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कविता

अलकापुर
अजय पाठक


अलकापुर तक जाकर लौटा
मेघदूत-सा मन।

पानी बरसा, बिजली चमकी
घटाघोर अंधियार
मेरुखंड में भोग रहा है
यक्ष विरह की मार

            नाप रहा है प्राणप्रिया की
           दूरी-सौ योजन।

उज्जयिनी की स्मृतियों को
पल-पल याद करे
वृक्षलता से, वल्लरियों से
वह संवाद करे

            कानों में गूँजा करते हैं
           पिय के मधुर कथन।

वन-वन भटके माँद-खोह में
डोल गई है काया
एक भूल पर धनकुबेर ने
कहाँ-कहाँ भटकाया ?

            जीवन से हरियाली रूठी
           सूखा वृंदावन।


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