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कहानी

सबसे कठिन काम
मधु कांकरिया


डॉक्टर मधुसुदन की कहानी मैं जरूर कहना चाहूँगी, क्योंकि ऐसी कहानियाँ जल्दी पीछा नहीं छोड़ती हैं। वैसे इन दिनों डॉक्टर साहब पर एक अजीब ही भूत सवार है। इन दिनों अक्सर जिंदगी के सवालों में उलझे रहते हैं वे। क्या है जिंदगी? क्या है खुशी? क्या है नियति? क्या सिर्फ संयोग है जिंदगी...? जैसे सवाल हर पल उठते-बैठते पीछा करते रहते हैं। डॉक्टर साहब का। भीतर का तापमान इतना बढ़ जाता है कि एयरकंडिशंड चेंबर में भी माथे पर पसीने की बूँदें छलछला उठती हैं। कई बार सोचते हैं कि लिख डालें अपनी आत्मा का इतिहास। लिखने के लिए डायरी खोलते भी हैं, कलम भी उठाते हैं अपनी अंतरात्मा में प्रवेश भी करते हैं कि तभी सब कुछ गड़बड़ा जाता है। 'बस पचपन, बस पचपन...' लिखकर शून्य में ताकने लगते हैं। जब से इस 'पचपन' का हादसा हुआ है जीवन की धारा ही पलट गई है।

शांत झील से खौलती हुगली नदी बन गए हैं डॉक्टर मधुसुदन! अकेले होते ही सोच नाम का कीड़ा कुलबुलाने लगता है - क्यों हुआ ऐसा? कहाँ चूके, कहाँ कूदे की सुख-चैन के सारे परिंदे ही उड़ गए उनकी मुंडेर से। बाघ की तरह झपट्टा मारने लगती हैं स्मृतियाँ। तहखाने में उतरते-उतरते एकदम नीचे उतर आते हैं डॉक्टर माथुर।

तब नए-नए डॉक्टर बने थे वे। बचपन से देखा एक स्वप्न पूरा हुआ था। गले में स्टेथस्कोप झुलाने का। एक स्वप्न क्या पूरा हुआ, आने वाले दिनों में स्वप्नों की पूरी फसल ही लहराने लगी। स्वप्न था अपने मुहल्ले और कोलकाता को पूरी तरह निरोगी बना देने का। अपने स्वप्न का पूरा नक्शा दिमाग में था उनके। कहाँ हेल्थ क्लब खुलवाना है। कहाँ निःशुल्क दवाइयों की व्यवस्था करनी है। कई मेडिकल रिप्रेजेंटिटिव से संपर्क किया, गरीब बस्तियों के लिए मुफ्त दवाइयों और मुफ्त ऑपरेशन की व्यवस्था की। गंधाती, मच्छरों-मक्खियों से बजबजाती, गंदगी और कचरे के ढेर पर आबाद बस्तियों में हेल्थ और हाइजिन से संबंधित कई डॉक्युमेंट्री दिखाई। लोगों को और खुद को भी हर पल प्रेरित करने के लिए अपने चेंबर की मुख्य दीवार के बीचोंबीच बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवाया, 'पहला सुख निरोगी काया'। खुद के लिए उन्होनें नियम बनाया, सप्ताह में दो दिन निःशुल्क देखेंगे। कुछ रोगियों से आधी फीस लेंगे और जो पूरी तरह समर्थ हैं सिर्फ उनसे ही पूरी फीस लेंगे। कितने भी थके-हारे क्यों न हो, हर जरूरी नाइट कॉल को अटेंड करेंगे। बिना चिकित्सा किसी को मरने नहीं देंगे।

देखते ही देखते बारिश की तरह बरसने लगे वे। हरियाली की तरह फैलने लगे और देखते ही देखते बन गए वे हर दिल अजीज!

भीतर सत्य का जोर था, आँखों में झिलमिलाते स्वप्न थे। इस कारण तेज गति से स्वप्न और श्रम का सफर चलने लगा था जिसमें पहला ब्रेक लगा - शादी की सुहागरात में। मधुयामिनी में मधुमती की भूमिका में आए ही थे कि कर्कश फोन घनघना उठा। दुल्हन ने जैसे ही सुना 'आ रहा हूँ' उसकी गालों की सुर्ख लालिमा कालिमा में बदल गई। सतरंगी स्वप्नों की उड़ान शुरू हुई ही थी, मादक कामनाओं ने पूरी तरह अँगड़ाई ली भी नहीं थी, अधमुँदी आँखें पूरी तरह मुँदी भी न थी कि यह जानलेवा जुदाई! उद्दाम आवेग से भरी अतृप्त आत्मा चित्कार कर उठी - आज की रात मत जाओ। फूलों की सेज, दुल्हन की आँखों से छिटकती कामनाओं की चाँदनी, अपना बेकाबू मन, अधपीया मधु का प्याला...। कुछ भी बाँध नहीं पाया डॉक्टर मधुसुदन को, 'डॉक्टर बनाना बहुत कठिन होता है प्रिय, किसी की जान की कीमत पर मैं सुहागरात कैसे मना सकता हूँ? चित्तरंजन के रसगुल्ले की सारी मिठास को अपने कंठ में उड़ेलते हुए बोले डॉक्टर मधुसुदन। जब तक मरीज को ICU में भर्ती करवा कर घर लौटे डॉक्टर साहब तब तक मुर्गा बाग दे चुका था और दुल्हन की मुँह दिखाई की रस्म शुरू हो गई थी। रात फिर आई पर वो बात नहीं आ पाई। दुल्हन के मन का कोई कोमल तार-तार हो चुका था। डॉक्टर साहब तो फिर भी सुहागरात में शयन सुख का त्याग कर मुहल्ले के हीरो बन गए थे लेकिन दुल्हन का बहुत जतन से सँजोया हर रात देखा स्वप्न पहली ही रात टूट-टूटकर बिखर चुका था।

टहनी से झरते पत्तों की तरह बीतते रहे दिन। कभी चट्टान से भारी तो कभी परी के पंखों से भी हलके। शतरंगी घोड़े की तरह स्लो मोशन में अढ़ाई-अढ़ाई कोस चलती रही जिंदगी। मोहल्ले के स्वास्थ्य के प्रति समर्पित डॉक्टर ने बनारस के मगही पान की तरह अपने हृदय की नकारात्मक प्रवृतियों को दिन पर दिन काटते-छाँटते पूरी तरह तराश लिया था। इस कारण हर वक्त पगली हवा से बौराए रहते। कभी इस गली, कभी उस गली। कभी इस घर, कभी उस घर। कभी गीले बाल, कभी बिखरे बाल। कभी मोजे पहने तो कभी बिना मोजे पहने। कभी चाय पीए, तो कभी बिना चाय पीए। कभी यह हेल्थ स्कीम, तो कभी वो हेल्थ स्कीम। खुद की जिंदगी में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया सिवाय इसके कि बिना धूम-धमाका के एक पति से पिता भी बन गए वे और घर-बाहर दो अलग-अलग दुनिया में जीते रहे। मरीजों के बीच रहते-रहते वे इतना कम बचे थे कि घर ने उन्हें लगभग अनुपस्थित ही मान लिया था। इसलिए घर के कोने-कोने में जहाँ उन्हें अपने खिलाफ शिकायत और ठंडी उदासीनता खड़ी मिलती वहीं बाहर हर चप्पे चौराहे पर लोग, 'खूब भालो डॉक्टर मोधुदा' के लिए प्रशंसा और सम्मान के गुलदस्ते लिए खड़े मिलते। मोहल्ले में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहाँ डॉक्टर मधुसूदन के कदम न पहुँचे हों, मौत के सन्नाटे में जिंदगी न लहरा उठी हो, चाहे गगनचुंबी इमारत हो या लेबर कॉलोनी हो या झुग्गी झोपड़ियाँ हो। चाहे सूखे, फटेहाल और पिचके पेट वाले हों या चिकने, तोंदियल फुले पेट वाले हों। डाइयग्नॉस्टिक सेंटर वाले डॉक्टर मधुसूदन को भगवान मानते थे क्योंकि किसी भी टेस्ट के लिए न तो उन्होंने कभी कमीशन माँगे और न ही कभी उन्होंने रिपोर्ट को बदलने का दुराग्रह ही किया।

पर घर उन्हें अपनी औकात दिखा देता। कभी शादी की सालगिरह पर पत्नी के लिए उपहार लाने से चूक जाते या बेटे के जन्म दिन पर घर जल्द नहीं आ पाते, तो कभी बेटे की सेकेंड हुगली ब्रिज दिखाने की जिद पूरी नहीं कर पाते और जब ऐसे बढ़ते अपराधों के चलते घर में उमस बहुत बढ़ जाती तो वे घरवालों के मनोरंजन के उद्देश्य से अपने रोगियों के अनुभव सुनाते हुए कहते - जानते हो आज मैंने एक रोगी को कहा दिन में एक गोली दो बार, सुबह-शाम लेना तो गधा पूछता है - एक गोली को आधी-आधी कर दो बार लूँ क्या? एक रोगी को नींद की गोली दी तो पूछता है कि नींद के पहले लूँ या बाद में लूँ। हा हा हा! लेकिन जब देखते कि घरवालों को न उनमें दिलचस्पी रह गई थी और न ही उनके रोगियों में तो कभी वे गाँवों में फ्री मेडिकल कैंप लगाने निकल पड़ते, तो कभी पत्नी और बेटे को वही जुमला पकड़ा देते 'बहुत कठिन है डॉक्टर बनना'। वे इतना डूब कर बोलते इसे कि उनका अंग-अंग लय-ताल में होता। पत्नी कुढ़ जाती और मुँह फुलाकर नहले पर दहला जड़ देती, 'उससे भी कठिन है अच्छा पति बनना'। मानिनी पत्नी कुछ दिन मान करती। काश! चाभी के गुच्छे की तरह पति को भी पल्लू से बाँध रख पाती! उन नशीले, रंगीन और मादक स्वप्नों को याद कर आँसू बहाती जो उसने 'फूल तुम्हें भेजा है खत में 'गाते हुए कॉलेज की सखियों के साथ कभी देखे थे। लेकिन फिर वही घोड़ा वही मैदान। अपने संत से पति को क्षमा कर देती। जैसा भी है पति पूरा का पूरा उसका है - सोचती और ईश्वर से हॉट लाइन जोड़ लेती।

दिन बीत रहे थे। टूट-टूट कर भी जुड़ जाती लय-ताल जिंदगी की। मध्यवर्गीय मानसिकता सब कुछ स्वीकार कर लेती। चाय के प्याले में शक्कर दिन पर दिन काम होती जा रही थी, पर वाणी में डॉक्टर के दिन पर दिन शक्कर घुलती जा रही थी। लेकिन एक मटमैली शाम सचमुच कुछ ऐसा हो गया कि आसमान में उड़ते गरुड़ का ध्यान भटक गया और सारी लय-ताल बिगड़ गई।

यह वह समय था जब इतिहास करवट बदल रहा था और अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि से उपजी एक नई नवेली पार्टी ने देश के प्रतिवद्ध युवाओं का राजनीति में सक्रिय योगदान के लिए आह्वान किया था। फिजाँ में बदलाव की अकुलाहट थी। पर पीड़ा की जाने कैसी अकुलाहट इस आंदोलन ने पैदा कर दी थी कि डॉक्टर के वृत्त में सिमटी मीनारें टूटने लगी और पहली बार इस सोच ने असर डाला कि देश के लिए यदि सचमुच कुछ करना है तो देश को इन भ्रष्ट नेताओं के साए से मुक्त करना होगा। मैं चाहे कितनी भी खुशबू फैलाने का प्रयास क्यों न करूँ, बदबू के स्रोतों को जब तक बंद न किया जाएगा मेरे सारे किए कराए पर माटी गिरती रहेगी।

भीतर मचलता कुछ करने का जोश-जज्बा, होठों पर मचलती कॉलेज के दिनों की महबूब पंक्तियाँ, 'हम लड़ेगें साथी / उदास मौसम के खिलाफ / हम लड़ेगें जब तक दुनिया में / लड़ने की जरूरत बाकी है' और बाहर लगातार बढ़ता मित्रों और शुभचिंतकों का दबाब, एक चमकती शाम उन्होंने एक अभूतपूर्व निर्णय लिया, 'हम लड़ेंगे भ्रष्टाचार के खिलाफ, हम लड़ेंगे विधान सभा का चुनाव। अपने इस निर्णय पर वे खुद भी कम हैरान नहीं थे। उधर जाने कैसे टीएमसी और सीपीएम दोनों मुख्य दलों को खबर लग गई डॉक्टर के चुनाव लड़ने की इच्छा की। दोनों ने ऑफर किया कि वे उनकी पार्टी का प्रतिनिधित्व करे। पर भ्रष्टाचार मुक्त भारत का स्वप्न देखने वाले डॉक्टर ने ठानी कि वे निर्दलीय ही चुनाव लड़ेंगे।

और वे सचमुच कूद पड़े चुनावी मैदान में, पूरे संकल्प और पवित्रता के साथ।

भीतर था सत्य और अपने तीस वर्षीय जीवन के सत्कर्मों की पूँजी का जोर, इस कारण अपनी जीत के प्रति इतने आश्वस्त थे वे कि चुनाव के अत्यंत सरगर्मी के दिनों में भी प्रचार से दूर भागते रहे। मरीजों की उपेक्षा कर चुनावी प्रचार में आस्था नहीं थी उनकी, लिहाजा थोड़ा बहुत प्रचार जो भी किया मित्रों और शुभचिंतकों ने ही किया। मित्र समझाते - आजकल बिना प्रचार, मीडिया की ठकुरसुहाती और विज्ञापन के कुछ नहीं होता, बिना माँगे तो माँ भी रोटी नहीं देती तो लोग क्यों देंगे तुम्हें वोट? आत्मविश्वास से दिपदिपाते चेहरे पर छलक आई पसीने की बूँदों को पोंछते हुए वे कहते - तीस साल क्या कम हैं मेरे विज्ञापन के लिए, कौन सा घर है जहाँ मेरी सेवा नहीं पहुँची? बोलते-बोलते गर्व से उनकी नाक फूल जाती। चाय बैगुनी (बैगन का भाजा) खाते मित्र दबी जबान से कहते, जैसी अभी लहर चल रही है मोदी की और जिस प्रकार का आक्रामक प्रचार है उनका, हमें रिस्क नहीं लेनी चाहिए। लेकिन डॉक्टर साहब अपनी कड़वी दवा पर अड़े रहते - सच्चाई को नगाड़ों की जरूरत नहीं होती और तैश में आ अधपीयी प्याली छोड़ निकल पड़ते।

सारी खुदाई एक तरफ, डॉक्टर मधुसूदन एक तरफ। और तो और एन चुनाव के दिन भी एक इमरजेंसी केस में फँसे रहे और किसी प्रकार दौड़ते भागते दिया अपना वोट। दोस्त, रिश्तेदार, शुभचिंतक आशंकित लेकिन डॉक्टर साहब पूरी तरह आश्वस्त। उनके दोनों मुख्य प्रतिद्वंदी कुख्यात गुंडे, ऐसे में कौन रोकेगा उनके विजय रथ को? और तो और मतगणना के दिन भी निरासक्त योगी की तरह निकल पड़े रोगियों को देखने। रोगियों को देखते-देखते ही हाजमा बिगड़ गया, वी.पी. खतरे की सीमा छूने लगा। टीवी बोला, मोबाइल बोला, घर बोला - कि वे सारे प्रतिद्वंद्वियों से पीछे चल रहे थे। घर पहुँचे तब तक वे अपनी जमानत जब्त कर चुके थे। उन्हें मिले थे सिर्फ पचपन वोट। सिर्फ पचपन!

भीतर कुछ इतने जोर से टूटा कि उसकी आवाज को सारे परिवार ने सुना। झाँव-झाँव करते गली के कुत्ते ने सुना। खिन्न और सुन्न डॉक्टर ने इस घटना के बाद अपने को अपने घर में ही कैद कर लिया। वे न किसी से मिले, न कुछ बोले। न किसी से कुछ शिकवा शिकायत ही की। और पूरे 'पचपन' घंटे के बाद जब वे अपने घर से बाहर निकले तो सब कुछ वैसे ही था। बाहर गंदगी पर जिंदगी पसरी हुई थी। सड़क पर पगली वैसे ही मूत रही थी और पुलिसवाला उसे डंडे से खदेड़ रहा था। हाथ रिक्शावाले वैसे ही सड़क पर बदहवास दौड़ रहे थे। हाबड़ा पुल वैसे ही शान से खड़ा था। काली मंदिर में वैसे ही बकरे की बलि चढ़ रही थी। लेकिन डॉक्टर की केमिस्ट्री बदल चुकी थी। वे अब दूसरे ही इनसान थे। उनकी जिंदगी पर गंदगी पसर गई थी। जिंदगी में पहली दफा वे फुर्सत के इतने बड़े साम्राज्य में रहे इस कारण जब वे निकले तो सारे अंतर्द्वंद्व, ऊहापोह, भीतरी उठापटक...। सबसे मुक्त उनका एक नया अवतार ही सामने था।

जीरो फीस और आधी फीस की सुविधा अब खत्म थी। सबको समान भाव से देखते हुए चेंबर फीस अब उन्होंने दुगुनी कर दी थी। होम विजिट चौगुनी थी। पत्नी और परिवार का ख्याल रखते हुए नाइट विजिट उन्होंने खत्म कर दी थी। शनिवार और रविवार की मुफ्त सेवाएँ भी उन्होंने बंद कर दी थी। और जितने भी हेल्थ क्लब उन्होंने चला रखे थे सब से त्यागपत्र दे दिया था उन्होंने। अपनी अपमानजनक हार का बदला वे अपने भीतर बसे इनसान से चुन-चुन कर ले रहे थे। और उसे पूरी तरह कुचलने में लगे थे। भीतर का शैतान अब उनके कंधों पर चढ़ उनका गला दबोचने लगा था। अपनी मटर सी आँखों को झपका-झपकाकर वे रह-रहकर गुर्रा रहे थे - अब तुम्हें वही मिलेगा मुहल्ले वालों जिसके लायक हो तुम। उफ! तुम्हारी सेवा करते-करते मैंने खुद को, परिवार को खो दिया, कोई इतवार-इतवार सा नहीं आया। क्या मिला मुझे - पचपन वोट! क्यों किया ऐसा? दिन-रात एक युद्ध चलता रहता उनके भीतर, साँस फूली रहती, नसें तनी रहती। वी.पी. बढ़ता रहता। खाली होते ही तन्हाइयाँ सवाल करने लगतीं उनसे, काश नहीं लड़ा होता उन्होंने यह चुनाव! पर नहीं लड़ते तो पता कैसे चलता लोगों का यह रंग? क्या ऐब था उनमें जो मिला उन्हे यह फरेब! ओह! किस गलतफहमी में धँसे हुए थे वे कि लोग उन्हे फरिश्ता मानते हैं! सारे छिलके उतर गए! उफ हारे तो भी किससे? एक गुंडे से! और कैसी शर्मनाक हार!

धीरे-धीरे वे एक चुप्पी में तबदील होते जा रहे थे। कोई नमस्कार भी करता तो उसे घूरते और सोचते - जिन पचपन लोगों ने वोट दिया उन्हे क्या उसमें होगा वह भी?

उन्ही दौड़ते-भागते दिनों में मुझे जरूरत पड़ गई थी डॉक्टर साहब की मदद की। हमारे पड़ोसी की चार वर्षीया लड़की को एकाएक डायरिया हो गया था। कई बार पड़ोसी ने फोन किया था, लेकिन डॉक्टर साहब ने आने से मना कर दिया था। कुछ खास परिवारों को डॉक्टर साहब ने अपनी लिस्ट से बाहर कर दिया था कि किसी भी हालात में वे उन्हें अपनी सेवाएँ नहीं देंगे। दुर्भाग्यवश यह परिवार भी उनमें से एक था। अभी तक डॉक्टर साहब के अलावा किसी दूसरे डॉक्टर का मुँह भी नहीं देखा था अब उस घड़ी में बुलाएँ भी तो किसे? हिम्मत कर मैं आई उनके चेंबर में, घंटे भर बाहर बैठी रही और जब सारे रोगी चल गए तब जाकर उनसे बात हुई। थके-थके, उदास और हारे-हारे से डॉक्टर साहब के चेंबर में जब मैं घुसी तो एक बार तो उन्होंने मुझे भी रोगी ही समझा। मैंने अपने आने का मकसद बताया और गुजारिश की - गुड़िया की हालत गंभीर है, आपको चलना होगा। डॉक्टर साहब ने डायरी दिखाई। कुछ पल सोचते रहे, फिर हथोड़े सी गहरी उनकी आवाज गूँजी - पारवो ना, आमी खूब व्यस्त (नहीं जा सकूँगा, मैं बहुत व्यस्त हूँ) देखो एक घंटा भी खाली नहीं हूँ, कैसे जाऊँ? मैंने दुबारा गुजारिश की तो वे चिढ़ गए। अजीब और बेबस निगाहों से घूरा मुझे, टेबल पर रखी गिलास से कुछ घूँट गटके। रह-रहकर एक वहशी हरी कौंध सी चमक रही थीं उनकी गहरी काली आँखें। और कट-कटकर कुछ शब्द गिर रहे थे उनके मुँह से 'अमार छाडे तो अनेक डॉक्टर आछे उनाके डेके नाओ (मेरे अलावा भी तो ढेरों डॉक्टर हैं बुला लो उनको)। मैंने हिम्मत कर फिर जिद की - मैं आपको लेकर ही जाऊँगी। वे बोले कुछ नहीं, उनके चेहरे पर पल भर के लिए तकलीफ और दर्द उभरे लेकिन दूसरे ही पल उनकी आँखों में काँटे उगने लगे, समझ गई यह डॉक्टर नहीं उनका प्रतिशोध बोल रहा है, कहना चाहती थी - डॉक्टर साहब किसकी गलती की सजा आप किसको दे रहे हैं कि तभी डॉक्टर साहब ने नाक तक खिसक आए चश्मे को ऊपर उठाते हुए कुढ़ते हुए कहा - उफ बहुत कठिन है डॉक्टर बनना!

और मैं सोच रही थी कि कितना कठिन है इनसान बनना!


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