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लेख

हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक संकट
अरुण कुमार त्रिपाठी


हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं के इस वैचारिक संकट का अनुमान पत्रकार शिरोमणि बाबूराव विष्णु पराड़कर ने नब्बे साल पहले लगा लिया था। तभी उन्होंने 1925 में वृंदावन के हिंदी संपादक सम्मेलन में कहा था, "पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनिकों तथा सुसंगठित कंपनियों के लिए संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे, आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पनात्मकता होगी, गंभीर अन्वेषणा होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी। ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति न होगी। इन गुणों से संपन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएँगे। संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुँच न होगी। वेतनभोगी संपादक मालिक का काम करेंगे और बड़ी खूबी से करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतंत्रता प्राप्त है वह उन्हें न होगी।"

इन पंक्तियों को पढ़कर समझा जा सकता है कि पराड़कर जी ने पत्रकारिता के भावी परिदृश्य का मसीहाई अनुमान लगा लिया था। लेकिन यह अनुमान किसी संपादक या पत्र समूह से ईर्ष्या द्वेष पर आधारित नहीं था। यह पूँजीवाद के भावी विकास की रूपरेखा थी जो उनके मस्तिष्क में कौंध गई थी। इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि यह स्थिति आजादी के बाद तत्काल शुरू हो गई थी या आपातकाल जैसी स्थिति बहुत पहले बन गई थी। हिंदी की वैचारिक पत्रकारिता ने समय-समय पर विशेष तेवर दिखाए हैं और उसके उस योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता। इस बारे में प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री प्रोफेसर रजनी कोठारी ने अपने एक आलेख में कहा भी कि नब्बे के दशक के वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन, मंडल आंदोलन और मंदिर आंदोलन के बारे में अखबारी और विशेषकर भाषाई पत्रकारिता का लेखन ज्यादा प्रखर और जीवंत रहा है। इसका अर्थ है कि एक बड़े राजनीतिशास्त्री ने उस दौर के लेखन में वे तमाम तत्व देखे जो निर्भीक और गंभीर विश्लेषण में होने चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि वैश्वीकरण उसी इलाके पर होने वाला हमला था जहाँ से स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई छिड़ी थी। इसलिए वह क्षेत्र ज्यादा सशंकित हो गया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1991 में वैश्वीकरण की शुरुआत के साथ ही कई हिंदी अखबारों ने बाकायदा इसके विरुद्ध अभियान छेड़ा। उस समय तमाम अँग्रेजी अखबार या तो समर्थन की मुद्रा में थे या समर्पण की। उनका कार्पोरेटीकरण हिंदी से पहले हुआ। संभवतः उन्हीं का दबाव था कि हिंदी पत्रकारिता से वैचारिकता को खर-पतवार समझकर उसकी निड़ाई-छँटाई तेजी से की गई। संपादकविहीन अखबार, विचारविहीन संपादकीय का दौर आया और क्योंकि उपभोक्तावादी मूल्यों पर आधारित एक ऐसा मध्यवर्ग पैदा हो गया था जिसे विचार यानी मार्क्सवादी सैद्धांतिकी की आवश्यकता नहीं थी। वह उसके कारण ठीक से उपभोक्ता नहीं बन पाया था और भारत में विस्तृत बाजार नहीं देख पाया था।

यह वही दौर था जब सोवियत संघ का विघटन हुआ और डैनियल बेल ने 'एंड ऑफ आइडियोलाजी' जैसी पुस्तक लिखी। फ्रैंसिस फुकुयामा ने भी इसी दौर में 'एंड ऑफ हिस्ट्री' जैसी अवधारणा प्रस्तुत की। उसी समय क्लैश आफ सिविलिजेशन की अवधारणा लेकर सैमुअल पी. हटिंगटन भी आए। अँग्रेजी पढ़ा-लिखा तबका उस विचार से गहरे प्रभावित था और वहाँ विचारहीनता या नवउदारवादी सोच का प्रभाव जम गया था। लेकिन हिंदी में वह मध्यवर्ग धीरे-धीरे बन रहा था इसलिए उसमें गांधीवाद, समाजवाद और वामपंथ का असर बचा था। सांप्रदायिक विचारों का सैद्धांतिक प्रतिरोध बचा था। साथ ही दक्षिण भारत में हुए सामाजिक परिवर्तन के आंदोलनों से वंचित रहने के कारण उत्तर भारत में मंडल आंदोलन के प्रति आकर्षण और समर्थन था तो विरोध भी। मंडल आंदोलन के पीछे सिर्फ पिछड़ी जातियों के आंदोलन की ताकत नहीं थी, बल्कि उसे दलित आंदोलन का भी समर्थन था। यही वजह थी कि इसके विरोध के लिए सवर्ण जातियों को स्वयं भगवान राम को अवतार लेने के लिए बुलाना पड़ा। अयोध्या आंदोलन परोक्ष रूप से मंडल आयोग की रपटों का विरोध था और उसने सामाजिक न्याय को महज राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित कर दिया। उसे सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर तक जाने से रोक दिया। हिंदू समाज की राजनीति तो बदल गई लेकिन हिंदू-हिंदू ही रहा। बल्कि थोड़ा और अनुदार हो गया। हिंदी पत्रकारिता की वैचारिकी ने इसे उजागर करने में एक भूमिका निभाई लेकिन वह धीरे-धीरे वह वैश्वीकरण और हिंदूवाद की धारा में बह गई। इस सोच के दो काम होते हैं। एक तो वह आलोचनात्मक विचारों को सेंसर करती है तो दूसरी ओर दक्षिणपंथी विचारों का प्रचार तेज करती है। वैचारिकी को घटाने के लिए प्रिंट मीडिया के नेतृत्व को जनता से काटकर कारपोरेट के पक्ष में खड़ा किया गया और उन मजदूर, किसान, आदिवासी जैसे विषयों को त्याग दिया जिनसे मुख्यधारा का लोकतांत्रीकरण हो रहा था। इसीलिए वे आंदोलन या तो जंगलों में जाकर उग्रवाद में सिमट गए या फिर आत्महत्याओं की कड़ी बन गए। उनकी समझ में किसानों की समस्या तो तब आई जब जंगलों में हिंसा होने लगी, बड़े स्तर पर किसानों ने आत्महत्याएँ शुरू की और उस पर अँग्रेजी अखबार के कुछ शीर्षस्थ पत्रकारों की तरफ से खबरें और प्रतिक्रियाएँ आईं।

इस बीच वैचारिकता और निष्पक्षता पर भी जो सबसे बड़ा हमला हुआ वह चैनलों की तरफ से हुआ। कुछ चैनल नाग-नागिन और भूत-प्रेत के माध्यम से आगे बढ़े और मनोरंजन की अदालतें लगाकर टीआरपी बढ़ा ले गए और कुछ ने बढ़ती सामाजिक-राजनीतिक हिंसा के खाद पानी से अपनी खबरों की खेती की। उन्होंने इसी खेती में विचारों के लिए थोड़ी जगह बनाई लेकिन वह भी उन लोगों के लिए जो या तो उदारीकरण के हर हाल में हितरक्षक थे या फिर बहुसंख्यक समाज की संस्कृति पर आधारित राष्ट्रवाद के पैरोकार। यह सब अचानक नहीं हुआ है कि कई चैनलों पर एक ही विचारधारा के दो तिहाई प्रवक्ता एक साथ विराजमान रहते हैं। नवउदारवादी विचारों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से समझौता किया और एक तरफ सामाजिक परिवर्तन की धारा को रोक दिया तो दूसरी तरफ उपभोक्तावाद के विस्तार की नई जमीन तैयार कर ली। कम से कम वैश्वीकरण का हिंदुत्ववादी विरोध तो थम गया बल्कि उसने अपने एजेंडा पर काम करते हुए वैश्वीकरण के लिए रास्ता दे दिया। हालाँकि आज वही उदारीकरण गोरक्षा के नाम पर बढ़ने वाली आक्रामकता से झटके खा रहा है और प्रधानमंत्री को इस हद तक बयान देने को मजबूर कर रहा है कि गोली मारना है तो हमें मारो। चैनलों के आक्रामक दक्षिणपंथी रुझान की इसी प्रवृत्ति को मीडिया विशेषतः खबरों का फाक्सीकरण कहते हैं और इसी के प्रभाव में प्रिंट मीडिया भी आ गया। इसी प्रभाव के कारण कश्मीर में इलेक्ट्रानिक मीडिया एकतरफा रिपोर्टिंग कर रहा है और उसके बारे में वहाँ के आईएएस अधिकारी ने कहा भी है कि अगर भारत को अपने राष्ट्रवाद के विचार को कश्मीर में बचाना है तो उसे राष्ट्रीय मीडिया से छीन लेना चाहिए क्योंकि उसका सर्वाधिक नुकसान यही कर रहे हैं।

समाचारों के फाक्सीकरण की इस प्रक्रिया के साथ ही भारतीय और विशेषकर हिंदी समाचार पत्रों का टीवीकरण हुआ। हिंदी के पत्र हों या अँग्रेजी समेत अन्य भाषाओं के भी हों, वहाँ बौद्धिक उसे माना जाने लगा जो लगातार टीवी चैनल पर दिखता है। बौद्धिकता की कसौटी टीवी पर चढ़-चढ़कर बोलने की कला हो गई और तमाम अगंभीर किस्म के चैनलों के पैनलिस्ट अखबारों के स्तंभकार हो गए। इस प्रक्रिया ने भी हिंदी पत्रकारिता में वैचारिक संकट पैदा किया। यह उसी घटना का नया रूप था जब टेलीविजन चैनलों के शुरू होने के साथ धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, माधुरी और रविवार जैसी हिंदी की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने महाप्रयाण किया था। चैनलों के पैनलों से अखबार के पन्नों पर उतरने वाले बौद्धिकों ने सरोकार वाले बौद्धिकों को या तो लघु पत्रिकाओं की ओर ठेल दिया या फिर वे ब्लाग और फेसबुक पर चले गए। इस प्रक्रिया ने हिंदी पत्रकारिता में एक किस्म की बौद्धिक दरिद्रता को आमंत्रित किया। अब वह दारिद्रय एक फैशन हो गया है। नब्बे के दशक में हिंदी के दो संपादकाचार्यों ने तय किया कि वे संपादकीय पृष्ठ पर अनुदित लेख नहीं छापेंगे। लेकिन आजकल अनुदित लेख और बातचीत पर आधारित टिप्पणियाँ फैशन बन गई हैं। छपेगा वही जो टीवी पर दिखता है वह चाहे जो लिखे। यह स्थिति अँग्रेजी पत्रकारिता में भी है लेकिन वहाँ जगह इतनी है कि कमजोर पक्ष की भरपाई के लिए मजबूत पक्ष आ ही जाता है। जबकि हिंदी को मजबूती से डर लगता है। वह सोचती है कि कमजोर रह कर ही उसके बच्चों का गुजर हो सकता है और वह सफलता के उस महल में प्रवेश कर सकती है जिसका प्रवेश द्वार उसके लिए बंद है और जहाँ सिर्फ नाबदान का रास्ता खुला है। जिस रास्ते के पास इत्र लगे रुमालों के ठेले खड़े हैं। लोग नाक पर रुमाल रखकर नाबदान के रास्ते से महल में प्रवेश कर रहे हैं। शायद यहाँ परसाई जी (हरिशंकर परसाई) की तरह रोम-रोम में नाक रखने वाले कम हैं इसीलिए किसी को कोई झिझक नहीं है।


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