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कविता

अलगाव
अनिल कुमार


अलगावों में
कटता अपना
आज पहर है।

साया ही क्यों
चिह्न कदम से
अलग हो गया
भाव मुखों का
बदल बैर से
नेह खो गया,
गर्म साँस से
आया
चारों ओर कहर है।

नजरें ही क्यों
तर्जनियाँ भी
तनी हुई हैं
भंगिमाएँ भी
धनुषबाण-सी
बनी हुई हैं,
होठों पर भी
छलका तीखा
विपुल जहर है।

कहीं नहीं अब
अमन चैन की
बजती वंशी
घूम रही है
हवा भयंकर
पीड़ा दंशी,
सौ जेठों पर
चढ़ा तवा-सा
आज पहर है।


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