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कविता

अरण्य जीते हैं
माहेश्वर तिवारी


बोलों में, बातों में,
दिन-दुपहर, रातों में
            कितने-कितने अरण्य जीते हैं।

आदत की तरह
हो गया है
भीगते हुए
            जलते रहना
शब्दों की
त्योरियाँ चढ़ाते
भीतर-बाहर
            बस चुप रहना

फूलों-पत्तों से
होकर तटस्थ
            कैसा-कैसा अनन्य जीते हैं।

हिंसाएँ, शांति-पाठ
त्राटक में
शामिल
कैसा अंतर्विरोध
नाटक में
शामिल।

टूटी तलवारों की
मूँठ लिए
अपने में धन्य-धन्य जीते हैं।
 


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