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कहानी

बुलंद हस्तियों के बीच एक शाम
मधु कांकरिया


वाकया उन दिनों का जब महानगर मुंबई को धीरे-धीरे सोचने, खोजने और समझने में लगा था मैं। वे दरअसल मेरे अंडे से बाहर निकलने के दिन थे। इसलिए हर शाम मैं अपने दड़बे से बाहर निकलता और जब भी बाहर निकलता, आंटी को अँग्रेजी के एल अकार के बने सोसाइटी के प्रांगन में ढेरों नीम, पीपल, चंपा, चमेंली और गंधराज के पेड़ों से घिरे लंबे से लॉन में टहलते हुए देखता था। अपने समय के अँधेरों से घिरे लोगों के बीच भी आंटी अपने में ही रमी रहती थी, खोई सी, गुनगुनाती सी। कभी फ्रेम (बच्चों की गाड़ी) में बैठे गोल गदराए खूबसूरत बच्चों को निहारती जिन्हें उनकी बदकिस्मती और महँगाई की मारी आयाएँ घुमाती रहती तो कभी जोगन की सी निस्संगता से जोगिंग करती घुटने से ऊपर पेंट पहनी लड़कियों की मस्त चाल, नंगी टाँगें और खुली बाँहों को देखती रहती। तो कभी आँखों में खुला अचंभा लिए, तितली की तरह उड़ती आधुनिकाओं को अपने पालतू कुत्तों को सैर कराते देखती। कई बार बगीचे के कोनो-अंतरों में आंटी की ही हमउम्र महिलाओं का ग्रुप भजन कीर्तन करते हुए भी दिख जाता पर उनमें शामिल होने की बजाय परम निरपेक्ष भाव से आंटी पास से हवा के शांत झोंके की तरह गुजर जाती। मंद-मंद मुस्कान और जीवन राग बिखेरती आंटी चलती भी यूँ जैसे इस दुनिया और धरती से उन्हें कोई शिकायत नहीं हो।

लगभग पचपन वर्षीय आंटी मेरी पड़ोसी थीं। यह बात अलग है कि यह भी मैं तभी जान पाया जब मुझे उनकी जरूरत महसूस होने लगी। मैं पाँचवें माले के एक तरफ था और आंटी लिफ्ट के एकदम दूसरी तरफ। आंटी के परिदृश्य में आते ही चट्टान की तरह कठोर और वजनी हमारे दिन एकाएक तितली के पंखों की तरह रंगीन और हल्के हो गए थे। 'आंटी आज मेरा कूरियर आएगा, प्लीज रख लेना। आंटी यह लो चाभी मेरी मेड आए तो काम करवा लेना। आंटी, धोबी को ये कपड़े दे देना, आंटी प्लीज दूध वाला आए तो दूध ले लेना, नहीं गरम मैं आकर कर लूँगा, क्या कहा, दूध फट जाएगा, ठीक है, गरम भी कर लेना आंटी जी!'

दरअसल मैं मुंबई में एम.बी.ए. कर रहा था। हम चार लड़के आंटी के पास वाले फ्लैट में ही एक साथ रहते थे। हम सुबह-सुबह ही निकल जाते, दिनभर हमारी क्लास चलती। इस कारण कभी डाक, तो कभी धोबीवाला, तो कभी दूधवाला, तो कभी कामवाली बाई, सभी को अब जैसे आंटी का खुला घर मिल गया था। दिन भर आंटी हमारी प्रतिनिधि बनी हमारा सामान देती-लेती रहती। और हम निश्चित हो कॉलेज में भी देर तक मस्ती मारते रहते। हमारी पौ बारह थी क्योंकि अब हमें चिंता नहीं थी कि हम नहीं पहुँचे तो घर की व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। अब कामवाली आंटी से चाबी ले लेती। धोबी आंटी से कपड़े ले लेता, किरानी वाला आंटी के पास हमारा सामान रख देता। दूध वाला आंटी को दूध दे देता, आंटी की इस उदारता की खबर जाने कैसे उड़ते हुए हमारे दूसरे पड़ोसी मि. गोयल तक भी पहुँच गई। एक दिन मैंने देखा मि. गोयल का तीन वर्षीय बेटा सोनू आंटी की गोद में बैठा-बैठा चना बादाम टूँग रहा था। वह टीवी पर छोटा भीम देखने की जिद कर रहा था और आंटी उसे समझा रही थी कि ज्यादा टीवी देखने से बच्चों की कोमल आँखें खराब हो जाती हैं। और उसे कोई नीली परी की कहानी सुना कर बहला भी रही थी। कई बार सोनू कुछ समझ नहीं पाता, वह पूछना चाहता तो पूछ भी नहीं पाता। आंटी चिंतित हो कहने लगी - 'क्या होगा इन बच्चों का भी। न ये ठीक से अँग्रेजी बोल पाते हैं और न हिंदी। इस कारण इनके अंदर एक अलग तरह की घुटन रहती है। बच्चे भी क्या करें, इनकी मातृभाषा हिंदी है पर माँएँ हैं कि जन्म से ही अँग्रेजी बोल-बोल हिंदी सीखने ही नहीं देती हैं। मैंने एक बार कहा भी मिसेज गोयल से तो कहने लगी, 'यदि मैं अँग्रेजी नहीं बोलूँगी तो अँग्रेजी इसके लिए एलियन भाषा बन के रह जाएगी'। सोचो यदि मातृ भाषा एलियन रह जाए तो ज्यादा नुकसान है या विदेशी भाषा एलियन रह जाए तो ज्यादा नुकसान है? मैं क्या बोलता, खुद मैं भी अपने नन्हें-मुन्ने भतीजो से अँग्रेजी में ही बोलता था पर उस दिन जाने अनजाने मेरे मन की कोई फाँक भी आंटी के विचार में शामिल हो गई थी इस कारण आंटी की बात का जवाब देने की बजाय मैंने बात घुमा कर पूछ डाला 'आंटी यह कहाँ से आ टपका? 'आंटी ने अद्भुत जवाब दिया 'यह मेरे एकांत को रचने और मेरी जिंदगी में आनंद घोलने आ पहुँचा'। अपने आराम और दूसरे कामों को स्थगित कर आंटी पूरी गंभीरता से मुंडी हिला-हिला, मुँह बना-बना और आँखें मटका-मटका कर उसे कहानी सुनाती रही, जैसे - भावी पीढ़ी का निर्माण कर रही हो और किसी गंभीर श्रोता की तरह सोनू कहानी सुनता रहा।

मि. और मिसेज गोयल दोनों ही अपनी-अपनी कंपनी में सीनियर मैनेजर थे। मिसेज गोयल अपने तीन वर्षीय बेटे सोनू को अपने साथ ही ले जाती थी। उसे वे किसी क्रेच में डाल फिर अपने ऑफिस जाती। कई बार शाम को क्रेच की गाड़ी पहले आ जाती, मिसेज गोयल बाद में आती। जालीदार बंद गाड़ी में बैठा सोनू अक्सर रोता रहता, कई बार हमसे जिद करता की हम उसे अपने साथ ले चलें। एक बार सोनू से बात करते-करते ही बदबू का भभका सा लगा। मुझे लगा आस-पास कुछ गंदगी पड़ी होगी। मैंने सोनू के ड्राइवर से कहा कि वह गाड़ी थोड़ी दूर पार्क कर दें, यहाँ बदबू आ रही है। वह हँसने लगा - यह बदबू सोनू बाबा के पेंट से आ रही है, उसने पॉटी कर दिया है। मैं तो जैसे आसमान से गिरा। हे भगवान यह सब भी होता है! मैंने उतावला होकर कहा 'जब तुम जानते हो तो उसका पेंट क्यों नहीं बदल देते हो? 'उसने अजीब सा जवाब दिया 'सिर्फ पेंट बदलने से क्या होगा? मुझे उसे साफ भी करना होगा, मेरा काम जब तक उसकी माँ नहीं आ जाए, उसकी चौकीदारी करना है, उसकी माँ बनना नहीं है। फिर मैंने मैडम को फोन पर बता भी दिया है। अब वे जाने और उनका काम जाने।

एक बार भयंकर गर्मी थी, सोनू बंद गाड़ी मैं बैठे-बैठे झुलस ही गया था, मुझे सोनू पर बड़ा तरस आया, मैंने गाड़ीवाले से कहा, 'जब तक इसकी मम्मा नहीं आ जाती, कम से कम इसे खुली हवा में बाहर तो रहने दो, कैसे कैदियों की तरह इसे अंदर ठूँस रखा है। उसने बड़ा मायूस जवाब दिया 'मैं जैसे ही इसे छोड़ दूँगा यह पिंजरे से छूटे पक्षी की तरह उड़ने लगेगा और मैं दिन भर का थका हारा, मुझमें इतनी जान नहीं कि इसके पीछे-पीछे दौड़ूँ। जब इनकी माँ को ही इनकी चिंता नहीं तो मैं क्यों सोचूँ।'

बहरहाल दिन बीत रहे थे। हम सब जिंदगी को झेलने और उसके बंदोबस्त में लगे थे। ये वो दिन थे जब भविष्य में कुछ बन पाने के नसतोड़ तनाव में ही हमारा वर्तमान स्वाहा हो रहा था। इस तनाव को झेल न पाने की वजह से हमारे एक सहपाठी का मानसिक संतुलन ही बिगड़ गया था। और उसे कॉलेज स्थगित कर काउंसलिंग लेनी पड़ रही थी। एक ने आत्महत्या की असफल चेष्टा की। मैं भी अपने को डिप्रेशन से बचाने के लिए खुद को कभी 'भाग्य' के हवाले करता तो कभी 'डू द बेस्ट एंड लिव द रेस्ट' जैसे जीवन मंत्र के हवाले छोड़ देता। हम सभी खुद को बेफिक्र रखने की भरसक कोशिश करते। इस कारण कॉलेज से घर और घर से कॉलेज के बीच जो कुछ भी समय हमें मिलता उसमें युवराज के छक्के और राखी सावंत के ठुमके हमें हमारी तनावों की दुनिया से कुछ देर के लिए ही सही दूर ले जाते, हमारा दिल बहलाते और हमारे पंखों को हवा देते।

उन्ही दिनों एक बार आंटी का घबड़ाया हुआ फोन आया मेरे पास, 'तुरंत आओ, सोनू को बहुत उल्टियाँ हो रही है, उसकी माँ फोन नहीं उठा रही है' मैं भी घबड़ा गया। घर पहुँचा तो देखा कि सदैव खिला-खिला सा रहने वाला आंटी का मुखमंडल तनाव, चिंता और थकान के बादलों से घिरा हुआ था। आंटी की साड़ी उलटी से लथपथ थी, पूरे घर में अजीब सी उलटी की गंध भरी हुई थी, जंगली हिरण की तरह हर तरफ धमाचौकड़ी मचाने वाला सोनू गमछा ओढ़े सोफे पर ही अधमरा सा लेटा हुआ था। आंटी आँगन को फिनाइल से साफ करते हुए ही फोन पर मिसेज गोयल से बतिया रही थी। मिसेज गोयल आंटी को फोन पर समझा रही थी 'आप चिंता मत कीजिए, यह तो इसी प्रकार उलटी करता रहता है, इसने क्रेच में कुछ ज्यादा खा लिया होगा। आप तो बस इसे थोड़ा नमक चीनी घुला पानी पिला दीजिए। मैं नौ बजे तक पहुँच जाऊँगी, क्या बताऊँ आज बॉस के साथ एक बहुत जरूरी मीटिंग में फँस गई हूँ। उस दिन पहली बार देखा मैंने आंटी को क्षुब्ध होते हुए, माथा पकड़ बोली वे, 'हे भगवान क्या हो गया है इसकी माँ को, बेटा अधमरा हो रहा है, अभी तक छह उलटी कर चुका है और इसकी माँ कह रही है 'चिंता की कोई बात नहीं, क्रेच में ज्यादा खा लिया होगा, यह तो इसी प्रकार करता रहता है उलटी'। हे भगवान, किस हादसे में मर गई हैं इनकी ममता, किसने बना दिया उन्हें ऐसा! कैसा समय है! बॉस को फुल टाइम, पति को पार्ट टाइम और बच्चे घास फूस की तरह बढ़ रहे हैं? चेहरा देखो इसका, कैसे छुआरे सा सूख गया है। और बात करते-करते ही आंटी ने मुझे सोनू के लिए नमक चीनी का पानी बनाने में लगा दिया और खुद सोनू के कपड़े बदलने में लग गई। हमेशा सोनू को छोटा भीम देखने से रोकने वाली आंटी ने इस बीच खुद ही टीवी पर छोटा भीम लगा दिया जिससे सोनू का मन लगा रहे।

अगले सप्ताह से ही मैं एम.बी.ए. के इंटर्नशिप में व्यस्त हो गया, आंटी के यहाँ आना जाना थोड़ा कम हो गया लेकिन फिर भी हम दोनों घरों के बीच आंटी को लेकर अदृश्य खींचातानी चलती रहती थी। आंटी जैसी दुधारू गाय को हम सभी अपने-अपने खूँटे में बाँध लेना चाहते थे। हम दोनों को ही डर रहता कि कहीं कोई अकेला ही आंटी को हाईजैक न कर ले, इस कारण अपनी जिंदगी में व्यस्त होते हुए भी मैंने दुआ-सलाम जारी रखी और तभी मैंने आश्चर्य से देखा कि सबसे दूर-दूर रहने वाली बंद गोभी मिसेज गोयल भी अनायास ही मेरे ही पदचिह्नों पर चलने लगीं थीं, बल्कि मुझसे भी कदम भर आगे ही थीं।

उन्ही दिनों मुझे एकाएक गोयल परिवार की तरफ से सोनू के जन्मदिन के उपलक्ष्य में रखी पार्टी में शरीक होने का निमंत्रण मिला। मुझे इस निमंत्रण की उम्मीद नहीं थी। क्योंकि उनकी दुनिया और हमारी दुनिया एकदम अलग-अलग थी। वहाँ वे सभी बुलंद हस्तियाँ आने वाली थी जो अपने जीवन में कामयाबी के शिखर को छूँ चुकी थीं या छूने के करीब थीं। मेरा भी वहाँ जाना जरूरी था क्योंकि मैं भी कामयाबी से हाथ मिलाने के इस दुर्लभ अवसर को खोना नहीं चाहता था। इसलिए समय कम होने के बाबजूद मैं वहाँ गया। उनका घर जरूरत से ज्यादा चमक रहा था। सोनू किसी रूठे राजकुमार की तरह बैठा हुआ था। समृद्धि किसी परी की तरह अपने पंख पसारे खड़ी थी। किसी दीवार पर मोनालिसा मुस्कुरा रही थी तो किसी दीवार पर एम.एफ. हुसैन के घोड़े दौड़ लगा रहे थे। कुछ आत्मविश्वास के गुच्छे वहाँ चहक रहे थे तो कुछ नेशनल और मल्टीनेशनल जमूरे अलग से ही दमक रहे थे। मि. महेश्वरी अपनी विदेश यात्रा का बखान कर रहे थे तो मि. चंदानी जिनकी फोरेन पोस्टिंग तय थी मुंबई को कोस रहे थे कि दो महीने से यहाँ सूरज तक नहीं दिखा, क्या होगा यहाँ रहकर। मिसेज बाफना का ख्याल था कि यदि देश की बागडोर किसी कोर्पोरेट को दे दी जाए तो देश शायद बच सकता है। मिस्टर भारद्वाज को संतोष था कि उन्होंने अपने प्रवासी पुत्र को स्काईप पर ही गणपति पूजा करवा दी। इसी बीच मिस्टर रवि ने सीमा पर गश्त लगाते दो भारतीय सैनिकों के सर काट ले जाने वाली घटना का जिक्र शुरू किया ही था कि मिस्टर महेश्वरी ने उन्हे डपट दिया - यार ऐसी घुटन और डिप्रेसिंग बातों के लिए हमारा ऑफिस ही क्या कम है जो तुम यहाँ भी ऐसी बातें ले बैठे? हें हें करते मिस्टर रवि ने दाँत निपोर दिए। इसी बीच केक काटने की रस्म शुरू हुई। इतनी भीड़-भाड़, शोर-गुल, आक्रामक रोशनी, कैमरा और तेज म्यूजिक को सुन सोनू शायद डर गया था और चीख मार-मार कर रोने लगा था। सोनू के चीख मारने के साथ ही हम लोगों की 'फील गुड' की लय-ताल गड़बड़ा गई थी। सोनू ने रोते-रोते कहा, 'मुझे केक नहीं काटना, मुझे आंटी के पास जाना है। और तभी जैसे 26/11 का अटैक हो गया हो। गोयल दंपति को साँप सूँघ गया। चिड़िया सी चहकती मिसेज गोयल की बिल्लोरी आँखें छिपकली की आँख की तरह बाहर निकल आई, 'शिट यार, आंटी को तो बुलाना ही भूल गए'।

मिसेज गोयल इस चूक के लिए अपने पति को बुरा भला कहने लगी, 'किसी को नहीं भूले एक आंटी को हो कैसे भूल गए? हर दिन डेढ़-दो घंटे रख ही लेती हैं सोनू को। उन्ही के चलते मैं पूरी शाम सोनू को लेकर निश्चिंत रहती हूँ, लेकिन तुम्हें मेरा सुख कब सुहाया है? तुम तो चाहते ही हो कि मैं नौकरी-वोकरी छोड़ तुम्हारी चाकरी में ही लगी रहूँ। नुकीले तार जैसी शख्सियत वाले मि. गोयल कुछ देर सुनते रहे, झल्लाते रहे, पत्नी को शांत करने की कोशिश भी की, पर पत्नी थी कि एकदम गरम स्त्री, बेकाबू। जंगली बिल्ली कि तरह नोचने-झपटने को तैयार। पार्टी की रंगत बिगड़ती देख उन्होंने भी अंतिम दाँव लगाया और डफर कह दिया मिसेज गोयल को - 'क्या आंटी-आंटी रट लगा रखी है। अरे यह तो सोचो कि इस पीजा, बर्गर, डांस और ड्रिंक की पार्टी में आकर कर भी क्या लेती आंटी? वे हमें देख कर दुखी होती और हम उन्हें देखकर। खुश होओ कि दो दुख कम हुए' मि.गोयल के इस खुलासे के साथ ही एक जोरदार ठहाका लगा। बादल छँटे, तापमान सामान्य हुआ, पार्टी की रंगत लौटी। मिसेज गोयल फिर आवभगत में लग गई। तेज म्युजिक पर कुछ जोड़े थिरकने लगे, 'कजरारे-कजरारे तेरे नयन बड़े कजरारे...।' कुछ 'लुंगी डांस की फरमाईश करने लगे।

सोनू रोते-रोते ही सो गया। बुलंद हस्तियों और कामयाब लोगों की पार्टी फिर धीरे-धीरे सबाब पर चढ़ने लगी।


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