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कहानी

मस्तूलों के इर्दगिर्द
विमल चंद्र पांडेय


...आखिरकार उस बँदरिया ने अपने बच्चे का सिर पानी में डुबो दिया और उसके कंधे पर चढ़कर अपनी गरदन पानी से बाहर निकाल अपना जीवन बचाने की कोशिश करने लगी। अकबर यह देखकर हैरान रह गया। बीरबल ने उससे कहा - जहाँपनाह, मेरा खयाल है अब आपको कोई शक नहीं होगा कि इनसान हो या जानवर, सबको अपनी जान सबसे प्यारी होती है। अकबर इस जीवंत उदाहरण से बहुत खुश हुआ और बीरबल को बड़ा ईनाम दिया।’

कहानी खत्म कर उसने अपनी कक्षा की ओर देखा जहाँ पिन ड्रॉप साइलेंस इस बात की तस्दीक कर रहा था कि हर कहानी की तरह यह उदाहरण भी कक्षा के विद्यार्थियों, जिनमें ज्यादातर उससे अधिक उम्र के थे, को विषय का सार पूरी तरह समझाने में कामयाब रही है। विषय था - ‘दुनिया के हर रिश्ते से प्यारी अपनी जिंदगी।’

ठीक दाएँ जहाँ ‘लर्न इंगलिश विद दीपिशखा क्लासेज’ का बोर्ड था और बाएँ ‘तीन महीने में वजन घटाएँ’ का ऐलान करती होर्डिंग, उसने अपने संस्थान का बोर्ड लगवाया था और यह उसे खासा उत्साहित करता था ‘रिलेशनशिप’ बढ़ते-बढ़ते दोनों बोर्डों को निगल चुका था। उसकी वर्कशॉप में ज्यादातर युवा होते या अभी-अभी युवावस्था का पड़ाव पार किए प्रौढ़ जिनके प्रेम, शादी, संतान जैसे उलझे रिश्तों में फँसे होने की गुंजाइश हुआ करती। कुछ पहले से ही शादीशुदा लोग होते या फिर जल्दी ही उनकी शादी की संभावना होती।

उस दिन जब उस रहस्यमयी महिला का फोन आया तो वह रूटीन कक्षाओं के बाद दिन भर के केस भी सुलझा चुका था। उस दिन के एक केस में एक महिला अपनी शादी के बारह साल बाद अब अपने पति को छोड़कर अपने उस प्रेमी के पास जाना चाहती थी जिसने महिला की शादी के दस साल बाद तक उसका इंतजार किया था। प्रेमी ने दो साल पहले शादी की थी और अब उसकी पुरानी प्रेमिका लौटकर उसके पास जाना चाहती थी। समस्या यह थी कि जब उसका पुराना प्रेमी उससे मिला, जिसने उससे वादा किया था कि वह कभी भी उसके पास लौटना चाहेगी तो वह उसे सारी मजबूरियों के बावजूद अपना लेगा, तो उसने कहा कि शादी ही नहीं दुनिया के सभी रिश्तों से उसका मोहभंग हो चुका है। प्रेमिका का कहना था कि वह अपने पुराने प्रेमी के भीतर जीवन के प्रति आस्था भरना चहती है और यह काम सिर्फ वही कर सकती है। उसने बड़ी मुश्किल से महिला को यह समझाने में सफलता पाई कि दरअसल वह अपने पुराने प्रेमी के पास नहीं जाना चाहती बल्कि अपने पति को छोड़ना चाहती हैं पति को छोड़ने के बाद अगर वह प्रेमी के पास गई तो शर्तिया वह उसे भी कुछ समय बाद छोड़ने की इच्छा जताएगी क्योंकि हर प्रेमी शादी के बाद पति हो जाता है और बिल्कुल ऐसा ही व्यवहार करता है जैसे पतियों के लिए तय मानकों के अनुसार निर्धारित है और भले ही वह उस समय अपनी काउंसलिंग के लिए वह अपनी फीस में डिस्काउंट पा सकती है लेकिन सुप्रीमो ऐसा बिल्कुल नहीं चाहता। (रिलेशनिशप में हर अगली काउंसलिंग में फीस कम हो जाती है।)

सुप्रीमो के नाम से जाने जाने से पहले उसका एक सम्मानजनक नाम था जिसका अर्थ था तेजोमय इनसान। उसका नाम बहुत बड़ा झूठ साबित हुआ था इसलिए उसने आत्महत्या को स्थगित करके लौटने के बाद अपने लिए एक नया नाम चुना था जिसके कई अर्थ थे और जो अपमानजनक व सम्मानजनक दोनों ही परिस्थितियों में लागू होते थे। दुनिया के हर रिश्ते में असफल होने के बाद उसने हर कोच की तरह एक सफल रिश्ते निभानेवाले कोचिंग की नींव डाली जो बहुत सफल हो रही थी। रिश्ते कैसे निभाएँ’ नाम से शुरू की गई उस कार्यशाला को जब उसने स्थायी संस्थान में बदला तो उसका नाम उसने ‘रिलेशनिशप - ए क्वेश्चन टू सॉल्व’ रख दिया जो अंग्रेजी में होने के कारण पहले से ज्यादा भीड़ खींचता था। उसके संस्थान में हर तरह के रिश्ते आते थे लेकिन सबसे ज्यादा स्वाभाविक तौर पर प्रेमी प्रेमिका और पति-पत्नी ही आते थे। उसके पास अनुभवों के अलावा कुछ नहीं था और बाद में उसने जाना कि दुनिया में यही सबसे ज्यादा कीमती चीजें हैं। उन्हें चाहे जैसे प्रयोग कर सकते हैं। उसने इसका व्यवसायिक प्रयोग किया और आजकल शहर में बड़े आदमियों में गिना जाता है।

उस रहस्यमयी महिला का फोन जिस दिन आया वह रात में बिस्तर पर लेटा अपनी दूसरी प्रेमिका को याद कर रहा था और संसार के इस झूठ पर मुस्करा रहा था कि पहला प्यार ही सबसे आकर्षक होता है और इनसान इसे जीवन भर नहीं भूलता। हालाँकि उसके दोनों प्रेम संबंधों का हस्र एक ही रहा था पर फिर भी उसे अपनी दूसरी प्रेमिका की याद ज्यादा आती थी। वह दुनिया के इस झूठ पर भी हँसता था कि इनसान सच्चा प्रेम सिर्फ एक बार करता है। वह जानता था कि ऐसा सिर्फ इंसानों को अपने मन पर नियंत्रण करने के लिए अपनाई गई एक बकवास चाल के अलावा कुछ नहीं है।

उस महिला ने उससे फोन पर कहा कि वह एक असाध्य बीमारी से ग्रस्त है और उसने आज तक प्रेम नहीं किया। यह बीमारी अनुवांशिक है और उसके खानदान में इससे बचने की लाखों कोशिशों के बावजूद पिछले पाँच सालों में तीन मौतें हो चुकी हैं और वह अपना समय इससे बचने में लगाकर जाया नहीं करना चाहती। डॉक्टरों के अनुसार वह बहुत जल्दी ही मर जाएगी और उसकी यह अंतिम इच्छा है कि वह मरने से पहले किसी से प्रेम करे। वह मरने से पहले अपने अनुभव दुनिया से बाँटना चाहती है और इसलिए प्रेम करके उसके अनुभवों पर एक किताब लिखना चाहती है। वह उस महिला की पागल इच्छा से पहली बार में जरा भी प्रभावित नहीं हुआ। उसे लगा जैसे टीवी में उसे देखकर कई प्रशंसिकाएँ बार-बार फोन कर उसे परेशान करती रहती हैं, यह भी उनमें से एक है। उसने उसे पाँच लगातार दिनों तक दस से अधिक बार मना किया कि वह उसे दुबारा फोन न करे क्योंकि उसका काम न प्रेम कराना है न ही किताब लिखवाना। वह किसी ऐसे इनसान की तलाश करे जो उसकी तरह की महिलाओं को पसंद करता हो और अगर प्रेम का रिश्ता निभाने में कोई दिक्कत आती है तब वह उसे निस्संकोच संपर्क करे। वह कुछ प्रकाशन संस्थानों से बात करे और उन्हें इस बात पर राजी करे कि वह उसका शोधग्रंथ छाप दें।

उसकी दोनों प्रेमिकाओं ने उससे बहुत टूट कर ठीक उसी तरह उससे प्रेम किया था जिस तरह उसने। वह हर दिन बदलता था क्योंकि हर दिन उसकी उम्र का एक दिन कम होता जाता था पर प्रेमिकाओं को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। वह उसे हर रोज उतना ही फ़्रेश और ताजा चाहती थीं जितना वह एक दिन पहले था। वे खुद महीने में एक हफ्ता बुरी तरह डिप्रेशन और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जातीं जो उसे अपनी गलती की तरह झेलना पड़ता मगर उसे रोज एक ही तरह ताजा रहना था।

‘अगर आप अपने सेक्रेटरी का नंबर दें तो मैं उनसे कल के लिए समय ले लूँ।’ महिला ने मीठी आवाज में कहा था।

‘मेरा कोई सेक्रेटरी नहीं। मैं अपने सारे काम खुद करता हूँ। आप अपनी समस्या बताइए। अगर मेरे लायक कुछ हुआ तो मैं आपको जरूर समय दूँगा।’ उसने टालनेवाले अंदाज में कहा था।

उसकी पिछली जिंदगी, जिसमें वह अकेले दौड़ने पर भी सेकेंड आया करता था, उसके सामने फि़ल्म के कुछ दृश्यों की तरह खुलती थी। सारे दृश्यों को मिलाकर एक धूसर रंग की फिल्म बनती थी और हर बार कलाकार चाहें अलग-अलग हों, उसका क्लाइमेक्स तय था। हर फि़ल्म के अंत में खुद को फि़ल्म का नायक मान रहा व्यक्ति आत्महत्या करने पहुँचता था।

फि़ल्म के एक दृश्य में खुद को नायक समझनेवाला व्यक्ति अपने घर में कई बातों को लेकर प्रताड़ित किया जा रहा है। यह प्रताड़ित किया जाना ऐसा है कि किसी को दिखाई नहीं देता, इतना सूक्ष्म कि कभी-कभी तो नायक को भी नहीं। उसके दोनों बड़े भाइयों से हमेशा उसकी तुलना की जाती है और वह हर बार ऐसा महसूस करता है कि अब इससे ज्यादा किसी का अपमान किया जाना मुमकिन नहीं लेकिन अगली बार वह गलत साबित होता है। घर का छोटा बेटा होने के कारण वह शुरू से माँ-बाप का दुलारा था पर पिता की मौत के बाद माँ अचानक बदल गई। उसने करीब जाकर माँ को पहचानने की कोशिश की तो पाया कि वह अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष कर रही थी। भाभियाँ वैसे तो अच्छी थी पर उन्हें इस बात पर विश्वास नहीं होता था कि कोई पूरी मेहनत से नौकरी खोजे तो उसे क्यों नहीं मिल सकती। वे मेहनत की पुरातन परिभाषा से इस तरह से चिपकी थीं जिस तरह वह ईमानदारी नाम के झूठे और हास्यास्पद विशेषण से। ईमानदारी एक ऐसा शब्द था जो सुनने में बहुत मीठा और नमकीन लगता था और खाना खाने के बाद इसका जाप करने से भोजन पचाने में सहायता मिलती थी। इस शब्द के प्रयोग से अच्छे निबंध लिखे जा सकते थे और बच्चों को डराया और बोर किया जा सकता था। खाली पेट रहने पर अजीर्ण की शिकायत होने पर भी इस शब्द को प्रयोग किया जा सकता था और कई वैद्यों ने इसकी तगड़ी अनुशंसा की थी। कुछ लोगों को इसका जाप करने का नशा भी था और कुछ ऐसे भी लोग थे जो इसे अपने घर के उस सदस्य की तरह मानते थे जिसकी अरसा पहले मौत हो चुकी हो और उसकी बरसी भी धूमधाम से मनाते थे।

एक दृश्य में उसकी प्रेमिका उसे सिर्फ इसलिए छोड़ रही है कि उसे अचानक पता चल गया था कि वह अब भी, उस बला की खूबसूरत लड़की के उसके जीवन में आ जाने के बावजूद ईश्वर को नहीं मानता। पहले अगर नहीं मानता था तो कोई बात नहीं थी, लेकिन अब जबकि वह लड़की उसकी प्रेमिका बनकर उसके जीवन में आ गई है, उसे ईश्वर की सत्ता में विश्वास हो जाना चाहिए, ऐसी लड़की की दृढ़ मान्यता थी। वह बहुत कोशिश करके भी ऐसा नहीं कर पाया। वाकई उस लड़की का उसके जीवन में आना एक असाधारण और स्वप्न के सच होने सरीखी आश्चर्यजनक घटना थी और इसके लिए वह वाकई किसी का, किसी का भी शुक्रगुजार होना चाहता था। वह पेड़ों, नदियों, बादलों, हवाओं और सूरज का आभार प्रकट करना चाहता था। किसी ईश्वर के अस्तित्व को मानने के लिए उसके अंदर से आवाज उसी तरह नहीं आती थी जिस तरह से तमाम दर्द और परेशानियों के बावजूद सिगरेट छोड़ने की नहीं आती थी। वह यह भी जानता था कि जिस दिन अंदर से आवाज आई वह तुरंत छोड़ देगा।

‘मैं ईश्वर से आजादी चाहता हूँ’, यह उसने अपनी प्रेमिका के उस सवाल के जवाब में कहा था जब उसने पूछा था कि उसका सपना क्या है। बाद में उसे सोचने पर कभी विश्वास नहीं होता कि उस घोर आस्तिक प्रेमिका से उसके अलगाव का कारण उसका यह एक वक्तव्य बना था। अलगाव के बाद उसे पता चला कि दरअसल उसकी प्रेमिका का मकसद उससे प्रेम करना नहीं था बल्कि उसे अपनी तरह बनाना था। वह आज तक नहीं समझ पाया कि उसके वक्तव्य के बदले उसकी प्रेमिका ने जो वक्तव्य दिया था, उसका अर्थ क्या था, सिवाय इसके कि वह खुद को ईश्वर मानती थी।

कम दृश्यों में उसकी जिंदगी के विशेष क्षण कुछ इस तरह आते थे कि उसकी सबसे प्यारी भाभी ने उससे अनैतिक संबंध बनाने की चेष्टा की थी। उसने किसी तरह भागकर अपना विश्वास बचाया था और भाई ने घटना के एक महीने बाद अचानक इसी कारण से उसे पीटकर लहूलुहान कर दिया था। उसकी माँ ने, जो उसे ही सबसे ज्यादा स्नेह करती थी, उसे बचपन से ही गलत विचारोंवाला करार कर एक लंबी छलाँग लगा अपने बड़े बेटे के काफी नजदीक पहुँच गई थी। उसके एक दोस्त ने ऐसे वक्त पर साथ दिया जब उसके सिर से छत अचानक कई शर्मनाक घटनाओं के बाद अचानक लुप्त हो गई थी। दो दिन छत देने के बाद दोस्त ने एक काली रात में उसे ऐसे अँधेरे में धकेल दिया था जिससे वह पूरी तरह कभी नहीं निकल पाया। अगले दिन दोस्त ने कहा था - ‘अब ये सब बातें पूरी तरह नॉर्मल हैं। जिंदगी इंज्वाय करने के लिए होती है।’

पार्क के एक अँधेरे कोने में बैठ कर पीने का उसका एक ही मकसद था कि मरने से पहले इतना पी ले कि मरते वक्त दर्द का एहसास न हो। मरना मुश्किल काम है, यह पहला पैग जज्ब होते ही उसे समझ में आ गया था। उसने ढेर सारी सिगरेटें पीं और उनका धुआँ बाहर नहीं निकाला। उसने अँधेरे से खूब बातें कीं और उसे बताया कि वह हमेशा से उससे प्रेम करता है। अँधेरे ने उससे कहा कि वह खूब पीए और उसकी बाँहों में खुद को ढीला छोड़ दे। उसने अँधेरे से कहा कि उसे कई बार लगता है कि दुनिया में उसके कई हमशक्ल घूम रहे हैं और उनके कारण वह हर बार असफल हो जाता है। काम वह करता है और क्रेडिट कोई और ले जाता है। अँधेरे ने कहा कि असफलता मात्र एक शब्द है और उसका कोई अर्थ नहीं होता।

एक काँपती परछायीं अचानक उसके सामने आ खड़ी हुई तो वह एकबारगी डर गया। फिर उसे हँसी आई, अब किसी से क्या डरना। सामने मैले कुचैले फटे पुराने कपड़ों में एक भिखारीनुमा आदमी खड़ा था।

‘कौन हो तुम...?’ उसने सिगरेट का धुआँ अंदर खींचते हुए पूछा था।

‘इट डिपेंड्स। समय पर निर्भर करता है कि मैं कौन हूँ। कभी-कभी मैं अपने आप को एक इनसान महसूस करता हूँ तो कभी भगवान। कभी मैं कुत्ता होता हूँ और कभी भड़का हुआ साँड़। मैं कभी एक भावुक लड़की होता हूँ जो सीले मौसम में न जाने किसकी याद आने पर रो पड़ती है। कभी मैं एक ऐसा बदमाश लड़का होता हूँ जो लड़कियों के चेहरे की तरफ देखने से पहले उनके उभारों की ओर देखता है। वैसे दुनिया में पहचान के लिए मेरा जो नाम है उसका उच्चारण भुवनेश्वर है। मुझे पसंद करनेवाले लोग जैसे मैं मुझे भुवन भी पुकारते हैं और पसंद प्रेम में बदल जाने पर तुम मुझे भू भी बुला सकते हो।’

‘मुझे तुम कोई भूत दिखाई पड़ते हो...।’

वह उस बकवास से ऊबकर अपनी बची हुई शराब का अंतिम पैग पीने लगा।

‘तुम्हें शायद मेरी बातें पसंद नहीं आईं।’ उसने उसके चेहरे के पास चेहरा सटाते हुए पूछा। ‘जानते हो क्यों, इसलिए कि वे पूरी-पूरी तुम्हारी समझ में आ गईं।’

उसने उसकी बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया।

‘शायद तुमने गौर नहीं किया कि मैंने ईश्वर जैसे कपड़े पहन रखे हैं। अगर नशे की हालत में तुम आत्महत्या करने के विकल्पों पर गौर कर रहे हो और मैं तुम्हारे सामने आकर खड़ा हो जाता हूँ तो क्या इस बात की बिल्कुल भी संभावना नहीं है कि मैं ईश्वर हो सकता हूँ?’

‘तुम पागल हो और मैं पागलों से बहस कर अपना मूड खराब नहीं करना चाहता।’ उसने अंतिम सिगरेट जलाई।

‘ठीक है, तुम मुझे पागल ही समझो लेकिन अगर वाकई तुमने मरने का इरादा कर लिया है तो उसके पहले एक बार मुझे अपनी पूरी कहानी सुना दो। मैं वादा करता हूँ कि मैं जरूर तुम्हें कोई ऐसी बात बता सकूँगा जो तुम्हारे बिल्कुल काम नहीं आएगी कि तुम्हें जीना पड़े।’

इस बार वह मुस्कराया। भुवन ने सिगरेट लेने के लिए उँगलियाँ आगे बढ़ाईं तो उसने उसे सिगरेट थमा दी। उसने उसे सारी बातें कह सुनाई जो उसकी जिंदगी में इस तरह हुई थीं जैसे उनका होना उसकी गलतियों से निश्चित था और इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी।

‘घर, परिवार, दोस्ती, प्रेम हर रिश्ते में असफल होने के बाद तुम मरकर क्या यह साबित करना चाहते हो कि इन रिश्तों में अगर तुम सफल हो जाते तो नहीं मरते...?’ भुवन ने पूछा। वह कुछ नहीं बोला। भुवन उससे पूछता रहा। वह चुप रहा। वह उसे चुप रहने की आखिरी सीमा तक ले आया और वहाँ से धक्का दे दिया।

‘पता नहीं, मैं नहीं जानता मैं क्या साबित करना चाहता हूँ लेकिन यह तय है कि मैं यहाँ आत्महत्या करने नहीं आना चाहता था। कुछ ऐसा है जो मेरे अंदर अब भी धड़कता है और जिसकी महक मुझे अपनी हर बर्बादी की याद दिलाकर खड़ा करना चाहती है और मेरा मन करता है कि मैं दुनिया में आग लगा कर कहकहे लगाऊँ। मैं कायर नहीं हूँ पर रिश्तों की लताएँ मुझसे साँप जैसी लिपट गई हैं और मेरा दम घोट रही हैं। तुम मेरी गर्दन पर इसके निशान देख सकते हो। मेरे पास न जीने की इच्छाशक्ति बची है, न पैसे और न ही मेरे रहने के लिए कोई दुनिया।’

बदले में भुवन ने एडिसन और बल्ब जैसा कुछ बुदबुदाते हुए अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले।

‘ये पैसे तुम्हारे लिए पर्याप्त तो बिलकुल नहीं हो सकते लेकिन तुम अगर चाहो तो इनका उपयोग कर सकते हो।’

‘और तुम...?’

‘तुम मुझे कहीं खाना खिला दो आज। कल की कल देखी जाएगी। मैं नहीं जानता कि कल मुझे खाने की इच्छा रहेगी या नहीं। हाँ अगर तुम्हें लगता है कि यह पैसे देकर तुम पर कोई एहसान कर रहा हूँ तो उसे सच मान लेना।’

‘नहीं, बात सिर्फ पैसों की नहीं है। जिंदगी से लड़ने की मेरी इच्छाशक्ति बिल्कुल खत्म हो गई है।’

‘तो तुम मेरी इच्छाशक्ति ले जा सकते हो। मेरे पास बहुत है। मेरे कपड़े और मेरी मुट्ठी में अनाज के ये दाने देखकर तुम आसानी से इसका अंदाजा लगा सकते हो।’

दोनों थोड़ी देर के लिए खामोश हो गए।

‘तो तुम मरना चाहते हो, यह तय है ?’

‘हाँ...।’

थोड़ी देर तक भुवन चुप रहा। उसके बाद उसने दूर पड़ी एक नारियल का खाली खोखड़ की तरफ इशारा करते हुए उसे कहा,

‘वह देख रहे हो...?’

‘हाँ...।’

‘उसे उठा लाओ...।’

उसे ले आने के बाद भुवन ने उसमें पास के गड्ढे से पानी लाकर भर दिया। अचानक उसने उसका सिर पकड़ा और उस छोटे खोखड़ में उसकी नाक घुसा दी। खोखड़ के किनारे से उसकी नाक छिल गई। उसने प्रतिरोध किया।

‘तुमने कहा था तुम मरना चाहते हो...।’

उसने प्रतिरोध करना छोड़ दिया और खुद को भुवन के हवाले कर दिया। उसने अपनी साँस रोक ली और उस पानी में कुछ देर बाद उसका दम घुटने लगा। उसने पूरी ताकत से अपनी साँस को रोक रखा था। ऐन उस वक्त जब उसका दम निकलनेवाला था और उसे अपनी मौत सामने नजर आ रही थी, भुवन ने उसका सिर पानी से बाहर खींच लिया। वह बुरी तरह हाँफ रहा था। भुवनेश्वर ने उसे गौर से देखा।

‘यह तुम्हारा नया जन्म है जो मैंने तुम्हें दिया है। इस पर मेरा अधिकार है। अब तुम मर चुके हो। जाओ और कुछ काम करो जिससे दुनिया में कुछ अच्छा हो। क्योंकि अगर तुम्हारा नुकसान हुआ है तो उसकी भरपाई करने का एक ही तरीका है कि तुम कुछ ऐसा काम करो जिससे दूसरों को फायदा हो। इसे अनुभवों का सदुपयोग करना कहते हैं। चूँकि मैं इस भ्रम में जीना पसंद करता हूँ कि पूरी दुनिया ही एक परिवार है जिसके कारण मेरी यह हालत रहती है, मेरे पास सिर्फ यही रास्ता है। तुम्हें लोगों का भला करना है तो जरूरी नहीं कि उन्हें शराब से दूर करो। अगर तुम उन्हें कायदे से शराब पीना भी सीखा सके तो उनका भला ही करोगे।’

उसने भुवन से कहा कि वह एक प्रयास और करेगा पर पता नहीं क्यों उसे लगता है कि उसे फिर जल्दी ही यही काम करने यहीं आना पड़ेगा।

‘चूँकि यह जिंदगी मेरी दी हुई है तुम्हें मेरी बात माननी चाहिए। अगर तुम इस बार भी कामयाब नहीं होते तो यहीं आना। फिलहाल के लिए अपनी आत्महत्या अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दो। जैसे दुनिया में सभी ने अपनी-अपनी आत्महत्याएँ स्थगित कर रखी हैं, तुम भी यही करो। जब तुम्हें लगे कि अब तुम्हारी मौत हो जानी चाहिए, तुम सीधा यहीं आना। हम तुम्हारी मौत के पहले एक बार साथ-साथ जश्न मनाएँगे।’

वह अपना शहर छोड़ कर दूर एक अनजान शहर चला गया। वहाँ कुछ दिनों भटकने के बाद उसे एक काम मिल गया। वहाँ से कुछ दिन काम कर कुछ पैसे बनाने के बाद उसने एक प्रयोग के तौर पर एक हफ्ते के लिए अपनी कंपनी में ही ‘रिश्ते कैसे निभाएँ’ नाम की कार्यशाला शुरू की थी जिसने उसकी तकदीर बदल दी।

उस महिला का नाम अप्रतिममाधुरी था और वह अपने नाम की तरह ही अजीब थी। जब वह उससे मिलने आई तो आते ही उसने सबसे पहला सवाल यही पूछा कि क्या उसने किसी से प्रेम किया है। वह हँसा क्योंकि वह इस सवाल का मतलब कई जन्मों से खोज रहा था।

वह आई और वह उसके प्रवाह को रोक नहीं पाया। लगा सब कुछ पहले से तय था और वह इस घटनाक्रम का एक छोटा सा हिस्सा था। उससे मिलने में उसे जरा भी रुचि नहीं थी मगर जब मिला तो पाया कि वह उसके साथ समय बिताने लगा है।

एएम जैसा नॉनरोमांटिक नाम रखे जाने के बावजूद वह जरा भी हतोत्साहित नहीं हुई। वह हर रोज सुप्रीमो के साथ घंटो बैठती और दुनिया की उन तमाम चीजों पर बारहा बहस करती जो न तो उसकी जिंदगी में आई थीं और न ही कभी आने की उम्मीद थी जैसे अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव, प्रियदर्शन की फि़ल्मों की गिरती क्वालिटी, सचिन के बैट का वजन, धार्मिक चैनलों की प्रासंगिकता, बरमूडा ट्राएंगल का रहस्य आदि। उसने एक तरह से सुप्रीमो की अवैतनिक सेक्रेटरी का काम सँभाल लिया था। ऑफि़स में काम तो ज्यादा था ही, सुप्रीमो को आराम मिलने लगा तो उसके मन में अप्रतिम के लिए झल्लाहट कुछ कम हो गई। कुछ समय बाद उसे लगने लगा कि उसकी बातें भले बेसिर-पैर की हों, बोर करनेवाली नहीं हैं। उनसे अच्छा खासा टाइम पास किया जा सकता है। खासतौर पर उन अभ्यर्थियों से जो हर इतवार अखबार में विज्ञापन पढ़कर विवाह प्रस्ताव लेकर आ जाते हैं। सुप्रीमो इतवार की अपनी छुट्टी मजे से उनका साक्षात्कार लेने में गुजार देता था और सारे अभ्यर्थियों के चले जाने के बाद दोनों उनकी चर्चा कर घंटों हँसते रहते थे।

आवश्यकता है एक ऐसे इनसान की जिसकी जिंदगी में हवा से ज्यादा प्रेम हो। जो मानता हो कि प्रेम से पेट भी भर सकता है। एक ऐसी महिला को अपने लिए प्रेमी की जरूरत है जिसके अंदर ढेर सारा प्रेम भरा हुआ है। तलाश है एक ऐसे इनसान की जो इतना प्रेम सँभाल सके...। जो पिछले एक वर्ष में कभी किसी चिड़िया की मौत पर रोया हो, किसी तितली को पानी में से निकालकर उसके पंख सुखा उड़ने में मदद की हो, किसी दूसरे के सफल होने पर जिसकी आँख भर आई हो...।

‘तुम इनसे शादी क्यों करना चाहते हो यह जानते हुए भी कि इनकी जिंदगी सिर्फ चंद महीने ही बची है?’ इस एक मासूम सवाल के एक से एक मनोरंजक जवाब आते।

‘मुझे लगता है मैं अप्रतिममाधुरी जी को कई जन्मों से जानता हूँ। अखबार में इनका विज्ञापन पढ़ते ही मेरे अंदर घंटी सी बजने लगी। मैं इनका पुराना प्रेमी हूँ, जन्मों का प्यासा।’ एक दुबले पतले युवक ने कहा। वह हँस पड़ी। ‘आप जन्मों के प्यासे ही नहीं भाई साहब भूखे भी मालूम पड़ते हैं।’

‘मैं मैडम को इनके अंतिम दिनों में प्रेम देकर यह साबित करना चाहता हूँ कि दुनिया से प्रेम अभी खत्म नहीं हुआ है।’ एक निरीह से प्राणी ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए अपना प्रेम प्रस्ताव प्रस्तुत किया। वह फूट पड़ी, ‘मुझे नौकर नहीं चाहिए रामू, भागो यहाँ से...।’ रामू बोलते ही उसका गुस्सा अचानक हँसी में बदल गया और उसको इतना अचानक रंग बदलते देख वह भी हँस पड़ा।

एक बूढ़ा आया जिसे देख कर यह साफ था कि इसके पेट में आँत और मुँह में दाँत न्यूनतम जरूरत पूरी करने तक ही बच पाए थे पर उसके जज्बात बहुत ताकतवर थे। उसने कहा कि वह बच्चों से बहुत प्यार करता है। उसकी इच्छा थी कि वह अप्रतिम से विवाह कर बच्चे पैदा करे और अप्रतिम के चले जाने के बाद उन बच्चों को अपने प्रेम की निशानी मानकर बाकी की जिंदगी, जो कि वास्तव में बहुत कम बाकी थी, बिताए।

दो ऐसे भी लड़के आए जो आज तक हर काम साथ करते आए थे। वे चाहते थे कि वे दोनों मिलकर उससे विवाह करें क्योंकि दोनों मिलाकर ही एक पूरे इनसान जैसे नजर आते थे। उनकी समस्या विकट थी। उन्हें अपने मेलजोल पर घरवालों के दिनोंदिन बढ़ते जा रहे ऐतराज के मद्देनजर अपनी-अपनी जिंदगियों में एक लड़की की व्यवस्था करनी थी। उन्होंने कहा कि वे हफ्ते में आधा-आधा वक्त अप्रतिम को अपने साथ रखना चाहते हैं ताकि उनके घरों में उनकी छवि साफ रह सके। वे दोनों भौंचक रह गए। ऐसा भी हो सकता है, उन्हें भनक भी नहीं थी।

एएम पहले तो रविवार को साक्षात्कार लेती, पूरा सोमवार हँसती, मंगलवार को अचानक संजीदा हो जाती और बुधवार को इसे याद कर उसके सामने रोती और कहती कि उसे लोगों की भावनाओं से खेलने का कोई हक नहीं है। वह समझ नहीं पाता था कि एएम की समस्या क्या है। वह उसकी हालत देखकर अपने भीतर झाँकता और धूसर रंग के दृश्यों में खो जाता।

रिश्ते इस दुनिया का सबसे बड़ा झूठ हैं और सबसे बड़ा आकर्षण। अचानक मेरे आसपास की भीड़ बहुत तेज भागने लगती है और मैं सिर्फ चुपचाप खड़ा रह जाता हूँ। सब मुझे कुचलते रौंदते मेरे बीच से निकलकर कहीं न कहीं भागने लगते हैं और मैं शरीर पर बिना कोई चोट खाए ये सोचने लगता हूँ कि अभी थोड़ी देर पहले मैं कहाँ भाग रहा था। मुझे भी भागना है और अगर मैं तुरंत नहीं भागा तो मेरा बहुत कुछ छूट जाएगा। मैं अपनी कँपकँपाती टाँगों से भागने लगता हूँ और भागते-भागते मेरे मन में कोई भूला सा खयाल परेशान करता हुआ पूछता है कि भागते हुए मैं जो छोड़ता जा रहा हूँ उसका नाम क्या है ?

‘नाम इतने जरूरी क्यों होते हैं?’

क्योंकि हम ही रखते हैं उन्हें...।’ उसने सरल भाव से कहा।

‘मेरे भीतर जो बेचैनी है मैं उसे कोई नाम देना चाहता हूँ।’

‘उसका नाम हो सकता है मगर जिस दिन तुम उसे नाम दे दोगे वह तुम्हारी जिंदगी का आखिरी दिन होगा।’

‘मुझे यह शर्त मंजूर होनी चाहिए।’

सुप्रीमो धीरे-धीरे अप्रतिम के लिए सचमुच चिंतित होने लगा था। पहले उसका सोचना था कि अप्रतिम को किसी भी ठीकठाक लड़के के साथ जोड़ दिया जाय लेकिन अब उसे लगने लगा था कि अगर यह लड़का गलत निकल गया तो? अगर फलाँ लड़का बाद में चरित्रहीन निकल गया तो? अप्रतिम प्रेम पर जो किताब लिखना चाहती है उसके लिए निहायत जरूरी है कि वह उसे किसी ऐसे हाथ में सौंपे जो बिल्कुल सुरक्षित हो। वह किताब लिखे तो ऐसी कि दुनिया का प्रेम पर विश्वास कायम रह सके। उसे अपने पर फिर कोफ्त हो आई। वह बार-बार ऐसा क्यों सोचने लगता है? उसे क्या जरूरत है किसी के लिए इतनी चिंता करने की और वह भी किसके लिए? एक ऐसी लड़की के लिए जो प्रेम पर किताब लिखना चाहती है? एक ऐसी चीज पर जो दुनिया का सबसे खौफनाक झूठ है... सभी रिश्ते झूठ हैं और इनका सरताज है प्रेम। उसने तय किया अब भी उसकी भावनाएँ कभी-कभी जोर मारती हैं जिसका निष्कर्ष उसने यह निकाला कि चूँकि यह दुनिया का सबसे मजबूत जाल है, कभी-कभी इसकी ओर खिंचाव हो जाना स्वाभाविक है। कल से वह अपने ध्यान की अवधि को बढ़ाएगा।

उसकी खुद से इस दौरान रोज ही मुलाकात होने लगी। वह इस तथ्य पर अटल था कि एक आम आदमी बनकर जीने में कोई मजा नहीं। वही पुराने रिश्ते, वही एक तयशुदा एडवेंचर, नहीं उसकी जिंदगी ठीक है। उसे इस जमीन के मियादी रिश्ते नहीं चाहिए।

‘क्यों नहीं चाहिए ?’

‘क्योंकि वे बदलते हैं। वक्त के साथ...।’

‘तुम क्यों नहीं बदलते ?’

‘मैं इस दुनिया में मिसफि़ट हूँ।’

‘मिसफिट की थ्योरी कमजोर लोगों का अस्त्र है। तुम्हें ठीक से रिश्ते निभाना आता ही नहीं। कभी अपना सब कुछ देकर बिना कुछ पाने की उम्मीद किए कोई रिश्ता निभाने की कोशिश की है?’

‘मैं शाश्वत चीजें चाहता हूँ। मुझे बदलनेवाली चीजों से डर लगता है। मुझे नौकरी से इसलिए डर लगता है क्योंकि उसके बाद मेरे माँ-बाप मुझे ज्यादा प्रेम और सम्मान देने लगते हैं। अगर मेरी नौकरी छूट गई तो...?’

‘यह कोरी बकवास के सिवा कुछ नहीं। माँ-बाप सिर्फ अपने बच्चों की खुशी चाहते हैं।’

‘मुझे शादी से डर लगता है क्योंकि पहले-पहल हर घंटे फोनकर हाल चाल लेनेवाली बीवी पुरानी हो जाने पर आपको दिन भर नहीं पूछती। उसे आपकी याद तब आती है जब वह बिस्तर पर सोने जा रही हो और उसे पता चलता है कि दाहिनी तरफ की जगह खाली है।’

‘समय के साथ पति की तरह पत्नी की भी जिम्मेदारियाँ और प्राथमिकताएँ बदलती हैं। ये बदलाव कुदरत के नियम हैं। तुमसे पहले इन पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई क्योंकि सब इसके लिए तैयार होते हैं।’

‘मैं नहीं हूँ। मुझ सिर्फ वह रिश्ता चाहिए जिसकी सतह ऐसी हो कि समय की धूल उस पर एकदम न टिक पाए। मैं शाश्वत रिश्ता चाहता हूँ।’

‘शाश्वत इस दुनिया का सबसे झूठा शब्द है।’

‘रिश्ते इस दुनिया का सबसे बड़ा झूठ हैं।’

‘तुम्हें रिश्ते निभाना नहीं आता।’

‘मैं पूरी दुनिया को रिश्ते निभाना सिखाता हूँ।’

‘अगर आप अपनी जिंदगी में परेशान हैं अपने रिश्तों की वजह से, अगर आपके विश्वास को छला गया है, अगर आप हर रिश्ते से ठगे गए हैं... तो आपके लिए अब आपके दरवाजे तक जाएगा... रिलेशनिशप - एक क्वेशचन टू सॉल्व। एक ऐसा वर्कशॉप जो आपको बताएगा कि आप किस रिश्ते को कैसे निभाएँ। डायल 9451887246 फॉर अप्वाइंटमेंट। सुप्रीमो ऑव रिलेशन्स के पास है हर समस्या का समाधान। टिंग टाँग।’

उसने टीवी बंद कर दिया। उसकी नजर अपने आप एएम के कमरे की तरफ चली गई। उसके कमरे की लाइट जल रही थी। उसने खुद अपना मुँह सूँघने की कोशिश की तो उसे लगा कि शराब की महक के अलावा भी कोई महक उसकी साँसों में शामिल हो रही है।

‘मैं अंदर आ सकता हूँ ?’

‘हाँ-हाँ क्यों नहीं आइए।’ एएम अपने बिस्तर पर लैपटॉप पर कुछ कर रही थी। वह सीधी होकर बैठ गई।

‘क्या कर रही थी?’ उसने एक तरफ बैठते हुए पूछा।

‘कुछ लिख रही थी।’

‘क्या ?’

उसने लैपटॉप सुप्रीमो की तरफ मोड़ दिया। सुप्रीमो ने कुछ देर तक स्क्रीन पर निगाहें जमाए रखीं। उसके चेहरे के भाव बदलने लगे।

‘ये सब किस आधार पर लिखा है तुमने?’

‘मैंने जैसा फील किया...।’

‘क्या तुम्हारा कोई ब... ब... ब्वायफ्रेंड है?’ उसने लड़खड़ाती जबान में पूछा और उसी वक्त उसे लगा कि शराब की महक आने से और ब्वायफ्रेंड जैसे बाजारू शब्द को इस्तेमाल करने से उसकी बात को कहीं हल्के में न ले लिया जाय।

‘नहीं... आप तो जानते ही...।’ एएम ने आराम से मुस्कराते हुए जवाब दिया।

‘ये सब बचकानी बातें लिख रही हो तुम। बहुत ज्यादा रूमानियत भरी बातें जिनका असली जिंदगी से कोई लेना देना नहीं।’

एएम उसका चेहरा देखती रही।

‘प्रेम में बहुत नंगी बातें होती हैं।’ उसकी उँगलियाँ लैपटॉप पर फिसलने लगीं। उसने कुछ लाइनें लिखीं और उन्हें सेलेक्ट कर बोल्ड कर दिया।

- प्रेम का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि जिसके बिना जीने की एक वक्त कोई सूरत नहीं होती, हम उसके बिना भी जी लेते हैं।

- प्रेम में हम हर रोज किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचते हैं।

- प्रेम में कोई भी निष्कर्ष अंतिम नहीं होता।

- प्रेम में हम सबसे ज्यादा उदार होते हैं और सबसे ज्यादा क्रूर।

- पूरी दुनिया में आज तक प्रेम की कमी से किसी की मौत नहीं हुई।

- इनसान को प्रेम की कोई जरूरत नहीं लेकिन बाजार ने इसे उसके लिए अपरिहार्य बना दिया है।

- प्रेम इनसान को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर ले जाता है।

एएम उसके पास आई तो उसे लगा एक मीठे पानी की नहर उसे छू गई। उसका शरीर एक बार जोर से काँपा और उसे याद आया कि उसे बहुत देर से पेशाब लगी है।

वह बिना कुछ बोले निकल गया।

अपनी राह पर अकेले चलते-चलते मुझे अचानक कभी-कभी लगने लगता है कि मेरे साथ कोई और भी चल रहा है। अब चूँकि मुझे ऐसी आदत नहीं रही है और मैंने हमेशा अकेला रहने का चुनाव किया है, मुझे अजीब लगता है। मैं यह यकीन से नहीं कह सकता कि मुझे अच्छा लगता है या खराब।

- मैं समझ सकती हूँ।

- यही तो दिक्कत है कि तुम कुछ नहीं समझ सकती क्योंकि मैं खुद ही नहीं समझ पा रहा हूँ।

- जरूरी है कि तुम्हारे समझे बिना मैं कुछ न समझूँ? ये उसी तरह है न कि जेब में मोबाइल के वाइब्रेट करने का भ्रम हो, तुम हाथ जेब में डालो तो पता चले कि मोबाइल तो आज घर पर ही छूट गया।

- एह...।’ वह चुप हो गया।

चीजें उसके आस-पास बदल रही थीं, उसके बाहर बदल रही थीं और उसके भीतर बदल रही थीं। वह पूरी ऊर्जा से उन्हें बदलने से रोक रहा था। हालाँकि उसे कारण नहीं पता था कि वह इन बदलावों को क्यों नहीं होने देना चाहता। यह रोकना कुछ ऐसा था कि किसी लड़के की दाढ़ी मूँछें उग रही हों और वह उन्हें रोकना चाहे। उसने पाया कि वह कभी-कभी किशोरों की तरह फि़ल्मी गीत गुनगुनाने लगा है। उसे कभी खुद पर झल्लाहट होती और अगले ही पल वह खुद को शीशे में देखकर सोचने लगता कि अड़तीस की उम्र में भी वह पैंतीस से ज्यादा का नहीं लगता... ज्यादा से ज्यादा छत्तीस... तो क्या... वह भी तो करीब बत्तीस की होगी ही...। उसकी झल्लाहट कभी-कभी हद से पार हो जाती तो वह रिश्तों के जाल पर अपनी लिखी कोई किताब पढ़ने लगता। इससे भी हारता तो डायरी लिखने लगता।

- लगता है जिंदगी फिर से मुझे अपने जाल में जकड़ रही है। जिंदगी की पकड़ में आने का मतलब है मौत के लिए तैयार रहना, ठीक उसी तरह जैसे किसी रिश्ते को शुरू करने का मतलब है उसके खात्मे के लिए तैयार रहना। किसी रिश्ते की शुरुआत की बात करते वक्त मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आखिर मैं किस रिश्ते की बात कर रहा हूँ और यह जानना ही मेरे डर का कारण है। मैं जानता हूँ कि मैं निराशावादी इनसान हूँ और यही मेरी सफलता का कारण रहा है। मैं अच्छे दिनों का सुख कभी नहीं उठा पाता क्योंकि उस समय लगातार मेरे मन में यह चलता रहता है कि ये एक दिन खत्म हो जाएँगे। मैं क्या करूँ...?

उसकी वर्कशाप में आनेवालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। अब इनमें काफी विदेशी भी आने लगे थे जो उसकी ख्याति से प्रभावित होकर अपने रिश्तो की जटिलताओं का समाधान खोजने आ रहे थे। वह उनकी समस्याओं को सुलझा रहा था और अपनी समस्या में उलझता जा रहा था।

मगर अब वर्कशॉप में कुछ बदल रहा था। उसके विचार एक रिश्ते को लेकर बदल रहे थे। कुछ नियमित लोग जो अपने कई प्रकार के रिश्तों को लेकर अक्सर भ्रमित रहा करते थे, उसके स्थायी विद्यार्थी थे। वे इन बदलावों को नोट कर रहे थे।

‘प्रेम किसी को अपने आपके सिवा न कुछ देता है, न किसी से अपने आपके सिवा कुछ लेता है। प्रेम न किसी का स्वामी बनता है, न किसी को अपना स्वामी बनाता है।... क्योंकि प्रेम प्रेम में ही परिपूर्ण है।’

‘मैं प्रेम में हूँ और बहुत बार यह सोच कर कन्फ्यूज हो जाता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए क्योंकि कई बार प्रेम मुझे घायल करता है और मेरे सपनों को उजाड़ डालता है। मैं क्या करूँ... प्रेम मुझे कई बार सूली पर चढ़ा देता है?’

‘जब प्रेम तुम्हें अपनी ओर बुलाए तो उसका अनुगमन करो हालाँकि उसकी राहें विकट और विषम हैं। जब उसके पंख तुम्हें ढक लेना चाहें, तो तुम आत्मसमर्पण कर दो, भले ही उन पंखों के नीचे छिपी तलवार तुम्हें घायल करे। ...और जब वह तुमसे बोले तो उसमें विश्वास रखो, भले ही उसकी आवाज तुम्हारे स्वप्नों को चकनाचूर कर डाले, जिस तरह झंझावात उपवन को उजाड़ डालता है।

...क्योंकि प्रेम जिस तरह तुम्हें मुकुट पहनाएगा उसी तरह सूली पर भी चढ़ाएगा। जिस तरह वह तुम्हारे विकास के लिए है, उसकी तरह तुम्हारी काट-छाँट के लिए भी। अनाज की बालियों की तरह वह तुम्हें अपने अंदर भर लेता है। तुम्हें नंगा करने के लिए कूटता है। तुम्हारी भूसी दूर के लिए तुम्हें फटकता है। तुम्हें पीसकर श्वेत बनाता है। तुम्हें नरम बनाने तक गूँथता है। ...और तब तुम्हें अपनी पवित्र अग्नि पर सेंकता है जिससे तुम प्रभु के पावन थाल की रोटी बन सको।

- खलील जिब्रान

उसने पाया कि प्रेम में चोट खाए लोग इस तरह की बातों पर सहमत नहीं होते। क्या वे सचमुच प्रेम में ही थे। उसे पहली बार लगा कि प्रेम से मिलते जुलते बहुत सारे रिश्ते आजकल चलन में हैं जो प्रेम का आभास या कहें धोखा देते हैं। उनसे चोट खाकर यह प्रवचननुमा क्लास लेना क्या उसी तरह नहीं है जैसे खासे बुखार के बाद पैरासीटॉमॉल की जगह डाइजीन खाना? जो बर्न इंजरीवाले लोग नहीं उन्हें बरनॉल क्यूँ लगाना।

‘देखो तुम्हारे चक्कर में मैं सोच भी दवाइयों की भाषा में रहा हूँ।’ उसने अभिभूत से मुस्कराते हुए कहा जिससे उसकी मुलाकात एक डॉक्टर के यहाँ हुई थी। वह एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव था और उसके चेहरे से पता नहीं क्यों यह झलकता था कि उसके साथ जो लड़की रहेगी वह हमेशा खुश रहेगी। सुप्रीमो ने कुछ समय पहले उससे एएम के बारे में बात की थी और आज वह अचानक ही चला आया था, मन में एएम से मिलने की इच्छा लेकर। काफी देर तक वह उसे अपनी लाइन की मजबूरियाँ बताता रहा जैसे डॉक्टर बिना महँगे गिफ्ट लिए दवाइयाँ लिखते ही नहीं और कुछ बड़े एमआर बड़े ऑर्डर पाने के लिए अपनी बीवियों को डॉक्टर्स के पास भेजते हैं। वह जान बूझकर बीवी का जिक्र ले आया और बोला कि अगर उसकी शादी हो जाय तो वह कभी अपनी बीवी को किसी डॉक्टर के पास नहीं भेजेगा चाहे वह भगवानदास अस्पताल का डॉक्टर खुराना ही क्यों न हो।

खाना अप्रतिम ने बनाया और परोसा भी। स्वाद और परोसने दोनों में सबसे ज्यादा आकर्षित करनेवाली बात थी प्रेम और स्नेह। एमआर खाता रहा और भद्दी नजरों से एएम की ओर देख कर तारीफ करता रहा। वह बार-बार दाल की माँग करता और एएम जब उसके पास जाकर थोड़ा झुक कर दाल देती तो उसके गले की गहराइयाँ देखता हुआ वह अचानक कह उठता - ‘बस बस, अब नहीं।’ मगर फिर थोड़ी देर बाद फिर दाल की या सलाद की माँग उठाता।

‘खाना कैसा लगा ?’ एएम को जैसे इन सबसे कोई मतलब ही नहीं था। वह उसी उत्साह से सुप्रीमो को चपातियाँ परोसती एमआर की तरफ मुखातिब हो पूछ बैठी।

‘बहुत शानदार। बिल्कुल आपकी तरह...।’ वह बेशर्मी से बोला।

सुप्रीमो आश्चर्य में था। उसे पहले लगता था कि यह युवक बहुत शालीन और सभ्य है मगर आज उसके मजाक उसके भीतर आग पैदा कर रहे थे।

‘सबसे अच्छा क्या लगा आपको...?’ एएम ने मुस्कराते हुए पूछा।

‘सबसे अच्छा तो लगा आपका इतने प्यार से झुक झुककर परोसना। खाने का स्वाद दुगुना हो गया।’ वह हँसता हुआ बोला। एएम भी उसकी हँसी में शामिल हो गई। दोनों हँसने लगे। हँसी की आवाजे धीरे-धीरे उसके कान से दिमाग में गूँजने लगीं। अचानक वह खाना छोड़ उठ खड़ा हुआ।

‘उठो...।’

‘...?...’

‘आइ सेड गेट अप।’

‘क्या हुआ...?’ एमआर हैरानी में था।

‘गेट आउट। बाहर निकलो...।’

‘अरे भई, मगर...।’

‘बाहर निकलो। मेरे सामने से हटो वरना मैं कुछ कर बैठूँगा...।’ वह आखिरी लाइन कुछ इस आवाज में चिल्लाया कि एमआर डर गया और अपना हाथ पास पड़ी नैपकिन में पोंछ, अपना बैग उठा निकल गया।

सुप्रीमो पास रखी कुर्सी पर निढाल सा टेढ़ा हो गया। उसने एमआर की दी हुई दवाइयों में से एक सरदर्द की गोली खाई और सोफे पर ही ढेर हो गया। उसकी इच्छा थी कि एएम उसके पास आकर उसका मूड खराब होने का कारण पूछे और उसे समझाए कि छोटी-छोटी बातों पर अपना मूड खराब नहीं करना चाहिए लेकिन वह जब चुपचाप अपने कमरे में चली गई तो उसे अपनी कार्यशाला में अक्सर दोहराई जानेवाली बात याद आई - दुनिया में किसी रिश्ते से कोई भी अपेक्षा उसके खत्म करने की शुरुआत है। उसे लगा उसकी जिंदगी में शतरंज की बिसात की तरह काले और सफेद घर बने हैं और वह कभी काले घर में चला जाता है और कभी सफेद घर में। शायद उससे खेलनेवाला यह भी भूल गया है कि जब उसने खेलना शुरू किया था तो उसकी गोटियाँ किस रंग की थीं।

‘मेरी किताब आधी से ज्यादा पूरी हो चुकी है।’ एक दिन एएम ने उसे अचानक ही बताया तो वह निराश सा हो गया।

‘कैसे... तुम्हें प्रेम तो हुआ नहीं? फिर किताब कैसे लिख ली आधी?’

‘वो ऐसे कि अब यह किताब प्रेम के अनुभवों पर नहीं रही। अब यह प्रेम को समझने की प्रक्रिया पर है। जिस माहौल में किसी इनसान को प्रेम होता है और वह उससे कैसे रियेक्ट करता है...?’

‘तुम्हें पता है तुम क्या लिख रही हो?’

‘हाँ।’ अद्भुत आत्मविश्वास भरे उत्तर से वह थोड़ा सहम सा गया पर उसने हार नहीं मानी।

‘तुम पता नहीं फिक्शन लिख रही हो या रिसर्च। या दोनों का मिश्रण पर मैं यह जरूर कहूँगा कि पहले तुम्हें मेरी किताब ‘रिलशेनिशप्स ऑन एज’ जरूर पढ़नी चाहिए। तुम्हें मदद मिलेगी यह जानने में कि कौन से रिश्ते किस तरह की धार पर टिके होते हैं और जरा सी चूक...।’

‘मैंने पढ़ रखी है। मैंने आपकी सारी किताबें पढ़ रखी हैं और आपको यह जरूर पता होना चाहिए कि आपकी सारी किताबें किसी गुस्से और बायसनेस में लिखी गई हैं। यहाँ तक कि पूरे देश और विदेशों तक में चल रही आपकी वर्कशॉप भी सारे रिश्तों को लेकर बायस्ड है। और चूँकि इस दुनिया के ज्यादातर लोग किसी न किसी गुस्से और बायसनेस का शिकार हैं, उन्हें आपकी बातें और आपकी लिखी किताबें बहुत अपनी सी लगती हैं।’

पहली बार किसी ने सुप्रीमो की बात काटी थी। वह हतप्रभ था और उसे आराम से अपने कमरे में जाते देखता रहा।

जैसे-जैसे उसकी जिंदगी ढलान पर जा रही है, मुझे एक अजीब से डर ने जकड़ लिया है। वह आजकल बहुत कमजोर दिखती है। उसके बाल पहले भी काफी कम थे मगर पिछले कुछ समय से तो अजीब तरीके से उड़ते जा रहे हैं। हालाँकि वह हमेशा दुपट्टे से सिर ढक कर रहती है मगर जब कभी उसके सिर से दुपट्टा जरा भी हटता है तो मैं अपनी आँखें फेर लेता हूँ। वह बहुत कमजोर हो गई है। ऐसी बीमारी उसे वाकई है, मुझे अब भी विश्वास नहीं होता। उसकी दवाइयाँ उसके साथ हँसी खेल कर रही हैं। मगर अब भी वह हर दूसरे रविवार को विज्ञापन जरूर निकलवाती है। मैं बहुत मना करता हूँ कि अब उसे साक्षात्कार लेने नहीं बैठना चाहिए लेकिन वह नहीं मानती और दो दिन खूब हँसती है और दो दिन खूब रोती है। मुझे तो लगता है ज्यादा हँसना और ज्यादा रोना भी उसके लिए खतरनाक ही होगा। शाम को डॉक्टर के यहाँ जाना है। देखते हैं क्या बताता है।

‘मैं मर जाऊँगी तो तुम्हें मेरी याद आएगी?’ सुप्रीमो को उसका तुम पुकारना बहुत भला लगता था। आजकल वह ऐसे-ऐसे सवाल करती थी कि उसे सँभालना एक बच्चे को सँभालने से भी ज्यादा कठिन हो जाता था।

‘अगर तुम्हारे हाथ में होता मेरी जिंदगी बचाना तो तुम क्या कीमत दे सकते थे इसे बचाने के लिए?’

वह ऐसे सवालों पर चुप रह जाता था। मन में बहुत कुछ आता था लेकिन बरसों तक चुप रहने के अभ्यास ने उसे अब थोड़ा संकोची बना दिया था।

बादलों से खाली हो चुकी एक शाम को जब वह डॉक्टर के यहाँ से उसे बिना बताए बोझिल कदमों से वापस आ रहा था, उसने आसमान में दो इंद्रधनुष देखे। दोनों इंद्रधनुष एक दूसरे के समानांतर अपनी आभा बिखेर रहे थे। उसने अपनी अड़तीस साल की जिंदगी में पहली बार दो इंद्रधनुष एक साथ देखे थे। उसे बहुत अच्छा लगा और उस वक्त उसे फिर महसूस हुआ कि इस बात को वह किसी से बाँटना चाहता है और उसके कंधे पर सिर रखकर खूब खूब रोना चाहता है। वह थोड़ी देर तक सड़क के किनारे बने फुटपाथ पर नम आँखें लिए बैठा रहा और फिर घर की ओर चल पड़ा। उसने निश्चय किया कि यह बात वह एएम को जरूर बताएगा कि आज उसने जिंदगी में पहली बार दो इंद्रधनुष एक साथ देखे हैं।

वह घर पहुँचा तो एक आश्चर्य उसका इंतजार कर रहा था। उसके कमरे की सफाई कर दी गई थी और उसकी किताबें यहाँ वहाँ रख दी गई थीं। वह अपने कमरे खासकर किताबों को किसी को भी हाथ नहीं लगाने देता था। पिछले दो नौकर सिर्फ इसी गलती के कारण नौकरी से निकाले गए थे कि उन्होंने मालिक को खुश करने के लिए मालिक की किताबों की आलमारी साफ कर दी थी। उसे जरा भी गुस्सा नहीं आया बल्कि वह शेल्फ के पास जाकर किताबों को प्यार से सहलाने लगा।

‘मैंने तुमसे बिना पूछे यह किया, यह जानते हुए कि तुम्हें अपनी किताबों को किसी का हाथ लगाया जाना पसंद नहीं।’ वह पास खड़ी मुस्करा रही थी।

वह भी मुस्कराया। उसकी याद में इस नई जिंदगी में पहली बार किसी ने उसकी अकारण तानाशाही को चुनौती दी थी और उसे यह अच्छा लगा था। मगर उसने कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया और शेल्फ में से एक महान दार्शनिक की किताब पढ़ने लगा।

‘तुम दर्शन क्यों पढ़ते हो इतना? तुम्हें पता है सारे दर्शन आखिरकार एक पागल और बौखलाए मन की अतिअनुभूतियाँ हैं और कुछ नहीं...।’

‘तुमने दवाई खाई?’ उसने बात को मोड़ने की गरज से पूछा।

‘नहीं अभी खाऊँगी। पहले बताओ।’

‘पहले तुम दवाई खाओ। समय से देर करना बहुत गलत बात है।’

‘क्यों... क्या तुम्हें दवाइयों पर दर्शन से ज्यादा विश्वास है?’

‘हाँ...।’

‘क्यों...?’

‘इससे दर्द में तुरंत आराम मिलता है।’

‘और दर्शन से क्या मिलता है ?’

‘दीर्घकालिक आराम...। जाओ खाकर आओ फिर यहाँ आकर बैठो मेरे पास।’

‘मैं दर्शन कैसे खाऊँ?’ वह हँसने लगी। उसे इस तरह के घटिया मजाकों पर उसे बहुत गुस्सा आता था पर आज वह भी हँस दिया।

‘जाओ बाबा खाकर आओ।’

‘ओके। फिर मुझे बताना कि दर्शन ज्यादा कड़वा होता है या दवाइयाँ।’

उसका मन अचानक बहुत उदास हो गया। उसने इंद्रधनुषवाली बात एएम को नहीं बतायी और यूँ ही अकेला खाली सड़कों की खाक छानने निकल गया। जब वह रात शुरू होने के थोड़ी देर बाद लौटा तो उसका मन पूरी तरह बदल चुका था और वह इंद्रधनुष की बात पूरी तरह भूल चुका था। उसकी मन हो रहा था कि वह पूरी तरह से खुद को भुला दे। उसे अचानक ही उस दिन भुवनेश्वर की बेतरह याद आई और शक भी हुआ कि क्या वह कभी वाकई इस नाम के आदमी से मिला था।

उसने अपनी मिलास, एक बोतल जो रूस से उसका एक शिष्य लाया था और कुछ नमकीन लेकर लॉन में मेज पर ले आया। एएम बरामदे से बाहर आकर खड़ी हो गई।

‘तुम जाओ और खाकर सो जाओ और प्लीज मुझसे खाने के लिए बार बार कहने का कोई फायदा नहीं। मैं जब पीता हूँ तो रात का खाना नहीं खाता।’

वह थोड़ी देर तक वहीं खड़ी बोतल और गिलास को घूरती रही। फिर बिना कुछ कहे अंदर चली गई।

जब वह दो लार्ज पीकर खत्म कर चुका था और उसे हल्का सुरूर आना शुरू हो गया था, उसने देखा कि एएम उसकी मेज के पास खड़ी है। उसे अचानक गुस्सा आया लेकिन उसके हाथ में कुछ देखकर वह अपने गुस्से को दबा गया। एएम ने एक प्लेट मेज पर रखी और चुपचाप वापस भीतर मुड़ गई। उसके जाने के बाद उसने प्लेट में से एक पकौड़ा उठाया और एक पकौड़ा मुँह में डालते ही उसे तीन पैग का नशा महसूस हुआ। इतना स्वादिष्ट पकौड़ा उसने अपनी माँ के हाथ का खाया था जब उसके पिता जिंदा थे। पिता की मौत के बाद माँ के हाथ के पकौड़े उसे कभी पहले जैसे स्वादिष्ट नहीं लगे। माँ के हाथ के पकौड़े पिता का पसंदीदा व्यंजन था। पिता के साथ माँ के हाथ का स्वाद भी चला गया।

वह पीना छोड़ बेतहाशा पकौड़े खाने लगा। जब पीने की याद आई तो उसने अचानक एक डबल लार्ज बनाकर एक साँस में खींच गया और बोतल किनारे कर दी। वह पकौड़े खाने लगा और सारे पकौड़े साफ कर गया। इसके बाद प्लेट में बचे पकौड़ों के टुकड़ों को बीन-बीन कर खाने लगा।

रात की चाँदनी उसकी प्लेट में भी पड़ रही थी और प्लेट का खालीपन साफ साफ दिख रहा था। वह धीरे से उठा और अंदर एएम के कमरे की ओर चल पड़ा। वह पलँग पर अधलेटी मुद्रा में कुछ पढ़ रही थी।

‘मैंने सारा खा लिया। इसमें तुम्हारा भी था क्या?’ उसने लड़खड़ाती आवाज में पूछा।

‘नहीं नहीं वो सारा आपका था।’ उसने मुस्कराती आवाज में कहा।

‘और तुम्हारा...?’

‘मेरा अलग रखा हुआ है।’

वह चुप हो गया। इसके बाद के संवाद बोलने में उसे नशे में भी शर्म आई। उसने मन में कहा ‘उसमें से एकाध दोगी?’ और पलटकर जाने लगा।

‘आप और लेंगे?’ एएम ने पलँग से उतरते हुए पूछा।

वह चुपचाप उसकी ओर देखने लगा और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे जो धीरे-धीरे अतिक्रमण करते हुए उसके गालों और वहाँ से उसकी गर्दन तक फिसलने लगे। एएम किचन में यूँ गई जैसे उसने कुछ देखा ही नहीं। उसे उतने नशे में भी इस बात पर शर्मिंदगी हुई कि वह पकौड़ियों के लिए रो रहा है मगर उसे आश्चर्य तब हुआ जब यह सोचते ही उसकी रुलाई और तेज हो गई। इतनी तेज कि वह खुद को रोक नहीं पाया और रोता हुआ अपने कमरे में भाग गया।

थोड़ी देर बाद जब एएम उसके कमरे में पहुँची तो उसने पाया कि उसकी देह आरामकुर्सी पर हिल रही है और वह कहीं दूर निकल चुका है। उसने उसे झकझोरा तो वापस आने में उसे थोड़ी देर लगी।

‘आप पकौड़ियाँ लेंगे?’ एएम के हाथ में प्लेट थी जिसमें पकौड़ियाँ थीं। उसने पकौड़ियों की ओर ध्यान नहीं दिया और एएम का हाथ पकड़ कर अपने सामनेवाली कुर्सी पर बिठा दिया।

‘जानती हो इनसान को सबसे ज्यादा दुख कब होता है?’ उसकी आवाज लड़खड़ा रही थी।

‘जब उसे अपनी माँ की याद आती है।’ एएम ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा।

‘बकवास... इनसान को सबसे ज्यादा दुख तब होता है कि उसकी जिंदगी के अड़तीस साल बेकार में निकल जाएँ और उसे आधी से ज्यादा जिंदगी खत्म हो जाने पर अचानक किसी दिन यह पता चले कि दो इंद्रधनुष एक साथ भी निकल सकते हैं और वो इतने सुंदर होते हैं एक साथ कि...।’ उसकी आवाज टूटने लगी।

‘मैं समझ सकती हूँ।’ वह उसका सिर सहलाने लगी।

‘तुम कुछ नहीं समझती। समझती हो तो बताओ कि इतने सुंदर इंद्रधनुष देखकर मेरा खूब-खूब रोने को क्यों मन कर रहा है?’

‘क्योंकि तुम खुद एक इंद्रधनुष हो।’

‘नहीं मैं एक टूटा हुआ तारा हूँ।’

‘तुम एक सुंदर इंद्रधनुष हो जिसमें खुशबू भी है। तुम ये पकौड़ियाँ खाओ और बताओ कैसी बनी हैं। ये अभी बनाई अलग से...।’ एएम ने पकौड़ियाँ जबरदस्ती उसके मुँह में डाल दीं। वह धीरे-धीरे खाने लगा और एएम की बाँहों में दुबक गया।

वहाँ उसे कब नींद आ गई, उसे पता भी नहीं चला।

‘बरसों हो गए मुझे माँ से बात किए।’ उसने उसके कंधे पर सिर रखते हुए अगले दिन कहा था।

‘तुम जाकर माँ से मिल आओ...।’

‘नहीं... सबको अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है मधु। माँ को भी...। मैं कल रात तुम्हारे सामने रोया, इसके लिए सॉरी। मैं आमतौर पर रोता नहीं।’

‘क्यों...?’

‘क्या क्यों?’

‘क्यों नहीं रोते?’

‘?’

‘क्यों नहीं रोते...?’

‘तुम नहीं समझोगी... रोना कमजोरों की निशानी है और मैं कमजोर नहीं हूँ।’

‘हूँ... रोने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए और रोना किसी और चीज की निशानी हो कमजोरी की तो कतई नहीं है।’

‘कमजोर अपनी कमजोरियों को रोकर छिपाते हैं।’ उसने निर्णायक आवाज में कहा।

‘तुम अपने बारे में एक बात जानते हो?’

‘क्या...?’

‘तुम बहुत मासूम हो, एक छोटे बच्चे की तरह। तुम्हें हर वक्त माँ की जरूरत होती है पर तुम कभी इस बात को मानते नहीं।’

‘बकवास...।’

‘तुम खुद को जितना क्रूर दिखाने की कोशिश करते हो, उतने ही हैरान नजर आते हो...। तुम्हें एक बार माँ से मिलने जाना चाहिए या माँ को ही यहाँ ले आओ।’

उसे लगा एएम अभी बहुत मासूम है, उसे नहीं पता कि किसी के सहारे की चाहत इनसान का सबसे कमजोर पहलू है। वह थोड़ी देर बाद चुपचाप उठ गया।

शाम को जब वह अपने घर में दाखिल हुआ तो उसे लगा जैसे किसी बहुत जाने पहचाने घर में घुस रहा है। ऐसा अनुभव उसे पिछले दस साल में कभी नहीं हुआ था। घर की छतें दीवारें और घर की खूश्बू उसे अपनी बाँहों में भर लेने को आतुर थी। उसकी आहट सुन कर एक बूढ़ी औरत किचेन से बाहर निकली जिसे पहचानने में उसे वक्त लगा।

‘माँ...?’ पहचानने में वक्त लगने का सिर्फ यही कारण था कि उसे सपने में भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि माँ इस घर में भी हो सकती है। वह कुछ भी बोल पाने में असमर्थ था और दौड़ कर माँ से लिपट गया। माँ रो रही थी और वह माँ से लिपटा यह सोचने की कोशिश कर रहा था कि यह सच है या सपना। एएम भी उसी व़क्त किचेन से निकली। उसके हाथों में कड़छी थी और होंठों पर मुस्कराहट। उसने भरी आँखों से उसकी ओर देखा तो उसने अपनी भौंहें उचका दीं जिसका मतलब शायद था - ‘देखा मेरा कमाल। तुम्हें चौबीस घंटों में दो बार रुला दिया।’

उसने इशारों-इशारों में उसे समझाने की कोशिश की कि वह भावुक होकर नहीं रो रहा बल्कि उसे माँ के साथ बिताई बचपन की कुछ बातें याद आ गई हैं। भावुक लोगों के लिए उसके मन में कोई स्नेह या सहानुभूति नहीं होती, वे कमजोर लोग होते हैं। एएम ने कहा कि उसके मन में भावुक लोगों के लिए बहुत सम्मान होता है क्योंकि वे बहुत मजबूत और बहुत कोमल होते हैं। वह किचेन में चली गई।

दस साल का समय भी भुवनेश्वर के चेहरे पर कोई असर नहीं छोड़ पाया था। उसे आश्चर्य हुआ जब भुवन इतनी आसानी से मिल गया। उसे लगा था कि अगर वह उसे खोजने निकलेगा तो कभी नहीं खोज पाएगा, इसलिए अपने आप को इस बात से उदासीन रखता था कि उसकी अक्सर उससे मिलने की तीव्र इच्छा उठती है। उसने बताया कि दस साल में वह जरा भी नहीं बदला।

‘जानते हो क्यों?’ भुवन ने उसकी सिगरेट छीनते हुए पूछा।

‘क्यों ?’

‘क्योंकि मैं उसी समय पूरा बदल गया था जितना मुझे बदलना था।’

‘और न तुम्हारी बातें बदलीं...।’ उसने हँसते हुए दूसरी सिगरेट जलाई।

‘क्योंकि धुएँ का स्वाद नहीं बदला।’ उसने खूब सारा धुआँ छोड़ते हुए अट्टहास लगाया।

उसने भुवन के कंधे का सहारा पाकर पिछले दस साल के अपने सारे लिफाफे खोल डाले और बताया कि उसे शक है कि उसके सभी लिफाफों में रखे नोट जाली हैं। भुवन ने उसे सलाह दी कि उसे दूसरी बोतल खोल लेनी चाहिए। दोनों ने खूब पिया और खूब बे-सरो-पा बातें कीं।

‘मुझे वो लड़कियाँ बहुत अच्छी लगती हैं जिनके बाल झड़ गए होते हैं।’

‘धुएँ का रंग वैसा ही होता है जैसा दुख का...।’

‘नमकीन की जगह पकौड़ियाँ होतीं तो बहुत अच्छा होता।’

‘पकौड़ियाँ खाने की इच्छा एक सामंतवादी सोच है...।’

‘दुनिया में सारी मौतें प्रेम की कमी से होती हैं।’

‘कुछ लोग हैजे से भी मर जाते हैं।’

उसने अपना सिर भुवन के कंधे पर रख दिया।

जिस दिन उसने एएम से शादी करने की इच्छा जाहिर की, उसकी माँ गाँव जा चुकी थी और जाने से पहले उसके और एएम के भविष्य में होनेवाले बच्चे का नामकरण कर गई थी। एएम ने वह नाम उसे ही दे दिया और कहा कि अगर वह अपनी पूरी उम्र जिंदा रहती तो उसे गोद ले लेती।

उसे नींद में भी ऐसा लगता था कि उसकी जिंदगी बस कुछ पलों की है और वह अक्सर चिहुंक कर जाग जाता था। जागते ही वह एएम के कमरे के पास जाता और धीरे से दरवाजा खोलकर उसके पास जाकर खड़ा हो जाता। अगर एएम के शरीर में कोई हलचल नहीं दीखती तो वह धीरे से उसकी नाक के सामने हथेली रखता और साँस चलती पाकर सुकून भरे कदमों से चलकर वापस अपने बिस्तर पर आ जाता। यह लगभग रूटीन सा बन गया था। मगर जो टूटता है उसे ही रूटीन कहते हैं।

‘यहीं सो जाओ न...’ उसने पलट कर जाते सुप्रीमो की कलाई पकड़ ली।

वह धीरे से उसके बिस्तर पर आ गया और एएम एक बच्चे की तरह उसके सीने में दुबक आई।

‘तुम एकदम छोटी बच्ची जैसी लग रही हो।’ वह उसे अपनी बाँहों में कसता हुआ फुसफुसाया।

‘अगर खामोशी टूट गई तो तुम बच्चे हो जाओगे।’ उसने अपनी उँगलियाँ उसके होंठों पर रख दीं।

‘मतलब...?’ उसने फँसी आवाज में पूछा।

वह चुप हो गया और उसे अपने और करीब करने की कोशिश की जो कि मुमकिन नहीं था। थोड़ी देर तक वह उसे अपनी बाँहों में समेटे यह सोचता रहा कि एसी का टेंप्रेचर और घटा देना चाहिए। कमरे में देर तक खामोशी छाई रही। घड़ी की टिकटिक सुनाई देती रही।

‘मैं तुम्हारे पास ही मरना चाहती थी।’

‘क्यों...?’

‘बहुत पहले से जानती हूँ तुम्हें।’

‘कब से...।’

‘वैसे तो पिछले कई जन्मों से लेकिन इस जन्म में तब से जबसे तुमने ये वर्कशॉप और इंस्टीट्यूट शुरू किया।’

वह चुप रहा।

‘तुम्हारे इंटरव्यूज टीवी पे आते थे और मैं हर बार कितनी मौतें मरती थी। मैं बिल्कुल उन्हीं रास्तों से गुजर रही थी जिनसे होकर तुम गुजरे थे और लगभग वही-वही मोड़ मेरी जिंदगी में आ रहे थे। तुम्हारी कहानियाँ सुन-सुनकर मैं समझ रही थी कि तुम और मैं एक ही हैं... मुझे तुमसे बहुत प्यार होता जा रहा था। तुम्हारे भीतर एक बहुत मासूम बच्चा है। एक ऐसा बच्चा जिसका खिलौना छीन लिए जाने पर वह सबके खिलौने तोड़ देना चाहता है। तुमने दुनिया को ये सिखाना शुरू कर दिया कि सारे रिश्ते झूठे हैं। प्रेम नाम की कोई चीज दुनिया में नहीं है। मैं भी तुम्हारे रास्तों से गुजरकर वहीं खड़ी थी लेकिन ठीक उसी वक्त मेरे मन में था कि प्रेम ही सारे खिलौने वापस ला सकता है। मैं तुम्हारी हर वर्कशॉप में मरती जा रही थी। मैं जानती थी कि मेरी मौत इस बीमारी से ही होगी लेकिन इस कुढ़न ने मेरी बीमारी को जल्दी उकसा दिया। मैं तुम्हें इस तरह तिल-तिल कर मरता नहीं देख सकती थी। मेरा मन करता था कि तुम्हें तुम्हारी क्लास के बीच आकर अपनी बाँहों में ले लूँ और कहूँ कि बाबू मेरा बच्चा ये दुनिया बहुत अच्छी है...।’

उसका दिल कर रहा था कि वह इन सारी बकवास बातों का प्रतिवाद करे और उसे समझाए कि इस हालत में ज्यादा बोलना उसके लिए नुकसानदायक है मगर वह चुप रहा। उसकी आँखें बहने लगी थीं और वह धीरे-धीरे नीचे सरकता हुआ एएम के सीने तक आ गया था। वह बोलती रही हालाँकि उसकी आवाज अब कमजोर होती जा रही थी।

‘तुम्हारा दुख अपनी जगह पर ठीक है तेजस मगर इसके लिए पूरी दुनिया से बदला...? क्या ये ठीक है सोना...?’ उसने उसका सिर अपने सीने में दबाते हुए पूछा।

‘किसी-किसी की बदकिस्मती होती है कि उसे एक लाइन से सब बुरा ही मिलता है लेकिन उसकी जिंदगी में कभी अच्छा भी मिलता है और जब एक बार यह शुरू होता है तो सब ठीक होने लगता है बाबू।’

‘प्रेम की परछाईं में भी प्रेम होता है। प्रेम का नाम भी हो तो उसके नाम से खेलने पर बहुत रोना पड़ता है, तुमने देखा है ना ?’

उसने एएम के सीने में चेहरा पूरी तरह से घुसा लिया और दोनों बाँहों से उसे जकड़ लिया। एएम का सीना गीला हो रहा था। उसने अपने दोनों स्तनों के बीच में उसका चेहरा घुसा लिया और उसकी बालों में उँगलियाँ डाल कर सहलाने लगी।

वह सो गया और उस रात उसे ऐसी नींद आई जो कई दशकों पहले आई थी। जब वह आठवीं में पढ़ता था और उसकी पसंदीदा कहानियों की किताब, जिसका कवर नीला था और जो महीनों खोए रहने के बाद अचानक मिल गई थी जब वह उसके मिलने की उम्मीद छोड़ चुका था। उसकी तीन कहानियाँ वह पढ़ चुका था और उसे लगता था कि अगर बाकी कहानियाँ अगर वह नहीं पढ़ पाया तो उसकी पूरी जिंदगी अधूरी रह जाएगी। उसने पूरे घर की आलमारियों और कोने बेचैनी से छान मारे थे मगर वह किताब नहीं मिली थी और वह धीरे-धीरे निराशा में जाने लगा था। जिस दिन वह किताब उसे अचानक मिली उसे लगा उसकी जिंदगी की सारी परेशानियाँ अब खत्म हो गई हैं। स्कूल के होमवर्क, दोस्तों के झगड़े और क्लास में पढ़नेवाली लड़कियों को इंप्रेस करना सारी समस्याएँ अचानक बहुत छोटी हो गईं। वह किताब उसे आज तक याद थी और वह नींद भी...। आज से पहले तक। अब से पहले तक।

उसने कभी अपने आप को इतना नहीं जाना था जितना एएम ने उसे अपने साथ कुछ दिनों में बता दिया। समय बहुत जल्दी बीत रहा था और वह एक गवाह की तरह सिर्फ देख पा रहा था। कुछ भी करना उसके बस के बाहर की चीज थी और उसके भीतर सब कुछ बदलता जा रहा था। सब कुछ एक अंतहीन सिलसिले के अंत की शुरुआत की तरह चलता जा रहा था।

एक दिन अचानक वह सोकर उठा तो उसने पाया कि वह अपने इतने बड़े घर में अकेला रह गया है और एएम घर के हर कोने में होकर भी कहीं नहीं है। वह पहला दिन था जब उसने अपने आप को इतना अकेला महसूस किया था। वह पूरी दुनिया में अकेला रह गया था और इस बार उसके मन में पहले से भी ज्यादा सवाल अनसुलझे छूटे थे। उसने अपना इंस्टीट्यूट नहीं खोला और कई जन्मों तक सिर्फ घर में कैद पुरानी राहों में भटकता रहा। घर के सारे फोन, सारे नौकर, ई-मेल और मोबाइलों को अपनी जिंदगी से बाहर निकाल दिया। उसका मन करता था कि भुवनेश्वर को घर में बुला ले और उसके साथ शराब पिए लेकिन साथ ही उसे यह भी पता था कि वह बंद दीवारों के पीछे पीना पसंद नहीं करेगा।

‘घर चलोगे?’ उसने उसी रात कब्रिस्तान में भुवनेश्वर के साथ शराब पीते हुए पूछा।

‘कौन से घर...?’

‘मेरे...।’

‘वह तुम्हारा घर है...?’

‘मतलब मैंने उसे बनवाया है...।’

भुवन हँसने लगा। उसने गाँजा मसला और नई सिगरेट भरी।

‘इस बार का माल कहाँ से लाए हो भू?’ उसने अच्छी सुल्फा क्वालिटी के बारे में पूछा।

‘माल तो हर बार वहीं से आता है पार्टनर बस किसी बार चीज अच्छी निकल जाती है कभी खराब... चांस की बात है।’ भू ने उसे सिगरेट थमाते हुए कहा।

‘चांस की बात है... सब कुछ चांस की बात है।’ उसने कश लगाते हुए धीमी आवाज में कहा।

थोड़ी देर तक दोनों पैग बनाने और आसमान देखने में व्यस्त रहे।

‘तुम्हें याद है मैंने अपनी आत्महत्या स्थगित की थी कई सालों पहले...?’ उसने भू के कंधे पर सिर टिकाते हुए पूछा।

‘हाँ, याद है। अच्छी तरह...।’

‘मैं सोचता हूँ अब कर लूँ।’ उसने कब्रिस्तान के सन्नाटे में अपना सन्नाटा मिला दिया और हवा की साँय-साँय अचानक डरावनी हो गई।

‘कर लो। लेकिन यह पैग खत्म करने के बाद...।’

‘हूँ...।’

थोड़ी देर तक फिर खामोशी छाई रही। दोनों इस खामोशी से घबराते रहे। वह पीता-पीता अचानक ऊब गया और अपनी गिलास घुमा कर फेंक दिया जो एक कब्र से टकरा कर टूट गई।

‘अपना संस्थान बंद कर दूँ?’ उसने भू से पूछा।

‘कर दो।’

‘या लोगों को वह सिखाना शुरू कर दूँ जो सच है?’

‘शुरू कर दो।’

‘या सब कुछ छोड़कर कहीं ऐसी जगह चला जाऊँ जहाँ कोई मुझे पहचानता न हो...?’

‘चले जाओ।’

‘या यहीं रहकर कोई दूसरा अच्छा व्यवसाय करूँ जिसमें सिर्फ और सिर्फ दिमाग लगाना पड़ता हो ?’

‘करो।’

‘हूँ...।’ वह लंबी साँस भर निराश होकर उठ गया। उसे भू से यह उम्मीद नहीं थी।

वह वहाँ से निकला तो रात गहरा चुकी थी। उसने घड़ी नहीं लगाई थी और यूँ वक्त का अंदाजा लगाने में मुश्किल हुई। वह सड़क पर चलता हुआ अपने मकान की ओर जा रहा था। अपने इलाके में पहुँचने से कुछ पहले ही उसने यूँ ही आसमान की तरफ देखा और देखता ही रह गया। आसमान में भरी रात दो इंद्रधनुष खिले थे। उसने अपने आस पास देखा कि किसी को इसके बारे में बता सके। पूरी सड़क खाली थी। एक पल को यह भ्रम लगा । इतनी रात में आखिर इंद्रधनुष रात में निकलते हैं? उसने कभी नहीं सुना। मगर क्या पता निकलते हों। उसने तो दो इंद्रधनुषों का एक साथ निकलना भी नहीं सुना था तो भी तो दो इंद्रधनुष एक साथ निकलते ही हैं। उसकी आँखें भर आईं और उसका मन हुआ कि माँ और एएम न सही, रास्ते में कोई चोर या भिखारी भी मिल जाए तो वह उसके कंधे पर सिर टिकाकर उससे यह बता दे। उसने खुद को विश्वास दिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया और उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी एक उँगली इंद्रधनुष को छू गई। उसने अपनी उँगली का सिरा देखा तो उस पर सात रंग लगे हुए थे। उसकी इच्छा हुई कि वह दौड़कर वापस कब्रिस्तान जाए और भू को अपनी उँगली दिखाकर उससे कहे कि वह बहुत अच्छा दोस्त है। उसके शरीर में अचानक एक लहर सी उठी और एक सिहरन से वह क्षण भर को काँप उठा। उसे अपने भीतर कुछ नया-नया सा महसूस हुआ। उसने अपनी हथेली इंद्रधनुष में डुबो ली और सतरंगी हथेली को पैंट की जेब में छिपा लिया कि सुनसान सड़क पर उसके असबाब कोई लूट न ले।

घर पहुँच कर उसने अपनी हथेली एक कागज पर छाप ली और उस कागज को सँभाल कर रख लिया।

वह जानता था कि वह सड़क पर चाहे अपनी वर्कशॉप में चीख-चीख कर लोगों को बताए लेकिन रात में इंद्रधनुष निकलने की बात कोई भी कभी स्वीकार नहीं करेगा।


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हिंदी समय में विमल चंद्र पांडेय की रचनाएँ