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लेख

समाजवाद : गरीबों का सपना अमीरों का हौवा
अरुण कुमार त्रिपाठी


समाजवाद का सपना भारत में कितनी बुरी तरह टूटा है इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के चुनाव में किसी दल की हिम्मत नहीं थी कि वह देश में समाजवाद लाने के नाम पर वोट माँगे। जब देश में गुजरात जैसे पूँजीवादी मॉडल की धूम मची हो उस समय अन्य राजनीतिक दलों की तरफ से देश में किसी और मॉडल को उसके समकक्ष खड़ा ही नहीं किया जा सका। हालाँकि केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक और हरियाणा के मॉडल उससे अच्छे थे और हमें इस तथ्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि आज सत्ता पर दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी का गठन जब 1980 में किया गया था तब उसने 'गांधीवादी समाजवाद' को अपना सिद्धांत बनाया था। इस दौरान सोवियत संघ के पतन और चीन के बाजारवादी परिवर्तन के बाद समाजवाद पराजित हुआ, हालाँकि इस बीच लातिन अमेरिका जैसे दुनिया के कुछ हिस्सों में समाजवाद का मॉडल प्रासंगिक भी हुआ।

पर आज जब उदारीकरण के संकट के बीच राष्ट्रीय स्तर पर एक समाजवादी मॉडल की प्रस्तुति का सवाल था तब फिर पूँजीवादी मॉडल की प्रस्तुति सबसे चमकदार रही। पश्चिम बंगाल में चुनाव हारकर माकपा अपने मॉडल का महत्व खो चुकी है और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी वैसा कोई मॉडल तैयार नहीं कर पाई। नीतीश कुमार ने बिहार में वैसी कोशिश की लेकिन वह मोदी के इर्द-गिर्द उठे विवादों में खो गई। त्रिपुरा का मॉडल क्या है और वहाँ के मुख्यमंत्री की जीवन शैली क्या है? यह उदाहरण देश के समक्ष रखा ही नहीं जा सका। केरल के मॉडल पर कांग्रेस और माकपा दोनों की दावेदारी है इसलिए उसे कोई पेश करने को तैयार ही नहीं हुआ।

पारंपरिक 'कम्युनिस्ट पार्टियों' या 'सोशलिस्ट पार्टियों' के घोषणा पत्रों में भले ही समाजवाद शब्द का उल्लेख रहा हो, लेकिन बहस और चर्चा में यह शब्द कहीं आया ही नहीं। विडंबना देखिए कि भ्रष्टाचार और याराना पूँजीवाद के समाधान का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ने भी कहीं भी इस शब्द का जिक्र नहीं किया। बल्कि उसके सिद्धांतकार ने स्पष्ट शब्दों में दावा किया कि हम तो तथ्यों के आधार पर तर्क करते हैं हमें बीसवीं सदी की किसी विचारधारा में यकीन नहीं है। पिछले दिनों जब समाजवादी जनपरिषद के महामंत्री और समाजवादी सिद्धांतों के अनुरूप जीवन जीने वाले सुनील भाई का निधन हुआ तो उनकी अंत्येष्टि में और शोकसभाओं में तमाम 'समाजवादी' जुटे। यह अच्छी बात थी लेकिन जब समाजवादियों का जमावड़ा ऐसे ही मौकों पर होने लगे तो उसकी सोचनीय स्थिति को समझा जा सकता है। इसके बावजूद समाजवाद का एक आकर्षक अतीत रहा है और अभी भी जब पूँजीवाद गंभीर संकट में होता है तो कुछ खुसुर-फुसुर के बीच दूर भविष्य में कहीं समाजवाद की उम्मीद दिखाई पड़ने लगती है। दरअसल समाजवाद अब पूँजीवादी पिता की बिगड़ैल संतान होकर रह गया है, जिसे कभी जेल में, कभी उपेक्षा में रहना पड़ता है, तो कभी भ्रष्ट व जातिवादी तरीके से अपना अस्तित्व बचाने का मौका मिल जाता है और अगर समाजवाद दुनिया के किसी हिस्से में ज्यादा शक्तिशाली बन पड़ता है तो उसे एक दबाव के बीच अपना मॉडल बनाकर काम करने का मौका दे दिया जाता है।

आजकल समाजवादी संगठनों में लातिन अमेरिका के देशों का प्रयोग बहुत चर्चा में है। भारत के समाजवादी और साम्यवादी दोनों इन देशों में हो रहे समाजवाद के प्रयोग को उम्मीद से देख रहे हैं और तीसरी दुनिया के तमाम देशों में अपनाए जाने की संभावना देख रहे हैं। लातिन अमेरिकी देशों में सोवियत संघ की तरह का शास्त्रीय मार्क्सवाद के अर्थों में समाजवाद का प्रयोग नहीं हुआ। लेकिन जो हुआ वह आज उदारीकरण की विकल्पहीन दुनिया में साकार विकल्प पेश करने का प्रयास है। तभी लातिन अमेरिका के विद्वान माइकल लेबोवित्ज और मार्ता हार्नेकर के समाजवादी पुनर्जागरण संबंधी व्याख्यान में कामरेड एबी बर्धन कहते हैं - "सारी दुनिया के समाजवाद का सपना देखने वालों के लिए यह जरूरी है कि वे लातिन अमेरिका के भीतर चल रही प्रक्रियाओं को समझें।" वैसे तो लातिन अमेरिका के सभी देशों में समाजवाद के नए प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं जो खेती से लेकर उद्योग और व्यापार सभी क्षेत्रों में अपना असर डाल रहे हैं और उनका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है तो विदेश नीति पर। लेकिन उनमें अगर किसी के प्रयोग की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है तो वह है वेनेजुएला के दिवंगत राष्ट्रपति उगो चावेस के प्रयोग की। चावेस ने कहा था कि हमें समाजवाद को फिर से खोजना होगा। यही काम आज भारत के बचे-खुचे समाजवादी करने की कोशिश कर रहे हैं। चावेस ने जो संविधान बनाया था वह समाजवादी नहीं था। उसमें निजी संपत्ति का निषेध नहीं था। उसमें सेंट्रल बैंक को पूरी तरह मुक्त रखने का प्रावधान था। यानी वहाँ पूँजी को किसी नियंत्रण से मुक्त रखने का प्रावधान था। इसके बावजूद चावेस का संविधान मनुष्य के समग्र विकास की बात करता है। इसके लिए उन्होंने लोकतांत्रिक बजट तैयार करने, लोकतांत्रिक ढंग से योजना बनाने, आत्मप्रबंधन, कोआपरेटिव्स बनाने के प्रावधान किए। चावेस ने विकेंद्रीकरण और जनभागीदारी के लिए जो कम्युनल कौंसिलें बनाईं उसे जनवरी 2007 में समाजवाद के बुनियादी त्रिभुज की संज्ञा दी। इसके तहत मजदूर सामाजिक उत्पादन करेंगे, उत्पादन के साधनों की मिल्कियत सामाजिक होगी और उत्पादन सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए होगा।

लातिन अमेरिका के बोलिविया, वेनेजुएला, अल सल्वाडोर, कोलंबिया, ब्राजील, चिली, पेरू जैसे देशों के समाजवादी मॉडल की चर्चा इसलिए जोर पकड़े हुए है क्योंकि इन देशों के राष्ट्राध्यक्ष छापामार लड़ाई या शास्त्रीय मार्क्सवादी सिद्धांत से निकले हुए कम्युनिस्ट नेता रहे हैं पर उन्होंने अपने देशों में लोकतांत्रिक चुनाव से सत्ता हासिल की और अपने समाजवादी प्रयोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए कर रहे हैं। एक तरह से उनका समाजवाद मार्क्सवादी समाजवाद न होकर गांधीवादी समाजवाद है। यह वही समाजवाद है जिसकी कल्पना महात्मा गांधी और उनके जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव जैसे तमाम अनुयायी किया करते थे। इस समाजवाद की सारी पूँजी मानव की समता, प्रेम और बंधुत्व की अवधारणा और उन विचारों के वाहक बनने वालों की नैतिक शक्ति हुआ करती थी। समाजवाद की मार्क्सवादी अवधारणा आदर्शवाद नहीं द्वंदात्मक भौतिकवाद पर निर्भर करती है। इस सिद्धांत में क्रांतिकारी सिद्धांत के साथ-साथ उसके लिए भौतिक स्थितियाँ अनिवार्य होती हैं। पर उसकी के साथ एक तरह का आर्थिक नियतिवाद जुड़ा हुआ है। यानी पूँजीवाद का संकट ऐसी स्थितियाँ पैदा करेगा जिसमें समाजवाद आना अनिवार्य है।

भारत के समाजवादियों ने अपने सपने की व्याख्या यूरोप से अलग की। उनका मानना था कि यूरोप का पूँजीवाद हो या समाजवाद वह तीसरी दुनिया के साम्राज्यवादी शोषण पर आधारित है। इसलिए एशिया और अफ्रीका के देशों में शोषण का वह मॉडल खड़ा नहीं की जा सकता और उन्हें अपने लिए समाजवाद का एक टिकाऊ मॉडल खोजना ही पड़ेगा। लेकिन भारत की जातिगत असमानता को देखते हुए डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादियों ने पहले जाति के ढाँचे को तोड़ने और नर-नारी समता लाने पर जोर दिया। उनकी दार्शनिक सोच इस तर्क के विस्तार पर आधारित है कि मानव सभ्यता न तो संसाधनों की लूट पर टिक सकती है और न ही परमाणु हथियारों के ढेर पर खड़ी होकर ज्यादा दिन चल सकती है। उनका समाजवाद रंग, नस्ल, लिंग और जाति संबंधी तमाम तरह के भेदभावों को खत्म करने, जनता और शासकों के बीच ही नहीं छोटे और बड़े देशों के बीच बराबरी का व्यवहार कायम करने, मानवाधिकार की रक्षा करने और पारस्परिक बंधुत्व की भावना विकसित करने पर आधारित रहा है। लेकिन उनके सिद्धांत में इस बीच पर्यावरण रक्षा का सवाल भी तेजी से जुड़ता गया है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संबंधी विनाश के खतरे को देखते हुए अब मामला पूँजीवादी शोषण से विश्व की मुक्ति का ही नहीं, पृथ्वी जैसे ग्रह के अस्तित्व का भी है।

पर यहाँ फिर वही प्रश्न अहम है कि मानव के समग्र विकास पर खड़ा मॉडल ग्रोथ के मामले में पीछे छूट जाता है और इसी बिना पर पूँजीवादी प्रचार तंत्र और उनकी नौकरशाही समाजवादी मॉडल को ध्वस्त कर देती है। यह स्थिति भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ही नहीं चीन जैसे बाजारवादी समाजवादी देश में भी है। जिस तरह भारत में गुजरात बनाम केरल मॉडल की चर्चा होती है उसी तरह चीन में बो शिलाई के 'चांगक्विंग' मॉडल बनाम 'गुआंगडांग' मॉडल की चर्चा होती है। 'चांगक्लिंग' मॉडल में बो शिलाई समाजवादी विचारों का प्रयोग करते हुए तीव्र और संतुलित विकास के रास्ते पर चल रहे थे और असमानता को कम करने में भी लगे थे। जबकि 'गुआंगडांग' मॉडल मुक्त बाजार और निर्यातोन्मुखी है जिसमें असमानता तेजी से बढ़ती है। लेकिन चीन के अभिजात्य वर्ग ने बो को सांस्कृतिक क्रांति के दिनों में लौटाने वाला व्यक्ति बताकर न सिर्फ प्रदेश के नेतृत्व से हटा दिया बल्कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से भी बाहर कर दिया।

जब चीन जैसे कथित समाजवादी देश में समाजवादी प्रयोगों पर इस तरह का खतरा है तो भारत जैसे घोषित पूँजीवादी देश में समाजवादी प्रयोग को किस तरह बदनाम करने का प्रयास होगा इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। दरअसल भारत में कोई समाजवादी प्रयोग चले इससे पहले उसमें अगड़ी-पिछड़ी जातियों के झगड़े और बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के अधिकारों से सवाल उठ खड़े होते हैं या यूँ कहे कि उठा दिए जाते हैं।

इसके बावजूद भारत जैसे विशाल देश में समाजवाद की उम्मीद इस बात पर निर्भर करती है कि लोकतंत्र समता की आकांक्षा पैदा करता है और पूँजीवाद एक सीमा से ज्यादा उसे दे नहीं सकता। पूँजीवाद अगर टीना यानी कोई विकल्प नहीं का नारा लगाता है तो समाजवाद सीता यानी सोशलिज्म इज द आल्टरनेटिव का नारा लगाता है। भारतीय समाज ने कभी विकल्पहीनता में विश्वास नहीं किया। यहाँ के दर्शन में बहुधावाद है, वही यह उम्मीद देता है कि देश के किसी हिस्से में ही सही समाजवाद का कोई सुंदर प्रयोग जरूर होगा और वह किसी न किसी रूप में देश की राष्ट्रीय नीतियों में अपनी जगह बनाएगा। क्योंकि अगर अमीरों के तीव्र विकास से सबकी समृद्धि की गारंटी होती तो भारत में गरीबी का मौजूदा स्तर न होता। लेकिन समाजवाद टिकाऊ तभी होगा जब वह पूँजीवाद के मुकाबले अपना एक लचीला आर्थिक मॉडल विकसित करे।


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