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कविता

अनजाने शहरों के बाशिंदे हो गए
आनंद वर्धन


अनचीन्ही गलियों में उलझे से खो गए

कितने ही रंगों के बिखरे थे सपने
दूर से बुलाते थे लगते थे अपने
मृगतृष्णा जैसा था रेतों का जंगल
पाँव जले नहीं मिला जल कोई शीतल
आँसू की लड़ियाँ ज्यों आँख में पिरो गए
अनजाने शहरों के बाशिंदे हो गए

कस्तूरी शावक सा मन भटका बन बन
मिली नहीं गंध कहीं मिला नहीं जीवन
छूट गए गाँव गली, पनघट, चौबारे
बिछुड़े हैं सगे सभी ढूँढ़ थके हारे
सपनों की धुँधली सी यादों में खो गए
अनजाने शहरों के बाशिंदे हो गए

ठहरे तालाबों को समझा था सागर
उनसे ही भर ली थी सपनों की गागर
रातों सी लंबी है बिसर गई बातें
लौट कहाँ आएँगी महकी बरसातें
आ न सके वापस घर गाँव छोड़ जो गए
अनजाने शहरों के बाशिंदे हो गए

देस छोड़ छोड़ यहाँ परदेसी आए
लेकिन वे हरदम परदेसी कहलाए
इंद्रधनुष छूने की सोच थी तुम्हारी
आशाएँ उचक उचक भटक भटक हारीं
तसवीरें मौन रहीं रंग सभी खो गए
अनजाने शहरों के बाशिंदे हो गए।

 


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