डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कविता

हैंगर
बुद्धदेब दासगुप्ता

अनुवाद - कुणाल सिंह


जब भी उसके पास करने को कुछ नहीं होता था
या नींद नहीं आती थी लाख कोशिशों के बावजूद
तो वह अलमारी खोल के खड़ा हो जाता था।
अलमारी खोल के घंटों वह देखता रहता था
अलमारी के भीतर का संसार।
दस जोड़ी कमीजें, पतलून उसे देखते थे, यहाँ तक कि
अलमारी के दोनों पल्ले भी अभ्यस्त हो गए थे उसके देखने के।
अंततः, धीरे धीरे अलमारी को उससे प्यार हो गया। एकदिन ज्यों ही उसने
पल्ले खोले, भीतर से एक कमीज की आस्तीन ने उसे पकड़ लिया
खींच लिया भीतर, अपने आप बंद हो गए अलमारी के पल्ले, और
विभिन्न रंगों की कमीजों ने उसे सिखाया कि कैसे
महीने दर महीने
साल दर साल, एक जनम से दूसरे जनम तक
लटका रहा जाता है
सिर्फ एक हैंगर के सहारे।
 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में बुद्धदेब दासगुप्ता की रचनाएँ