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कविता

अवसान
लाल्टू


जवान बेटी और बिस्तर के अलावा
कमरे में यन्त्र और नलियाँ.

बिस्तर पर वह ज़मीन के आखिरी छोर पर खड़ा.
ज़मीं का गोल न होना सुखद आश्चर्य.
प्रकाश और अँधेरे की जुगनू दुनिया कुछ ही छलाँग दूर.
सभी प्रकाश स्रोतों और अँधेरे से दूर.
मूर्त्त बेटी से दूर, अमूर्त्त सपनों स्मृतियों से दूर.

छोर पर खड़ा वह वापस देखता है बेटी को
कोई डूबता है कौन डूबता है सब कुछ डूबता है
कैसी लहरे हैं कौन टूटता है सब कुछ टूटता है
बेटी समाज देश आदर्श सब कुछ टूटता है.

आखिरी छलाँग.
अब नहीं सोचना क्यों कैसे जैसे महज सवाल.
बेटी मेरी है वह सोचता है.
बेटी की हथेलियों में किताब है
किताब में खड़ी हरी हरी हरी हरी प्रतिमा.
सफेद पन्ने, काले धब्बे, बेटी का चेहरा.

(अक्षर पर्व - 1998)


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