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कविता

अनजानी राह
केसरीनाथ त्रिपाठी


उसने मेरा परिचय कभी नहीं पूछा था
मैं अनजानी राह उसी के गाँव बढ़ गया
जाने कैसे भाव उभरते उसके मुख पर
मैं झिझकेले पाँव उसी की ठाँव बढ़ गया

गीत व्यथा के अंतर्मन को चीर रहे थे
कातर नयनों की मैंने पढ़ ली थी भाषा
अति विषाद था मौन में इतना व्‍यापक मुखरित
संबंधों की देखी नूतन-सी परिभाषा

धनलक्ष्‍मी के बाहुपाश में, जकड़ स्‍वार्थ में
करुणा और मानवता रोई आर्तनाद में
सहलाने को घाव, हाथ नहीं सबके बढ़ते हैं
मरहम वाले हाथ, कभी भी जल सकते हैं

मेरे जलने से मिलती हो शीत किसी को
जीवन भर जलने का मैं संकल्‍प करूँगा
देखें सपने रुदन-मुक्ति के व्‍यक्ति-व्‍यक्ति के
सपनों की दुनिया से मैं संलग्‍न रहूँगा।


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