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कविता

हाथ
बुद्धदेब दासगुप्ता

अनुवाद - कुणाल सिंह


अपने हाथों के बारे में हमेशा तुम सोचते थे
फिर एकदिन सचमुच ही तुम्हारा हाथ तुमसे गुम गया।
हाय, जिसे लेकर तुमने बहुत कुछ करने के सपने पाले थे गालों पे हाथ धरकर
पागलों की तरह दौड़ धूप किया, न जाने कितने दिन कितने महीने कितने साल-
पागलों की तरह सर पीटते पीटते फिर एक दिन तुम्हें नींद आ गई।
बहुत रात गए तुम नींद से जागकर खिड़की के आगे आ खड़े हुए
खिड़की के पल्ले खुल गए
अद्भुत चाँदनी में तुमने देखा एक विशाल मैदान में सोए हैं
तुम्हारे दोनों हाथ। एकसार बारिस हो रही है हाथों के ऊपर, और
धीमी धीमी आवाज करते हुए घास उग रहे हैं हाथों के इर्द गिर्द।

 


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