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लेख

वरना हम नायक ढूँढ़ते रह जाएँगे
अरुण कुमार त्रिपाठी


कर्नाटक में टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने पर मचे घमासान के बीच यह सवाल अहम हो गया है कि क्या हम विभिन्न जातियों और धर्मों में बँटे भारतीय ऐसे पुरखे और नायक ढूँढ़ने की सामर्थ्य खोते जा रहे हैं जो सभी के लिए आदरणीय हों? अगर टीपू सुल्तान का नाम लेते ही हिंदुओं के एक हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले धार्मिक और राजनीतिक संगठन भड़क उठते हैं तो क्या राणा प्रताप और शिवाजी जैसे नायकों को मुसलमान दिल से स्वीकार करेंगे? बल्कि आज नायकों और महापुरुषों को जिस तरह आपस में लड़ाने का सिलसिला चल निकला है उससे तो बहादुर शाह जफर, अजीमुल्लाहखान, नाना साहेब पेशवा, झाँसी की रानी, मंगल पांडे, मौलवी बाकर, अहमदउल्ला शाह, महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, मौलाना आजाद, भगत सिंह, अशफाक उल्लाह, फुले, आंबेडकर और पेरियार जैसे आधुनिक भारत के निर्माताओं और अलग-अलग मोर्चों पर नायक रहे लोगों को सभी के पुरखे मानना कठिन हो जाएगा।

हिंदुस्तानियों के इसी विभाजित मानस को समझते हुए डॉ. राम मनोहर लोहिया ने हिंदू और मुसलमान विषय पर भाषण देते हुए कहा था कि - "हर बच्चे को सिखाया जाए, हर स्कूल में, घर-घर में, क्या हिंदू, क्या मुसलमान, बच्ची-बच्चे को कि रजिया, शेरशाह, जायसी वगैरह हम सबके पुरखे हैं, हिंदू और मुसलमान दोनों के। मैं यह कहना चाहता हूँ कि रजिया, शेरशाह, जायसी को मैं अपने माँ-बाप में गिनता हूँ। ...लेकिन उसके साथ-साथ मैं चाहता हूँ कि हममें से हर एक आदमी क्या हिंदू क्या मुसलमान यह कहना सीख जाए कि गजनी, गोरी और बाबर लुटेरे थे और हमलावर थे। यह दोनों जुमले साथ-साथ हों हिंदू और मुसलमान के लिए। ...अगर सात सौ बरस (मुसलमानों का शासन) को देखने की यह नजर बन जाए तो हिंदू और मुसलमान दोनों पिछले सात सौ बरस को अलग निगाह से नहीं देखेंगे। लड़ाई करने वाली निगाह से नहीं देखेंगे।"

लेकिन इस मानस को बनाने की कठिनाई के बारे में भी महसूस करते हुए लोहिया कहते हैं कि कितने हिंदू हैं जो कहेंगे कि शेरशाह उनके बाप दादाओं में से हैं और कितने मुसलमान कहेंगे कि गजनी, गोरी लुटेरे थे? बल्कि लोग कहेंगे कि गजनी और गोरी न आए होते तो मुसलमान होते ही कहाँ से?

लेकिन अगर हमें भारत को और उसके लिए यहाँ रहने वाले हिंदू और मुसलमानों के रिश्तों को ठीक करना है तो साझे पुरखे तो ढूँढ़ने ही होंगे। उससे देश के भीतर तो रिश्ते सुधरेंगे ही पाकिस्तान से भी संबंध बनेंगे।

इसी से कुछ मिलती-जुलती बात भाजपा के संस्थापक और पूर्व उपाध्यक्ष के आर मलकानी अपनी किताब 'इंडिया फर्स्ट' में करते हैं। हमें ध्यान रखना होगा कि जब संजय खान के धारावाहिक पर भारी विरोध उठा था तो मलकानी ने ही आगे बढ़कर टीपू को राष्ट्रनायक कहा था। इस पुस्तक में 'ग्रेटनेस ऑफ टीपू' सुल्तान नामक अध्याय में वे कहते हैं कि हर राष्ट्र को नायक और खलनायक चाहिए। वे आधुनिक भी होंगे और मध्ययुगीन भी। इसलिए अगर हम शिवाजी, राणाप्रताप, गुरु गोविंद सिंह, कृष्णदेव राय और झाँसी की रानी को नायक मानते हैं तो हमें मोहम्मद बिन कासिम, गजनी, गोरी अल्लाउद्दीन, औरंगजेब, नादिर शाह और अब्दाली को खलनायक मानना होगा। लेकिन उसी के साथ हमें यह भी याद रखना होगा कि अकबर, दाराशिकोह और टीपू सुल्तान नायक हैं, खलनायक नहीं। टीपू के नायकत्व के पक्ष में तैयार किए गए अपने आख्यान में वे मालाबार की चढ़ाई के लिए टीपू को जिम्मेदार तो ठहराते हैं लेकिन पूरी तरह से दोषी नहीं। वे कहते हैं कि वह दौर पिंडारियों और ठगों का था, इसलिए संहार और तबाही करने वाले वे गैर जिम्मेदार लोग थे। इसके अलावा यह कहना ज्यादा सही होगा कि टीपू ने वहाँ हिंदू समुदाय नहीं अँग्रेजों के व्यावसायिक साझेदारों पर हमला किया था। वे टीपू का पक्ष लेते हुए कहते हैं कि टीपू को हिंदू विरोधी चरित्र का शासक बताने का काम अँग्रेजों ने बड़ी सफाई से किया और इस काम में उनके बेटों का वजीफा छह सौ गुना बढ़ाकर उनकी मदद ली। मलकानी सवाल करते हैं कि अगर किसी एक युद्ध से किसी शासक या इतिहास पुरुष का नायकत्व खत्म हो जाता है तो कलिंग के युद्ध में एक लाख लोगों को मारने वाला अशोक कैसे नायक हो गया और सरहिंद में तीस हजार मुसलमानों को मारने वाला बंदा बैरागी कैसे लोकनायक कहलाएगा।

उल्टे मलकानी टीपू की तारीफ करते हुए बताते हैं कि जब वह बच्चा था तो उसके दो शिक्षक थे, एक पंडित गोवर्धन और दूसरे मौलवी ओबदुल्ला। टीपू के साथ आजीवन रहने वाले और उनके प्रधानमंत्री 'पुर्नैया' थे। उनके प्रधान सेनापति कृष्णराव थे। उनके निजी सचिव शिवाजी थे । इसके अलावा टीपू 156 मंदिरों को दान देता था। टीपू रोज सुबह उठकर नहाकर श्रीरंग भगवान की पूजा करता था और एक बार वह श्रृंगेरी महराज का स्वागत नहीं कर पाया तो उसने प्रायश्चित में सात चंडी यज्ञ कराया। अँग्रेजों से लड़ते हुए मारा जाने वाला उस समय का अकेला राजा था।

टीपू की बहादुरी के बारे में इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब वह मारा गया तो लार्ड वेलेजली ने कहा, "देवियों और सज्जनों यह जाम मैं भारत की लाश पर टकरा रहा हूँ।"

टीपू महज बहादुर और हिंदू धर्म का आदर करने वाला ही नहीं बल्कि एक आधुनिक और कल्पनाशील शासक भी था। उसने चैंबर ऑफ कामर्स खोला। कच्छ, होरमुज, जेद्दाह, अदन, बसरा में व्यापार के लिए बंदरगाह कायम किए। उसने मैसूर को रेशम, चंदन और मोती उद्योग दिए, मापतौल की पद्धति में सुधार किए, हिजरी कैलेंडर में संशोधन किया। वह पर्यावरण के प्रति भी संवेदनशील था और जब उससे यह शिकायत की गई कि मैसूर की फैक्टरियाँ कावेरी के जल को प्रदूषित कर रही हैं तो उन्हें वहाँ से हटवा दिया गया। टीपू ने हर चार मील पर स्कूल खोले, पेड़ों की कटाई रोकी और महिलाओं की शिकायत पर शराबबंदी लागू की।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हम टीपू को अपना नायक और पुरखा मान पाएँगे? अगर हम दारुल हरब और दारुल इस्लाम के सिद्धांत या सावरकर के पितृभूमि और देव भूमि के सिद्धांत पर चलेंगे तो शायद नहीं। लेकिन अगर हम यहाँ हजारों साल से रहने वालों की देशभक्ति तय करने के लिए ऊपर वाले दोनों सिद्धांतों का पालन न करके उन्हें सहज रूप से उनके प्रकट योगदान के आधार पर आदर और तिरस्कार देंगे तो शायद हमारे पुरखों का विवाद सुलझेगा और झगड़े का मानस भी ठंडा पड़ेगा। तब शायद पुरखों और नायकों का विभाजन नहीं उनकी साझेदारी बनेगी।


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