबा का परिचय दूँ आप ‘काशी का अस्सी’ एक बार फिर से पढ़ जाइए और समझ लीजिए कि बाबा ने उसे एक बार भी पढ़ा नहीं है लेकिन अस्सी के हर पात्र में कम या ज्यादा निवास करते हैं भले रहते नदेसर में हों। बाबा के बारे में जानने का मन अगर आपने बना लिया है तो बता दूँ कि बाबा बजाप्ते एक बेतरतीब आदमी हैं इसलिए कहानी भी कभी आगे कभी पीछे यानी बाबा की गति से छलाँगें लगाए तो आप एडजस्ट कर लीजिएगा, कन्फ्यूज मत होइएगा।

बाबा का परिचय देने से पहले मुझे अपना परिचय भी देना पड़ेगा। मेरा नाम हँसमुख लाल अग्रवाल है और मैं एक छोटा मोटा पत्रकार होने के साथ-साथ हिंदी का एक सफल कथाकार हूँ। मेरे शहर में कई सफल कथाकार रहते हैं और आपकी जानकारी के लिए बता दिया जाय कि मेरी एकाधिक कहानियाँ हिंदी की पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। चूँकि हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है (यहाँ तो सब ऐसा ही कहते हैं) इसलिए हिंदी में निकलनेवाली सभी पत्रिकाएँ राष्ट्रीय पत्रिकाएँ और उनमें से किसी भी पत्रिका में एक भी बार छप जाने पर लेखक को आसानी से राष्ट्रीय कहा जाने लगता है (जिसकी शुरुआत वह खुद करता है)।

मैं बाबा का सातवीं कक्षा से दोस्त हूँ और बाबा की उम्र इस समय मेरी उम्र के बराबर यानी लगभग पैंतीस साल है। अब बाबा का परिचय - (कायदे से तो आपको खड़े हो जाना चाहिए) बाबा का पूरा नाम अनुज श्रीवास्तव है और वह कायस्थों (बाबा के शब्दों में लालाओं) से सख्त नफरत करते हैं। ये क्रांतिकारी कहलाने का सबसे आसान रास्ता मना जाता रहा है. बाबा मीरापुर बसहीं, यानी यू पी कॉलेज के पीछे से जो रोड गई है, में इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स की एक दुकान चलाते हैं और साले को मस्त रहते हैं। आप स्वभाव से पूरे बनारसी हैं और काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता की पढ़ाई में पूरे दो साल बर्बाद कर चुके हैं। बर्बाद इसलिए कि आपके भीतर पत्रकारिता की इतनी आग थी कि आपको किसी भी प्रकार के किसी प्रशिक्षण की कोई जरूरत नहीं थी।

दो साल की पत्रकारिता की डिग्री लेने के दौरान बाबा ने बहुत जलवे दिखाए थे और ‘बाबा’ की उपाधि अर्जित की थी लेकिन वह बाद में। डिग्री लेने के बाद बाबा ने दिल्ली का रुख किया जहाँ हम लोगों के बचपन का एक और साथी वरुन एक अच्छे (सर्कुलेशन के आधार पर) अखबार में अपनी नौकरी बचा रहा था। बाबा ने पूरी मेहनत से बीस दिन तक नौकरी खोजने की पूरी दिल्ली में कोशिश की और आईटीओ, फिल्म सिटी से लेकर पीटीआई यूएनआई तक रिज्यूमे फेंक आए। लेकिन बीस दिन में बनारस को हर साँस में खींचनेवाले बाबा बुरी तरह घबरा गए और इतने ही अंतराल में दो बार तबियत खराब होकर ठीक होने के बाद दिल्ली पर एक दिन थूक कर भाग आए (सौजन्य : असगर साहब का ‘कैसी आगी लगाई’)। थूकनेवाली थ्योरी के दो भाग हैं। मैंने उसी दौरान ‘कैसी आगी लगाई’ पढ़ा था और बाबा के साथ जैसा गुजर रहा था, मैं अंदाजा लगा रहा था कि बाबा जल्दी ही दिल्ली पर थूक कर भागेंगे। बाबा ने वरुन से जब बनारस जाकर दुकान खोलकर बाकी की जिंदगी (जो दिल्ली में नौकरी खोजने के बाद बहुत थोड़ी सी बाकी मालूम जान पड़ती थी) अपने बनारस में जाकर बिताने की इच्छा व्यक्त की तो वह बहुत खुश हुआ। उसने कहा कि इससे बढ़िया कुछ हो ही नहीं सकता कि आदमी जहाँ का है वहीं जाकर मरवाए। आखिर मरवाना हर जगह है तो दिल्ली क्यों। बाबा को उसने शिवगंगा में चालू में बिठा दिया क्योंकि दो दिन बाद का टिकट मिल रहा था और बाबा दो दिन रुकने के पक्ष में नहीं थे। जब ट्रेन सीटी देकर चल पड़ी तो बाबा और वरुन ने एक दूसरे को हाथ हिलाया। बाबा को बहुत भयंकर भीड़ होने के बावजूद खिड़की के पास जगह मिल गई थी और आगे जब आप बाबा के विषय में बाकायदा जान लेंगे तो ऐसी घटनाओं के विषय में विस्तार से जानने की अपनी इच्छा आपको बहुत टुच्ची सी लगेगी। ट्रेन जब आगे से मुड़ी और बाबा बहुत हल्के से नजर आ रहे थे तो वरुन का कहना था कि बाबा ने सिर आपातकालीन खिड़की से बाहर निकाल कर दिल्ली पर नफरत से थूका था। आपातकालीन खिड़की दरवाजे के दाईं तरफ थी और आपात स्थिति में जो बॉक्स तोड़कर उसे खोला जाना था वह तोड़ा जा चुका था। बाद में जब बनारस में इस घटना का जिक्र हुआ तो बाबा थूकनेवाली घटना से साफ मुकर गए और उन्होंने ताल ठोककर कहा कि ऐसा थोड़े ही था कि तुल जाते तो दिल्ली में नौकरी ही नहीं मिलती लेकिन उनको ऐसा लगा कि अपने घर में दो रुपया कम कमाना बाहर दो रुपया अधिक कमाने से अधिक फायदेमंद है।

बाबा कई काम कर के छोड़ चुके हैं और उन सभी कामों में जो चीज सबसे खास होती है वह है उस काम को लेकर उनका एप्रोच। यह एप्रोच बाबा के उसी रवैये की देन है जिसे अच्छे से कहनेवाले लोग यह कहते हैं कि बाबा की उम्र इंटर पास करनेवाली जगह पर ही रुक गई है और देसी भाषावाले कहते हैं कि बबवा बकचोद है। बाबा ने लौटने के बाद जब बनारस में एक दो पन्ने का अखबार ज्वाइन किया था तो उनकी निष्ठा बड़े-बड़े गणेश शंकर विद्यार्थियों और प्रभाष जोशियों को मात देने वाली थी।

इसके कुछ पीछे जाएँ तो मैंने बतौर पत्रकार अपना जीवन बनारस के एक जमाने में क्रांतिकारी कहे जानेवाले अखबार ‘आज’ से शुरू किया था। हमें कक्षाओं में पढ़ाया गया था कि आज का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है और इसने आजादी की लड़ाई में महती योगदान दिया है। जब मैंने वहाँ काम करना शुरू किया तो उस समय तक इतिहास ही इतिहास बचा था और अब उस स्वर्णिम इतिहास को धूमिल किए जाने की कोशिशें ऐसी थीं कि कुछ समय बाद इस अखबार का नाम लेने पर लोगों की बेलगाम हँसी छूटने वाली थी। हम नए नवेले पत्रकारों को इस बात से ज्यादा दुख नहीं था कि हमसे पाँच हजार रुपए पर हस्ताक्षर करा कर पाँच सौ दिए जाते थे बल्कि असली चिंता की बात यह थी कि इस अखबार को कोई खरीदता नहीं था। लोग इसे बंद करने की सलाहें मालिकों को दिया करते थे और वह न जाने किस मजबूरी के तहत इसे निकालते ही जा रहे थे (उनकी मजबूरियाँ हमें खैर बाद में समझ में आईं)। इस अखबार को सिर्फ एक कारण से पसंद किया जाता था कि शहर के सिनेमाहॉलों में हुए परिवर्तनों को यह स्वर्णिम इतिहास वाला अखबार बीच के पूरे एक पन्ने (कभी-कभी दो पन्ने भी) पर स्वर्णाक्षरों टाइप छापता था। सबसे नीचे सबसे बड़ा फोटो उस फि़ल्म का हुआ करता था जिसे परिवार में लड़के तिरछी निगाहों से देखते थे और चाय की दुकानों पर एकदम खुलकर देखते और चर्चा करते थे। उसके ऊपर शहर में लगी हर फिल्म की एक छोटी फोटो, कलाकारों के नाम और फिल्म के बारे में एक-दो लाइनों में विशेषता दिए जाने का रिवाज था। ये विशेषताएँ फिल्म के एक ऐसे सीन के साथ लिखी होती थीं जो सीन पूरी फिल्म में आँखें फाड़कर खोजने पर भी नहीं मिलता था। ये कुछ इस तरह होती थीं - दक्षिण भारतीय कलाकारों का जमावड़ा, सिराको से भी बढ़ कर बेहतरीन सीन, गोरी गोरी सुंदरियों का मेला, रोंगटे खड़ेकर देनेवाले रोमांटिक सीन आदि आदि। उन फिल्मों के विज्ञापनों के साथ कुछ और विज्ञापन उसी फांटसाइज में देने का जो प्रयोग इस अखबार ने शुरू किया था वो काबिल-ए-तारीफ था। ऐसा लगता था ये भी फि़ल्में ही हैं। ‘प्राइवेट ट्यूशन टीचर’, ‘मस्त जवानी’ और ‘केलेवाली’ जैसी फि़ल्मों के साथ ‘छोटा लिंग निराश क्यों’, ‘ और ‘जापानी लिंगवर्धक यंत्र फ्री’वाले विज्ञापनों ने इस क्रांतिकारी अखबार को एक खास वर्ग में बहुत मशहूर कर दिया था। लोग चाय की दुकान पर फि़ल्मों के विज्ञापन पढ़ कर आपस में बातें करते कि रजा आज ‘पीछे से डाला ए राजाजी’ पिच्चर देखे चलल जाई जेम्मन ‘केकरा खातिर रखले बाड़ू ब्लाउज में बुलबुली’ गनवा हौ। ऐसी बातें करते हुए भी वे तिरछी निगाहों से जापानी यंत्र और नाना प्रकार के तेलों के बारे में जरूर पढ़ते और अंदाजा लगाते कि भले ही आज कोई दिक्कत नहीं है लेकिन कभी दिक्कत हो तो इसी दवाखाना में चला जाएगा।

बाबा मुझसे मिलने आज के दफ्तर में आया करते थे और रिर्पोटिंग की एकाध घटनाओं में पत्रकारों के तथाकथित (आभासी) जलवे देखकर बाबा ने निर्णय लिया कि अब जो भी हो जाय, साले को पत्रकार ही बनना है। बाबा ने सारे अस्त्र आजमा लिए और कुछ दिन के भीतर ही एक दो पन्ने के अखबार के ‘क्राइम रिपोर्टर’ हो गए।

बाबा क्राइम रिर्पोटर क्या हुए कि हमारे ग्रुप में बातचीत का पूरा टॉपिक ही बदल गया। मान लीजिए मैं और रवि पहले से यादव की चाय की दुकान पर बैठे चाय लड़ा रहे हैं और बाबा का इंतजार कर रहे हैं और बाबा अचानक आते हैं। वैसे तो बाबा हमेशा अचानक ही आते थे लेकिन उन दिनों अंदाज कुछ यूँ था।

‘साले तुम लोग यहाँ चाय लड़ा रहे हो वहाँ इसकी जात की करोड़ों रुपयों का हेरफेर हो गया।’ हम घबरा कर उठते, ‘कहाँ, कैसे, कब...?’ फिर बाबा इत्मीनान से कहानी सुनाते कि नदेसर से कैंट आने के बीच में जो सड़क पड़ती है उसका पुनर्निर्माण किया जा रहा है और उसका ठेका फलाने ठेकेदार को दिया गया है जो फलाँ मंत्री का छोटा साला है जिसके लिए इतने करोड़ रुपए स्वीकृत हुए हैं और पीडब्ल्यूडी का फलाँ इंजीनियर उस ठेकेदार का साढ़ू भाई है जो सड़क बनवा रहा है...। लब्बोलुआब ये होता था कि देश में और खासतौर पर बनारस में बहुत कुछ गलत और गैरकानूनी हो रहा है और चूँकि बाबा पत्रकार हैं इसलिए इसको सही करने की सारी जिम्मेदारी उनकी है। बाबा ने उन दिनों अपने चार पृष्ठों के अखबार में कई सारी ज्वलंत समस्याओं पर अपनी कलम चलाई थी और कसम से जितने भी लोगों ने उसे पढ़ा वे बाबा की खोजी पत्रकारिता के मुरीद हो गए। दिक्कत यह थी कि बाबा उस अखबार में कहानी कविता छाप रहे हैं, खोजी पत्रकारिता कर रहे हैं या नामर्दी दूर करने का विज्ञापन दे रहे हैं इससे अखबार के संपादक यानी मालिक को कोई मतलब नहीं था। वह अपने किराने की दुकान से एक दिन अचानक उठ कर आता था और बाबा को कहता था - ‘का मरदे अनुज एकबरवा जल्दी छापा केतना लोग खोजत हउवन कि अबहीं तक हमार ‘बारूद’ आयल काहे नाहीं।’ बाबा कहते - ‘हाँ भइया प्रेस में चला गया है, कल शाम तक आ जाएगा। इस बार हम बनारस के सभी थानों के बारे में एक खबर दे रहे हैं कि कौन से कमाईवाले थाने हैं और कहाँ-कहाँ पोस्टिंग के लिए कितना पैसा लग रहा है और...।’

‘बहुत सही रजा...चँपले रहा।’ उसे बाबा की पत्रकारिता का बखान सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं रहती थी। वह बाबा की हर रिपोर्टिंग को ऊँची आवाज में बहुत सही गुरू, बहुत सही रजा कहकर धनिया, हींग बेचने चला जाता तो बाबा थोड़े दुखी होते। लेकिन बाबा इतने आशावादी थे कि थोड़ी देर दुखी रहने के बाद यह मान लेते थे कि वाकई उनकी हर रिपोर्ट इतनी सही रहती है कि उनका संपादक बहुत सही के अलावा कुछ और नहीं कह पाता है। ज्यादा दुखी होने पर वह यह भी सोचते कि जाने दो, चूतिया नमक तेल बेचनेवाला आदमी है, मेरी पत्रकारिता क्या समझेगा। अखबार हर हफ्ते छपता था और बाबा पूरे हफ्ते दौड़ते रहते थे। हम सब बाबा की मेहनत देखकर नतमस्तक थे। पत्रकारिता मैं भी कर रहा था और हम दोनों तनख्वाह में (रुपए पाँच सौ मात्र) बराबर भी थे लेकिन बाबावाली श्रद्धा मुझमें नहीं थी। मैं किसी तरह कोरम पूरा करके अपनी ड्यूटी बजाता था और चाहता था कि जल्दी से जल्दी कोई अच्छा अखबार मुझे मिल जाय।

बाबा को इस बात से बहुत टेंशन होती जा रही थी कि वह और उनका अखबार बहुत मेहनत करके भी देश तो दूर बनारस में भी कोई गलत काम रोक नहीं पा रहे। बाबा थोड़े दुखी रहने लगे थे और लड़कियों और फिल्मों के बारे में बात करने की जगह हर समय विभिन्न समस्याओं पर बातें करते रहते थे जिसके अंत में एक लाइन का निष्कर्ष आता था - ‘सिस्टम मादर... है।’

उन्हीं दिनों बाबा एक दिन अपने छोटे भाई की बाइक (जो ऑटोमोबाइल की दुकान पर ठीक-ठाक कमाता था और मूड ठीक होने पर कभी-कभी, प्राय: रविवार को, बाबा को अपनी मोटरसायकिल कुछ देर के लिए देकर अनुगृहीत करता था) लेकर विद्यापीठ एक सेमिनार की रिपोर्टिंग करने जा रहे थे कि इंगलिशिया लाइन के पास कुछ खाकी वर्दीवालों ने उन्हें रोक दिया।

‘कागज दिखाओ।’

बाबा ने कहा कि उनके पास कागज नहीं है क्योंकि वह प्रेस में हैं।

‘डीएल दिखाओ।’ पुलिसवाले ने कहा।

बाबा ने कहा कि वह ड्राइविंग लाइसेंस लेकर चलना अपनी तौहीन समझते हैं क्योंकि वह प्रेस में हैं। संयोग से बाबा उस दिन हेलमेट भी नहीं लगाए हुए थे और पुलिसवाला पहले ही प्रेस वालों की वजह से खार खाया हुआ था। नगर के दो तीन प्रमुख अखबारों ने यह खबर प्रकाशित की थी कि पुलिसवाले यातायात प्रबंधन पर ध्यान नहीं दे रहे और पूरे शहर में लोग ट्रिपलिंग कर रहे हैं और बिना हेलमेट के चलते हैं। आखिर पुलिसवाले ने गुस्से से पूछा, ‘न डीएल है न कागज है, आखिर तुम्हारे पास है क्या ?’

इस पर बाबा ने जो किया उस पर यही कहा जा सकता है कि बाबा तो हमेशा सही होते हैं बस वक्त गलत हो जाता है। बाबा ने अपना स्वेटर नीचे से थोड़ा सा उठाया और आँखों से नीचे की ओर इशारा करते हुए बोले, ‘मेरे पास यह है, देखिए और जाने दीजिए।’

खाकी वर्दीवाला आगबबूला हो गया और उसने दाँत पीसते हुए जो कहा था उसका सभ्य भाषा में अनुवाद यही होगा कि हे दो कौड़ी के पत्रकार तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई पुलिसवाले को ऐसे भद्दे इशारे करने की? यह सवाल एक करारे झापड़ के साथ आया था। बाबा सकपका गए और उन्हें अपनी हरकत का विश्लेषण किया तो पाया कि उन्होंने अनजाने में एक खासी बद्तमीजी भरी हरकत कर दी है। उन्होंने अपने प्रेस कार्ड को, जो गले में लटका था और स्वेटर में अंदर ही कहीं फँस गया था, को बाहर निकाला और पुलिस की गलतफहमी दूर की। पुलिसवाला भी मान गया कि बाबा स्वेटर उठा कर नीचे की ओर दिखा कर वाकई यही कार्ड प्रदर्शित करना चाह रहे थे। उसने प्रेस कार्ड का आगे-पीछे उर्ध्वाधर क्षैतिज सब तरफ से मूल्यांकन किया और दिमाग की कई परतें खुरच डालीं। आखिरकार उसे झक मार कर पूछना ही पड़ा।

‘ये है क्या?’

‘अखबार है अउर क्या है।’

‘ई कौन सा अखबार है दैनिक जागरण तो हम सुने हैं।’

‘ई साप्ताहिक है।’

‘अच्छा...। दैनिक लगा है नाम में तो साप्ताहिक कैसे...?’

‘अरे नाम में लगा होने से का मतलब? पहले पंद्रह दिन पे आता था और अब साप्ताहिक हो गया है। दैनिक भी हो जाएगा कभी न कभी...।’ बाबा का तर्क अकाट्य था लेकिन एसओ की चिंता भी वाजिब थी।

‘कभी हम सुने नहीं ‘दैनिक बारूद’ का नाम।’

बाबा ने अब ट्रंप कार्ड फेंका।

‘अच्छा... नाम नहीं सुने? लेकिन हर हफ्ते कप्तान साहब के कार्यालय और पुलिस लाइन जाता है हमारा अखबार।’

इस बात में असर था और पुलिसवाले ने बाबा को इसके बाद और परेशान नहीं किया और बाइज्जत जाने दिया। इस घटना का चश्मदीद गवाह मेरा एक पत्रकार मित्र था जो उस समय बगल की चाय की दुकान पर बैठा था। मगर कमाल यह कि बाबा के प्वांइट ऑफ व्यू से जब यह घटना सुनाई गई तो बिल्कुल अलहदा थी।

‘जानते हो कल एक लफड़ा हो गया था।’

‘क्या बाबा?’ हमने उत्साह में भर के पूछा।

‘एक पुलिसवाले से झकझक हो गई थी।’

‘कब... कैसे... कहाँ...?’

‘अइसे ही, हम अनुपम की गाड़ी से विद्यापीठ जा रहे थे एक सेमिनार की रिपोर्टिंग करने और इंग्लिशिया लाइन पर कोई एस्सो था जो हमको रोक लिया।’

‘अच्छा... फिर?’

‘उसको बहुत समझाए कि गाड़ी का कागज हम लेके चलते ही नहीं और डीयल हमारा आज तक बना नहीं लेकिन साला मनबे नहीं किया।’

‘अच्छा... फिर?’

‘फिर का, लगा कहने कि न कागज है न डीयल है न हेलमेट है त∙ तुम्हारे पास है का? हमारा दिमाग घूम रहा था, हम कहे अबे जाने दो दिमाग मत चाटो।’

‘फिर?’

‘फिर का, हमारा हाथ पकड़ लिया। बस हाथ पकड़ना था कि घुमा के मारे एक लपाटा। कहे भोंसड़ीवाले, बड़े-बड़े लोगों की गाँड़ में दम नहीं कि अनुज श्रीवास्तव का हाथ पकड़ें और तुम चले हो पुलिसिया इस्टाइल मारने...।’

मैं और रवि खामोश थे क्योंकि हम पहले भी ऐसी कई घटनाएँ सुन चुके थे। लेकिन विवेक ने उन दिनों यादव टी स्टाल पर नया-नया बैठना शुरू किया था और बाबा के जौहर से पूरी तरह परिचित नहीं था। पहले तो उसने कई बार पूछा क्या वाकई? क्या वाकई? और आखिर मैं हतप्रभ होकर कह बैठा, ‘हमको लग रहा है बाबा तुम चूतिया बना रहे हो। एसओ तुमको झापड़ मारा होगा और तुम हिंया अपने वाहवाही लूट रहे हो।’

बाबा चुपचाप उठे और यादव टी स्टाल के बगलवाली दुकान से एक सिगरेट जला आए। उन्होंने सबके चेहरों पर एक नजर डाली और गहरी आवाज में बोले, ‘बेटा अभी तुमको मालूम ही नहीं कि अनुज श्रीवास्तव क्या चीज हैं। जिस दिन जान जाओगे ऐसी बकचोदी भरी बात नहीं पूछोगे।’ इसके बाद बाबा के चेहरे पर जमाने भर का दुख उभर आया जिसका भावार्थ था कि एक तो सिस्टम पहले से जालिम है दोस्त भी साले सिस्टम की तरह होते जा रहे हैं।

इस प्रकरण के बाद यह आवश्यक हो जाता है कि बाबा का फिजिकल स्ट्रक्चर जान लिया जाय। स्वभाव से कभी महाउत्तेजित कभी औघड़ मलँग बाबा का रंग गेंहुँआ, कद दरम्याना और वजन चौवालिस किलोग्राम है। पेट पर कटे का निशान है जिसे वह चाकू का निशान बताते हैं और करीबी बताते हैं कि कफ सीरप की शीशी टूट कर पेट में धँसी थी। बाबा उन दिनों एक दिन के लिए भी किसी दोस्त की बाइक लेते तो बाइक कुछ बदली हुई आती थी। बाइक के तेवर बजाज प्लेटिना से हार्ले डेविडसन टाइप के हो चुके होते थे और उसकी हेडलाइट कवर पर प्रेस का स्टीकर लगा होता था। बाबा उन दिनों बहुत निडर हो गए थे। सड़क पर ऐसे चलते मानो उनके माथे पर प्रेस का स्टीकर लगा हुआ है। हर जगह पंगे लेते थे और अपुष्ट सूत्रों की मानें तो ज्यादातर जगहों पर पिटकर लौट आते थे। कुछ भी हो बाबा कोई भी गलत बात बर्दाश्त नहीं करते थे और कहीं भी भिड़ जाते थे।

बाबा में बाबत्व के गुण बचपन से थे लेकिन ये गुण परवान चढ़े तब जब बाबा ने किसी शुभचिंतक के यह कहने पर कि अच्छा और बड़ा पत्रकार बनने के लिए प्रशिक्षण जरूरी होता है, काशी विद्यापीठ में एडमिशन लिया। एडमिशन लेने की इच्छा के पीछे अखबार के उन भरमाऊ लेखों का भी उतना ही हाथ था जो करियरवाले पेज पर छपते थे और बताते थे कि मीडिया का क्षेत्र अनंत संभावनाओं से भरा है और इससे संबंधित कोर्स करने के बाद प्रारंभिक सेलरी भले ही आठ-दस हजार हो, कुछ अनुभव के बाद पत्रकार अपनी क्षमतानुसार लाखों कमा सकते हैं (क्षमता का अर्थ वे खुल कर नहीं बताते थे)। बाबा ने जब विद्यापीठ में पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए दो साल के कोर्स में एडमिशन लिया तो वे साल बकौल उनके उनकी जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल थे (हालाँकि बाद में बाबा ने इसे अपने जीवन का सबसे बुरा समय माना)। उस समय उनका नाम बाबा नहीं रखा गया था और उन दो सालों में उन्होंने यह नाम अपनी योग्यता से अर्जित किया।

हम सभी दोस्त भी लड़कियाँ घूरने, भागकर फिल्में देखने और टाइमपास करने से आगे आ चुके थे और नून तेल लकड़ी की चिंताओं से घिरने लगे थे। हम तब भी लगातार मिलते थे लेकिन अब हमारी बातें प्रेम प्रसंगों और जीवन को लेकर बड़े सपनों से उतर कर औकात पर आ चुकी थीं। मैं हमेशा से एक बड़ा लेखक बनना चाहता था लेकिन जब मैंने कहानियाँ लिखना और पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया तो मेरी सारी कहानियाँ वापस लौट आती थीं। उन पत्रिकाओं में छपी सारी कहानियाँ अच्छी ही नहीं होती थीं बल्कि कुछ तो मेरी लौटाई गई कहानियों से भी खराब होती थीं। फिर भी मैं समझ चुका था कि अच्छा लेखक बनने लायक न तो मेरी भाषा है न शैली। फिर भी मैं आज भी रोटी जुटाने के प्रयासों के बीच कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूँ और मजे की बात यह है कि इस बीच मेरी दो तीन कहानियाँ देश की बड़ी मानी जानेवाली पत्रिकाओं में छप भी गईं। यह तब की बात है जब हम गृहस्थ नहीं हुए थे और शादी के लिए हमारे घरों में रोज नए रिश्ते आ रहे थे, वह भी तब जब हममें से कोई किसी काम धंधे से नहीं लग पाया था। मैं एक ऐसे अखबार में नौकरी कर रहा था जहाँ से चाय पीने का खर्चा भी नहीं निकल पाता था हालाँकि मेरे कई साथी उसी अखबार से मोटरसायकिल, महँगे मोबाइल फोन और महँगे कपड़े कहाँ से मैनेज कर लेते थे यह कम से कम उस समय मेरे लिए एक अबूझ पहेली रहती थी।

बाबा ने पत्रकारिता के चकाचौंधी जलवे देखकर विद्यापीठ में एडमिशन लिया था और पढ़ाई छोड़े पूरे चार साल हो जाने के बावजूद फिर से फुलटाइम कोर्स करने की हिम्मत की थी। वह वहाँ वाकई सिर्फ पढ़ने ही गए थे लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि वहाँ उनके लिए प्रेम अपनी जुल्फें खोले, लिपिस्टिक लगाए और पलकें बिछाए इंतजार कर रहा है। अपने क्लास में बाबा की मुलाकात अपनी क्लासमेट रिचा (बदला हुआ नाम) से हुई जो फिजिक में अपने तरह की एकमात्र और दुर्लभ पीस थी और देखने में एकदम बाबा के लिए स्पेशल ऑर्डर पर बनवाई गई लगती थी। बाबा बोलने में शुरू से उस्ताद थे और व्यवहार में महाभौकाली थे। वह मासूम लड़की धीरे-धीरे बाबा की वाणी और उनकी जानकारी (पढ़ें अपनी अज्ञानता) से जो एक बार इंप्रेस हुई तो फिर होती चली गई। बाबा जो काम करते थे वह एकदम जुटकर और फुलटाइम। बाबा की डिक्शनरी में पार्टटाइम शब्द ही नहीं था। वह जिन दिनों प्यार में थे उन दिनों हम दोस्तों को लगता था कि पूरी दुनिया प्यार में है। हमें लगता था कि ओसामा बिन लादेन, जॉर्ज बुश, ददुआ और ठोकिया सभी किसी न किसी के प्यार में जरूर गिरफ्तार होंगे। बाबा जब हमारे पास आते तो बातों का समाँ पूरी तरह बदल जाता। मान लीजिए मैं वरुन और रवि के साथ यादव के अड्डे पर बैठ कर किसी ऐसे अखबार में काम करने के बारे में सोच रहा होऊँ जिसका सर्कुलेशन भी अच्छा हो और पैसे भी मिलें और इस विषय पर सोचते-सोचते हमारे चेहरे बासी लौंगलत्ते की तरह दिखने लगे हों कि अचानक बाबा का आगमन होता था।

‘क्या बात हो रही है?’ वह सिगरेट हमारी ओर बढ़ाते हुए मुखातिब होते। उन दिनों बाबा के हाथ में बराबर सिगरेट रहती थी।

‘हँसमुखवा सोच रहा है कि अमर उजाला में रिज्यूमे डाल आए।’वरुन बताता। बाबा के चेहरे पर ऐसी मुस्कराहट आती जिसका अर्थ होता कि सालों कभी तो कुछ अच्छा सोच बतिया लिया करो।

‘छिनरो के गोली मारो नौकरी को, मालूम है आज रिचवा से क्या बात हुई है?’ और हम अपने-अपने दुख भूल कर बाबा के प्रेम के रंग में खो जाते और थोड़ी देर के लिए दुनिया से बाहर अपनी एक छोटी और पवित्र दुनिया में चले जाते। हालाँकि बिजली चले जाने के बाद यादव जी जो जनरेटर चलाते उसकी कर्कश आवाज हमारी पवित्र दुनिया तक भी आ जाती थी और हम न चाहते हुए बाहर आ जाते थे।

लब्बोलुआब ये कि बाबा प्रेम में थे और हर दिन ऊपर उठते जा रहे थे। हम अपने हाथ बढ़ा कर उन्हें पकड़ने की कोशिश करते लेकिन वह दिनोंदिन हमारी पहुँच से बाहर जा रहे थे। उन्हीं दिनों मेरी पहली कहानी देश की एक अच्छी साहित्यिक पत्रिका में छपी थी और मेरे पास रोज दो के औसत से फोन आते थे जो मेरे इस मुगालते को और पुख्ता करते थे कि वाकई मैं अच्छा कहानीकार बन सकता हूँ। यादव जी की चाय पीता हुआ मैं विवेक, वरुन और रवि को यह बताता रहता था कि आज किस-किसके फोन आए और क्या-क्या बातें हुईं। उस समय कुछ चार-छह दिनों के लिए तो ऐसा हुआ ही होगा कि किसी ऐसी साहित्यिक हस्ती का फोन आया होता था कि दोस्त बाबा के रोज के प्रेम प्रसंगों से ध्यान हटाकर मेरे फोन के बारे में जानने की इच्छा रखते थे। बाबा साहित्यिक चर्चाओं में एकदम से अलग-थलग सा महसूस करते क्योंकि रवि और वरुन ने रुचिवश थोड़ा बहुत साहित्य पढ़ रखा था और मेरी खरीदी किताबें भी माँग कर ले जाते रहते थे लेकिन बाबा ने आज तक साहित्य को ध्यान देने लायक चीज नहीं समझा था।

आखिर एक दिन जब मैं सबको बता रहा था कि आज हिंदी के एक जाने माने कवि ने मेरी कहानी पढ़ कर फोन किया था और इस खुशी में सबको चाय के साथ पकौड़ियाँ भी खिला रहा था, बाबा ने बताया कि आज उन्होंने साले को एक बहुत बेहतरीन कहानी पढ़ी है। हम सबने उत्साह से पूछा कि कौन सी कहानी तो बाबा लेखक का नाम याद करने में तो असमर्थ रहे लेकिन उन्होंने सार संक्षेप में बताया कि एक बनिया है जो अपनी लड़की को कैद करके रखता है, एक लड़का उसके घर में किराएदार आता है तो लड़की उसको पसंद करने लगती है और कैद से छुड़ाने के लिए उसको चिट्ठी लिखती है आदि आदि। कुल मिलाकर बाबा ने उस दिन अपनी एडीशनल टिप्पणियों के साथ कहानी सुनाई और इस क्रम में खुद में एक लेखक साँस लेता महसूस किया।

दो दिन बाद जब मैं ऑफिस से खाली होकर यादव टी स्टाल पर चाय की चुस्कियों के साथ रवि और वरुन को अपनी नई कहानी का प्लॉट सुना रहा था कि बाबा नमूदार हुए। उन्होंने दिनदहाड़े घोषणा की कि वह एक भी एक कहानी पर काम कर रहे हैं और जल्दी ही पूरा करके सबको सुनाने वाले हैं। बाबा पूरी तरह साहित्यिक से हो गए थे ओर रिचा का नाम भूल कर भी नहीं लेते थे। हम तब उसकी चर्चा भी ले आते तो बाबा हमें ऐसी निगाहों से देखने लगते कि हमें अपने टुच्चेपन पर शर्म आने लगती। आखिरकार एक दिन वह घड़ी आ ही गई। बाबा ने अपनी लिखी कहानी ‘हरकत’ का यादव टी स्टॉल में बाकायदा पाठ किया जिसका आनंद यादव जी ने भी उठाया और कहानी खत्म करते ही लेखक ने मुझसे पूछा कि इसे हंस में भेजें या कथादेश में। कहानी का सार बाबा की दिल्ली से बनारस तक की रेल यात्रा थी जिसमें चालू डिब्बे में बैठे एक नवदंपत्ति की अश्लील ‘हरकतों’ (जिसके बारे में वह हमें विस्तार से बता चुके थे) का बाबा ने और भी अश्लील तरीके से वर्णन किया था। मैंने बाबा को सिर्फ इतना कहा था कि बाबा आप जिन पत्रिकाओं में कहानियाँ भेजना चाहते हैं पहले उनको एकाध महीना खरीद कर पढ़ तो लीजिए। साथ में मैंने बिना माँगे एक राय यह भी दी कि बाबा आपको कुछ लेखकों की किताबें जरूर पढ़ना चाहिए। जैसी कहानियाँ लिखने में आपकी रुचि है, बेहतर होगा आप मंटो, राजेंद्र यादव, राजकमल चौधरी, कृश्ण बलदेव वैद और तसलीमा नसरीन की कम से कम प्रतिनिधि रचनाएँ तो खरीद कर पढ़ें ही पढ़ें। बदले में बाबा ने जो जवाब दिया उससे मैं ही नहीं यादवजी तक लाजवाब हो गए और हमारी चर्चा से ध्यान हटाकर रबड़ी बेचने में ध्यान लगाने लगे।

‘अबे हम किसी लेखक का लिखा इसलिए नहीं पढ़ना चाहते क्योंकि हम नहीं चाहते कि हमारी राइटिंग पर किसी की छाप पड़े। समझे?’

मैं क्या कोई नहीं समझा था। बाबा लगभग एक महीने तक साहित्यिक रहे थे और फिर अचानक एक बीच छह-सात दिन के लिए लगातार गायब हो गए। जब बाबा लौटे तो उनकी कलाई पर कटने का निशान था।

‘ये कटा कइसे बाबा?’ रवि ने पूछा। निशान ताजा था।

‘अबे कुछ नहीं, पपीता काट रहे थे।’ बाबा ने लापरवाही से कहा और अपनी दूसरी कहानी के बारे में बुझी आवाज में कुछ कहने लगे। सबने बेमन से बाबा की कहानी सुनी लेकिन ध्यान सबका बाबा की कलाई पर ही था। सब जानते थे कि बाबा का मन अभी बताने का नहीं है तो वह नहीं बताएँगे और बाद में बिना पूछे ही सब खोल देंगे। चिंता की बात यह थी कि यह पपीते का मौसम नहीं था।

बाद में बाबा के एक क्लासमेट ने, जो हमें यूँ ही एक दिन चनुआ सट्टी में मिल गया था, हमें बताया कि बाबा ने रिचा को प्रपोज किया था और उसने उन्हें चालू फैशन के हिसाब से सिर्फ दोस्त बताते हुए प्रेम का प्रपोजल मानने से इनकार कर दिया था। बाबा के पपीता काटने का राज हम समझ गए थे। ठीक उसी समय के आसपास मैंने और वरुन ने भी क्रमश: अपने ऑफिस और कॉलोनी में अपनी पसंद की लड़कियों को प्रेम प्रस्ताव दिया था जो बेरहमी से खारिज कर दिया गया था। हम दोनों ने इस गम को बाबा से बाँटा था और दो दिन आँसू बहाकर दारू पीने के बाद धीरे-धीरे इसे भूलने लगे थे। लेकिन बाबा में लड़कपन था और वह जिन चीजों से दिल लगाते थे उन्हें इतनी आसानी से छोड़नेवालों में नहीं थे। हमें यह दुख था कि हमारे बचपन के दोस्त बाबा ने अपने जीवन की इतनी जरूरी बात हमसे छिपाए रखी। बाबा ने मुझसे मार्गदर्शन न पाने की स्थिति में अपनी कहानी ‘दैनिक बारूद’ में छाप दी थी जिसे पढ़ने के बाद उनका उत्साहित संपादक कम मालिक (ज्यादा) भी आजकल एक कहानी लिख रहा था जिसका शीर्षक था ‘लटकता हुआ खंजर पजामे के अंदर’।

बाबा उस बीच हमसे काफी-काफी दिन पर मिलते थे और खासे गुमसुम नजर आते थे। एक बीच वह हमसे पूरे एक हफ्ते तक नहीं मिले और न ही हमारा फोन रिसीव किया। हम लोग उनके घर जाने की प्लानिंग कर ही रहे थे कि बाबा ने फोन करके हम लोगों को यादव जी के अड्डे पर बुला लिया। बाबा ने हरियाली आवाज में बताया कि उन्हें रिचा ने प्रपोज किया है और उन्होंने उसका प्रपोजल मान लिया है। बाबा की आँखों में विजय की चमक थी।

बाबा उन दिनों कपड़े एकदम नए और चटख रंगों के पहनने लगे थे। वरुन दिल्ली चला गया था और एक बड़े नामवाले अखबार में ठीक-ठाक पैसे पा रहा था। मैं लगातार उससे कहता और अपना बायोडाटा फॉरवर्ड करता रहता था कि मेरा भी दिल्ली के किसी अखबार में जुगाड़ लग जाए। वरुन कोशिश में था और मैं अब जल्दी से जल्दी बनारस छोड़ देना चाहता था। रवि ने मेडिकल रिप्रेजेण्टेटिव की नौकरी ज्वाइन कर ली थी और हर समय डॉक्टरों को गरियाता रहता था और कहता था कि इस लाइन में बहुत करप्शन है। मेरी और उसकी इस बात पर बहस होती ही रहती थी कि साला करप्शन तो हर लाइन में है कि अचानक बाबा आ जाते थे और बताने लगते थे कि रिचा आज हरे रंग के सलवार सूट में आई थी और कमाल लग रही थी। आज दोनों ने मैक्डॉनल्ड में बर्गर खाए, कॉफी पी और इस दौरान बाबा ने उसकी हथेलियों को दबाया था जो कि फूल से भी नाजुक थीं। रवि का मूड उस दिन बहुत खराब था।

‘चुप रहबा बुजरो के, आग राग मत गावा, इहाँ पूरा जिंदगी सरवा अन्हारे में हौ। बु़ढ़ौती में पढ़ाई कइले क∙ डिसीजन लेहले हउवा त∙ आपन उमिरियो याद रक्खल करा। ई खाय कमाय क उमिर हौ बाबा, लौडिंयाबाजी करे क∙ नांहीं...।’

बाबा हतप्रभ थे। उनकी बातों को अपने ही नहीं दूसरे दोस्तों के ग्रुप में भी सम्मान दिया जाता था मगर आज रवि की ऊँची आवाज की हिकारत यादवजी ने भी महसूस की थी और चुपचाप दूसरी ओर मुँह करके चाय छानने लगे थे। बाबा उदास से हो गए थे और उसी समय विवेक आ गया था। रवि ने व्यंग्य से हँसते हुए विवेक को जो सुनाया उसका अर्थ यह था कि तीस साल की उम्र में एक तो बबवा पढ़ाई कर रहा है और दूसरे जीवन की जटिलताओं की ओर ध्यान न देकर बेवकूफि़यों में लिप्त है।

मुझे कुछ महीने पहले घटी ऐसी ही घटना याद हो आई जिसमें बाबा की ऐसी ही हरकत पर वरुन ने उन्हें डाँटा था और कहा था बेटा अनुज तुम्हारी आदतें सब वही हैं जो हम सबकी आठ साल पहले थीं। यह वही दिन था जब उनका नाम बाबा रखा गया था। दरअसल रात को नौ बजे, जब हम यादव टी स्टॉल से चाय सिगरेट पीकर अपने-अपने घरों को लौट चुके थे कि बाबा का फोन आया। मुझे, रवि और वरुन को बाबा ने फिर वहीं इमरजेंसी में बुलाया था जहाँ से हम सब सिर्फ एक घंटे पहले रुखसत हुए थे।

‘बात क्या है? क्या कोई बहुत जरूरी काम है?’ यह सवाल लगभग सभी ने पूछा था और इसका जवाब यही मिला था कि हाँ जल्दी आओ बहुत जरूरी काम है। हम सब बिना मन के पहुँचे थे तो बाबा यादवजी की दुकान में न बैठकर बाहरवाली पान की दुकान पर खड़े सिगरेट पी रहे थे और मुस्करा रहे थे। मैं और रवि भी बिना मन के आए थे लेकिन वरुन घर पर कोई जरूरी काम छोड़ कर आया था। उसने पहुँचते ही पूछा।

‘क्या बात है जल्दी बताओ साले घर जाना है तुरंत।’

बाबा अनवरत मुस्करा रहे थे और हम बहुत जल्दबाजी में कहीं कोई बदलाव नहीं देख पा रहे थे।

‘बात देख नहीं पा रहे हो?’ बाबा ने मुस्कराते हुए पूछा।

‘नहीं... एकदम नहीं देख पा रहे, जल्दी बताओ।’ वरुन ने कोई बात देखने की गरज से इधर उधर नजरें फिराईं और फिर बाबा से मुखातिब हुआ।

‘तुम बताओ बे?’ अब बाबा मेरी ओर पलटे। मुझे भी कोई खास बात नहीं दिखी। ‘और गुरू तुम...?’ बाबा ने रवि की ओर देखा और रहस्यात्मक ढंग से मुस्कान बिखेरते हुए अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। दाढ़ी जो कुछ देर पहले बेतरतीब थी अब फ्रेंच कट हो चुकी थी और वाकई बाबा पर अच्छी लग रही थी लेकिन क्या बाबा ने हमें इसके लिए इतनी इमरजेंसी में बुलाया था।

‘भोसड़ी के यही देखने के लिए इतना इमरजेंसी में बुलवाए हो?’ वरुन आगबबूला हो गया था। बाबा हड़क गए थे लेकिन खुद को सँभालकर बोले थे।

‘अच्छा लग रहा है कि नहीं? मेरे ऊपर जम रहा है न?’ बाबा ने धीरे से हम तीनों की ओर बारी-बारी से देखते हुए कहा था। मैं भी गुस्से में था और रवि ने हामी भरते हुए कहा था कि दाढ़ी अच्छी लग रही है लेकिन इसको कल दिखाना चाहिए था, कल तक दाढ़ी बढ़ तो नहीं जाती। वरुन का गुस्सा बहुत बढ़ गया था। उसने बाबा को बहुत लताड़ा और चेतावनी दी कि बाबा अपने आप को सत्रह साल का लौंडा समझें तो समझें, दूसरों को अपने चूतियापे में शामिल न करें। यही वह ऐतिहासिक दिन था जब अनुज श्रीवास्तव जैसा साधारण नाम एक युगांतरकारी नाम में परिवर्तित हो गया था।

‘ऐसे नहीं चलता है चूतिए। हम लोग की उम्र तीस होने आई यार और तुम अभी भी लौंडहरी में लगे हो। जिंदगी कैसे चलेगी यह सोचो।’

अनुज ने कुछ प्रतिवाद करना चाहा था और वरुन को धीरे से कहा था कि तुम चूतिया हो।

‘हम तो चूतिया हैं ही बेटा लेकिन तुम च्यूतिया हो।’ चूतिए और च्यूतिए में वही फर्क था जो बकचोद और महाबकचोद में था और यह हर बनारसी पर जाहिर था।

उसी समय यादवजी ने अचानक एक भोजपुरी गाना चला दिया था। उसमें से कुछ लाइनें हमें बहुत पसंद आई थीं।

‘छप-छप नहाने स्वीमिंग पूल में...

कि बाबा एगो हइए हउएँ।’

गाना हमें भा गया था और वरुन का कहना था कि अनुज भी आजकल जीवन रूपी स्वीमिंग पूल में छप-छप नहा रहा है और इस लिहाज से बाबा कहे जाने के लिए सर्वथा योग्य है। वह दिन था और इसके बाद के कई साल, बाबा की यह सटीक उपाधि ऐसी हिट हुई कि लोग उनका असली नाम भूल गए। इसके बाद तो उनकी तरह हरकतें करनेवाले जितने लोग थे सब किसी न किसी तरह अधिक या कम समय के लिए इस विशेषण से नवाजे गए। बाबा बाकायदा एक विश्वविद्यालय हो गए और ‘बाबा’ उपाधि की फ्रेंचाइजी बाँटने लगे। जैसे एक बीच बहुत बचकानी हरकतें करनेवाले राहुल को बड़े बाबा का खिताब दिया गया तो सोनू को डीम्ड बाबा का। रवि ने एक बीच चुभती हुई बातें कहने के लिए नुकीले बाबा का खिताब प्राप्त किया तो अजीत को घर जाने के लिए जल्दबाजी दिखाने पर फरफर बाबा की उपाधि दी गई। बाबा की उपाधि अचानक बिजली की तरह से बाबा विश्वनाथ के शहर में फैल गई। हमें हर तरफ बाबा लिखा हुआ नजर आने लगा। बाबा ऑटोमोबाइल, बाबा गारमेंट्स, बाबा कैफे, बाबा मोबाइल्स, बाबा कोचिंग सेंटर... आदि आदि। लोग अपनी मोटरसायकिलों के आगे बाबा लिखवाकर और स्वास्तिक बनवाकर चलते तो हम हँस हँसकर दोहरे हो जाते। बाबा का ध्यान उधर आकृष्ट कराते तो बाबा बहुत गुस्सा होते लेकिन धीरे-धीरे कोई और चारा न होने की स्थिति में उन्होंने इस उपाधि को ग्रहण कर लिया था और न चाहते हुए भी बाबा पुकारने पर जवाब देने लगे थे।

एक दिन जब मैं दोपहर का खाना खाकर लहरतारा पुल के नीचे सिगरेट पीने जा रहा था कि एक लोकल चैनल पर विद्यापीठ में मारपीट हो जाने की खबर देखी। मैंने ध्यान नहीं दिया और निकलने ही वाला था कि मुझे टीवी पर पुलिस से मार खाता बाबा का चेहरा दिखा। मैं घबराहट में वरुन को (जो तीन-चार दिन की छुट्टी में दिल्ली से घर आया था) लेकर जब तक विद्यापीठ पहुँचता, तब तक मामला ठंडा हो चुका था। बाबा एक ओर पड़े थे और रिचा उनका माथा सहला रही थी। कुछ छात्र आक्रोशित से वहाँ खड़े थे और योजना बनाई जा रही थी कि एचओडी को घेर कर मारा जाएगा और बाबा की मार का बदला लिया जाएगा।

‘क्या हुआ बाबा?’ हमने बाबा से सहानुभूति जताई लेकिन बाबा को इसकी कतई जरूरत नहीं थी।

‘अबे कुच्छ नहीं... एक क्लर्क है। साला एचओडी का छर्रा है। प्रवेश पत्र देने के लिए बच्चों से पइसा माँग रहा था। पचास-पचास रुपया... हम मना किए तो हमको हड़काने लगा। सेंक दिए साले को...।’ बाबा के जोश में वृद्धि हो गई थी। उनके माथे से खून बह रहा था और वह हीरो बन गए थे। अपने से हट्टे कट्टे सहपाठियों को बच्चा कहने और समझनेवाले बाबा को पूरी पत्रकारिता विभाग के छात्र छात्राएँ हीरो मान रहे थे लेकिन बाबा बाबा थे, हीरो नहीं। उन्होंने रिचा के चेहरे के पास अपना चेहरा किया और धीरे से उसके कान में कुछ फुसफुसाए जो काफी धीमा होने के बावजूद हमने सुन लिया।

‘ये वरुन है... हिंदुस्तान दिल्ली में रिपोर्टर है। बहुत खतरनाक पत्रकार है। फाड़ कर रखता है। मेरे बचपन का दोस्त है।’ हमने देखा कि फाड़ के रखनेवाली भाषा पर रिचा के चेहरे पर कोई खास परिवर्तन नहीं आया। यानी वह सचमुच बाबा के करीब हो चुकी थी। इसके बाद बाबा मेरी ओर इशारा करते हुए फुसफुसाए। रिचा के आसपास एकाध लड़कियाँ और इकट्ठी हो चुकी थीं और बाबा के फुसफुसाने का राज जानना चाहती थीं।

‘वह हँसमुख है। बहुत बड़ा लेखक है। यंग राइटर्स में सबसे भयंकर राइटर है। इसके बारे में बताए थे न...? कहानी के साथ इसकी फोटो भी छपती है। मेरे बचपन का दोस्त है।’ ऐसा बताने के बाद बाबा की चोटों में काफी सुधार दिख रहा था। खैर, इस घटना के बाद विभाग के किसी क्लर्क ने कभी किसी काम के लिए छात्रों से पैसा नहीं माँगा।

हम कई तरह की कोशिशों से अपनी उम्र को रोकने और अपनी निश्चिंतता बचाने की कोशिशें कर रहे थे लेकिन उम्र थी कि मुट्ठी में कैद रेत और सिगरेट में भरे गाँजे की तरह सरकती और सुलगती जा रही थी। हम सब आपस में कम मिलते और जब भी मिलते, आगे आनेवाली जिंदगी, जो बहुत विकराल सवाल पूछती दिखाई देती थी, के बारे में चर्चाएँ करते। हमारी प्राथमिकताएँ बदल रही थीं। हम जिम्मेदार हो रहे थे और बड़े-बड़े सवालों से जूझने लगे थे। मैं समझ गया था कि इस नौकरी से बेड़ा पार नहीं होनेवाला और वरुन ने सलाह दी थी कि अगर मीडिया में बढ़िया करियर चाहिए तो दिल्ली की तरफ कूच करना होगा। मैं दिल्ली जाने की तैयारी में था। रवि दवाइयों की एजेंसी लेने के चक्कर में दिन रात एक कर रहा था और हम जब भी मिलते पत्रकारिता और दवाइयों की इस तरह मिक्स चर्चा करते जैसे पत्रकारिता कोई लाइलाज मर्ज हो और रवि इसके ही इलाज के लिए दवाइयों की एजेंसी ले रहा हो। बाबा की बचकानी हरकतें अब हमें बहुत कोफ्त देती थीं और हम सब उन्हें गाहे-बगाहे उनके चूतियापे भरी हरकतों के लिए सरेआम यादव जी की दुकान पर ही हड़का देते थे जिसे यादव जी सुनकर भी अनसुनी कर देते थे। बाबा कई कामों से जूझने के बाद हमारी बातें सुनकर अपने जीवन के लिए भी चिंतित हो रहे थे। उन्होंने एक दिन बताया कि वे अपने एक दूर के बड़े भाई और मार्गदर्शक टाइप आदमी के साथ पार्टनरिशप में एक इलेक्ट्रॉनिक आयटम्स की दुकान शुरू करनेवाले हैं। हमने बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया। सच कहूँ तो उन दिनों हम बाबा की हरकतों और बातों से बहुत पक रहे थे और अक्सर उन्हें इग्नोर करते रहते थे।

हमारे भीतर की नमी को दुनिया की जहरीली आँच ने सोख लिया था और हम भी धीरे-धीरे वैसे ही होते जा रहे थे जैसी यह दुनिया थी। हम दुनिया से जैसा ले रहे थे वैसा ही वापस देने की इच्छा में बराबर कामयाब भी हो रहे थे। दूसरों की चालाकियों ने हमें शातिर बनाया था और दूसरों के धोखे हमें क्रूर बना रहे थे। हम किसी से भी अब काम से ही मिलना पसंद करने लगे थे और फालतू में दोस्तों के साथ समय बिताने में अब रस नहीं मिल रहा था। मैंने साहित्य लिखना तो दूर पढ़ना भी बहुत कम कर दिया था क्योंकि साहित्य की दुनिया में और ज्यादा क्षुद्र लोग थे। खून जला कर लिखी गई मेरी कहानियाँ अव्वल तो कहीं छपती नहीं थीं और अगर छपती भी तो न कहीं से कोई पत्र आता था न ही फोन, कहानियों के एवज में कुछ पैसे मिलना तो सपने जैसी बात थी। मैं इसकी जगह कभी-कभी कुछ चालू अखबारों के लिए उनके कहने पर साहित्य और समाज पर कुछ लेखनुमा लिख कर दे देता था जिसके कुछ पैसे भी मिल जाते थे। मुझे लगता था कि किताबें और कहानियाँ पढ़नेवाला अब कोई नहीं बचा और लेखक लोग बेकार में किताबों पर किताबें लिखे जा रहे हैं। मैं चुपचाप अपनी बाइलाइन खबरें इकट्ठा करता जा रहा था और अपने जीवन के एकमात्र लक्ष्य की ओर ध्यान दे रहा था जो किसी अच्छे और बड़े अखबार में एक अदद नौकरी पाना था। वरुन ने मुझे लगातार अपने संपर्क बढ़ाने को कहा था और वह खुद भी ऐसा ही कर रहा था। रवि दवाइयों की एजेंसी लेने के लिए पैसे का इंतजाम कर चुका था और चीजें बहुत जल्दी ही फाइनलाइज होने वाली थीं। बाबा से मिलना कम हो रहा था क्योंकि न तो बाबा भविष्य को लेकर कोई उत्सुकता दिखाते थे न ही कभी कोई ऐसी गंभीर बात ही करते थे जिसमें रुचि ली जा सके। मैं और रवि जब भी मिलते आपस में अपने भविष्य को लेकर ही कुछ बात करते। एक दिन बाबा ने बताया कि वह अपने दूर के भाई के साथ इलेक्ट्रॉनिक का बिजनेस शुरू कर रहे हैं और इसके लिए मीरापुर में दुकान देख रहे हैं।

‘इतनी दूर क्यों?’ रवि ने पूछा था।

‘यार पास मिल नहीं रही दुकान और अगर मिल रही है तो दाम अधिक हैं। लेकिन हम सर्वे कर लिए हैं, उधर इलेक्ट्रॉनिक की दुकान खूब चलेगी।’ हमने बहुत ज्यादा रुचि नहीं दिखाई।

वरुन की नौकरी एक अच्छे चैनल (टीआरपी के आधार पर) में लग गई थी और उसकी तनख्वाह अचानक बहुत अच्छी हो गई थी। मैंने भी अपना रिज्यूम उसको उसके यह कहने पर फॉरवर्ड कर दिया कि अभी कुछ नियुक्तियाँ और होनी हैं। रवि ने एजेंसी डाल ली थी और अब अचानक बहुत व्यस्त हो गया था। हम लोग बीच में एक दिन मिले तो बाबा ने दुकान शुरू होने की खुशी में हम दोनों को बीयर पिला दी। बाबा ने आधी बीयर पी और जब उनको चढ़ गई तो हमें ही उनकी आधी बियर पीनी पड़ी। बाबा ने कहा था कि उनका बजट सिर्फ एक-एक बीयर पिलाने का है लेकिन चढ़ने के बाद हमने एक-एक बीयर और पीने की इच्छा व्यक्त की।

‘बाबा पइसा तो है न?’ रवि ने बस बाबा को चिड़काने के लिए कहा।

‘भोसड़ी के दोस्तों के आगे पइसा क्या है बे? हम कभी मना किए हैं खरचा करने से...?’ बाबा जोश में आ गए थे और उनकी जबान लड़खड़ा रही थी।

‘तो हम लोगों को एक-एक और पिलाओ फिलहाल। इसके बाद मन किया तो एक-एक और मारा जाएगा।’ मैंने रवि को आँख मारी। बाबा रौ में थे।

‘साले एक-एक क्या दस-दस पीओ। जितना मन करे पीओ साले को। अनुज श्रीवास्तव अपने आप को बेच के दोस्तों को पिलाएगा।’

हम समझ गए कि बाबा ने अपनी खुराक से एकाध बूँद ज्यादा मार ली है और उनको ओवरडोज हो गया है। हमने बाबा से मजे में पूछा।

‘बाबा आपको अंदर तो नहीं लेना पड़ेगा?’ बाबा शरमा गए और मुस्कराने लगे।

‘भक्साले, मजा ले रहे हो... चढ़ी थोड़े ही है इसकी जात की।’

अंदर लेनेवाली घटना साल भर पहले विवेक के कमरे पर घटी थी। वह कमरा किराए पर लेकर अकेला रहता था और पढ़ाई के बहाने उसके कमरे पर पीने के लिए कभी-कभी इकट्ठा होते थे। हमने नया-नया पीना शुरू किया था और बाबा के कमाल के बारे में उसी दिन पता चला था कि बाबा एक पैग से भी कमवाले आदमी हैं।

हम सबकी खुराक कम ही थी लेकिन फिर भी हमने चार से पाँच पैग तो मारे ही थे। बाबा ने पहला पैग तो नाक दबाकर मुँह बनाकर सबका देखादेखी पी लिया लेकिन दूसरे पैग में बाबा ने बहाना मार दिया कि उनके पेट में गैस जैसा कुछ हो रहा है और वह कोई खतरा नहीं उठाना चाहते लिहाजा ‘स्किप’ कर रहे हैं। बाबा स्किप करने के बाद वहीं दरवाजे के पास ही लेट गए जहाँ बैठकर हम लोग पी रहे थे। विवेक का कमरा छत पर था और हम बिलकुल दरवाजे के पास बैठकर पी रहे थे ताकि बाहर की ठंडी हवा से हमारा संपर्क बना रहे। हमने तीसरा पैग खत्म ही किया था कि हल्की बारिश होने लगी। विवेक ने रवि को, जो दरवाजे के सबसे पास था, कहा कि वह बाहर तार पर पसारे हुए सूखे कपड़े अंदर ले ले ताकि वे बारिश में भीग न जायँ।

‘अबे वो साबुनदानी वहीं रखी होगी, उसको भी अंदर ले लेना, कहीं भीग के गल न जाय।’ विवेक ने कहा।

‘अरे यार हल्की झींसी है अभी बंद हो जाएगी।’ रवि ने साबुनदानी उठाते हुए कहा। जैसे ही वह अंदर पहुँचा विवेक ने एक और फरमान जारी कर दिया।

‘यार वहाँ जो छोटा वाला स्टूल रखा है उसको भी अंदर ले लो, कहीं भीग न जाय।’

बाबा दरवाजे के बीचोबीच सोए थे और उनको पार कर अंदर बाहर करना पड़ रहा था। उनका धड़ कमरे में था और कमर के बाद का हिस्सा बाहर था। बाबा के पैर पर हल्की फुहारें पड़ रही थीं और रवि स्टूल उठा कर अंदर रख रहा था। अचानक बाबा के पैर से रवि का पैर हल्के से छू गया और बाबा लेटे-लेटे आँखें बंद किए हुए ही धाराप्रवाह बनारसी गालियाँ देने लगे। गालियाँ देने के बाद बाबा ने उसी पोज में विनती की।

‘अबे हमको भी अंदर ले लो कहीं भीग न जायँ।’

हम सब पर अगला पैग पीने से पहले ही दुगुना नशा हो गया था और हम चिल्ला-चिल्ला कर हँसने लगे थे। इधर बाबा फिर चिल्लाए थे।

‘यार... भाई... दोस्त हमको भी अंदर ले ले कोई प्लीज बे...।’ बाबा अंदर ही थे। उनके सिर्फ पाँव ही बाहर थे। जब हमने उनको यह बात बताई तो उन्होंने बतानेवाले को फिर गरियाआ और फिर से वही विनती दोहराई। यह घटना उस दिन और उस दिन के बाद से एक फेनोमेना बन गई और पीने के बाद अंदर लेनेवाले प्रसंग को एक बार जरूर छेड़ा जाता। बाबा होते तो उनके लिए और वह नहीं होते तो ग्रुप में जो भी कम पीनेवाला होता, उसके लिए।

हमने दूसरी और फिर तीसरी बियर पी। बाबा के अंदर की बियर पेशाब करने के बावजूद अंदर जाकर पच गई थी और बाबा बहुत उदास नजर आने लगे थे।

‘क्या हुआ बाबा? तुम्हारा मुँह घंटे की तरह लटका जा रहा है।’ रवि ने मजा लिया।

बाबा यह सुनकर और भी उदास हो गए। वह थोड़ी देर तक पूरी तरह से ध्यान लगा कर सिगरेट खींचते रहे और जब रवि की ओर पलटे तो उनकी आँखें गीली थीं।

‘धीरे-धीरे सब लोग अलग होते जा रहे हैं।’ लगा कि बाबा और बोले तो रो देंगे। मैं और रवि भी थोड़े भावुक हो गए थे लेकिन रवि ने अपनी आदत अनुसार बाबा की चुटकी ली।

‘कौन अलग हो रहा है बाबा? किसी खास की याद आ रही है क्या? कहीं रिचा...?’

बाबा चुप रहे। हम बीयर पीते रहे और बाबा सिगरेट। हम सबकी शादियाँ हो गई थीं और बाबा के आठ दस रिश्ते कटने के बाद आजकल शादी की बात चल रही थी जहाँ मामला लगभग फाइनल लग रहा था।

बाबा उसके बाद हमसे कुछ और दिन मिले थे कि मेरा दिल्ली जाने का वक्त हो गया था। वह उन दिनों अपनी दुकान के प्रेम में गिरफ्तार थे और जब भी आते थे सिर्फ टीवी, पंखे और कूलर की ही बात करते जिसमें हमारी कतई रुचि नहीं हुआ करती थी।

‘जानते हो सबसे ज्यादा मार्जिन किस टीवी पर है?’

‘आजकल धंधा सेल्स में नहीं सर्विस में है। समझ लो आज तीन टीवी बेचे लेकिन फायदा कितना मालूम है? सिर्फ नौ सौ रुपए। और सर्विस में क्या है कि एक टीवी खोली और पाँच छह सौ बना लिए।’

‘इंस्टालेशन में बिना मेहनत का पइसा है। एक डीटीएच लगाने के लिए लड़के को भेजते हैं तो वो झम्म से तीन सौ पा जाता है।’

हमें इस तरह की बातों में कोई रुचि नहीं रह गई थी। बाबा एकदम से बिजनेसमैन की तरह हो गए थे और हर समय खुद को एक अच्छा बिजनेसमैन साबित करने के लिए एक से एक उदाहरण दिया करते थे। मेरी वरुनवाले चैनल से कॉल आई थी और मामला लगभग फिट हो गया था। जिस दिन मुझे निकलना था उसके दो दिन पहले बाबा ने जबरदस्ती बीयर की पार्टी दी थी और हम अरविंदवाले अड्डे पर बीयर पीते हुए काफी चुपचुप से थे।

‘जम के पत्रकारिता करो और फाड़ दो इसकी जात की...।’ बाबा ने पहली बोतल का दूसरा घूँट भरते हुए कहा। हम ये मान चुके थे कि पहले घूँट में बाबा को चढ़ गई होगी। बाबा ने उस दिन बीयर, नमकीन और सिगरेट में कुल मिलाकर हजार रुपए तक तो खर्च किए ही थे। उसी बीच मेरे मोबाइल पर उसी चैनल के एक सीनियर जर्नलिस्ट का फोन आया और बात पूरी नहीं हो पाई कि फोन कट गया। मैंने फोन मिलाने के लिए नंबर डायल किया था कि देखा कि मेरे फोन में बैलेंस नहीं है। मैंने बाबा को बताया कि वह अपने सूत्रों से मेरा मोबाइल रिचार्ज करा दें। बाबा फोन पर ही कुछ साथी यानी छोटे बाजारियों को कह कर किसी का भी मोबाइल रिचार्ज करा देते थे और वहीं के वहीं रिचार्ज का पैसा ले लेते थे जो अगले दिन उसे हैंड ओवर कर देते थे। मेरे मोबाइल में बाबा ने छप्पन रुपएवाला कूपन डलवाया जिसमें पचास रुपए मिलते थे। मेरी जेब में पचास रुपए चेंज थे जो मैंने बाबा को थमा दिए।

‘और दो छह रुपए।’ बाबा ने हाथ आगे करते हुए कहा।

‘अबे ठीक है बाबा... इतना ही है।’ मैंने बात टालनी चाही।

‘नहीं अइसे कइसे... छह रूपया और दो।’ बाबा दृढ़ थे। मैंने अपनी सारी जेबें टटोली तो इत्तफाक से एक पाँच रुपए का सिक्का जींस की पिछली जेब में मिल गया। मैंने बाबा के हवाले किया और बीयर के घूँट लगाने लगा।

‘एक रुपया और...।’ बाबा ने फिर कहा।

‘साले डंडा मत करो। एक रुपया अपना लगा लेना। चूतिया...।’ मैंने बाबा को झिड़क दिया।

‘नहीं अपना क्यों लगाएँगे। निकालो फट्ट से...।’ बाबा एकदम दृढ़प्रतिज्ञ थे।

‘अबे हजार रुपया लगा रहे हो पार्टी देने में अउर एक रुपए के लिए पानी भर रहे हो। गजब आदमी हो।’ रवि ने भी बाबा को पार्टी का मजा किरकिरा करने के लिए डाँटा लेकिन बाबा जरा भी विचलित नहीं हुए।

‘पार्टी में हजार रुपया अउर लगवा लो चलेगा लेकिन बिजनेस इज बिजनेस। निकालो एक रुपया...।’ रवि ने अपनी जेबें चेक की और एक दो का सिक्का निकाल कर बाबा के हवाले किया।

‘ले साले...डाल ले। देख ले दो का सिक्का है।’ रवि ने गुस्से में कहा और मेरी ओर पलटा, ‘साले इस पर एक कहानी लिखो अगर दम है तो...।’

बाबा ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। दो का सिक्का अपनी जेब के हवाले किया, पिछली अगली सारी जेबें टटोल कर एक रुपए का एक सिक्का निकाला और रवि के हवाले कर दिया। बिजनेस डील समाप्त हो गई थी और वह बिजनेसमैन बाबा से फिर से साधारण बाबा हो गए थे। वह हर बार की तरह कहने लगे थे कि उनका पेट दो दिन से थोड़ा गड़बड़ है। हमने उनसे पूछा कि उन्हें अंदर तो नहीं लेना पड़ेगा तो वह शरमा गए।

मैं दिल्ली क्या गया कि बनारस और दुनिया सबसे कट गया। मुझे सीबीआई और भाजपा बीट मिली थी और इस पत्रकारिता में शुरू-शुरू में बहुत मजा आया था। जिंदगी बहुत शान से तो नहीं लेकिन आसानी से चलने लगी थी। मेरी तनख्वाह अच्छी थी और अपना जुगाड़ लगवाने के लिए मैं वरुन का इतना शुक्रगुजार था कि हर वीकेंड पर उसे दारू मैं अपने ही पैसे से पिलाता। वह अपने सीनियर के बहुत करीब था और उसके सीनियर ने धीरे-धीरे अपने परिचितों या अपने जूनियरों के परिचितों को अपनी टीम में भर लिया था। उसकी टीम बहुत अच्छा परफॉर्म कर रही थी और उसकी सफलता बाकी लोगों के लिए ईर्ष्या का सबब थी। बनारस से दोस्तों के फोन आने कम हो गए थे। बाबा कभी-कभी मुझे टीवी पर देखते तो किलक कर फोन घुमा देते लेकिन मैं बाबा की बातों को सीरियसली नहीं ले पाता, चाह कर भी। बाबा की बातें ही ऐसी होती थीं। एक बार मैं भाजपा के एक बड़े नेता के दौरे की रिर्पोटिंग कर रहा था कि बाबा ने मेरी रिपोर्ट देख कर मुझे फोन किया।

‘हँसमुख तुम उस नेता के बारे में बहुत अच्छा-अच्छा बोल रहे हो। अच्छी बात है लेकिन तुमको शायद यह फैक्ट नहीं मालूम कि पार्टी के भीतर ही एक खास मद में इसने तीन करोड़ रुपए का घोटाला किया है। तुम एक काम करो, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों को तोड़ो और पता करो कि असली मामला क्या है।’

‘तुमको कैसे मालूम बाबा?’ मैंने आश्चर्य व्यक्त किया। बाबा के अंदर की आग अभी तक बाकी थी? मेरे लिए आश्चर्य का विषय था। खैर, मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए बाबा को टालने की कोशिश की। इस नेता से मेरे अच्छे संपर्क बन चुके थे और मैं उन्हें खराब नहीं करना चाहता था।

‘अबे हमको हल्के में ले रहे हो क्या? हमको बहुत कुछ मालूम है। तुम बस मार दो इस नेता की कायदे से...।’ बाबा को मारने में बहुत मजा आता था लेकिन मैं अपना करियर बिगाड़ने के मूड में नहीं था जो बहुत पापड़ बेलने के बाद यहाँ तक पहुँचा था। मैंने बाबा को फोन रखने के लिए कहा।

‘अबे इतना बढ़िया क्लू दिए तुमको और तुम...।’ बाबा के पूरा करने से पहले ही मैंने उनकी बात काट दी। मेरा मूड खराब हो गया था।

‘बाबा यह दैनिक बारूद नहीं है। यह एक राष्ट्रीय चैनल है और तुम्हारी बकचोदियाँ नहीं चलतीं। यहाँ एक सिस्टम है और हर फैसला लेने से पहले पचास तरह की औपचारिकताएँ होती हैं। रखो फोन अभी फील्ड में हैं हम...।’ वरुन को बाद में सब बात बताने पर वह बाबा के ऊपर खूब हँसा और मुझसे कहा कि अगर मैं साहित्य में स्थापित होना चाहता हूँ तो बाबा को मुख्य पात्र बनाकर एक कहानी जरूर लिखूँ। उसने यह भी कहा कि बबवा अपने इसी तरह के चूतियापों की वजह से आज तक बल्ब बेच रहा है।

जिंदगी अपनी रौ में बहती जा रही थी और मैं हर दिन खुद को पहले से अधिक चालाक और खुर्राट महसूस करता। वरुन ने पहले ही चेता दिया था कि अपनी स्पेशल स्टोरीज की चर्चा किसी से भी मत करना चाहे वह कितना भी करीब हो।

नलिनी ने मेरे बाद ऑफि़स ज्वाइन किया था और आश्चर्यजनक रूप से बहुत तेज फैशन और लाइफस्टाइल कवर करते हुए पॉलिटिकल बीट तक पहुँच गई थी। उसे कांग्रेस और दिल्ली यूनिवर्सिटी को कवर करने की जिम्मेदारी मिली थी और मुझे उसकी मदद करने की सीख। मैंने अपने तई हमेशा ही उसकी मदद करने की कोशिश की थी और हमारे बीच अच्छे संबंध विकसित हो रहे थे। वह भी मुझसे अच्छे से पेश आती थी।

बाबा की शादी हो चुकी थी और अब मुझे लगता था कि बाबा सीरियस हो गए होंगे। सीरियस हमारे लिए बाबा के संबंध में एक बहुलार्थी शब्द था जिसके अनेक अर्थ थे। जैसे बाबा अब छोटी-छोटी बातों को इश्यू बना कर मारपीट करने पर उतारू नहीं हो जाते होंगे, जैसे बाबा अब छोटी-छोटी बातों को हमारी तरह भूल जाते होंगे दिल से नहीं लगाते होंगे, जैसे बाबा की चिंताएँ भी अब लौंडों लपाड़ोंवाली न रहकर गृहस्थोंवाली हो गई होंगी और उसी हिसाब से उनका नजरिया भी बदल गया होगा। मैंने रवि को एकाध बार फोन किया तो बाबा के बारे में पूछने पर उसने सिर्फ इतना कहा कि उसकी बहुत दिनों से मुलाकात नहीं हुई है। सभी अपनी जिंदगी में रमते जा रहे थे क्योंकि धीरे-धीरे सबकी उम्र का पारा तैंतीस को छू रहा था और जिम्मेदारियों के मुँह बढ़ते जा रहे थे।

मेरे चैनल और मेरी जिंदगी में जब वह हादसा हुआ तब मेरी उम्र तैंतीस हो चुकी थी और मैं अगले ही महीने एलआईसी की जीवन प्लस टाइप की कोई पॉलिसी लेकर अपना और अपनी पत्नी के साथ अपने होनेवाले बच्चे का भविष्य भी सुरक्षित करना चाह रहा था। हम सब बहुत असुरक्षित लोग थे और हर समय असुरक्षा के बारे में ही सोचते रहते थे। हमारी असुरक्षा का आलम यह था कि जब मैं बनारस छुटि्टयों में घर आता और सुबह पाँच से नौवाली बिजली कटौती के तहत अगर किसी दिन सुबह छह बजे तक बिजली नहीं कटती तो मैं असुरक्षित हो जाता। मुझे लगता कि कुछ घंटे अतिरिक्त बिजली देकर बिजली विभाग अगर पूरे दिन हमें बिजली से महरूम रख देगा तो मेरा क्या होगा। दिल्ली में मयूर विहार के अपने फ्लैट में रहते वक्त अगर एक दिन पानी दिन भर आ जाता तो मुझे लगने लगता कि अगले दिन पानी ही नहीं आएगा और मैं घर में उपलब्ध सारे बर्तन, यहाँ तक कि चम्मच भी भर के पानी स्टोर कर लेता। सड़क पर चलता आदमी अगर तेजी से दौड़ता हुआ अगर मेरी तरफ आता तो मुझे लगता कि वह मेरा बटुआ और मेरा महँगा मोबाइल फोन छीन सकता है। किसी को सब्जी काटते देखता तो डर लगता कि कहीं उसकी अँगुली न कट जाय और दरवाजा बंद करके ऑफि़स के लिए निकलता तो नीचे से ऊपर वापस आकर चेक करता कि दरवाजे में ताला अच्छी तरह बंद किया है। हमारे चैनल में, हमारे फील्ड में, और हमारे आसपास सभी ऐसे ही असुरक्षित आदमी थे। इसका कारण भी था। अगर आप मुझसे पूछें तो मैं ऐसा कोई स्पष्ट कारण तो नहीं बता पाऊँगा लेकिन कारण जरूर थे। वे इतने आसान नहीं थे कि एक दो लाइनों में किसी को समझाए जा सकें। चीजें बहुत जटिल थीं और हमें लगता था कि दुनिया के दो हिस्से हो गए हैं। एक हिस्सा हमारे पक्ष में है तो दूसरा विरोध में। मैं एक शब्द कहूँगा ‘ऑफि़स पॉलिटिक्स’ और आप पूरी बात समझे बिना ढेर सारी नसीहतों के पिटारे खोल बैठेंगे। लेकिन कोई शब्द होठों पर और कागज पर जितना आसान होता है उस शब्द को जीवन में जीना उतना ही कठिन।

मैंने एक स्टोरी पर डेढ़ महीने मेहनत की थी और वह भी बिना किसी को बताए। यह एक गोपनीय मुहिम थी जिसके बारे में सिर्फ मेरे कैमरामैन को मालूम था। यह कवरेज मेरे लिए मेरी अब तक की जिंदगी का और लगभग तीन साल की नौकरी का सबसे महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती थी। मैं आपको उस ऑपरेशन के बारे में जरूर बताता लेकिन चूँकि अब वह रिपोर्ट किल की जा चुकी है, मैं उस मंत्री का नाम लेकर अपने लिए मुसीबतें नहीं खड़ी करना चाहता। न तो मैं इतना हिम्मती कहानीकार हूँ और न ही इतना बेखौफ पत्रकार। मैंने अपने बॉस को उस दिन बताया जब मुझे पूरा यकीन था कि सिर्फ दो या तीन दिनों में पूरी खबर अपने पास होगी। मेरा बॉस हर बॉस की तरह चमचागिरीपसंद इनसान था और हर बॉस की तरह चाहे जितने भी खराब मूड में रहता हो उसका मूड अपनी तारीफ सुनते ही ठीक हो जाता था। इन सब के बावजूद वह एक ठीकठाक हिम्मती पत्रकार था और उसने इस स्टोरी के लिए थोड़ा झिझकने के बाद हामी भर दी। मैं नहीं जानता था कि नलिनी को इस स्टोरी के बारे में पता चल चुका है। चीजें, जैसा कि मैंने बताया कि बहुत जटिल थीं और मैं सारी बातें आपको बताने में असमर्थ हूँ, सिर्फ इतना ही कह सकता था कि चैनल का मालिक उस मंत्री का करीबी था और यह खबर मेरे मालिक के लिए इतने काम की हो सकती है कि मैं उस मंत्री के खिलाफ एक रिपोर्ट कर रहा हूँ, मुझे कतई मालूम नहीं था। सब कुछ पता नहीं कैसे बहुत जल्दी-जल्दी हुआ था और मेरी वजह से, जी हाँ सिर्फ मेरी वजह से मेरे बॉस की पूरी तीस लोगों की टीम सड़क पर थी। कम से कम मेरे बॉस ने मुझ पर यही इल्जाम लगाया था कि उसकी और उसकी टीम की नौकरी जाने का जिम्मेदार मैं हूँ लेकिन मुझे बाद में पता चला कि एक समूह इस कोशिश में तब से मालिक के कान भर रहा था जब मैं उस चैनल में आया भी नहीं था। वरुन भी मुझसे नाराज रहा था और उसने बॉस का पक्ष लिया था। मैं समझ चुका था कि बॉस अपनी टीम को कहीं दूसरे चैनल में लेकर जाएगा तो वरुन को वहाँ ले जाए, इसलिए वरुन उसका पक्ष ले रहा है वरना वह मेरे बचपन का दोस्त था और मैं उसे अच्छी तरह पहचानता था।

हालाँकि मेरा यह मुगालता भी तब टूटा जब वरुन ने मुझे अपना कमरा खाली करने को कहा। उसने बॉस के कहने पर उनके खास मेरे एक कलीग को अपना रूममेट बनाना स्वीकार किया जो मेरी लाख कोशिशों के बावजूद बॉस को मुझसे ज्यादा तेल लगा ही लेता था।

मैं टूट चुका था। दुनिया में मेरे लिए कुछ नहीं बचा था। मैं अब किसी के साथ बैठकर फ्यूचर प्लानिंग भी नहीं कर सकता था क्योंकि मुझे वरुन और रवि के साथ ही इसकी आदत थी। रवि धंधेवाला हो गया था और वरुन तेल लगानेवाला। शारीरिक और मानसिक हर तरह के दबावों से मेरी तबियत खराब हो गई। मेरे कैमरामैन दोस्त ने एक हफ्ते मुझे अपने घर में रखा और मेरी दवाई करवाई। घर से माँ पापा और पत्नी के फोन आए कि मैं घर चला आऊँ और वहीं कोई काम धंधा करूँ। अगर चाहूँ तो कुछ समय बाद वापस दिल्ली जाकर नौकरी ही खोजूँ लेकिन फि़लहाल चला आऊँ। मेरे दोस्त ने मेरा टिकट कराकर शिवगंगा में बिठा दिया। मैंने दिल्ली पर थूका तो नहीं लेकिन भरे दिल और नम आँखों से दिल्ली की ओर देखता रहा। मेरे लिए दिल्ली फिर से बहुत दूर हो गई थी।

जब मैं बनारस पहुँचा तो मेरा बुखार तो कम हो गया था लेकिन मन बहुत थका हुआ था। मैंने रवि और बाबा को फोन कर दिया था और दोनों मुझे लेने कैंट आए थे। हमने स्टेशन पर ही पहले चाय पी और एक दूसरे का हाल पूछा। मैं जल्दी से जल्दी घर पहुँच जाना चाहता था। रवि ने बिल्कुल मैच्योर और दुनियादार इंसानों की तरह धीरे से मुझसे पूछा कि अगर मुझे कुछ पैसों की जरूरत हो तो मैं अभी बता दूँ। उसने एक अच्छे दोस्त की तरह पूछा था लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा था। अगले दिन बाबा की शादी की पहली सालगिरह थी और हमने कल उनके घर ही शाम को मिलना तय किया। बाबा ने स्ट्रिक्टली कहा कि कोई इसकी जात की गिफ्ट लेकर नहीं आएगा।

घर आने के बाद मैंने अपने पड़ोस के ही एक डॉक्टर को दिखाया। खाना खाकर मैंने उनकी दी हुई दवाई खाई और सो गया। शाम को जब मैं उठा तो काफी तरोताजा महसूस कर रहा था। पता नहीं यह माँ के हाथ के खाने का असर था या पत्नी की बनाई हुई चाय का, मुझे भीतर से बहुत बेहतर महसूस हो रहा था।

शाम सात बजे के आसपास हल्की फुहारें पड़ी और सड़कें धुल गईं। पापा उसी समय ऑफिस से आए थे और मैं माँ, पापा और पत्नी के साथ बैठकर शाम की चाय पी रहा था कि बाबा का फोन आया।

‘कैंट आ जाओ तुरंत थोड़ी देर के लिए।’

मैंने बाबा को मना किया कि अभी एकदम मन नहीं कर रहा और थोड़ी कमजोरी भी लग रही है मगर बाबा नहीं माने।

‘सिर्फ पाँच मिनट के लिए बे, बहुत अर्जेंट है।’

मैंने बाबा से मिन्नतें की कि मुझे न बुलाएँ क्योंकि मेरा मन अभी कहीं निकलने को नहीं हो रहा और फिर माँ पापा और पत्नी भी नाराज होंगे लेकिन बाबा ने मुझसे कहा कि बहुत जरूरी काम है और मैं अगर उन्हें अपना दोस्त मानता हूँ तो जरूर आऊँ। मैंने इस तरह की बात बहुत लंबे समय बाद सुनी थी। मैंने कपड़े पहने और थोड़ी देर में आने को कहकर घर से निकल गया। मैंने रवि को आने के लिए कहा तो उसने कहा कि उसे डीलर को पेमेंट देने जाना है और वह नहीं आ सकता।

कैंट पर यादवजी के अड्डे पर बाबा मेरा इंतजार कर रहे थे। बिल्कुल पीछेवाली मेज पर जहाँ हम अक्सर बैठा करते थे। मुझे देखते ही बाबा मुस्कराए तो मेरे भी होंठों पर मुस्कान आ गई। यादव जी भी मुझे देखकर उस खुशी से मुस्कराए जो बहुत दिन बाद देखने पर छाती है।

‘साले क्या है तुम्हारा जरूरी काम? देख रहे हो मौसम कैसा हुआ है और बेकार में दौड़ा दिए यहाँ तक?’ मैंने शिकायत दर्ज कराई और बेंच पर बैठ गया।

बाबा ने सिगरेट मेरी ओर बढ़ा दी और खुद बाहर निकलकर मेरे सामने खड़े हो गए। उनके चेहरे पर रहस्य भरी मुस्कराहट थी।

‘क्या...?’ मैंने पूछा। बाबा के चेहरे के भावों से स्पष्ट था कि मैं कुछ जरूरी मिस कर रहा हूँ।

‘देखो...।’ बाबा फिर मुस्कराए।

‘क्या यार बताओ हमको नहीं समझ आ रहा कुछ।’ मैं झल्ला गया। बाबा थोड़ा सकपका गए और मेरे थोड़ा पास आकर धीरे से बोले, ‘पठानी सूट सिलवाए हैं कल के लिए... सही है?’ मैंने बाबा को गौर से देखा। नीले रंग का टाइट फिटिंग में सिला पठानी सूट बाबा के पतले शरीर पर वाकई अच्छा लग रहा था। मैं उन्हें गौर से देखने लगा। मेरी आँखों के सामने हजारों हजार दृश्यों की आवाजाही होने लगी। हमारा बचपन, हमारी आवारागर्दियाँ और हमारा बड़े होना। हमारी दुनियादारी, हमारे सपने और उनका टूटना। हमारा भोलापन, हमारी मस्तियाँ और हमारी मतलबपरस्तियाँ। सब कुछ एक झटके में मेरी आँखों के सामने से गुजर गया था। बाबा सामने खड़े इतने खुश थे जैसे इस वक्त इससे बड़ा कोई मुद्दा कोई नहीं है। पता नहीं क्यों मेरा मन भर आया था। मैंने अपनी आँखों की नमी छिपाने की गरज से बाबा से पूछा, ‘दुकान कैसी चल रही है बाबा?’

‘अरे गाँड़ मराने जाय दुकान। पहिले बताओ कइसा है ये...?’

मैंने बाबा को बताया कि वह इन कपड़ों में वाकई बहुत अच्छे लग रहे हैं। वह थोड़ा पीछे गए और लगभग मेरे चेहरे के पास अपना जूता लाते हुए अपना पैर लहराने लगे।

‘इसी का सेट है। सही है कि नहीं...?’ जूता भी नया था और बाबा ने बाद में बताया था कि इसे नागरा कहा जाता है और यह पठानी सूट पर ही पहना जाता है।

‘बहुत सही है गुरू... बहुत सही।’ न चाहते हुए भी मेरा गला पता नहीं क्यों भर्राया जा रहा था।

‘अबे दुकान का क्या है... चल ही नहीं रही है सही से। खींचतान के काम हो रहा है। रविया सही कहता था, उस तरफ धंधा सही नहीं है इलेक्ट्रॉनिक आइटम का...। सोच रहे हैं इधरे दुकान डालें...।’

बाबा इसके बाद मेरी नौकरी को लेकर कुछ बोलने लगे थे कि मुझे ज्यादा सोचना नहीं चाहिए। पत्रकारिता करने के बाद आखिर उन्होंने भी बिजनेस शुरू किया ही है। इसमें कोई परेशान होनेवाली बात नहीं है। मुझे बाबा की कोई बात सुनाई नहीं दे रही थी। मैं अचानक उठा और मैंने बाबा को गले लगा लिया। मेरी आँखें बह चली थीं जिसे छिपाने के लिए मैंने धीरे से शर्ट की बाँह से उसे पोंछ लिया।

‘का हुआ बे... साले बहुत प्यार आ रहा है हमारे ऊपर... बीयर उअर झाँट नहीं पिलाएँगे हम। इस समय पइसा नहीं है।’ बाबा खुश थे। वह हमेशा से इतने ही एक्सप्रेसिव रहे थे।

‘साले हम दिल्ली पर थूक के थोड़े भागे हैं।’ मैंने बाबा की चुटकी ली। बाबा अचानक जोश में आ गए और मुझसे अलग होते हुए बोले, ‘गुरू, एकाध महीना जम के आराम करो और बहरी अलँग का मजा लो। एकदम रिफ्रेश होकर फिर निकलो दिल्ली साले को...।’ इसके बाद बाबा तुरंत प्लान बनाने में लग गए कि हर रविवार हम लोग सुबह पाँच बजे उठ के ओ पार रेती में चल के धूनी रमाई जाय और चउचक माचा-पानी करने के बाद दुपहरिया में खाना खाने के टाइम पर वापस आया जाय। बाबा हमारे प्लानिंग कमीशन के अध्यक्ष थे। वह बोलते जा रहे थे और मैं सिर्फ उनके चेहरे को देख रहा था जो दुनिया में सबसे प्यारा और अपना सा लग रहा था।

मैंने बताया कि आज घर जाने के बाद मैं बहुत लंबे समय बाद एक कहानी लिखना शुरू करूँगा तो बाबा बहुत खुश हुए और यादवजी को एक राउंड और चाय भेजने का ऑर्डर दे दिया।


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हिंदी समय में विमल चंद्र पांडेय की रचनाएँ