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कविता

अपना भैंसा अपनी गाड़ी
भारतेन्दु मिश्रा


अपना भैंसा अपनी गाड़ी
पत्थर छील रहा गजराज।

सड़क किनारे भैंसा गाड़ी
उसके नीचे धरे गिरिस्ती
चूल्हा फूँक रही है रानी
बच्चे खेल रहे मनमौजी
लड़की करती सारे काज।

एक तरफ अच्छी कालोनी
एक तरफ ये गंदी झुग्गी
सुंदर प्रतिमाएँ खरीदकर
सब पत्थर दिल घर ले जाते
लोगों से रहते नाराज।

आग पेट की जब जलती है
पत्थर पर छेनी चलती है
बजता है संगीत अलौकिक
श्रम की मदिर गंध बहती है
रानी छील रही है प्याज।


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