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कविता

अगिन-खान
श्यामसुंदर दुबे


बड़बोले सूरज के
बोल हुए तीखे
गाँव-घर-मुहल्ले
सब एक साथ चीखे।

जलपांखी जले
और सुलगे पहाड़,
ऐसे तो नहीं थे
जैसे अब हुए झाड़
पत्रहीन - गाछहीन
डालों पर पंछी क्या
पंछी का जामा न दीखे।

चूल्हों में आग नहीं
सुलगी भूख पेटों में
अस्थिशेष बचा रंक
जबर के चपेटों में
आँगनों दरार फटी
घर खदबदाए दीवारें हिलीं
आए कुछ जलजले सरीखे।

डाँगर-ढोर हाट में
नीलामी पर चढ़े हुए,
साहूकार-बैंक की उधारी
सिर अपने मढ़े हुए
लुहारों की भट्टी में
अंगारों की आँच तपे
ऐसी अगिन-खान में जीने के गुर सीखे।
 


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