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कविता

कान
बुद्धदेब दासगुप्ता

अनुवाद - कुणाल सिंह


एक कान देखना चाहता है अपने जोड़ीदार दूसरे कान को
एक कान कहना चाहता है दूसरे कान से न जाने कितनी बातें।
कभी मुलाकात नहीं होती दोनों की, बातें एक कान में बहुत गहरे धँसकर
दूसरे कान की गहराई से निकल पड़ती है, और अंततः
हवाओं में घुल मिल जाती है। दुख और शर्म से
कुबरे होते होते एक दिन कान झड़ जाते हें, गिर पड़ते हें रास्तों में कहीं। पृथ्वी पे
इस तरह शुरू होती है कानहीन मनुष्यों की प्रजाति।
आज एक कानहीन आदमी की एक कानहीन लड़की से शादी है,
पसरकर बैठे हैं देखो, उनके कानहीन दोस्त यार
कानी उँगली डुबाकर दही खाते खाते
न जाने कौन सी बात पे
हँस हँस कर दोहरे हुए जा रहे हैं
रो रहे हैं, सो रहे हैं बिस्तरों पर।
 


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