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लेख

टीपू सुल्तान पर घमासान
अरुण कुमार त्रिपाठी


कर्नाटक में मचे टीपू विवाद पर किसी अखबार ने एक रोचक व्यंग्यचित्र छापा था। लंदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून एक साथ एक अखबार में कर्नाटक की खबर देख रहे हैं और मोदी कह रहे हैं कि आप ने टीपू के साथ युद्ध लड़ा था और अब हम टीपू के नाम पर युद्ध लड़ रहे हैं। हालाँकि राजनीति, इतिहास, संस्कृति और मनोविज्ञान के स्तर पर उठे इस विवाद का कुल लब्बोलुआब इतना है कि कांग्रेस पार्टी संघ परिवार के राणाप्रताप और शिवाजी की तरह कुछ मुस्लिम नायक ढूँढ़ रही है और भाजपा उसे किसी कीमत पर स्थापित नहीं होने देना चाहती। दरअसल नायकों की रचना जिस मिथकीय और उन्मादी तरह से की जाती है कांग्रेस उस भावना से रहित है। इसलिए इस कला में माहिर संघ परिवार के विरोध के सामने उसके कदम लड़खड़ाने लगते हैं। टीपू सुल्तान की सारी चमक इस बात में है कि वे बहादुर थे और अँग्रेजों को हराने के लिए तुर्क, फ्रांसीसी और अफगान किसी से भी हाथ मिला सकते थे। लेकिन उनका स्याह पक्ष यह है कि अपनी इस बहादुरी के रास्ते में उन्हें कालीकट के हिंदुओं का संहार करना पड़ा, कुर्ग के नागरिकों पर जुल्म ढाना पड़ा। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ मराठों और निजाम हैदराबाद से भी लोहा लेना पड़ा। आज के संदर्भ में टीपू सुल्तान का सारा नायकत्व औपनिवेशिक और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष पर टिका हुआ है। 1799 में श्रीरंगपत्तनम में अँग्रेजों से लड़ते हुए मारे गए टीपू एक नायक के रूप में तभी चमकते हैं जब हम उस विरासत को 1857 से जोड़ते हुए 1947 तक लेकर आएँ। क्योंकि 1857 वह कालखंड है जब हिंदू बैरागी, गोसाईं, नागा और साधु संत, मुल्ला मौलवियों के साथ मिलकर लड़े थे और उसमें वहाबी धारा के लोग भी शामिल थे। हमें यह नही भूलना चाहिए कि अंडमान निकोबार जेल में बंद एक वहाबी ने ही वायसराय लार्ड मेयो को पटक कर मार डाला था। लेकिन एक तरफ तो महात्मा गांधी ने औपनिवेशिक संघर्ष की हिंसक धारा ही बदल दी और दूसरी तरफ आज का सारा संदर्भ फिर औपनिवेशिक यूरोप से गठबंधन करने और पश्चिम एशिया से सांस्कृतिक और राजनीतिक दूरी बनाने का है। जबकि पश्चिम एशिया हमारी आजादी की प्रेरणा से आजाद हुआ था और बाद में निर्गुट आंदोलन में जिसका महत्वपूर्ण योगदान था। संघ परिवार की भारतीयता अँग्रेजों के विरुद्ध नहीं है न ही उसका इटली से आईं सोनिया का विरोध इटली की फासीवादी विचारधारा से है। उसका सारा राष्ट्रवाद यूरोपीय साम्राज्यवाद के आंशिक विरोध और मुगल शासन के भारी विरोध पर टिका हुआ है। वह विरोध आज के इस्लामी आतंकवाद से जुड़ गया है और डैलरिंपल के उस निष्कर्ष पर जाकर ठहर रहा है कि अलकायदा और तालिबान की परंपरा वहाबियों और देवबंदियों की धारा से निकलती है। जबकि कांग्रेस का राष्ट्रवाद इसके विपरीत उदारता के साथ समावेशी था। अब कांग्रेस की मजबूरी यह है कि जब वह भाजपा के राष्ट्रवादी प्रतीकों के सामने गांधी और नेहरू को ठीक से खड़ा नहीं कर पा रही है तो टीपू सुल्तान को कैसे खड़ा करेगी।

इन चुनौतियों के बावजूद इतिहास की एक विवेकवान और सहिष्णु समझ तो विकसित ही करनी होगी। यह सही है कि हमें इतिहास से बार-बार विवाद निकालने से बचना होगा और वर्तमान की ज्यादातर जरूरी चीजों की तलाश इस दौर में करनी होगी। लेकिन इतिहास का जिन्न प्रकट हुए बिना मानता नहीं और उसका धंधा करने वाले भी कम नहीं हैं, इसलिए उसे भगाने के मंत्र भी हमें सीखने ही होंगे। वह मंत्र मानवता के व्यापक मूल्यों की कसौटी पर इतिहास के तथ्यों को कसने से ही तैयार होंगे।


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