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कविता

अभिषेक
महेंद्र भटनागर


माना  अमावस  की अँधेरी  रात है,
पर, भीत होने की अरे क्या बात है ?
           एक पल में लो अभी
जगमग  नये आलोक के दीपक  जलाता हूँ !

माना, अशोभन, प्रिय धरा का वेष है,
मन में पराजय की व्यथा  ही शेष है,
           पर, निमिष में लो अभी
अभिनव कला से फिर नयी दुलहिन सजाता हूँ !

कह दो  अँधेरे से  प्रभा का राज  है,
हर दीप के सिर पर सुशोभित ताज है,
           कुछ क्षणों में लो अभी
अभिषेक  आयोजन  दिशाओं  में  रचाता हूँ !


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