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कहानी

कथा संस्कृति
खंड : दो
कथा भूमि


संपादन - कमलेश्वर

अनुक्रम

अनुक्रम जल-प्रलय की प्राचीन कथाएँ - भगवतशरण उपाध्याय     आगे

जल-प्रलय की प्राचीनतम कथा ‘सुमेरी-अक्कादी’ सभ्यता की है। यह कथा ईंटों पर कीलाक्षरों में उत्कीर्ण पायी गयी। यह कथा ग्यारहवीं ईंट पर थी। मानव सभ्यता की प्रथम महागाथा ‘गिलगमेश’ की कथा का ही यह एक अंश है। समय 2000 ई.पू. से भी पहले।

सुमेरी-अक्कादी : पहली कथा

जिउसुद्दू, शुरुप्पक नगर का निवासी था। वह गिलगमेश को यह कथा सुनाता है - ‘‘मैं तुझे एक भेद की बात बताता हूँ। रहस्य, गूढ़तम रहस्य! नगर शुरुप्पक को तू जानता है, जो फरात नदी के तट पर है। उस पुराने नगर के देवताओं के मन में आया कि जल-प्रलय करें!

‘‘दिव्य स्वामी एंकी इन देवताओं की इस योजना के विरुद्ध था। उसे देवताओं की इस योजना का पता चल गया। एंकी ने एक नरकुल की झोंपड़ी को सुनाकर कहा, ताकि झोंपड़ी के बहाने मैं उसे सुन लूँ। दिव्य स्वामी एंकी ने कहा... ‘शुरुप्पक के मानव, उवर्बुद के पुत्र! घर को गिरा डाल, एक नौका बना। माल-असबाब छोड़ दे। जान की फिक्र कर। सारे जीवों के बीज चुन ले और उन जीव-बीजों को नौका के बीच में लाकर रख ले - ’

‘‘मैंने नौका बनायी, जीव-बीजों को इकट्ठा कर उस पर रखा। भोजन भरा, घर वालों को बैठाया। और चलते समय मैंने नगरवासियों से कहा कि पवन देवता मुझसे घृणा करता है, इसलिए मैं अब यहाँ नहीं रहूँगा। इतना कहकर मैं नाव पर निकल पड़ा। नाव को चारों ओर से बन्द कर दिया। और तब भयंकर तूफान आया। काले-विकराल मेघों के बीच मशालें चमकाते हुए देवताओं को नगरवासियों ने देखा।

‘‘इतना अँधेरा और इतना भयंकर तूफान था कि भाई भाई को नहीं पहचान पाता था। देवता तक जलप्लावन से घबरा गये। वे भागे-भागे देवता अन के स्वर्ग पहुँचे। सारे देवता भय से कुत्तों की भाँति काँप रहे थे और स्वर्ग की देहरी में एक-दूसरे से चिपटे खड़े थे।

‘‘तब देवी इनन्ना आर्त्तनाद कर उठी - ‘क्यों मैंने अपनी ही प्रजा-सन्तति के लिए यह तूफान बरपा किया! क्या मेरी सन्तति यों मरने के लिए है?’

‘‘छह दिन और सात रात तूफान नहीं थमा। बाढ़ उमड़ती रही, और जल की सतह पर बहता हुआ मैं अपने साथियों के साथ जार-जार रोता रहा। उस भयंकर जलप्लावन में सिर्फ कुछ पर्वतों के शिखर डूबने से बच गये थे। आखिर मेरी नौका एक शिखर के पास जा लगी। एक सप्ताह तक नाव वहीं टिकी रही -

‘‘तब सातवें दिन मैंने एक कबूतर निकाला और उड़ा दिया। वह उड़ता रहा, पर उसे कहीं उतरने की जगह नहीं मिली। वह लौट आया। फिर मैंने एक अबाबील उड़ायी। वह भी हारकर लौट आयी। फिर मैंने एक कागा उड़ाया। उसने घटते हुए जल को देखा, दाना चुगा, डुबकियाँ लगायीं... वह लौटकर नहीं आया।

‘‘तब मैंने हविष निकाली, बलि चढ़ायी - चारों पवन देवताओं के लिए... पर्वत शिखर पर मैंने मद्य चढ़ाया। धूप और अगरु बिखेरे। इनकी सुरभि सूँघकर देवता आये और यज्ञ के स्वामी के चारों ओर इकट्ठे हो गये। तब देवी इनन्ना आयी और उन्होंने कहा -

‘‘देवताओ! जैसे मैं अपने गले की इन नीलमणियों को नहीं भूल सकती, वैसे ही मैं इन जल-प्रलय के दिनों को नहीं भूल सकती। अब देवता यज्ञ में पधारें! परन्तु एन्लिल न आवे! इस यज्ञ का भाग वह न पावे? क्योंकि उसने कहना नहीं माना। उसने जल-प्रलय करके मेरी एक-एक सन्तति नष्ट कर डाली।’

‘‘तब क्रोध में भरा देवता एन्लिल आया। उसने मेरी नौका देखी, तो और भी क्रुद्ध हो उठा और बोला - ‘किस प्रकार कोई मर्त्य इस जल-प्रलय से बचकर निकल गया!’

‘‘तब दिव्य स्वामी एंकी ने उसे समझाया - ‘देवताओं के देवता! वीर एन्लिल! तूने क्यों कहना नहीं माना? जो पापी है उस पर पाप डाल। अपराधी को अपराध का दण्ड दे! तू कृपा कर! कोई एकदम एकाकी न हो जाए। कोई एकदम विभ्रान्त न हो जाए। इस जल-प्रलय लाने से अच्छा है कि तू सिंह भेजकर प्रजा की संख्या कम कर दे...’

‘‘दिव्य स्वामी एंकी की यह बात सुनकर क्रुद्ध देवता एन्लिल शान्त हो चला। दिव्य स्वामी एंकी उसकी भर्त्सना करता चला गया कि कुछ के पापों के लिए उसने बहुतों को दण्ड क्यों दिया...

‘‘तब देवता एन्लिल की समझ में सब आ गया। वह नौका के भीतर आया। उसने मेरा हाथ पकड़ा। वह मुझे और मेरी पत्नी को बाहर लाया। उसने घुटने टेक कर प्रणाम किया। हमारे मस्तकों का स्पर्श किया और बीच में खड़े होकर हमें आशीर्वाद दिया -

‘‘पहले जिउसुद्दू मनुष्य था, पर अब से यह और इसकी पत्नी हमारी तरह देवता होंगे और जिउसुद्दू तथा इसकी पत्नी अब नदियों के मुहाने में निवास करेंगे! क्योंकि नदियों के मुहाने ही देवताओं के आवास हैं?’’

वैदिक गाथा : दूसरी कथा

भारतीय जल-प्रलय की कथाएँ शतपथ ब्राह्मण, महाभारत और पुराणों में मिलती हैं। प्राचीनतम कथा 800 ई.पू. में शतपथ ब्राह्मण में प्रस्तुत की गयी। यों इसके घटित होने का समय निश्चय ही इससे बहुत पुरातन है।

प्रातःकालीन आचमन करते मनु के हाथ में जल के साथ एक छोटी-सी मछली आ गयी। मछली बोली - ‘‘देखो! मुझे फेंको नहीं। मेरी रक्षा करो। जो विपत्ति आने वाली है, उससे मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी। जल-प्रलय होने वाली है। उसमें सब प्राणी नष्ट हो जाएँगे, पर मैं तुम्हें बचाऊँगी। तुम मुझे घड़े में डालो। मैं जब आकार में बढ़ जाऊँ, तो सरोवर में डाल देना। मैं फिर आकार में बढ़ जाऊँगी, तब मुझे सागर में डालना। जब प्रलय आ जाए, तब मुझे याद करना। मैं तब आकर तुम्हारी रक्षा करूँगी।’’

सात दिन बाद जलप्लावन हुआ। आकाश से धारासार जल गिरने लगा। पृथ्वी नष्ट हो चली। मनु मछली के कहे अनुसार करते गये। मछली का आकार बढ़ता गया और वह सागर में पहुँच गयी। मछली ने मनु से एक नाव बनाने के लिए कहा था। मनु ने नाव बना ली थी। जब जलप्लावन बढ़ता ही गया, तो मनु ने जीवों के जोड़े इकट्ठे किये और नाव में आ गये। जब जल बढ़ता ही गया, तो मनु ने मछली का स्मरण किया। स्मरण करते ही विशालकाय मछली सहसा तैरती आ पहुँची।

मछली बोली - ‘‘जलयान को एक रस्सी से मेरे सींग से बाँध दो!’’

मनु ने ऐसा ही किया। मछली जलयान को लेकर जल का सन्तरण कर चली। अन्त में वह जलयान को लेकर उत्तरवर्ती पर्वत से जा लगी। वहाँ पहुँचकर मछली बोली - ‘‘जलयान को गिरिशिखर के तरु से बाँध दो। जल के घटने की प्रतीक्षा करो। जल छीज जाने पर सूखी धरती पर यज्ञ का अनुष्ठान करो!’’

जब जल छीज गया, तो मनु ने सूखी धरती पर यज्ञ का अनुष्ठान किया। मनु ने अनुष्ठान क्रिया सम्पन्न करने के लिए किलात और आकुली नाम के असुर ब्राह्मणों को आमन्त्रित किया। उस यज्ञ से श्रद्धा का जन्म हुआ। और तब मनु और श्रद्धा के संयोग से नयी सृष्टि का आविर्भाव हुआ।

भागवत पुराण की कथा 8, 24 के सातवें श्लोक से शुरू होती है और शतपथ ब्राह्मण की कथा को महाभारत की कथा के संयोग से ऋद्ध कर अपना विस्तार प्राप्त करती है।

कहते हैं कि ब्रह्मा निद्रा में मग्न थे, तभी सहसा जल-प्रलय हुई और दैत्य हयग्रीव ने वेदों को चुरा लिया। वेदों की रक्षा के लिए हरि (विष्णु) ने मछली का रूप धारण किया। यह छोटी-सी मछली बाद में बढ़कर लाखों योजन की हो जाती है। हरि (शृंगी मछली) ने अपना भेद जल पर ही रहने वाले तथा जल का ही आहार करने वाले राजा सत्यव्रत को बता दिया। एक निर्मित सन्दूक राजा सत्यव्रत के पास स्वयं ही तिरता हुआ आ गया। राजा ने ब्राह्मणों के साथ उसमें प्रवेश किया। उसमें बैठकर राजा और ब्राह्मण हरि की स्तुति में ऋचाओं का पाठ करते रहे। अन्त में हरि ने हयग्रीव का वध करके वेदों का उद्धार किया। फिर विष्णु ने सत्यव्रत को दैवी और मानवी ज्ञान में दक्ष किया और उसे सातवाँ मनु घोषित किया। तब एक नया मन्वन्तर बना और नयी सृष्टि ने जन्म लिया।

बाइबिल : तीसरी कथा

जल प्रलय की आर्य गाथा असूरी गाथा से प्रभावित है। और बाइबिल की यह गाथा सुमेरी-आर्य गाथाओं से प्रभावित लगती है। यद्यपि यह भी कहा जाता है कि हजरत नूह की इस गाथा से भारत की ब्राह्मण गाथाएँ प्रभावित हैं।

‘‘और भगवान ने देखा कि धरती पर मनुष्य की दुष्टता बेहद बढ़ गयी है और उसके हार्दिक विचारों की प्रत्येक कल्पना केवल बुराई को ही गुनती है। भगवान ने नूह से कहा, ‘मैंने जिस मानव को सिरजा है, उसे, बल्कि प्रत्येक जीवधारी को, मिटा दूँगा। कारण कि मुझे उन्हें सिरजने का बड़ा क्लेश है। धरती हिंसा से भर गयी। जीवों ने आचार-विचार भ्रष्ट कर लिये हैं। तू अपने लिए काठ का एक (विशाल) सन्दूक बना ले। उसमें कमरे बना ले। फिर तू उसमें एक खिड़की बना और सन्दूक का द्वार उसके बाजू में बना। यह सन्दूक तीन महला हो। मैं पृथ्वी पर जल-प्रलय लाकर सारे जीवधारियों का नाश कर दूँगा। पर तेरे साथ मैं एकरार करूँगा। क्योंकि इस पीढ़ी में बस तू ही आचारवान बचा है। तू सन्दूक में प्रवेश करेगा। तू और तेरे साथ तेरे पुत्र, तेरी पत्नी और तेरे पुत्रों की पत्नियाँ, सब प्रवेश करेंगे। सारे जीवधारियों के हर किस्म के जोड़े तू सन्दूक में ला धरेगा। जिससे तेरे साथ ही उनकी भी रक्षा हो सके। जोड़े में एक नर हो, दूसरा मादा, सभी प्रकार का आहार भी रख ले।’ ’’

नूह ने ऐसा ही किया, जैसा भगवान ने उसे करने का आदेश दिया। तब भगवान ने नूह से कहा, ‘‘तू जान ले कि आज से बस सात ही दिन बाद मैं प्रलय के मेह बरसाऊँगा।’’

‘‘प्रलयंकर मेह धरती पर बरसने लगा, चालीस दिन और चालीस रात मूसलाधार बरसता रहा। आकाश के नीचे के सारे-के-सारे गिरि-पर्वत उस जल में लीन हो गये। भूमि के सारे जीवधारी विनष्ट हो गये। मात्र नूह और सन्दूक के दूसरे जीव, जो उसके साथ थे, बच रहे। डेढ़ सौ दिन बाद जल का गिरना थम गया। सातवें महीने के सत्रहवें दिन नूह का सन्दूक अरारत पर्वत पर थल से जा लगा। अगले माह के सत्ताईसवें दिन धरा सूखी। और तब नूह से भगवान बोले, ‘अब तू सन्दूक से बाहर निकल आ और तेरे साथ ही तेरी बीवी, तेरे बेटे और बेटों की बीवियाँ भी बाहर निकल आएँ, और अपने साथ के सारे जीवधारियों को तू बाहर निकाल ले, ताकि वे प्रजा जन सकें, फलें-फूलें, पृथ्वी पर बढ़ें।’

‘‘और तब नूह ने भगवान की पूजा के लिए बलिवेदी बनायी और उसने पाक पशुओं और पाक पखेरुओं में से एक-एक ले, उन्हें अग्नि में भून, भगवान को अर्पित किया। उस बलि की मनहर गन्ध भगवान को मिली और भगवान ने मन में कहा, अब कभी धरा को अभिशप्त न करूँगा, कारण कि आदमी के मानस की कल्पना तो बद और पापी उसकी तरुनाई से ही होती है, और न मैं कभी प्राणियों का हनन ही करूँगा। जब तक धरा कायम रहेगी, बीज की बुआई और फसल की कटाई भी कायम रहेगी। सर्दी और गर्मी, दिन और रात भी कायम रहेंगे।’’

यूनानी लातीनी गाथाएँ : चौथी कथा

यूनानी और लातीनी जल-प्रलय की ये गाथाएँ सीधे-सीधे बाइबिल से प्रभावित हैं। इन सबके मूल में सुमेरी-अक्कादी गाथा ही है, क्योंकि असुरों का राज्य मित्र से कैस्पियन सागर तक और यूनान से ईरान तक फैला हुआ था।

1

देवराज जीमस (वैदिक द्यौस) मनुष्य जाति पर एक बार नितान्त क्रुद्ध हो गया। उसने उस जाति को समूल नष्ट कर देने का निश्चय कर लिया। प्रोमेथियस को इससे बड़ी चिन्ता हुई और उसने अपने वंश की रक्षा के लिए अपने बेटे द्युकालियन को नेक सलाह दी कि सर्वनाशी जल-प्रलय आने वाला है, तू एक विशाल सन्दूक बना और अपनी पत्नी के साथ आहार आदि की सामग्री लेकर उसमें प्रवेश कर जा। तेरी रक्षा हो जाएगी और मानव जाति नष्ट होने से बच रहेगी। बेटे ने वैसा ही किया।

देवराज जीमस ने बादलों का आकाश-मार्ग खोल दिया और मेह से जीव-जन्तु जलमग्न हो विनष्ट हो गये। केवल देवताओं का आवास ओलिम्पस पर्वत शिखर जल-प्रलय से बच गया, शेष सारे गिरि-शिखर जल में समा गये। द्युकालियन और पीर्हा नौ दिन तक सन्दूक में बैठे जल की सतह पर बहते रहे। फिर पार्नास के सूखे स्थल पर पहुँचकर उन्होंने अपनी रक्षा की। द्युकालियन ने देवराज को बलि चढ़ायी। बलि से प्रसन्न होकर जीमस ने उन्हें सन्तान का वरदान दिया। पति ने जो पत्थर फेंके, वे नर हो गये और पत्नी ने जो पत्थर फेंके, वे मादा हो गये। इस प्रकार नयी सृष्टि हुई और मानव जाति समूल नष्ट होने से बच गयी।

2

आर्दातिस की मृत्यु के बाद उसके पुत्र जिसुथ्रस ने 64,800 साल राज किया। उसके शासनकाल में जल की विनाशी बाढ़ आयी। सपने में उससे क्रोनस ने कहा, ‘देइसियस माह के पन्द्रहवें दिन भयानक बाढ़ आएगी, जिससे सारी मानव जाति नष्ट हो जाएगी। तू सूर्यदेवता के नगर सिप्पारा में सारी हस्तलिपियों को ले जाकर गाड़ दे। फिर एक नौका बना, उस पर अपने सम्बन्धियों और मित्रों के साथ जा चढ़, उसमें आहार और पेय भर ले। इससे जीवन की रक्षा होगी। पशुओं और पक्षियों को भी उस पर पनाह दे।’

जब बाढ़ आयी और चराचर उसमें निमग्न हो गया, जिसुथ्रस की नौका जल पर तैरती रही। जब पृथ्वी सूख गयी, तब नौका का एक भाग तोड़कर उसने राह बनायी और देखा कि नौका एक पहाड़ की ऊँची भूमि से आ लगी है। वह पत्नी और पुत्री के साथ बाहर निकला। बलिवेदी बनाकर उसने देवताओं को बलि चढ़ायी। जिनके साथ वह बाहर निकला था, सहसा उनके साथ अन्तर्धान हो गया। पीछे छूटे लोगों ने देव-वाणी सुनी कि जिसुथ्रस अपने पुण्यों के कारण परिवार-सहित देवलोक में निवास करने चला गया है। उस नौका का एक अंश अब भी आर्मीनिया के कुर्दी पहाड़ों पर पड़ा है। देववाणी से आदेश पाकर लोगों ने सिप्पारा में गड़ी हस्तलिपियों को खोद निकाला और बाबुल और अन्य अनेक नगरों और मन्दिरों का निर्माण किया।

चीनी गाथा : पाँचवीं कथा

जल-प्रयल या बाढ़ की यह चीनी गाथा ‘दैवी कोप’ से मुक्त है। यह पहली गाथा है, जो पारलौकिक शक्तियों से हटकर प्रकृति की भीषणता और मनुष्य के उद्यम की कथा कहती है। शायद प्राचीन काल की गाथाओं में यह कथा एक महत्त्वपूर्ण संक्रमण का बिन्दु बन गयी हो।

‘‘बाढ़ का जल आकाश में चढ़ चला। गिरि-पर्वतों के शिखर लहरों में डूब गये और पानी उन पर होकर बहने लगा। लोग नष्ट हो चले, मैंने (यू ने) अपने चारों वाहनों (गाड़ी, नाव, बर्फ पर चलने वाला स्लेज और कील युक्त जूते) पर चढ़ गिरि से संलग्न सारे जंगलों को काट गिराया, साथ ही जनता को बताया कि भोजन के लिए मांस कैसे उपलब्ध हो सकता है। नवों प्रदेशों में मैंने जलधाराओं के लिए मार्ग बना उन्हें समुद्र में प्रवाहित किया। ची के तीर की मिट्टी में बीज डाल मैंने प्रजा को सिखाया कि मांस के अतिरिक्त अन्न भी कैसे उपजाया जा सकता है। वस्तुओं के विनिमय की परम्परा भी मैंने प्रचलित की और इस प्रकार उनकी एकत्रित राशि उपयोग में आने लगी। लोगों के पास धन-धान्य हुआ और देश में सुशासन की स्थापना हुई।’’

यावो के काल में पृथ्वी पर किसी प्रकार की व्यवस्था न थी। जलप्रसार अनियमित था। बाढ़ समूची धरा को ढक लिया करती थी। वनस्पति का विस्तार अनन्त था और पक्षियों तथा अन्य जीवधारियों का संचरण असाधारण मात्रा में हुआ करता था। अन्न अभी उपजा नहीं था। पशुओं की संख्या से, उनके सर्वत्र अट जाने से मनुष्य अत्यन्त दीन हो गया था। यावो ने शून को व्यवस्था सौंपी और यी को अग्नि पर नियन्त्रण करने की शक्ति दी। यी ने पर्वतों और जल-चुम्बित धारा पर सर्वत्र आग लगा दी। पशु पनाह की खोज में भाग चले। यी ने नवों नदियों का विभाजन किया। तब जा कर मध्य राज्य के लोग अपना आहार प्राप्त कर सके। जल-प्लावन के समय सर्प और अजगर सर्वत्र छा गये। यी ने इन्हें भगाकर जल-थल को जीवन के लिए निरापद किया। और मनुष्य की रक्षा की।


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