डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कविता

अकड़ गया रमजानी
राम सेंगर


रात अँधेरी,
भूख और जालिम बंबा का पानी।

इत मूँदे, उत फूटे
किरिया-भरा न दीखे
फरुआ चले न खड़ी फसल में
खीझे-झींके
पहली सींच
ठंड में भीगा
अकड़ गया रमजानी।

लालटेन अलसेट दे गई
शीशा टूटा
उड़ी शायरी
‘पत्ता पत्ता-बूटा बूटा’
हाल न उसका
कोई जाने
कैसी अकथ कहानी।

मिट्टी में लिथड़े
पाजामा-पहुँचे धोए
कोट न फतुही थर-थर काँपे
खोए-खोए
रोक मुहारा
आस्तीन से
पोंछ रहा पेशानी।

बगीचिया से बीन जलावन
आग जलाई
देह सिंकी, बीड़ी सुलगी
कुछ गरमी आई
बदली सूरत का
सच जाना
बढ़ी और हैरानी।
 


End Text   End Text    End Text