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कहानी

निर्वासिता
मधु कांकरिया


'हैलो! हैलो! हाँ! बोलो... बोलो!'

तुम्हारा फोन क्या आया, लगा कुछ तो वापस लौट आया है मेरा। जिंदगी कान में फुसफुसाई - लो मैं आ गई। बूँद-बूँद... पिघलने लगी बर्फ, उफ, गोला सा कुछ तो अटक गया या कि आवाज ही रुँध गई। शायद तुमने भी इसे महसूस..., तुम्हारे अंदर भी काँप रहा था कुछ। शायद भावनाओं की चाँदनी और अपराध बोध का मिलाजुला असर था, तुम बोले जैसे गहरे कुएँ से आई डूबती लटपटाती सी कोई आवाज... 'सॉरी ममा... तुम कुछ सँभले, कुछ रुके आखिर भावुकता का इजहार तुम्हें दुर्बलता की निशानी लगती और दुर्बल तुम थे नहीं, इसलिए जल्दी ही तुम असली बात पर आ गए थे। तुमने दो साल, सात महीने सत्ताईस दिन और दो हजार किलोमीटर की दूरी से हिचकते हुए कहा 'ममा, तुम दादी बनने जा रही हो'। क्या? इतनी खुशी? मैं गड़बड़ा गई।

ओह कितनी गलत थी मैं, सोचती थी कि अब कोई आवाज, कोई खुशी, कोई अहसास, कोई खबर छू नहीं पाएगी मुझे। पर जिंदगी की महक से भरी यह आवाज! भूल सकती हूँ कभी इसे?

बहुत देर तक तुम्हारी लहराती आवाज पहाड़ी हवाओं की तरह मन के खंडहर में मृदंग सी बजती रही। सॉरी ममा, तुमसे मिलने आ नहीं सका। कितना ताकतवर था वह क्षण जिसकी लपट में पिछला सब कुछ धुल-पुछ गया था। सब गिले-शिकवे चौखट के बाहर। उस क्षण का एक ही सत्य था - मैं और एक नन्हीं कोंपल जो हमारे बीच एक कोमल सा अहसास लेकर आ रही थी। उस एक महान क्षण के बाद से तो मेरी जिंदगी ही जैसे बदल गई थी। अड़ोस-पड़ोस, आसमान के चाँद-सितारे, बादल-बारिश और यहाँ तक की गली के कुत्तों-बिल्ली तक को खबर लग चुकी थी कि एक खूबसूरत घटना मेरी जिंदगी में घटने वाली है। मैं अब पूरी तरह दो मैं में बँट चुकी थी। एक मैं अभी-अभी उगे इस रिश्ते की पंखुड़ी-पंखुड़ी को सलीके से खोलने में लग गया था। दूसरा मैं उड़ता हुआ दूर जा पहुँचा उस सुबह जब तुमने पहली बार किसी विदेशी आसमान को छूने के लिए उड़ान भरी थी।

यह वह समय था जब भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर कैलीफोर्निया की सिलिकन वैली में कामयाबी की नई गाथाएँ लिख रहे थे। तुम्हें भी वहीं की किसी कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के लिए आमंत्रित किया गया था। पाँच साल, छह महीने और सत्रह दिन बाद तुम भारत लौटे थे और लौटते ही तुम्हारा तबादला मुंबई हो गया था। देखते-देखते तुम कामयाबी की बौछारों में भींगते चले गए और मैं आवाजों से दूर अपने ही रचे सन्नाटों में सूखती चली गई।

उसके बाद आज! सालों बाद आज तुम-तुम से लगे। सचमुच का बुलावा, सचमुच के तुम। लगा संभावनाओं ने अभी तक पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ा है।

दादी होने के अहसास ने मुझे एक स्वप्न का गुलाम बना दिया था और गुलाम कभी शांति से जी नहीं सकता है। इसलिए हर पल मैं अपने स्वप्न के भविष्य की नोक पलक सँवारने में लगी रहती। हरपल मेरे भीतर इंतजार उगता रहता। इंतजार - एक नन्हें ईश्वर का जो मुझे मेरे अंश के साथ जोड़ने वाला था।

और एक दिन रिश्तों की पिछली मटमैली छाया को धो-पोंछकर मैं तुम्हारे यहाँ। अचानक... अप्रत्याशित... मुझे देख तुम बहुत खुश हुए।

सूर्य किरणों की रोशनी में तुम्हारी खुशी, तुम्हारी कोमल हँसी झिलमिलाई!

खुशी के रंगों से भरी तुम्हारी आवाज, 'अब मत जाना ममा, बहुत अकेली रह चुकी हो, तुम्हारा दिल भी यहाँ बहला रहेगा और ऋचा को भी हेल्प मिल जाएगी। लगा अरब सागर की सारी नमकीन हवाएँ जैसे बहते हुए हमारे घर ही चली आई थी। मैं सचमुच बहुत खुश थी कि वक्त ने तुम्हारी आत्मा पर जो गर्दिश उगा दी थी वह झड़ गई थी। आखिर थे तो तुम मेरा ही खून, एक सर्वथा आत्मकेंद्रित जिंदगी कैसे जी सकते थे?

तुम्हारे यहाँ हर दिन जीवन का नया अविष्कार हो रहा था। हर शाम मेरे पास एक नई कहानी होती और उसे सुनाने को बेताब होती मेरी आत्मा। तुम्हारे घर में काम करने वाली बाइयाँ और उनकी दुनिया। हर दिन मेरी दुनिया में नए झरोखें खुल रहे थे। मैं हैरान थी यह जानकर कि तुम्हारी सोसाइटी में मुस्लिम बाइयाँ हिंदू नाम रखकर काम करती थी। नसरीन निशा बनी हुई थी, नूर बानू नीरा और जीनत खुद को जया बता रही थी। मैंने देखा कि दुल्हन के हार की तरह जगमगाती इसी मुंबई से बस ५० किलोमीटर की दूरी पर ही एक ऐसी अँधेरी, अभावों से पटी, सूखे जिस्मों, भूखे-नंगे और मैले कुचले लोगों से भरी मुंबई थी जहाँ हर साँस दहशत से भरी थी, जहाँ हर पाँव में छाला और हर हथेली में गट्टा बने हुए थे जहाँ हर रात एक उचटी हुई नींद थी। जहाँ महीने भर पहले ही एक ही परिवार के दो सदस्यों की मौत आधे घंटे के भीतर ही सिर्फ इस कारण से हो गई थी कि उनके घर में रोशनी का एक कतरा भी नहीं था। घटना पाताचापानी गाँव की थी जो कि मुंबई-मंत्रालय से महज ५० किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ी पर बसा छोटा सा गाँव था जहाँ वर्ली जाति के आदिवासी रहते थे। एक शाम मूँज की खटिया पर सभी सोए हुए थे कि परिवार के मुखिया के ऊपर झाड़ियों से सरसराता हुआ साँप चढ़ गया। दर्द से बिलबिलाते हुए उसने हाथ को झटका। अँधेरे में उसे कुछ दिखा नहीं। साँप पास में ही लेटी उसकी बेटी पर गिरा। बेटी चीखी। आसपास के लोग दौड़े हुए आए। खौफ जगाते और हिंसक जानवरों से भरे, रात के साँय-साँय करते नीले काले अँधेरे में, मशाल के सहारे वे जब तक साँप का विष निकालने वाले ओझा गुणी को लाते दोनो ही नीले पड़ चुके थे।

इस घटना ने मेरे दिमाग में इतना असर डाला कि मैंने घर की सारी अनावश्यक बत्तियों को बंद कर दिया। क्या जरूरत है तेज रोशनियों के इस इंद्रजाल की? ड्राइंग रूम में एक हल्की ट्यूबलाइट ही काफी है। किचन और मेरे अपने कमरे की बत्तियाँ भी बुझा दी मैंने, क्या जरूरत है, बाहर से तो रोशनी आ ही रही है। ऋचा का कमरा बंद था इसलिए वह जैसा था वैसा ही रहा। जैसे ही तुम ऑफिस से लौटे तुम्हारे माथे पर तीन सिलवटें पड़ी, ममा इतना अँधेरा सा क्यों है, कोई फेज उड़ गया है क्या? कितना डिप्रेसिंग लगता है यह अँधेरा। मैं चालू हो गई - जानते हो बेटा, यहाँ मुंबई से ही महज थोड़ी ही दूर पर दो जानें सिर्फ इसलिए चली गई कि उनके घर के पास रोशनी का कोई मरियल सा कतरा भी नहीं था।' और साँस रोक कर मैंने सारी घटना तुम्हें कह सुनाई इस उम्मीद में कि शायद तुम भी कुछ सोचो।

मेरी बातों को तुमने सुना, चबाया और फिर च्यूंगम की तरह थूकते हुए बोले - रिलेक्स ममा, ऑफिस से आया हूँ, दिन भर में यूँ ही हजारों तनावों से गुजरता हूँ, कभी बॉस की फटकार, कभी रिपोर्टी का लापरवाही का रवैया, कभी ऋचा से झिकझिक, कभी ट्रैफिक जाम, कभी बारिश कभी, चिलचिलाती धूप, कभी सेल्स टार्गेट का दबाब। पिछले कई महीने से कंपनी घाटे में चल रही है सो अलग। माथा यूँ ही भन्नाया रहता है। कुछ हल्की-फुल्की बात करो। कुछ हँसी-खुशी की बात करों। कहाँ की साँप काटने की बात लेकर बैठ गई तुम भी।

क्या? मैं फुँक गई। साँस फूलने लगी मेरी। उड़ती सी एक नजर डाली तुम पर थकान के बादलों से घिरा तुम्हारा चेहरा, असमय ही उड़ते बाल, कंप्यूटर पर निरंतर झुकते रहने के कारण पीठ का स्थायी दर्द... सच मुझे आते ही यह सब नहीं कहना था। आगे से सावधान! फालतू बिल्ली की तरह मन को समझाया मैंने। लेकिन भीतर से एक दुबली सी आह भी निकली। ओह! तुमको कंपनी लग गई है जिसके घाटे की इतनी चिंता है, पर जीवन घाटे में जा रहा है इसकी कोई चिंता नहीं है?

हिम्मत जुटा फिर आती हूँ तुम्हारे पास, बेटा छोड़ क्यों नहीं देते ऐसी नौकरी जो हमेशा तनाव में रखे तुम्हें।'

उजबक की तरह मेरे चेहरे को देखने लगे तुम जैसे सोच रहे हो कि किन शब्दों में मुझ कूढ़मगज को समझाया जाए। फिर शब्द-शब्द को चबा-चबा कर बोले, 'ममा, जहाँ भी जाऊँगा मुझे पैसा और पॉवर दोनों की लड़ाई लड़नी ही पड़ेगी, क्योंकि मुझे दोनों ही चाहिए' 'पॉवर लेकर भी क्या पा लोगे यदि जीवन में जीवन ही नहीं रहा' मैंने उसे कहा नहीं, कहना जरूर चाहती, उखाड़ थी, पर तब तक उसकी पुतलियों के रंग बदल चुके थे और मैं डर की गिरफ्त में आ चुकी थी।

रात सो नहीं पाती, छोटी सी नींद, बड़ी सी रात। रात भीतर रात, कई-कई रात। स्याह रात। आँखें बंद करती हूँ...। अँधेरा, दिखने लगती हैं दुलारी की लाल-लाल आँखें (जिसके पति और बेटी दोनों सर्प-दंश से मर गए थे), यदि कुछ नहीं किया गया तो उन आँखों की आग भस्म कर देगी दुनिया को। खोलती हूँ... अँधेरा। सब चल रहे हैं इसी अँधेरे में। कहीं समृद्धि का अँधेरा, कहीं गरीबी का। थक गई हूँ इस अँधेरे में अपने स्व को खोजते-बचाते। खुद को ढीला छोड़ देती हूँ। पल भर के लिए लगती है आँख, लगता है स्वप्न-स्वप्न भीतर स्वप्न देखती हूँ स्वप्न कि अब मैं कभी बूढ़ी नहीं होऊँगी क्योंकि मैं स्वप्न देखने लगी हूँ। स्वप्न एक नन्हें के आगमन का जो फिर से जोड़ेगा मुझे मेरे अंश से।

महीना, दो महीना, तीन चार... देखते-देखते सात मास बीत गए। अमूनन मैं पूजा पाठ में यकीन नहीं करती, लेकिन मैं चाहती थी कि मातृत्व और भ्रूण की मंगल कामना के लिए यदि ऋचा की सहमति हो तो ऋचा का सतमासा पूजा जाए, मैंने हिम्मत कर कहा भी पर तुम्हें यह सब पाखंड लगता। नीली रेशमी टाई की गाँठ को ढीला करते हुए तुम झल्लाए, भ्रूण हत्याओं वाले इस देश में सतमासा पूजन? इससे बढ़कर पाखंड और क्या होगा? मैंने समझना चाहा - इस भटके हुए देश में यह बताने की जरूरत और भी ज्यादा है कि औरत की कोख से छेड़खानी कर हम सिर्फ तबाही को ही न्योता दे सकते हैं।

तुमने इस तरह देखा मुझे जैसे जाने किस अजूबा से पाला पड़ गया हो और शब्दों को पत्थरों की तरह फेंकने लगे मुझ पर। 'तो इसके लिए पूजा का बहाना क्यों?'

'क्योंकि यहाँ के लोगों को पूजा की भाषा ही ज्यादा समझ में आती है। इस पूजा के द्वारा... मैं कहना बहुत कुछ चाहती थी, पर कहती किससे? इन सब बातों के लिए ठहर कर बैठना जरूरी था, पर तुम बैठना भूल चुके थे, तुम्हें दौड़ने की खुजली थी।

बोलने को बेताब मेरी आत्मा फड़फड़ाई। काश मिल जाता कोई बिल्ली का बच्चा तो बतिया लेती उसी से!

फिर एक सुबह सी सुबह। पत्तियों पर बजती बारिश और उससे उठता अद्भुत संगीत। जल्दी उठ गए थे तुम। अद्भुत रूप से शांत दिख रहे थे। जैसे समाधि से उठे हो। शांत, निर्विकार! दूर कहीं कोई चिड़िया चहचहा रही थी। एक चिड़िया मेरे भीतर भी चहचहा रही थी। मैंने तुरंत ही घर के बनाए मसाले की चाय तैयार की तुम्हारे लिए। बहुत पसंद आई तुम्हें, खिली-खिली निगाहों से मुझे देखते हुए कहा तुमने 'ममा, मैं तो इतनी मसालेदार चाय का स्वाद ही भूल गया था।' तुम्हारे शार्ट्स पर बिस्किट का चूरा बिखर गया था। उसे हाथों से झाड़ते हुए बोले तुम। तुम्हारा खिला-खिला चेहरा देख मैं फिर वही हो गई। पिछले सप्ताह ही मैंने फिर एक नया दुस्साहस किया था। अकेले ही फिर अरेरा कॉलोनी निकल गई थी। मैं अपने अनुभव तुम्हें सुनाने को बेताब थी। बस ढूँढ़ रही थी एक मुकम्मल मौका, जो मुझे आज मिल ही गया था।

मैंने फिर ध्यान से पढ़ा तुम्हारा चेहरा, हर कोने-अंतरे से पढ़ा, दाखिल हुई तुम्हारे भीतर...। लगा सब ठीक ही चल रहा है, तुम खुश थे, सब कुछ सुरताल में बह रहा था। उस दिन की तरह थकान या तनाव का नामोनिशान नहीं था तुम्हारे चेहरे पर। आज मैं 'सेफ्टी जोन' में हूँ। सँभल-सँभलकर कहना शुरू किया मैंने, 'बेटा क्या तुम जानते हो कि यहाँ से महज ६० किलोमीटर दूर एक बच्ची को शाम के झुटपुटे में तेंदुआ उठाकर ले गया, यहीं अरेरा कॉलोनी के पास, संजय गाँधी नॅशनल पार्क से जुड़ा एक गाँव है वहीं की घटना है यह। माँ रोटी बना रही थी और बच्ची सामने ही आँगन में खेल रही थी, पीछे झाड़ियों से आया तेंदुआ और हल्के अँधेरे का फायदा उठा खींच ले गया उसे। गाँव वाले जब तक पीछा किए, आधे से ज्यादा हिस्सा खा चुका था वह बच्ची का। यहाँ के आदिवासियों का कहना है कि जो तेंदुआ उनकी लड़की को उठा के ले गया था वह बाहर से लाया तेंदुआ था जिसे वन विभाग टूरिस्म बढ़ाने के लिए लाता रहता है। यहाँ के पले बढ़े जानवर हमें पहचानते हैं, सदियों से हम साथ-साथ रह रहे हैं। वे हम पर कभी हमला नहीं करते हैं। हमें देखकर भी साइड से निकल जाते हैं। बहुत ही नारकीय हालातों में रह रहे हैं ये ५६ गाँव के आदिवासी। फिर भी ये यह नहीं चाहते हैं कि बाघ और तेंदुए जैसे हिंसक जानवरों को खुले जंगलों से निकाल उनकी घेराबंदी की जाए, दत्तु तादेकर, जिनकी बच्ची को तेंदुआ उठाकर ले गया, वे तक कहते हैं कि घेराबंदी से इन जानवरों को तकलीफ होगी, हम तो सिर्फ यह चाहते हैं कि हमारे उन गाँवों को सुरक्षित कर दिया जाए जो जंगलों के अंदर नहीं बल्कि किनारे-किनारे हैं, गुस्सा सरकार पर है जो दोनों की जिंदगी और अजादी से खेल रही है। मेधा पाटकर हैं इनके साथ। क्या तुम लोग इनके लिए कुछ नही...।

बात मैं कायदे से पूरी भी नहीं कर पाई थी कि तुम्हारे चेहरे का रंग बदला, आँखों में लपट सी कुछ उठी, पुतलियों के रंग बदल गए। अपने सूखे ओठों पर जीभ फेरते हुए कुछ तल्ख कुछ डूबते स्वर में तुम फनफनाए, 'ऊफ ममा, रिलेक्स! सुबह ही सुबह इतनी डिप्रेसिंग बातें क्यों करती हो। खुश रहा करो ना! चिल करो' और चाय का प्याला अधूरा छोड़ झल्लाकर चले गए।

क्या? एक हँसते खेलते बच्चे को तेंदुआ उठाकर ले गया और यह कह रहा है चिल करो, किस दुनिया में हूँ मैं? क्या संवेदना की सारी ही टहनियाँ टूट गई? क्या यह है मेरा अंश? आज महसूस हुआ भूख और मौत के बाद संसार का सबसे बड़ा दुख है अपने अंश को बेअंश होते हुए देखना।

दिमाग सुन्न! मन मलवा! बैठी रही अवाक। जैसे सदियों से यूँ ही बैठी हूँ - सहमी, अपमानित... और युग फड़फड़ाते हुए निकल रहे हैं मेरे ऊपर से, सन्निपात के रोगी की तरह बड़बड़ाने लगी मैं, ऑफिस से आते ही नहीं बोलूँ, सुबह नहीं बोलूँ, शाम नहीं बोलूँ, तो फिर कब बोलूँ? लोगों के जीवन की दारुण त्रासदी पर बोलना क्या डिप्रेसिंग बोलना हो गया?

सवाल नहीं सवालों के गुच्छे उगने लगे भीतर।

आँखें मूँद लंबी-लंबी साँस खींचने लगी मैं।

थकी उम्र और बंद आँखों के आगे बादल के टुकड़ों सा तैर जाता है अतीत की स्मृतियों का एक टुकड़ा। राँची से कुछ दूर गुमला जिले के कुछ गाँवों में आदिवासी कल्याण आश्रम नामक संस्था के साथ आदिवासी और वन-जीवन समझने के लिए चली गई थी। तुम भी साथ में थे मेरे। वहीं पछरुवा गाँव में ठंड से ठिठुरती कुछ अर्द्धनग्न ठिठरियों को देख तुम इतने द्रवित हुए थे कि जैसे ही हम वापस लौटे अपने घर, मैंने देखा तुम मेरी अलमारी के सामने खड़े थे। मैंने समझा तुम्हें पैसे चाहिए, मैंने पूछा क्या चाहिए? तुमने हकलाते हुए कहा, ममा मुझे कुछ साड़ियाँ चाहिए। क्या? मैं तो सोच भी नहीं सकती थी ऐसा जवाब तब तुम महज दस साल के थे। तुम्हें सहला-पुचका कर पूछा तो जाना कि तुम्हें साड़ियाँ चाहिए थीं उन नंगी ठिठरियों के लिए।

बहुत दिनों तक मैं खुद को कोसती रही थी, मुझे नहीं ले जाना था तुम्हें वहाँ। पांखुरी से भी कोमल तुम्हारे मन पर अनजाने ही जाने कितनी खरोंचें डाल दी थी मैंने।

वही तुम! आज कह रहे हो 'चिल करो...'

इतनी ऊँची शिक्षा, इतनी प्रतिभा और सिर्फ पेट के दायरे में सिमटा जीवन? तुम रोशनी के फरिश्ते बन सकते थे पर क्या बन गए? किसने बदल दिया तुम्हें इतना? कहाँ गया वह मन जिसकी एक-एक पांखुरी को कितने सलीके से खोला था मैंने? ठंडी होती चाय को देखती रही। पीने की इच्छा ही जैसे मर गई थी।

थोड़ी देर बाद तुम लौटे, अधपीयी चाय खत्म कर थोड़े करीब आए, मेरी आँखों में झाँका, आँखों की कोरों में अटके आँसुओं ने जाने क्या कहा कि तुम्हारे भीतर भी कुछ तो पिघला, मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए भापदार शब्दों में बोले, 'ममा, कितना कुछ तो है घर में फिर भी तुम खुश क्यों नहीं रह पाती? कुछ तो टॅबू है तुम्हारे दिमाग में जो तुम्हें खुश रहने से रोकता है। मेरा दोस्त कहता है कि हम मिडिल क्लास भारतीयों का दिमाग है ही ऐसा कि हम खुशी भी खुलकर नहीं मना पाते उसमें भी हमें गिल्ट फीलिंग होती है। तुम अपने को ही देखो ममा, दुखी रहते-रहते शायद तुम्हारी दुखी रहने की आदत ही हो गई है। आसमान से दुख बटोर लाती हो तुम भी।

ओह नो! ठंडे पसीने से नहा जाती हूँ मैं। कैसे समझाऊँ, कैसे समझाऊँ तुम्हें कि मैं इसलिए दुखी हूँ कि एक धरती और योनि में जन्म लेने के संबंध बहुत गहरे होते है। पर... तुम नहीं समझोगे? बोलना चाहकर भी बोल नहीं पाती कुछ, गले से जाने कैसी तो गो-गो... की आवाज निकलने लगती है। चेहरे पर जबरन ओढ़ी मुस्कान अड़ियल बच्चे की तरह हाथ छुड़ाकर भाग खड़ी होती है। अपमान की कालिमा से काले पड़े मेरे चेहरे को देख तरस आ जाता है तुम्हें, पुचकारते हुए कहते हो तुम, 'सेंटी हो गई ममा, बुरा मान गई मेरी बात का।'

आँखों में उभरी हताशा और आक्रोश की बाढ़ को जबरन रोकती हुई मैं किचन की ओर खिसक जाती हूँ, जाने कितनी बार किचन और बाथरूम बने हैं मेरे शरण स्थल-मन ही मन कहती हूँ, बुरा मानने की विलासिता हमारे हिस्से कहाँ? वैसे भी हम हिंदुस्तानी औरतों की खाल इस उम्र तक आते-आते इतनी मोटी हो जाती है कि इतने छोटे-मोटे अपमान हमारे ऊपर से गुजर भर जाते हैं, हमारी आत्मा को जख्म नहीं दे पाते। तुम्हारे भीतर फिर कुछ पिघला, इसलिए फिर खुशामदी पर उतर आए तुम। चाय की प्याली को सिंक में रख मुस्कान बिखेरते हुए दोस्तानी आवाज में बोले, 'एक बात बताओ ममा, मुझे यहाँ रहते-रहते चार साल होने आए, मुझे अरेरा कॉलोनी के बारे में पता तक नहीं, तुम्हें कहाँ से पता चल जाता है इतना?'

मैं भी पिघली, लेकिन जब्त कर रखा मैंने खुद को - हे मन मेरे! यह निमंत्रण बात आगे बढ़ाने का नहीं है वरन हो चुकी बात के साइड एफेक्ट को काम करने का है, जिससे थोड़ी बहुत जो भी साझी दुनिया है हमारी वह निर्विघ्न चलती रहे।

फिर एक चमकता दिन...। फुर्सत की चादर और उसमें दुबकी मैं!

आज ऑफिस से पहली बार सीटी बजाते-बजाते आते देखा तुम्हें। शायद तुम्हारे सेल्स टार्गेट पूरे हो गए थे इस कारण बहुत खुश नजर आ रहे थे तुम। आते ही चहके तुम, 'आज मैं एक ऐसे रेस्टोरेंट में गया जहाँ वन हंड्रेड ट्वेंटी तरह के डोसे थे, पचास तरह की चॉकलेट थी।' ऋचा ने कहा। 'हमें भी वहाँ ले चलो।' ऋचा से निपटकर तुम फिर मेरी मनुहार करने में लग गए, 'चलो ममा, इतने दिन हुए तुम्हें मुंबई आए हुए, अभी तक कहीं घुमा ही नहीं पाया, चलो आज चौपाटी घूम आते हैं... मैं निहाल... पौने तीन साल हुआ था ऋचा को घर की बहू बने, आज पहली बार उसके साथ बाहर घूमने के लिए निकल रही थी मैं। धूप के साए थोड़े सिमटे तो हम निकले। गाड़ी में म्यूजिक चलता रहा। एकाएक तुमने देश के राजनीतिक क्षितिज पर अन्ना आंदोलन से नए-नए उभरे नेता अरविंद केजरीवाल पर कुछ टिप्पणी की, मैं उससे सहमत नहीं थी। भीतर लहर उठी, तुम्हारा प्रतिवाद करूँ पर मैं चुप रही। बैल बना लिया खुद को। अनुभव ने सिखला दिया है कि बैल बन जाओ तो बहुत से बेमतलब के दुख भाग खड़े होते हैं।

जूहू चौपाटी! समुद्र! लहरें! आवाजें! उड़ते परिंदे! खिलखिलाते बच्चे! प्यार करते जोड़े! हाथों में गुँथे हाथों वाले जोड़ों को देख तुमने भी ऋचा का हाथ होले से अपने हाथों में थाम लिया था। मेरी हथेलियाँ अचानक शुष्क होने लगी थी। भीतर कुछ कुलबुलाने लगा। पीठ का दर्द चिलक उठा। हाथों से ध्यान हटा मैं आसमान में खरामा-खरामा उड़ती गुब्बारे में कैद लालटेनें देखने लगी और सोचने लगी कि मैं आज कुछ भी नहीं बोलूँगी, जाने क्या है कि जब भी मैं बोलती हूँ मेरे भीतर से दुख-दर्द ही बोलते हैं और तुम्हारे अच्छे भले मूड पर कैंची चल जाती है। मैं सतर्क रही कि मैं आज कुछ भी नहीं बोलूँगी, एक चुप सौ सुख!

मैं बहुत देर से चुप ही थी, तुम कई बार कह भी चुके थे, 'अम्मा क्या मौन धारण है'? थोड़ी देर बाद फिर कहा तुमने, 'अम्मा कुछ तो बोलो'। अब नहीं बोलने का मतलब था अपनी नाराजगी दिखाना। यूँ भी बोलने के लिए तरसती मेरी रूह को तुमने क्या सहलाया झर-झर टपकने लगे शब्द जैसे झरते हैं पत्ते पतझड़ में पेड़ से। पिछले दिनों ही मैंने मलेशिया के कबीलों पर एक अद्भुत किताब पढ़ी थी। क्यों न उसी के बारे में बात करूँ। इसमें कुछ भी ऐसा नहीं था जो तुममें अपराध बोध पैदा कर तुम्हारे सुख सुहाग को मलीन करता। मैंने बहुत सावधानी से एक खूबसूरत बात उनकी तुम्हें बताई, 'जानते हो बेटा मलेशिया में एक कबीला है, 'सिनोई कबीला'। इस कबीले के लोगों के बीच एक विचित्र नियम है कि सुबह उठते ही परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठते हैं और पिछली रात देखे गए अपने स्वप्नों को सबके सामने कहते हैं। फिर वे इन स्वप्नों की व्याख्या करते हैं। वे मानते हैं कि ये स्वप्न उन्हें पूर्वजों से जोड़ते हैं और पूर्वज इन स्वप्नों के माध्यम से उन्हे उनके जीवन के निष्कर्ष और आने वाली समस्याओं का समाधान और आने वाले दुख का निदान सुझाते हैं। इसलिए सब सामूहिक रूप से उस दिन की योजना तय करते हैं। मैंने यह भी जोड़ा कि बहुत पहले मैंने स्वप्न देखा था कि लोग नमक का स्वाद ही भूल गए हैं, भर भर मुट्ठी नमक मिला रहे हैं खाने में पर खाना वैसा ही नमकहीन और बेस्वाद बना हुआ है। अब बताओ इस स्वप्न की क्या व्याख्या हो सकती है? क्या संकेत दे सकता है यह स्वप्न? अपनी बात समाप्त कर मैंने बड़ी हसरत से देखा तुम्हारी ओर। इस बार तो शर्तिया तुम खुश होंगे, कितनी विचित्र बात मैंने बताई थी तुम्हें। पर कुछ पल तुम्हारा चेहरा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह भावहीन बना रहा। फिर तुम झुंझलाए, छोटी सी उबासी लेते हुए सूखी आवाज में मेरी बहकती बातों पर एक दहकती टिप्पणी जड़ते हुए बोले, 'ममा यार, कहाँ पहुँच गई तुम भी? मलेशिया! अरे अपने घर और अपने देश की बातें खत्म हो गई क्या, नॉर्मल आदमी की तरह स्वादिष्ट बात क्यों नहीं करती ममा, खाना तो इतना स्वादिष्ट बना लेती हो। बोलते हुए तुम अपने रीबोक के जूते में लगी समुद्री बालू को जोर-जोर से झाड़ने लगे थे, जैसे मेरे विचारों को झाड़ रहे हो।

लो फिर क्या हो गया? इस बार क्यों चिढ़े तुम?

माजरा क्या है? कुछ भी बोलूँ पासा उल्टा ही पड़ता है?

पानी में डोलती परछाईं की तरह क्या फिर पकड़ नहीं पाई तुम्हारे मन को?

कानी नजर से देखती हूँ, ऋचा तो नहीं कहीं आस-पास? चल रही हूँ, मुस्कान को ढीठ की तरह चेहरे पर ओढ़े, साथ-साथ चलता जा रहा है अँधेरा। हीरामन की तरह तीसरी कसम खा लेती हूँ, जो भी हो जाए अब कभी नहीं बोलूँगी इससे, सिवाय जरूरी बातों के, कि दूसरे दिन ही टूट जाती है कसम। तुम्हारे दोस्त की माँ की मृत्यु हो जाती है। उन दिनों नेत्रदान करवाने का भूत सवार था मुझ पर। अभी तक चार परिवारों में नेत्रदान करवा भी चुकी थी। यह मौका खोना नहीं चाहती थी। इस कारण निर्लज्ज-ढीठ बच्चे की तरह फिर आई तुम्हारे पास। सुना है तुम्हारे दोस्त की माँ की मृत्यु हो गई है। तुमने गर्दन हिलाई, मुलामियत से देखा मेरी ओर, मेरा साहस लौटा। झिझकते स्वर में अपनी आवाज के एक-एक टुकड़े को जतन से जोड़ते हुए फरियाद की, 'बेटा, मैं चाहती हूँ कि तुम आगे बढ़कर उनके नेत्रदान के लिए पहल करो।'

तुम्हारे भाव फिर पलटे। माथे पर सिलवटें गहराई। कठोर नेत्रों से ताका तुमने मेरी तरफ, 'ऊफ ममा, कितना बोलती हो तुम भी, कुछ भी बोलती रहती हो, यह तो सोचो कि उस महिला ने जिंदगी में बहुत कष्ट झेला है अब शांति से क्या उन्हें मरने भी नहीं दें, मरने के बाद भी उनकी चीर-फाड़ करें। और यह भी तो सोचो, ऐसे गमगीन मौके पर बोलूँ भी तो कैसे? क्या सोचेंगे उनके घरवाले मेरे लिए? आक्रोश, परेशानी और खिन्नता के मिले जुले ये टुकड़े तुम्हारी आवाज से तारों की तरह टूटे थे।

टहनी सी फिर टूटी मैं। क्या कुछ गलत कह दिया मैंने? क्या दिमाग ठीक काम नहीं कर रहा मेरा? क्या मेरी सोच पर कोहरा छाया हुआ है? कहाँ तो पढ़ा था कि शादी होते ही औरत की अक्ल का एक तिहाई घास चरने चला जाता है और बच्चों के बड़ा होते ही बचा एक तिहाई खुद घर छोड़ भाग जाता है। तो क्या मैं सिर्फ बचे-खुचे एक तिहाई अक्ल से काम कर रही हूँ?

'अरे, इसमें बुरा क्या है और कौन जाने उनके बेटों में सद्‌बुद्धि आ जाएँ और तैयार हो जाए वे नेत्रदान के लिए तो दो आदमियों की दुनिया रोशन हो जाए।' रोक नहीं पाती खुद को, चूहे की तरह धड़कते दिल को थाम आखिर बोल ही देती हूँ।

इस बार चोले से बाहर निकल आए तुम 'ममा प्लीज, क्यों भेजा फ्राई करती हो अपना? क्यों हमारे मामले में दखलंदाजी करती हो? आने वाले बच्चे की सोचो, माँ हो घर की खुशहाली की सोचो। दादी बनने की सोचो और खुश रहो' आवाज में खीज, विद्रोह और असंतोष की मिली जुली छायाएँ मचल उठी थी।

क्या कहा? मैं सिर्फ बच्चे के लिए ही सोचूँ, पीड़ित मानवता के लिए नहीं...।

लगा जैसे घर की छत एकाएक टूट कर गिर गई है मुझ पर!

नहीं, यह मेरी दुनिया नहीं, यह मेरी रचना नहीं, यह मेरा अंश नहीं! नहीं जी पाऊँगी मैं इस भावशून्यता की बदबू में!

क्या मेरे होने में ही है ऐसा कुछ जो प्रेरित करता है कि मैं कुछ नहीं बोलूँ और बोलूँ तो भी सिर्फ बेटे-पोते, गहने-कपड़े, जेली, आचार, मुरब्बा के कोकून में ही बंद रहूँ? व्यतीत के धुँधल के से धुँधला जाती है आँखें, झाँकने लगता है एक और चेहरा, जिसे जाने कब बहा दिया था मैंने समुद्र की उत्ताल लहरों के बीच, जब भी घर गृहस्थी से इतर बात करना चाहती, झल्ला जाता वह चेहरा, 'उफ कितना बोलती हो तुम भी। चुप रहते-रहते लगता था कि ओंठ ही चिपक गए हैं मेरे। लगता मेरी धमनियों में खून नहीं शब्द और शब्द ही बह रहे हैं, बाहर आने को बेताब अनकहे शब्द!

नहीं, तुम मेरे नहीं अपने पापा का ही अंश हो। वे ही बह रहे हैं तुममें। मैंने समझा था कि उस अतीत को मैंने समुद्र में बहा दिया है, पर आज समझी जीवन अपने साथ बहाकर कुछ भी नहीं ले जाता, लौटा लाता है बार-बार, समुद्री लहरों की तरह। तुम कहते हो कि मैं माँ हूँ इसलिए सिर्फ अपने घर की खुशहाली के लिए ही सोचूँ पर इतना याद रखना मेरे बच्चे कि जिस दिन माँएँ पूरी धरती की माँएँ बन जाएँगी, दुनिया की तसवीर बदल जाएगी।

बढ़ते वक्त के साथ फैलने लगती है खामोशी। अपने ही खोल में बंद पोटली सी पड़ी मेरी काया दिन पर दिन सिकुड़ने लगती है। डुबा देती हूँ खुद को पूरी तरह किताबों में। आखिर ये ही हैं मेरी सच्ची साथी। नपी-तुली बातें तुम से खाना लगा दूँ? चाय बना दूँ? कब तक आओगे? ऋचा को ले जाऊँ चेक अप के लिए?

दार्शनिकता की चादर में दुबका देती हूँ खुद को। ऐसे ही झटके दिखा देते हैं विराट। वेदों में लिखा है 'पुत्र से बढ़कर कोई शत्रु नहीं', उपनिषद में लिखा है, प्रियं त्वां रौस्य़सि (तुम्हारा पुत्र ही रुलाएगा तुमको)। यदि मेरे लिए कोई कल हुआ तो नहीं रहूँगी इस कॅप्सुल घर में। साँझ की धूप सी सरक जाऊँगी, निःशब्द, खामोश। टकराऊँगी लहरों से, लेकिन इस माटी में खुद को नहीं रोपूँगी। बस एक बार निपट जाए ऋचा की डिलिवरी। दुनिया बहुत बड़ी है।

शांत, खामोश और बोरियत से भरे दिन गर्म हवाओं की तरह गुजर रहे हैं। गिनगिन कर गुजार रही हूँ दिन, कब आएगी ड्यु डेट ऋचा की? सब कुछ अच्छे से निपट जाए।

एक दिन झुँझला कर खींच लेते हो तुम किताब मेरी - क्या ममा, दिन भर किताब में ही डूबी रहती हो? कुछ बोलती ही नहीं, पास बैठो। मुझसे कुछ बात करो। देखो, तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ। खिड़की के बाहर खड़े पलाश के पेड़ों के हरियाले पत्तों से हटकर नजरें तुम पर टिक जाती है। तुम्हारी आँखों में वैसी ही जिद, वैसी ही बेबसी, वैसा ही प्यार, वैसा ही उतावलापन है जैसा दूर बचपन में तुम्हारी आँखों में झलकता था जब मैं कपड़े धोने में मशगूल रहती थी और तुम छीन लेते थे मेरे हाथ से साबुन - पहले मुझसे बात करो।

मैं फिर वही हो जाती हूँ। निहाल! गद्गद! भीतर जाने क्या पिघलता है कि डबडबा जाती हैं आँखें। आँसुओं के झिलमिलाते पर्दों से देखती हूँ तुम्हें, वैसा ही भोलापन आँखों में, वैसी ही भरे बादलों सी नेह भरी निश्छल आँखें? क्या मैं ही पकड़ नहीं पाती तुम्हारे व्यक्तित्व के रेशों को जो सेमल के फूलों की तरह उड़ते रहते हैं दिन भर? क्या नौकरी का तनाव बदल रहा है तुम्हारा व्यक्तित्व? इस महीने नंबर पूरे हो गए थे तुम्हारे। क्या इसीलिए नजर आ रहे हो इतने खुश? तुमसे दूर रहकर क्या मैं खुद एक शून्य में नहीं बदल जाऊँगी? जी पाऊँगी? तुम्हारी गुनगुनी आवाज का यह टुकड़ा 'मुझसे कुछ बात करो' चैन से बैठने देगा मुझे कहीं भी? फुदकेगा नहीं मेरे आसपास? पर तभी भीतर कहीं गहरे से उठती है एक और आवाज, उतनी ही तेज - जिन पेड़ों को छोड़ आए उनकी छायाओं के लिए क्यों लौटना? कोई भी शून्य स्थायी नहीं रहता, जीवन और प्रकृति देर सबेर भर ही देते हैं किसी भी शून्य को। मुझे वहाँ जाना है जहाँ चहक सकूँ, बाँट सकूँ खुद को रेशा-रेशा।

उफनती समुद्री लहरों की तरह टकरा रहीं हैं दोनों आवाजें। मन के कूल किनारों से।


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