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कहानी

भरी दोपहरी के अँधेरे
मधु कांकरिया


एक कहानी जो अढ़ाई हजार वर्षों से लगातार लिखी जा रही है, उसी का पुनराख्यान है यह कहानी। आप कहना चाहेंगे कि यह कैसे संभव है? अढ़ाई हजार वर्षों पूर्व जो कहानी लिखी गई वह आज की कहानी कैसे हो सकती है? शायद नहीं हो सकती, पर हो भी सकती है! क्योंकि तमाम आधुनिकता और प्रगति के बावजूद जो चीज काल-सीमाओं के पार आज भी शाश्वत है, जिसका रंग कभी किसी काल में नहीं धुँधलाया, वह है मानव-मन की बेचैनी और भटकाव। वही बेचैनी जो किसी को समुद्र के भीतर ले जाकर कोलंबस बनाती है तो किसी को पहाड़ों के ऊपर दर-दर भटकाती बुद्ध और महावीर। सत्य यह भी है कि हर बेचैन आत्मा बुद्ध और महावीर नहीं बन पाती। शायद इसलिए कि हर बेचैनी सान पर नहीं चढ़ पाती।

बहरहाल, सिलसिला इसी बेचैनी से शुरू हुआ था।

और एक पीली शाम...

आंतरिक कोलाहल, हवाओं की खोज और जिंदगी को सँभाल पाने की दिलो-दिमाग की असामर्थ्य ने ला पटका मुझे गिरिडीह जिले के निकटवर्ती मधुबन गाँव में, जहाँ एक रहस्यमयी सृष्टि किसी नए आश्चर्य के लिए पुकार रही थी मुझे। यहीं मिले थे इस कहानी के सारे 'इन्पुट'।

यूँ यह मधुबन गाँव भारत के भाल पर माथे की महीन बिंदी जितना भी नहीं, पर जैसे ही उसका रूपांतरण समवेत शिखर जी के रूप में हुआ... माथे की वह बदरंग बिंदी हीरे की कणी की तरह झिलमिलाने लगी।

जैनियों का मक्का-मदीना - यह शिखर जी! जहाँ एक किलोमीटर के भीतर ही बीस अति भव्य मंदिर हैं। नक्काशी और वास्तुकला के नायाब नमूने! अध्यात्म के ताजमहल! देवदारु, कृष्णचूरी, राधाचूरी और यूकलिप्टस जैसे खूबसूरत पेड़ों से घिरे उत्तुंग शिखरों वाले मंदिरों की इन कतारों को देख आप इसे मंदिरों का देश भी कह सकते हैं। इसकी पृष्ठभूमि में शिखर जी की पहाड़ियाँ हैं। सर्दियों में दूर-दराज से आए पक्षियों की तरह देश के कोने-कोने से जैन संप्रदाय के लोग यहाँ आते हैं, इन पहाड़ियों के दर्शन के लिए। अंतरात्मा को जगातीं इन पहाड़ियों के पग-पग पर इतिहास बिखरा पड़ा है। चप्पा-चप्पा अँटा पड़ा है देव-कथाओं, लोक-कथाओं, विश्वासों और मान्यताओं से। कहते हैं कि जैनियों के चौबीस तीर्थंकरों ने सत्य की खोज में राजपाट, घर-परिवार को त्याग इन पहाड़ियों पर नंगे पैर विहार किया था। यहाँ आज भी उन रास्तों पर उनके पद-चिह्नï सुरक्षित हैं, जहाँ प्राप्त हुआ था उन्हें निर्वाण।

लौटना फिर अपनी तरफ।

भोर के नरम कोहरे को भेदती हुई एक आवाज... जागिए, पहाड़ पर जाने का समय हुआ... ने नींद में बहती मेरी सुप्त चेतना को हलके से ठकठकाया। गहरी नींद में वह आवाज किसी दूसरे लोक से आती हुई लगी। वह आवाज उन यात्रियों के लिए थी, जिन्हें उस सुबह पहाड़ की यात्रा करनी थी। मैं पूरा पहाड़ चढ़ने को उत्सुक नहीं थी, बस... कुछ दूर तक जाकर किसी ऊँचे टीले पर बैठ पहाड़ को अपने भीतर महसूस करना चाहती थी। इस कारण मैं भी उठ बैठी। हाथ-घड़ी पर नजर पड़ी, चार बजकर तीन मिनट। फटाफट तैयार हो, कैमरे को बैग में डाल मैं नीचे।

पाँच-छह भव्य कोठियों वाली उस धर्मशाला-कम-मंदिर के करीब आधा किलोमीटर लंबे गलियारे को पार कर जब मंदिर के प्रवेश द्वार के बाहर खुले आँगन तक पहुँची तो एक जबर्दस्त दृश्याघात! जैसे कैलिफोर्निया से सीधे कालाहाँडी पहुँच गई हूँ। कहाँ धूप, चंदन, कपूर, अक्षत, कुंकुम, केसर और अगरबत्ती से गमकती-महकती दुनिया और कहाँ कई दिनों के मैल, जमा पानी और पसीने की मिली-जुली गंध के भभके। कहाँ साटन-सी स्त्रियाँ, नवनीत-से कोमल-चिकने पुरुष और कहाँ ढीली, मैली पोटलियों से एक-दूसरे पर लदे-बिखरे ये ढेर सारे डोली वाले। बासी मुँह, कीच-भरी आँखें और उनींदे, मैले चेहरे। सोने और बैठने के बीच की स्थिति में अपनी डोली पर ही लुढ़कते-गिरते मिचमिची आँखों से अपनी बारी का इंतजार करते हुए।

हर डोली वाले का अपना एक नंबर। मंदिर की प्रबंध समिति हर यात्री को एक लाठी और माँग के अनुसार डोली वालों को उसके साथ कर रही थी। भोर के नीम अँधेरे में नंगे पैर चलते ढेर सारे यात्रियों, डोली वालों और टाल-टंपाल के साथ मैं भी पहाड़ की ओर निकल गई।

हर बार की तरह इस बार भी यात्री अपेक्षाकृत कम थे, इस कारण डोली वालों के चेहरे लटके हुए थे। आसपास के अंचलों से इकट्ठे हुए इन आदिवासी डोली वालों के लिए हर यात्री देवता या कुबेर था। यात्रियों के काफिले को देखते ही सुस्त पड़े उनके चेहरों पर रंगत आ जाती और शरीर में हलचल। बस के दरवाजे से लेकर ठहरने के कक्ष तक चक्करघिन्नी की तरह नाचते नजर आते थे डोली वाले।

उस दिन भी रात-रात अकड़े-ठिठुरे डोली वालों में से सिर्फ पच्चीस खुशनसीबों को ही काम मिल पाया था। कुछ जिनकी उम्मीदें तगड़ी थीं, वे यात्री मिलने की आशा में वहीं उनींदे जमे थे। कुछ उठकर पहाड़ की तरफ चल दिए थे।

थोड़ी दूर ही बढ़ पाई थी मैं कि दो डोली वालों ने पूछा, ''डोली लगेगा?''

''नहीं।'' पर जाने किस आशा में वे मेरे पीछे धीरे-धीरे चलते रहे। आगे बढ़ी तो सिगड़ी सुलगाते और चाय के भगोने धोते नन्हें हाथ। एक पंक्ति में बने भव्य मंदिरों और साधु-ऋषियों के आदमकद कट-आउट की छाया में बैठे ढेर सारे रोगियों, कोढ़ियों, भिखमंगों, लूलों एवं लँगड़ों ने अपनी चकले-सी चौड़ी, सपाट, मैली हथेलियों को सामने फैला-फैलाकर आगे बढ़ना दुश्वार कर दिया था। कई भूरी-काली आकृतियाँ जो जिंदा थीं मगर जिंदा नजर नहीं आ रही थीं। कई इस कदर ठठरी थीं कि समझ पाना मुश्किल था कि औरत है या मर्द। काले पपोटों के बीच धँसी, बुझी आँखें जो किसी भी यात्री को देख भक् से जल उठती थीं।

आसमान में ओझल होते तारों का शेष होता उजास... मद्धिम-मद्धिम बहती पुरवैया, भोर की सात्विकता और सामने पुकारती पहाड़ियाँ... मन में जाने कैसी अस्पष्ट अनुभूतियाँ उठने लगतीं... घड़ी-भर के लिए दुनिया के कारोबार से दूर अपने भीतर लौकिक से अलौकिक होती, भोर की उस अद्भुत शांति से समरस होती कि तभी कोई टूटा हाथ लिए भिखारी या कोई डोली वाला सामने आ खड़ा होता और मेरी तल्लीनता के परखचे उड़ जाते।

पहाड़ तक पहुँचूँ-पहुँचूँ कि दिमाग का पचास प्रतिशत सात्विक तत्व फ्यूज! मेरी परेशानी और झुँझलाहट बढ़ने लगी थी। उन क्षणों में मानवीय दुख, त्रासदी, शोषण... धूल-कीचड़ के बारे में सोचना भी नहीं चाहती थी, बिलकुल भी नहीं। पर पहाड़ के रास्तों में बनी खपरैल की कच्ची, अधबनी, रिसती झोंपड़ियाँ, कादा-कीचड़, गोबर, कचरा, रँभाती गाएँ, पगुराते साँड़ और सुबह की गंदगी को चतुर मेहतरों की तरह सफाचट करते सूअर मुझे भूलने ही नहीं देते थे कि मेरे पैर अभी भी धरती पर ही हैं। और उस पर हर तीसरे कदम पर डोली वालों की रट सुनते-सुनते मेरी खोपड़ी झनझना गई। मन किया कि किसी कुत्ते की तरह अपने गले पर पट्टी लटका लूँ... मुझे डोली नहीं चाहिए।

बहरहाल, मैं जल्दी-जल्दी चलने लगी कि जितनी जल्दी हो सके इस धरती के धूल-धक्कड़ को पार कर पहाड़ की किसी उच्च शिला पर बैठ स्वयं को पहाड़ी हवाओं और फूल बरसाती बहारों के हवाले कर सकूँ, कि गहन एकांतिक क्षणों के भीतर कुछ उगे... कुछ अद्भुत... अलौकिक... कुछ अविस्मरणीय। आखिर ये वे पहाड़ियाँ ही तो थीं, जिनके किसी ऊँचे टीले पर बैठकर ऋषियों-मुनियों ने अपनी आत्मा की पड़ताल की थी। जीवन के अर्थ खोले थे।

अंततः पहाड़ और ऊँचाइयाँ। सुबह-सी सुबह। दिग्-दिगंत तक फैली सघन हरियाली, नारंगी होता आकाश और हवा में झूलते ऊँचे-ऊँचे दरख्त... मैं आमंत्रित किसी ऊँची उड़ान के लिए... पर मुझे धरती पर ही अटका रखने को उतारू ठौर-ठौर पर रेड़ मारते ये डोली वाले!

आखिर मैं किसी ऊँची शिला पर बैठ यात्रियों और डोली वालों के काफिले को गुजरते देखती रही। थोड़ी देर बाद ही सब यात्री जा चुके थे। डोली वाले भी समझ गए थे कि मुझे आगे नहीं बढ़ना है। और देखते ही देखते अब वहाँ पूर्ण निस्तब्धता थी। न इनसान, न इनसानी आवाज।

मैं और सामने विराट!

मन और आत्मा पर सदियों से जमी फफूँदी और थकावट की काई को मिटाने के लिए मैं आँखें मूँद लेती हूँ और स्वयं को हवाओं के हवाले कर देती हूँ। अंतर्चक्षु गहराते हैं और भीतर रोशनी की एक हलकी लकीर-सी खिंचने लगती है।

पूरी तरह माइंड से नो-माइंड की स्थिति।

मैं युग-युग तक उसी प्रकार बैठी हवाओं में उड़ती, हवाओं से ताकत बटोरती रहती। ब्रह्मांड के आर्केस्ट्रा को सुनती रहती, आत्मा पर लगे महानगरीय कीचड़ को धोती रहती कि तभी जैसे किसी ने ढेला मार मेरी तंद्रा भंग कर दी।

वे तीन किशोरियाँ थीं, जो इस प्रकार सघन सन्नाटे में पत्थर के ऊपर आँखें मूँदे, आलथी-पालथी मारे देख मुझे माथा-फिरी समझ खिलखिलाकर हँस पड़ी थीं। गिलहरी-सी चंचल किशोरियाँ। सभी ग्यारह से पंद्रह वर्ष के बीच की। ये कहाँ से आ टपकीं? मैं भीतर से बाहर लौटी। नहीं, ये बाहर की नहीं थीं। ये यहीं की स्थानीय बाशिंदा थीं। पहाड़ी हिरनियों-सी इनकी धमाचौकड़ी, झूमा-झटकी, मैले कपड़े, पाँव में सस्ते प्लास्टिक की चप्पलें एवं बिखरे बाल... मुझे कुछ भी संदेह नहीं रहा था कि तभी देखा - उनके पीछे-पीछे एक अधेड़-सी स्त्री।

ये यहाँ पहाड़ पर क्या करने आई हैं? शायद खोखड़ी-कुकड़ी (एक प्रकार की सब्जी) या महुआ बटोरने आई होंगी। कई आदिवासियों को देखा था मैंने खोखड़ी-कुकड़ी को बीनते और उनकी लुगदी बनाकर खाते।

''क्या महुआ बटोरने आई हो?'' पर बजाय जवाब देने के वे हँसने लगीं। झर-झर बहती हँसी।

मैं फिर पूछती हूँ... वही सवाल।

जवाब देते उनकी आँखें, हाथ-पैर सभी बोलने लगते हैं।

''हम पहाड़ पर बालू उठाने आई हैं।''

''बालू? सपने इकट्ठे करने की उम्र और बालू? पर क्यों?''

वे हँसने लगती हैं। महुआ-सी मोहक हँसी। लगा, जैसे वे जिंदगी से कुछ ज्यादा ही खुश हैं।

मैं फिर पूछती हूँ... वही सवाल।

''यहाँ पहाड़ पर मंदिर बनेगा।''

''क्या? हे भगवान! एक और मंदिर! क्या होगा इतने मंदिरों का? यात्रियों से ज्यादा मंदिर!

''क्या यहाँ की भूमि धँस नहीं जाएगी इतने मंदिरों के भार से? ''

उड़ते बादल के टुकड़े की तरह स्मृति का कोई टुकड़ा जेहन में तैरने लगता है। करीब पाँच-छह वर्ष पूर्व की एक घटना। झारखंड में ही गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड में एक बार घूमते-घामते ही जनजाति के एक आदिवासी से पूछा था मैंने, 'क्या तुमने किसी हिंदू देवी-देवता को देखा है?' उसने गर्दन हिला दी थी, ''यहाँ तीस कोस तो मैं हर दिन चलता हूँ... मैंने तो नहीं देखा कोई मंदिर... कोई आलय... हाँ, एक बार विश्व हिंदू परिषद के लोगों ने जरूर कुछ कैलेंडर और लॉकेट बाँटे थे, बस तभी एक दफे देखी थी भगवान्ï राम की तसवीर।'' और सचमुच मैंने देखा, उन आदिवासी अंचलों में मीलों तक कोई मंदिर तो क्या कोई आलय, शिवालय या सिंदूर-पुता शिवलिंग तक नहीं था। और यहाँ मंदिरों के जखीरे! काश, इनमें से किसी को उठाकर उन अंचलों में ले जा पाती तो पठारी इलाका वृंदावन बन जाता।

उतरती नदी-सी उस अधेड़ स्त्री को मेरी बात रास नहीं आई। रेत पर पड़ी मछली-सी उसके चेहरे की सूखी खाल हलके से काँपी। छिपकली की तरह थोड़ी बाहर को निकली उसकी आँखें सिकुड़ीं... होंठ बुदबुदाए - ''बनते रहें मंदिर। बालू उठाते-उठाते लीद निकल जाती है, पर भात तो मिल जाता है।''

उसका नाम अग्निदेवी था और वे तीन किशोरियाँ थीं - गुड़िया, टुडु और रानी - उसकी पुत्रियाँ।

उनमें सबसे बड़ी गुड़िया से मैं पूछती हूँ - ''कितनी मजदूरी मिलती है एक दिन में?''

अपने श्रम के गर्वीले गुमान के साथ बाएँ हाथ का पंजा उठाते हुए वह बताती है - ''पाँच रुपए।''

''बस? कितनी बालू उठाने पर?''

''सुबह आठ बजे से शाम पाँच बजे तक।''

''क्या? बीच में खाने के लिए छुट्टी नहीं मिलती?''

अपनी विपन्नता से बेखबर वह शरमाती हुई ताजा निकले चूजे की तरह माँ से सट जाती है। टुडु जवाब देती है - ''हम लोग बीच में खाते ही नहीं।''

''क्या...? घर कितनी दूर है?''

चंचल चिड़िया की तरह चोंच खोलती हुई वह तपाक से जवाब देती है - ''तीन किलोमीटर।'' जवाब देकर वह फिर अपनी टाँगों को हिलाने लगती है।

तीन किलोमीटर यानी हर दिन छह किलोमीटर की आवाजाही और नौ घंटे की रगड़ाई के बाद सिर्फ पाँच रुपए?

अग्निदेवी के चेहरे पर पतझड़ छा जाता है। अपने चहुँ ओर बिखरी सुंदरता से बेखबर अपने ही भीतर के यातनागृह में डूबती-उतराती वह कहती है - ''क्या करेंगी? और कोई काम भी तो नहीं मिलता।''

मैं सहानुभूति से उसकी ओर देखने लगती हूँ कि तभी नजर फिसलती हुई ढेर सारे बंदरों पर। लाल-लाल मुँह के बंदर खोंखियाते हुए एक डाल से दूसरी डाल पर कूद-फाँद रहे थे। मैं उत्तेजना से चीख पड़ती हूँ - ''देखो, बंदर!'' अग्निदेवी के बैंगनी होंठों पर भी हलका स्मित फैल जाता है। थोड़ा करीब आ मेरी आँखों में देखते हुए वह आशा-भरे स्वर में पूछती है - ''डोली लगेगा बहनजी! हमारा आदमी डोली उठाता है। बीस रोज से पहाड़ पर दौड़ रहा है, पर कोई यात्री नहीं मिलता।''

''क्या? डोली?'' जमी बर्फ-सी उदास वे आँखें! और उस क्षण की लपट... मेरे भीतर अचानक कुछ पिघलने लगता है।

बड़ी मुश्किल से दो शब्दों को कंठ से बाहर ढकेलती हूँ - ''नहीं, मैं पहाड़ पर नहीं चढ़ रही।''

क्षण-भर वह मुझे देखती है। प्लास्टिक की चप्पलों में अपने बेडौल पैरों को घुसाती है और सूखती नदी-सी अपनी आँखों को दूसरी ओर घुमा लेती है। मैं उसे पगडंडियों की तरफ जाते देखती रहती हूँ।

मैं फिर ध्यानाविष्ट होने की चेष्टा में आँखें मूँद लेती हूँ। लेकिन कोई तार जैसे टूट गया था। मेरी सारी लय-ताल-गति टूट जाती है। आँखें मूँदते ही श्रम को किसी पवित्र पाठ की तरह पढ़ती वे श्रम-सुंदरियाँ और गमगीन अग्निदेवी की बुझी-बुझी आँखें और भी शिद्दत से मेरे मानस में लोटने लगती हैं। अब चाहकर भी पहले की तरह आलथी-पालथी मार मैं बैठ नहीं पाती। एक महीन उदासी और बेचैनी मुझ पर तारी हो जाती है...। समझ जाती हूँ कि दैन्य और दरिद्रता के दलदल में साधना के कमल नहीं खिल सकते।

बैग हाथ में ले मैं आगे बढ़ने लगती हूँ।

कदम आगे बढ़ते हैं, पर विक्षुब्ध मन पीछे-पीछे।

एक बार इसी प्रकार कन्याकुमारी के समुद्र-तट पर विक्षुब्ध मनःस्थिति के साथ घूमते-घूमते रामकृष्ण मठ के एक संन्यासी से मेरी भेंट हुई थी। उन्होंने मुझे एक मंत्र दिया था - 'जब कभी अशांत और तनावग्रस्त हों, आप शांति के साथ अपने भीतर उठते आवेगों, तनावों और अशांति को देखिए... धीरे-धीरे आप अपने भीतर की बावड़ी में इतनी गहरी उतर जाएँगी कि पता ही नहीं चलेगा कि कब सतह की अशांति और तनाव शांत हो गया। गहरा पानी हमेशा शांत होता है।'

'पर आपने संन्यास लिया ही क्यों था महाराज?' मैंने पलटकर पूछा था। हँस दिए थे वे, एक उदास हँसी - 'हर संन्यास के पीछे कोई बेचैनी, कोई अशांति और कोई मोहभंग ही होता है। मैं अपने गाँव का नंबर वन पहलवान बनना चाहता था, पर हर बार ऐसा होता कि मैं दो नंबर पर आकर अटक जाता। अपनी हार... अपने कमतर होने को मैं सहन नहीं कर पाता। स्वप्न में भी मुझे वही पहलवान दिखता। मेरी छटपटाहट और बेचैनी का आलम यह था कि दिन में भी मैं दीवारों पर मुक्के मारता। उन्हीं दिनों मुझे अपनी पहली नौकरी का नियुक्ति-पत्र भी मिला, पर मुझे कोई खुशी नहीं हुई। माँ ने कहा, नौकरी मिली है, जा, जाकर गुरुदेव से आशीष ले आ। मैं उनसे मिलने के लिए निकल पड़ा। वहाँ मैंने अपनी बेचैनी के बारे में बताया। उन्होंने कहा, जब तक जीवन है, असफलताएँ और अस्वीकृतियाँ तो रहेंगी ही। मान लो, इस जन्म में तू पहलवान बन भी गया तो क्या, अगले जन्म में भी असफलता तो पीछा नहीं छोड़ेगी। इससे सदा के लिए पार पाना है तो संसार की आवाजाही से ही ऊपर उठ जा, बन जा संन्यासी।

'बस, मैंने सोच लिया कि मुझे नहीं रहना संसार में। पैंट-शर्ट पहनकर निकला था घर से... पर लौटा तो नंगे पैर... मुड़ा सिर और गेरुए वस्त्र।'

'फिर मिल गई आपको शांति?'

मेरे प्रश्न की तल्खी से चौंक गए थे वे। चेहरे पर उदासी का अक्स उभरा। धीर-गंभीर आवाज में बोले, 'यह तो इतने वर्षों के बाद समझ पाया हूँ कि संपूर्ण शांति सिर्फ एक मरीचिका है। एक मृत्यु है। शांति-अशांति, सफलता-असफलताएँ तो जीवन-सागर की लहरें हैं। यह कैसे संभव है कि जीवन रहे और लहरें नहीं उठें। फर्क सिर्फ इतना ही है कि कामनाओं की चाँदनी जब तेज होती है तो लहरों का मचलना-उछलना वेग से होने लगता है, अन्यथा वे निस्पंद पड़ी रहती हैं।'

चिंतकों और ऋषियों की उस भूमि पर चलते-चलते कन्याकुमारी और संन्यासी का ध्यान किसी सुखद झोंके की तरह आया और चला गया। खंडहरों में दबे इतिहास की ही तरह। शायद ऐसे ही निविड़ आवेग और अशांति को शांत भाव से देखती, महसूसती मैं पहाड़ पर आगे बढ़ती हूँ... बढ़ती ही जाती हूँ।

मैं और मेरा आसपास... सब स्थगित!

ऊँचाइयाँ और ऊँचाइयाँ!

पूर्णत्व का अहसास कराती प्रकृति और एक अतींद्रिय स्वप्नलोक की सृष्टि करती पहाड़ियाँ और इन सबके साथ बहता-फैलता पहाड़ी संगीत, उड़ते परिंदे और रागिनी गाती हवाएँ... सब कुछ मिलकर मन पर अजीब छाप छोड़ने लगे। खुल जा सिमसिम की तरह इतिहास के दरवाजे खुलने लगे। शताब्दियाँ आँखों के सामने से गुजरने लगीं। बुद्ध, महावीर, सुकरात, ईसा... पंत, निराला और अज्ञेय। 'पर सबसे अधिक मैं वन के सन्नाटे में मौन हूँ, क्योंकि ये ही मुझे बताते हैं कि मैं कौन हूँ।' शायद ऐसे ही किसी निविड़, निःशब्द सन्नाटे में लिखा होगा अज्ञेय ने।

अपने भीतर बहती, सोचती-विचारती, हाँफती-हाँफती मैं काफी ऊँचे पर साँस लेने के लिए कुछ देर ठहरती हूँ कि रास्ता फिर दो फाँकों में। इधर मुड़ूँ कि उधर? और तभी बिजली की तरह यह खयाल कौंधता है कि फड़-फड़ इतना ऊँचा चढ़ गई... पर मैंने कोई निशान तक याद नहीं रखा... इस बीच जलेबी की तरह ये गोल-गोल चक्करदार जंगली रास्ते जाने कितनी बार दो फाँक हुए, अब उतरते वक्त कहीं भटक गई तो? इतने सौंदर्य और भव्यता के बीच मैं तो भूल ही गई थी कि मुझे नीचे भी उतरना है। अब मैंने चारों ओर नजरें दौड़ाईं... मैं और पहाड़। दूर-दूर तक न आदमी, न आदमजात। एकाएक मेरे और सृष्टि के बीच व्याप्त सन्नाटा गहरा गया... सघन और रहस्यमय सन्नाटा! साँय-साँय करती हवा और पहाड़ एकाएक रहस्यमय हो उठे। भीतर घात लगाए बैठा डर अपने पंजे गड़ाने लगा। एकाएक मेरी रीढ़ की हड्डी में कंपन होने लगा और पाँव के तलुओं में सनसनाहट। यह शायद एकदम अकेला पड़ जाने के चलते घबराहट की चरमावस्था थी। कल्पना में दिखने लगी, बाघ के नुकीले जबड़ों के बीच फँसी अपनी काया। लाल-लाल बहता खून। हे करुणानिधि! हे दयानिधि...! बस, एक बार! प्रार्थना और बदहवासी! माथे पर उग आई पसीने की बूँदों को कुरती की बाँह से पोंछती-पोंछती फिर एक आवाज आई... थोड़ी दूर से... सूखे पत्तों पर चलने की चरमर-चरमर। समझ गई, लो आ गया कोई बाघ कि भालू... जानवर भी घात लगाए रहते हैं, अकेले को देख दबोच लेते हैं... इसीलिए कोई इन पहाड़ों पर अकेला नहीं जाता। हाथ जुड़ गए... सब खलास। आवाज थोड़ी और नजदीक आई... पेड़ों की ओट में होने को नजरें दौड़ाईं तो वाह रे किस्मत के वारे-न्यारे... झाड़ियों को संटी से हटाते... रास्ता बनाते दो डोली वाले। एक लंबू, एक मँझोला। लगा, जैसे डोली वाले नहीं, जीवित देवता दिख गए हों - पहाड़ के देवता।

उनकी साँसें और पहाड़ी संगीत।

वे भी मुझे वहाँ देख चौंके। फिर सहज मुस्कान। थोड़ा हाँफते हुए उत्सुकता से पूछ बैठे, ''डोली लगेगा बैनजी!'' थोड़ी लचक के साथ बोला गया बैनजी शब्द कानों में रस टपका गया।

मैं मुंडी हिला देती हूँ। भर-भर आँखें उन्हें देखती हूँ - थके हुए। शांत।

वे फिर आग्रह करते हैं, ''जब यहाँ तक आ गई हैं तो पहाड़ का दर्शन कर ही लीजिए। जो समझ में आए दे दीजिएगा।''

''मुझे पहाड़ नहीं करना...'' जी कड़ा कर बोलती हूँ मैं।

उनके ताजिए ठंडे पड़ जाते हैं, ''कोई बात नहीं बैनजी!''

डोली को कंधे से उतार थोड़ी दूर पत्थरों पर ऊटपटाँग ढंग से बैठ जाते हैं वे और नीचे कतार में बने मंदिरों की ओर देखने लगते हैं।

मैं भी उधर ही देखने लगती हूँ... हलके गुलाबी रंग में, कमल की पंखुड़ियों के आकार में ढला एक ताजा, टटका मंदिर ऊपर से बेहद आकर्षक लगता है।

उनसे बतियाने के लिए थोड़ा करीब खिसकती हूँ। कड़ुवे तेल और पसीने की मिली-जुली गंध का हलका-सा भभका। आत्मीयता से लंबू मेरी ओर देखता है -''अकेली ही हैं बैनजी?'' अपने पीछे की ओर खिंचे बालों पर हाथ फेरते हुए वह पूछता है।

''हाँ, नीचे उतरना है... पर कौन-सा रास्ता पकड़ूँ? ओफ, मैं तो बुरी तरह घबरा गई थी कि आप दिख गए।''

वह हँस पड़ा। मखाने-सी मीठी हँसी - ''ई पहाड़ियाँ, देव पहाड़ियाँ हैं। इहाँ पर कोई रास्ता भटक भी जाए तो पहाड़ के रक्षक भौमिया देवता अपना वाहन कुत्ता भेज देते हैं... कुत्ता रास्ता दिखा देता है।''

क्या बात! जैन होते हुए भी यह मेरे लिए नई बात थी। नीचे उतरने की बेताबी में मैं फिर पूछती हूँ - ''आप कब उतरेंगे? अभी कहाँ से आ रहे हैं?''

उसके चेहरे पर उदासी के बादल घनीभूत हो गए, ''ऊपर पहाड़ से। और कहाँ से आएँगे बैनजी? शायद ऊपर डोली लग जाए... इसी आशा में यात्रियों के पीछे-पीछे दौड़ गए थे।''

मैं अवाक्! ''तो पहले आपने यात्रियों से बात क्यों नहीं कर ली?''

दोनों के चेहरों की साँवली रंगत गहरा गई। एक निश्वास लेकर लंबू बोला, ''अरे बैनजी, जिनको चाहिए उनको तो डोली मंदिर से मिल ही जाती है। हम तो भूखे मरते उन्हीं के पीछे दौड़ जाते हैं, जिनके साथ डोली वाले नहीं होते कि ऊपर जब सँकरे, चिकने और खतरनाक रास्तों पर कोई नहीं चल सके तो उस समय हमारी डोली पर बैठ जाएँ... इसी आशा में...।''

''हे भगवान! बूँद-भर आशा में पूरे पहाड़ पर दौड़!''

मँझोले के चेहरे पर काँटे उग आते हैं, ''क्या करेंगे बैनजी, यहाँ नीचे भी तो कुछ काम नहीं है। भूखों मरते गाँव से पहाड़ दौड़ते हैं और पहाड़ से खाली हाथ फिर गाँव लौट जाते हैं।''

''क्या कभी ऐसा होता है कि ऊपर जाकर यात्री डोली कर लें...'' मैं फिर कुरेदती हूँ।

लंबू अपनी उठंग धोती पर बैठी रंग-बिरंगी तितली को उड़ाते हुए हलके से हँस पड़ता है, ''हाँ, कई बार हो भी जाता है... पिछले महीने ही बंबई से एक पार्टी आया था... ऊपर अचानक उनकी औरत की तबीयत खराब हो गई, चक्कर आने लगे, जैसे ही हमने कहा, डोली पर बैठ जाइए, वे झट से बैठ गए... बड़े अच्छे लोग थे, दोगुनी मजदूरी दिए।''

वह अपनी रौ में बहा जा रहा था कि तभी मुझे ध्यान आया कि अभी तो यात्रियों को गए मात्र अढ़ाई घंटे हुए होंगे, तो क्या इतनी जल्दी इन्होंने 27 किलोमीटर का इतना दुर्गम पहाड़ भी तय कर लिया? नीचे भी उतर गए?

लंबू समझाता है, ''देखिए, 27 किलोमीटर के पहाड़ में नौ किलोमीटर का रास्ता ही सबसे कठिन, फिसलन-भरा और खतरनाक होता है। हम वहीं तक यात्री के पीछे-पीछे चलते हैं। जो नौ किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ गया उसे फिर डोली नहीं लगती... हम फिर लौट आते हैं।''

''बाप रे! हर दिन की अठारह किलोमीटर की चढ़ाई और उतराई... वह भी एक मरियल-सी उम्मीद के सहारे!'' आश्चर्य और दुख मेरी आवाज में घुल-मिल जाते हैं।

वह बिखर जाता है, ''का करेंगे बैनजी, हर धर्मशाला में हजार डोली वाला... सब मिलाकर चार हजार डोली वाला ... मुश्किल से महीने में एको बार नंबर आता है।''

मैं लंबू को ध्यान से देखती हूँ। लंबू के दाएँ हाथ पर सिक्के के तीन निशान। एक बार मुझे बिशुनपुर में ही किसी आदिवासी ने बताया था, 'जैसे हमारी स्त्रियों के शरीर पर गोदने के निशान जरूरी हैं वैसे ही पुरुष आदिवासियों के दाहिने हाथ पर सिक्के के तीन निशान... यह हमारे पुरुषार्थ की निशानी है...। दरअसल बचपन में ही रूई के तीन टुकड़ों को तेल में भिगोकर कलाई पर रख देते हैं, फिर उनको जला देते हैं... हाँ, बहुत तकलीफ होती है, पर जो इसे सहन नहीं कर पाता, हम उसे आदिवासी ही नहीं मानते। मुझे तीन दिन तक बुखार रहा था। पर अब यह रिवाज धीरे-धीरे शेष हो रहा है। अब हम अंधविश्वासों से दूर हट रहे हैं। हमने अपने बच्चों के हाथों पर सिक्के नहीं बनाए।

मैं फिर लंबू की ओर देखती हूँ... सिक्के के तीन निशान। थोड़ी झिझक के बाद मैं पूछ ही लेती हूँ, ''आप क्या आदिवासी हैं?''

वह बातों के घोड़ों पर सवार हो जाता है।

''हाँ, हम आदिवासी हैं... संथाल आदिवासी। हमारा नाम बुद्धन माँझी है। जी नहीं, ये सदान हैं (हरिजन), इनका नाम फ्रुश्चन है - फ्रुश्चन तूरी... हम दोनों ही पास के गाँव के हैं, भुर्कुण्डा गाँव। हमार गाँव में 54 हँडिया (घर) हैं, छह कुएँ हैं। नहीं, बिजली नहीं है। गाँव में तीन जातियाँ हैं - आदिवासी, तुरिया (हरिजन) और मियाँ। नहीं, आज तक कभी कोई झगड़ा-टंटा नहीं हुआ। अरे, भात की चिंता से ही फुर्सत नहीं मिली। जात की चिंता का करेंगे... जी, यहाँ से तीन किलोमीटर पर है।'' बातचीत थोड़ी देर के लिए फिर थम जाती है। बुद्धन माँझी पास के ही पेड़ से करंज के दातुन तोड़ उसे अपने थोड़े-थोड़े बाहर निकले दाँतों पर रगड़ने लगता है। थोड़ी देर की रगड़ के बाद वह उस बचे हुए टुकड़े को दूर उछाल अपनी उठंग धोती के कोनों से ही मुँह पोंछ लेता है। न कुल्ले की जरूरत, न वाश-बेसिन की। शायद करंज के इन दातुनों का रस दाँतों के लिए उपयोगी होता है और उसके करने के बाद टूथपेस्ट की तरह मुँह इस कदर गंदा भी नहीं होता कि उसे पानी से धोना पड़े... प्रकृति की चीजें अपने में पूर्ण होती हैं।... अपनी आदत के मुताबिक मन ही मन सोचती मैं कनखियों से उसकी ओर देखती हूँ कि तभी एकाएक मन झंकृत हो उठता है... जैसे किसी ने आत्मा का वाद्य यंत्र छेड़ दिया हो... ढेर सारे खूबसूरत तोते और बीच में नीलकंठ मेरे एकदम करीब से उड़ते हुए। मैं खुशी से चीख पड़ी, ''देखो देखो तोते... देखो नीलकंठ!''

दोनों हँसने लगे - ''क्या आपके शहर में तोते नहीं दिखते?''

मैं झेंप जाती हूँ... तोते तो तोते, वहाँ तो आजकल गाय-बकरी तक नहीं दिखतीं। बस, दिन-भर काँव-काँव करते कौए, छाई रंग के कबूतर या फिर जाले में बंद नई नस्ल की सफेद-लाल ढेरों छोटी-छोटी मुर्गियाँ। या सड़क पर घूमते घाव खाए, बाल उड़े कुत्ते।

मेरी नजरें नीलकंठ का पीछा करती हैं। कुछ बोलने को होती हूँ कि देखती हूँ... झाड़ियों के पीछे से आता एक गड़ेरिया... पीछे-पीछे बीस-पच्चीस भेड़ें। फ्रुश्चन तूरी से पूछता है वह, ''कितना यात्री ऊपर चढ़ा? काम मिला?''

तूरी हलके से शरमा गया। गुड़ की भेली-सी मीठी शर्म, ''अरे काम मिलता तो का इहाँ बैठे रहते... !''

बाप रे! इन पहाड़ियों पर तो काम मिलना भी एक घटना है। एक खबर। ऐसा क्या मिल जाता होगा एक डोली उठाने का? मुझसे रहा नहीं जाता। पूछ ही लेती हूँ, ''भैया, कितना मिल जाता है आपको पूरा पहाड़ करवाने का?''

''बँधा हुआ रेट है बैनजी।'' पचास से सत्तर किलो तक हर डोली वाले को 350 रुपया और उसके बाद 375 रुपया।''

''क्या सत्ताइस किलोमीटर के इतने कठिन, खतरनाक और दुर्गम पहाड़ पर 50 से 70 किलो का बोझ लादने का सिर्फ 350 रुपया?''

मेरा आश्चर्य देख पूरे जमाने का दुख उसके साँवले चेहरे पर इकट्ठा हो जाता है। चिपचिपा चेहरा और भी चिपचिपा लगने लगता है, ''एक तो कम रेट, ऊपर से मार झिक-झिक। अभी थोड़े दिन पहले की बात है, दिल्ली का एक पार्टी था... बाबू पूरा रास्ता डोली पर बैठा रहा... एक बार भी नहीं उतरा... ठीक है, पैसा दिया है, बैठा रहे, पर मजा देखिए, जब चंदा प्रभु की टॉक (पद-चिह्न - सबसे ऊँची पहाड़ी) आई तो बोला कि सीढ़ियों पर भी डोली ले चलो। हम माथे पर हाथ रख दिए... कैसा तो यात्री? हम हँसकर बोला, बाबू, धरम इतनी आसानी से नहीं होता... पुण्य का रास्ता कठिन ही होता है... ऊपर खुद चढ़िए तो मिलेगा पुण्य। बार रे, वह तो आँखें दिखाने लगा... हमारी बात चुभ गई। बोला, कामचोर। नहीं चलना है तो गियान बघारता है! तब ये (बुद्धन माँझी) समझाए कि बाबू, इतनी सँकरी सीढ़ियों पर डोली चढ़ाएगा तो आप भी मरेगा और हम भी मरेगा। फिर भी देखिए मजा कि अपनी जान से ज्यादा पैसे वसूलने की पड़ी थी। कहता है, तो पहले क्यों नहीं बोला? तुम्हारा पैसा काटेगा।''

और अपने सारे दुखों और जिल्लतों को नीचा दिखाते हुए वह हँस पड़ा। पहाड़ी बारिश-सी मोहक हँसी।

हलकी-हलकी बारिश। टापुर-टापुर। हम थोड़ा हटकर एक बड़े वृक्ष के तले बैठ गए। तूरी कान के पीछे से अधबुझी बीड़ी निकाल सुट्टा मारने लगा। बातचीत फिर थोड़ी थमी। भर-भर आँखें नजरें दौड़ाईं - लाल मुँह वाले बंदरों का परिवार फिर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदा। सिर पर लकड़ियों का बड़ा-सा गट्ठर लिए कोई लकड़हारा गुजरा। दो-तीन आदिवासी झाड़ियों में घुसे... शायद कुकड़ी या महुआ बटोरने या जड़ी-बूटी की खोज में। एक-दो आदिवासी औरतें भी गुजरीं... सिर पर पत्तियों का ढेर लादे। गड़रिया, लकड़हारा, बंदर, रंगीन तितलियाँ, तोते, नीलकंठ और बकरियाँ... । लगा, किसी पुरानी दुनिया में लौट आई हूँ... पेड़-पौधों, पशु-पक्षी और जानवरों की भरी-पूरी जादुई दुनिया में।

इस बूँदाबाँदी, पहाड़ी संगीत और मद्धिम-मद्धिम बहती पुरवैया ने शायद बुद्धन माँझी और तूरी को भी भीतर से तरंगित कर दिया था। वे आँखें मूँदे धीरे-धीरे हाथों से ताल देते गाने लगे, 'हैरे हो-हैरे हो! भूति भला कति खान छूटि! हैरे हो, हैरे हो... '

बादल-बादल बहता गीत उठान पर आया तो उसकी पुकार 'हैरे हो... हैरे हो' मुझे भी आकुल-व्याकुल करने लगी। गीत की उदासी और आवाज की कसक हौले-हौले भीतर उतरती गई। मैं जैसे किसी उदात्त भूमि पर पहुँच गई। मन किया, युग-युगांत तक उस जादुई परिवेश में पंख फैलाकर धीरे-धीरे उड़ते-बहते संगीत को आँखें मूँद सुनती रहूँ... कि धीमे होते-होते गीत रुक गया।

क्या मतलब... 'भूति भला कति खान छूटि' का? मैं बहुत धीरे से पूछती हूँ कि संवेदना का झीना-झीना जाल जो इस बीच बुन गया था... चहुँ ओर, आवाज के जोर से तड़क न जाए।

बुद्धन की आँखें नम थीं। वह जैसे सोते से जागा, ''गीत क्या... हमी लोगन की कहानी है बैनजी!'' एक दीर्घ निःश्वास ले वह फिर कहने लगा, ''जब तक आदिवासी के शरीर में जान है, उसकी देह को दौड़ते रहना है। उसकी मजदूरी नहीं छूटने वाली।''

मतलब समझाकर वह फिर उदास हो गया। मेरी आँखों के सामने घूम गया बालू उठाता सुबह वाला वह परिवार। मुझे याद आई ऐसे ही लोकगीत की एक कड़ी, 'विपद नहीं बिसरे, विपद नहीं बिसरे, बने-बने लोराएँ सारू साग...' जिसे मैंने सिंहभूम के आदिवासी अंचलों में सुना था। जिसमें भी सारू साग की आस में वन-वन डोलती आदिवासिनी के थके पैरों की पीड़ा थी। सच... जैसा समाज वैसे ही उसके लोकगीत... न स्त्री, न प्रेम, न शृंगार, न अध्यात्म... सिर्फ जमीनी दुख और आहार की खोज...।

आदत के मुताबिक मैं फिर सोचने लगती हूँ कि तभी बुद्धन माँझी कहता है, ''चलिए हमारे गाँव... बहुत गीत सुन सकेंगी... और अब तो करमा भी करीब ही है... हर शाम नाचना-गाना-बजाना चलेगा, चलिए।''

उसकी आत्मीयता छूने लगती है। सोचती हूँ, क्या जवाब दूँ कि इसे बुरा न लगे। मुझे चुप देख वे दोनों फिर करमा की किसी घटना पर बात करने लगते हैं।

थोड़ी देर बाद मैं बात बदल देती हूँ - ''क्या यहाँ भी आप लोगों का नाचना, गाना-बजाना चलता रहता है?''

उसकी आँखें जैसे वेदना की झील में तैरने लगती हैं, ''इहाँ डेढ़ हाथ की जगह में हम लोग का नाचेंगे-गाएँगे। इहाँ तो रात-भर अधबैठे... अधसोए अपनी डोली पर लुढ़कते रहते हैं... पीठ अकड़ जाती है।''

वह अपनी रौ में बोलता गया कि तभी जेहन में कौंधा - मंदिर के खुले प्रांगण में एक-दूसरे पर औंधे लेटे, भेड़ की तरह एक-दूसरे से सटे, सिमटे-सिकुड़े ढेर सारे डोली वाले। पर उस क्षण दोनों की जीवंतता और व्यक्तित्व को देख यह विश्वास करना मुश्किल था कि ये दो भी उन्हीं ढेरों में से थे।

थोड़े संकोच के साथ पूछती हूँ, ''आप लोग कहाँ ठहरे हैं?''

बुद्धन मेरी बात ठीक से समझ नहीं पाता। तूरी जवाब देता है, ''यहीं मंदिर के बाहर... और कहाँ ठहरेंगे बैनजी! जी, वहीं सब कुछ होता है, खाना-पीना। अभी बारिश का जोर है तो वहीं डोली पर ही गूँगूँ पहन बैठ जाते हैं।''

गूँगूँ शब्द पर ध्यान अटक जाता है। ''यह गूँगूँ क्या है?''

बुद्धन मेरी इस नई जिज्ञासा पर हलके से झुँझला जाता है। उबासी लेते हुए बताता है, ''पत्ते से बनाई हुई टोपी होती है। थोड़ी बड़ी होती है। बारिश होती है तो सिर पर डाल लेते हैं।''

''खाना भी वहीं... मंदिर के बाहर?''

उसके माथे पर हलके से बल पड़ते हैं।

''नहीं, खाना पास के होटल में खा लेते हैं। दस रुपया में एक प्लेट भात मिलता है। दोपहर को वहीं खा लेते हैं।''

''और शाम को?''

उसकी आँखों में पीड़ा झिलमिलाने लगती है, ''शाम को कहाँ बैनजी, हम लोग तो एक बेला ही... भर दिन बस वही एक प्लेट।''

क्या उसी प्लेट-भर भात पर इतनी कड़ी चढ़ाई... मुझे लगा, मैं कहीं गलत समझ गई हूँ। संशय मिटाने के लिए पूछ बैठती हूँ, ''सुबह-शाम चाय तो लेते होंगे?''

मेरी नासमझी पर हँस देता है वह, पर हँसी अपनी आखिरी लहर में हलकी उदासी में बदल जाती है।

''नहीं बैनजी, चाय-वाय तो कभी-कभार साल-डेढ़ साल में मेला-वेला में पी लिया तो पी लिया। हाँ, गाँव में ताड़ी खूब चलता है... सुबह-शाम कभी भी। वो है ना, आदिवासी की ताड़ी, मियाँ की दाढ़ी...'' और बचकानी खुशी से वह हँस पड़ता है।

मैं ध्यान से उसे देखने लगती हूँ। उतार पर आता कमजोर शरीर। पतला चेहरा, थका-थका। कुछ पूछूँ कि उसके पहले ही वह उघड़ने लगता है, ''गाँव में हम छह भाइयों के बीच छह बीघा जमीन है। पठारी इलाका है न! कभी बहुत बारिश होती है तो सब बह जाता है और कभी बारिश नहीं होती... तो फसल मर जाता है। ई वर्षा में हालात ज्यादा बिगड़ा है। खटनी बढ़ी है। दौड़-भाग बढ़ी है। हम लोग पहले मोहलाइन पेड़ की लतर होती है न, उसकी खाल उधेड़, उसका ऊपर का छिलका उतार उसकी बीच की मज्जा को बटकर रस्सी बना लेते थे। उसे हाट में बेच देते थे। रस्सी तो अब भी बनाते हैं, पर सिर्फ अपने काम के लिए, अब वह हाट में नहीं बिकती। अब वहाँ प्लास्टिक की सस्ती रस्सियाँ आ गई हैं...। पहले गाँव में जटंगा से तेल निकलता था, वहाँ काम मिल जाता था, अब तो गाँव से पहाड़ और पहाड़ से गाँव।''

''क्या झारखंड बनने का आपको कुछ भी फायदा नहीं हुआ?''

सूखी नदी-सी उसकी आँखें मुझ पर टिक जाती हैं, ''नहीं, हम लोगों को कुछ फायदा नहीं हुआ। जो पढ़े-लिखे हैं उन्हीं को फायदा पहुँचेगा। हम लोगों ने सुना था कि सरकार ने बहुत पैसा दिया है। हमारी पंचायत का नाम है खुदीशार पंचायत, हमने पूछा तो जवाब मिला, पैसा बी.डी.ओ. के पास आया, माँगो जाकर उससे। हाँ बैनजी, इतना जरूर हुआ कि हमारा जो लड़का स्कूल में जाता है न, उसे साल में बीस रुपया मिल जाता है। गाँव के हर हड़िया... हर घर की यही कहानी है, बैनजी...'' और वह मायूसी से मुझे देखने लगा।

''क्या गाँव में भी आप लोग एक बेला...?''

बात पूरी करने से पहले ही बुद्धन समझ जाता है। समझाते हुए बताता है, ''नहीं, गाँव में सुबह के समय हम लोग दामड़ी पी खेत की तरफ निकल जाते हैं।''

''दामड़ी? वह क्या?''

''रात को जो भी मक्का-बाजरा या भात बचता है न, सुबह उसी में पानी और नमक मिलाकर पी लेते हैं।''

''अभी आपके यहाँ क्या बन रहा होगा?'' थोड़ा डरते-डरते मैं पूछती हूँ। किसी की निजता में इतना हस्तक्षेप? कहीं बुरा मान गया तो? पर वह मेरी जिज्ञासा को सहज भाव से लेता रहा। शायद हर आदमी की तरह उसके भीतर भी बूँद-बूँद इकट्ठी होती एक कहानी जाने कब से दबी, अनबरसी, अनकही पड़ी थी और जो इन उदात्त और भरे-भरे क्षणों के ताप से बूँद-बूँद बहने लगती थी... अपने लिखे जाने को प्रस्तुत।

''अभी मकई छोड़ के आए हैं, उसका घाट बन रहा होगा।''

''हर वक्त मकई...?''

उसके चेहरे पर फिर उदासी तारी हो जाती है।

''क्या करें, बैनजी... हम लोगों का स्वाद तो अब मर गया है। अब तो पेट के गड्ढे में बस कुछ डाल देते हैं... अभी थोड़ा मकई छोड़ आए हैं, वह खत्म होगा तब बाजरा आ जाएगा।''

''फिर बाजरा के बाद...?''

''तब तक देखिए इहाँ कुछ न कुछ काम मिल ही जाएगा।''

''यदि यहाँ काम नहीं मिला तो?''

पूछने के बाद अपने कमीनेपन पर मैं सचमुच शर्मसार हुई, क्योंकि मेरे गणित के अनुसार एक बहुत ही दयनीय जवाब मुझे मिलने वाला था, पर उसकी आँखों में अगली फसल का स्वप्न चाँद बन तैरने लगा था। उम्मीदें फुहारों की तरह बरसने लगीं।

हुलसते हुए जवाब दिया उसने, ''तब तक अगली फसल का धान आ जाएगा। तब चलेगा भात और कतई साग (पत्तियों की सब्जी)।''

और मेरी सारी जिज्ञासाओं पर विराम लगाते हुए वह हँसने लगा, एक आशा-भरी उज्ज्वल हँसी।

बारिश अब थम गई थी। मन में उजास फैलाती हलकी नरम धूप नीम की पत्तियों पर आकर ठहर गई थी। एकाएक बंदर फिर धमाचौकड़ी मचाते हुए दिखे। मैं बैग से कैमरा निकाल उनकी तसवीर लेने को होती हूँ कि जाने किस कोने से हुकहुकाता हुआ एक भिखारी फिर सामने। उसकी काली हथेलियाँ, शरीर से निकली दुर्गंध और बरसात के कारण मँडराते मच्छरों से मन इस कदर भिनभिनाया कि बेसाख्ता मुँह से निकल पड़ा -''इन भिखारियों ने भी यहाँ जीना दुश्वार कर दिया है।''

''ई भिखारी नहीं है,'' जाने वह क्षण कैसा बीता और कितना भारी पड़ा उन दोनों पर कि दोनों एक साथ फूट पड़े, ''ई भिखारी नहीं है।'' जैसे खुद उनके वजूद की चट्टानें हिल गई हों... उस क्षण की लपट में।

गहन अपराध-बोध से भर गई मैं। क्या यह उनका कोई रिश्तेदार है? क्या मुझे भ्रम हुआ? सावन के अंधे की तरह मुझे हर जगह क्या सचमुच भिखारी ही भिखारी नजर आते हैं? क्या यह मुझसे माँगने नहीं, उनसे मिलने आया था? मैंने देखा, एक जर्जर दरख्त की तरह जर्रा-जर्रा बिखरी उसकी काया को हाथों से सहारा देकर उन्होंने उसे सीमेंट की पाटी पर बैठा दिया था और ढेर सारी आत्मीयता और पुचकार के साथ उसके कंधे पर हाथ रखे हुए थे।

मैंने अफसोस के साथ कहा, ''मुझे दुख है, बिना सोचे-समझे मुँह से निकल गया।''

मेरे बोलते न बोलते वही लँगड़ा व्यक्ति उदास हँसी हँस दिया, ''तो का भईवा?''

बुद्धन के चेहरे पर भादों की काली-काली बदलियाँ छा गईं। आवाज थर्रा गई, ''आप क्या हर कोई शिबू को भिखारी समझ दुत्कार देता है... पर कौन जानता है कि कभी यही शिबू पहाड़ पर डोली लेकर दौड़ लगाता था... खेत में हल जोतता था... चालीस-चालीस किलो का लकड़ी का गट्ठर पहाड़ से ढोकर लाता था। शिकार में सबसे आगे रहता था। हम जैसे तो उसके ठेंगे पर थे। मर्द आदमी था... एक बार पहाड़ से डोली लेकर उतरते वक्त फिसलन पर पाँव पड़ गया... फिसल गया... मर ही जाता, पर किसी प्रकार बच गया, पर तब से एक हाथ और एक पैर पर लकवा मार गया...।'' बोलते-बोलते अपने खुरदरे हाथों से बीड़ी निकाल उसे माचिस से सुलगाकर उसने शिबू को थमा दी।

तूरी भी उसे सहानुभूति और लगाव से देखते हुए उसका हाथ अपने हाथों में लेकर कहने लगा, ''हम लोग इसे पहाड़ी गैंडा कहते थे। एक मार में लकड़ी चीर देता था।''

अपने साथी के आँसू पोंछने वाले उन हाथों को देखती रही मैं। उस पहाड़ी निर्जन में चहुँ ओर बिखरी जंगली सुंदरता के बीच, विराट की साक्षी में बुद्धन की बातें मन पर अजीब ढंग से थाप दे रही थीं। एक समय का श्रमवीर आज का भिखारी... जीवन कैसे एकाएक बुझ जाता है। मेरे भीतर जोरों से कुछ हिलने लगा, जैसे कोई सोई पीड़ा जाग उठी हो। मैंने कनखियों से शिबू की ओर देखा... उसके बुझे चेहरे पर जीवन जैसे कुछ काँपा... पेड़ से झरती पत्तियों की तरह उसके होंठों से कुछ शब्द गिरे... जैसे इस बीच नए सिरे से उसने अपने भीतर यातनागृह देख लिया हो - ''ई सब मात्र 80 रुपयों की खातिर हुआ बैनजी! तब डोली उठाने का 80 रुपया मिलता था...'' और बोलते-बोलते वह फिर गमगीन हो गया।

उन क्षणों की बोझिलता को कम करने के लिए जरूरी था कि मैं चैनल बदल दूँ। इसी चेष्टा में मैं बोलती हूँ, ''क्या इन पहाड़ों पर दुर्घटनाएँ प्रायः होती हैं?''

मेरे पूछते ही भीतर इकट्ठी बूँद-बूँद पीड़ा पत्तियों पर टिकी बरसात की बूँदों की तरह बुद्धन की आँखों से टप-टप टपकने लगी, ''क्या बताएँ बैनजी, हर साल कोई न कोई डोली वाला मर जाता है या लँगड़ा-लूला बन जाता है। पिछली साल हमरा चचा का गोड़ बेकार हो गया... डोली उठा रहा था, एकाएक बिजली गिरी, बेहोश हो गया... यात्री उसे वहीं छोड़ नीचे उतर गए। बाद में हम लोग उसे डोली पर उठाकर लाए... बहुत इलाज भी करवाया। घर में इकलौती गाय थी, उसे भी बेचना पड़ा... बुक्का फाड़-फाड़ रोया गाय को बेचते वक्त, उससे लिपट गया जैसे अपनी माँ को बेच रहा हो। लेकिन घुटना ठीक नहीं हुआ... अब मुड़ता नहीं है। अब वह बोझा नहीं ढो पाता है। घर में बेकार बैठा है।''

बोलते-बोलते अमावस्या की काली रात उसके चेहरे पर पसर गई।

''आज साबुत बैठे आपसे बतिया रहे हैं, कौन जाने कभी हम भी लूले-लँगड़ों के बीच बैठे मिले। हम लोगन की तो यही कहानी है बैनजी... कहीं भूख, कहीं मौत, कहीं...।''

बोलते-बोलते एकाएक वह बहुत उदास हो गया। मैंने देखा, उसकी आँखों के कड़ाह में ठिठके दो आँसू। एक दीर्घ निश्वास लिया उसने और तूरी को ठेलते हुए कहने लगा, ''चलिए, अब लास्ट होई गलै।''

तूरी अपना झोली-झंटा ले उठने को होता है कि मैं फिर रोक देती हूँ। छोटे-छोटे पलों की यह बड़ी होती दुनिया, जीवन लेने और देने का यह सिलसिला काश थोड़ा और खिंच जाए। मैं फिर पूछने लगती हूँ, ''मंदिरों के पास तो करोड़ों का फंड है। महानगरों से झागमझाग बहकर आती है चाँदी। मंदिर कोई मुआवजा नहीं देता? सारी दुर्घटनाएँ तो काम के वक्त ही होती हैं न?''

पहली बार बुद्धन के चेहरे पर काँटे उग आए। आँखों में पलाश दहकने लगा, ''हम लोग कोई यात्री तो हैं नहीं कि मंदिर का धन मिलेगा। इतना डोली वाला मरा, लूला-लँगड़ा हो गया, गोड़ गँवा दिया, कुछ नहीं हुआ। पर सालों पहले एक यात्री का ऊपर खून हो गया था, तब से सारे नियम बदल गए... पहाड़ पर ऊपर डाकबँगले के पास बारह पुलिस को ड्यूटी पर लगा दिया गया...।''

वह लहूलुहान हुए जा रहा था। मुझमें अपराध-बोध भरता जा रहा था - नहीं, अब और नहीं कुरेदूँगी, कि तभी वह झटके से उठ खड़ा हुआ और फ्रुश्चन तूरी की तरफ मुखातिब हुआ, ''उठिए, अब लास्ट होई गलै।''

हम तीनों नीचे उतरने लगे, पर लगा जैसे वर्ग-चेतना का एक अदृश्य वितान मेरे और उन दोनों के बीच खिंच गया है।

और अब कहानी का उत्तरार्ध!

पहाड़ पर मेरा दूसरा दिन। फिर वही नाज-नजारे। फर्क महज इतना कि अब आँखों का कुँवारापन मर गया था, इस कारण भिखारियों, रोगियों, कोढ़ियों की लपक-झपक, गोबर, गंदगी और कचरे ने तो इतना परेशान नहीं किया... पर इतिहास फिर भीतर धड़कने लगा। एक कतार में बने मंदिरों में महावीर... कहीं पूर्णतः निर्वस्त्र तो कहीं पेड़ की शाखा की ओट में...। देखते-देखते आँखें फिर पीछे घूम गईं और शताब्दियाँ आँधियों की तरह सामने से गुजरने लगीं... राजपाट और पत्नी-परिवार को त्याग सत्य की खोज में नंगे पैर इन पहाड़ियों पर विचरण करते महावीर...। समाधि लगाते महावीर... आदिवासी बाला चंदनबाला से आहार ग्रहण करते महावीर, एक-एक कर अपने वस्त्रों का त्याग करते महावीर और अंत में परम तत्व की प्राप्ति पर अहिंसा और अपरिग्रह का पाठ पढ़ाते महावीर। हजारों वर्ष पूर्व ही उनकी अंतर्दृष्टि ने समझ लिया था कि सारे शोषण और उत्पीड़न के मूल में है पूँजी का संचय।

खूबसूरत विचारों और स्वप्नों के काफिलों के साथ चलती जा रही थी। मन पुलकित था। पहाड़ जाना-पहचाना था। मैं फुर्ती-फुर्ती जल-मंदिर तक चढ़ गई। बस, अब और आगे नहीं। घड़ी देखी, साढ़े बारह... यानी डोली वालों और यात्रियों के उतरने का समय। आँखें अनायास ही बुद्धन और तूरी को ढूँढ़ने लगीं, दूर-दूर तक कि कहीं से उतरते दिखें। वे तो नहीं, पर दूर झाड़ियों की ओट में कोई परछाईं डोलती-सी दिखी। पास आने पर देखा, जिसे मैं छाया समझ रही थी वे दिगंबर मुनि थे, पूर्णतः निर्वस्त्र। यूँ ऋषियों-मुनियों की इस नगरी में उनका बीच रास्ते में मिलना बहुत ही स्वाभाविक था, पर साधु-साध्वियों के बीच भी अपनी संपूर्ण वस्त्रविहीनता के कारण वे अलग ही ध्यान खींचते थे। गौर से देखने पर दिमाग में कौंधा कि ये वे ही स्टार महाराज थे, जिनके आदमकद कट-आउट और होर्डिंग मैंने धर्मशाला से पहाड़ तक आते हुए देखे थे और जिनके दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आए हुए थे। अपनी जैन परंपरा और संस्कार के अनुसार मुझे घुटनों के बल बैठकर उनकी वंदना करनी थी, पर अपने संस्कारों के सत्य को खंडित करते हुए मैंने हलका-सा नमस्कार ही किया। उनके एक हाथ में मयूर-पंख का बना चँवर था जिससे शायद वे अपने नग्न शरीर पर बैठे मच्छर-मक्खियों को उड़ाते थे। मेरे हाथों में खुला कैमरा और खुली डायरी को देख उन्होंने मुझे कोई रिपोर्टर समझा और मेरा अभिवादन किया।

छुआरे-सी सूखी और सख्त पड़ी उनकी खाल को देखकर मन किया कि पूछूँ उनसे कि उन्होंने पहले अपने तन को मारा कि मन को? सुना था, एक जैन साधु ने वासना से मुक्ति पाने के लिए अपनी आँखें ही फोड़ डाली थीं कि आँखें ही वासना की जड़ हैं। किसी और ने अपनी जननेंद्रिय को ही काट डाला था... पर वासना से पार नहीं पा सके थे वे, क्योंकि देह को जगाने के सारे मंत्र तो मन के तहखाने में गड़े रहते हैं।

बहरहाल, मुनिवर उतने मुखर नहीं थे। उन्होंने अपनी धीर-गंभीर आवाज में सिर्फ यही कहा, ''वस्त्र तो मात्र एक ढक्कन है। शरीर के विचार शांत हो गए तो ढक्कन को उतार फेंका।''

''पर इतने कठोर जीवन और धारा के विरुद्ध तैरने की सार्थकता?''

मुनिवर तरस खाती निगाहों से मुझे देखते रहे। पर साथ चल रहे श्रावक का चेहरा तमतमा गया। आवाज तन गई, ''अहिंसा की साधना और संसार की आवाजाही से मुक्ति और क्या? जब तक कर्मों के बंधन रहेंगे... संसार से मुक्ति नहीं मिलेगी... इसीलिए ये महाराज संसार से कुछ नहीं लेते सिवाय दो मुट्ठी अन्न के। आप नहीं जानतीं कि कितना कठोर जीवन जीते हैं ये। कच्चा पानी, धातु, विद्युत्, ईंधन, हरी वनस्पति... किसी भी ऐसी चीज का तो उपयोग नहीं करते ये कि वायुमंडल में बहते सूक्ष्म जीवों की कहीं हत्या न हो जाए। पूरे दिन में सिर्फ एक दफे आहार, सो भी थाली में नहीं... बस, जिस किसी भी गृहस्थ के द्वार पर जाकर अंजलि फैला दी और जितना भर समाया, अंजलि में उतना भर ग्रहण किया। पूस की ठंड हो या जेठ की खौलती गर्मी, इन्हें न तो गर्म कपड़े पहनना है और न ही देह-ताप के शमन के लिए स्नान। कभी-कभार हम श्रावक ही इनकी देह को भीगे तौलिए से पोंछ दें तो पोंछ दें।''

बोलते-बोलते आँखों की कोरों से आँसू बहने लगे थे उन श्रावक के। मैं अपने खयालों में आत्मलीन-सी चलती जा रही थी कि तभी उन्होंने फिर सचेत किया, ''सँभलकर चलिए... उतराई में गिरने का खतरा ज्यादा रहता है... क्योंकि...।''

''क्योंकि रास्ता अजाना हो जाता है।'' मैंने उनका वाक्य पूरा कर दिया था।

महाराज फिर फुसफुसी आवाज में कहने लगे, ''जीव-मात्र की हत्या पाप है। गुरुदेव प्रकाश मुनि के बारे में तो आपने सुना होगा। उनके पैर पर एक बार एक चींटी चढ़ गई थी। उन्होंने पैर को न हिलाया, न डुलाया कि चींटी को कष्ट होगा। चींटी ने वहीं घर कर लिया। बाद में चींटियों की कतार लग गई, पर वे न हिले, न डुले... उसी प्रकार बैठे-बैठे ही उनके प्राण निकले। तो ऐसे होते हैं अहिंसा के साधक।''

बिना किसी विवाद में पड़े मैंने पूछा, ''गुरुदेव, आपने दीक्षा कब ली?''

दूर अंतरिक्ष की ओर देखते हुए वे कहने लगे, ''करीब ग्यारह वर्ष की उम्र में जैन मुनि द्वारा लिखित एक पुस्तक पढ़ी थी, उसे पढ़कर जीवन की व्यर्थता का वह बोध हुआ कि फिर संसार से मन उठ गया। वह पुस्तक मेरे संन्यास के लिए च्यवनप्राश बनी। धीरे-धीरे मैंने साधु-जीवन को अपनाना शुरू कर दिया। लगभग सभी हरी सब्जियों, जमींकंद, कच्चा पानी, रात्रि-आहार, बिछौना, विद्युत् सबका त्याग कर दिया... फिर एक सुबह अपने गुरु से दीक्षा ले ली। पहले कच्ची दीक्षा हुई फिर मुनि दीक्षा।''

''और वस्त्र-त्याग?''

''वस्त्रों को भी धीरे-धीरे उतार फेंका। भैयाजी (पूर्ण वस्त्रधारी) से छोलकजी (दुपट्टाधारी) बना। फिर एलकजी (एक लँगोटधारी) और अंत में महाराज (पूर्णतः निर्वस्त्र)।''

महाराज पहाड़ियों पर सँभल-सँभलकर पग धरते जा रहे थे कि भूल से भी कोई कीट-पतंग पाँवों तले न कुचल जाए। अपनी आदत के मुताबिक मैं फिर सोचने लगी कि अहिंसा को भी कितने सीमित और संकीर्ण अर्थों में इन लोगों ने अपनाया है... कि तभी एक हलका-सा धमाका हुआ... वातावरण की लय-ताल और गति को तोड़ता हुआ।

आवाज का पीछा करते हुए मैं तेज-तेज चलने लगी कि एकाएक मेरे कदमों को जैसे ब्रेक लग गया। सबसे पहले नजर पड़ी, फैले, लंबे, बेडौल और खुरदरे दो पैरों पर। पैर भी नहीं, तलुवों पर। और फिर देखा, एक आदमी जो बेहोश पड़ा हुआ था, सिरहाने था उसका साथी... उसके मुँह पर पानी के छींटे मार रहा था। पास ही उलटी पड़ी डोली ने बाकी कहानी भी बयाँ कर दी थी।

साथी डोली वाला दुखी था तो संतुष्ट भी कि डोली पर उस समय कोई यात्री नहीं था... किसी गुजराती परिवार के साथ थे वे। अफसोस जताकर और उनकी मजदूरी देकर वह परिवार नीचे उतर गया था।

अब क्या होगा? कैसे होश में आएगा? साथी डोली वाला मुझे शांत करने लगा, ''कुछ नहीं, बस भूख के मारे चक्कर आ गया है, इस कारण बेहोश हो गया है। देखते हैं थोड़ी देर में होश आ ही जाएगा, नहीं तो ऊपर से इतने डोली वाले उतर रहे हैं... किसी की भी डोली में बैठाकर नीचे उतार लेंगे।''

दुख सोखने की उसकी आदत ने उसे कठोर बना दिया था। मैंने बेहोश पड़े उस डोली वाले के सिरहाने बैठ उसे माथे से हिलाया तो हलकी-सी चीख मेरे मुँह से निकल पड़ी, ''अरे, इसका माथा भी फट गया है! देखो, खून बह रहा है!''

साथी डोली वाले ने फिर बुझे-बुझे स्वर में कहा, ''हाँ, पत्थर से माथा टकरा गया था... बस, एक बार नीचे उतर जाए तो तितिपाती पत्ती को पीसकर उसका लेप कर देंगे, खून बहना रुक जाएगा।'' उसने फिर मुझे शांत करना चाहा, ''आप चिंता न करें, यदि मंदिर तक रिपोर्ट पहुँच गई तो अगली बेर डोली भी नहीं मिलेगा। मैनेजर बोलेगा, ताकत नहीं है, डोली क्या खींचेगा?''

''क्या? ऐसा भी हो सकता है? हे भगवान्!'' मैंने प्रश्न और आशा-भरी नजरों से महाराज की ओर देखा। उन्होंने करुण निगाहों से मुझे देखा और आगे बढ़ने लगे।

मैंने आवेग में उनके हाथ पकड़ लिए, ''कुछ कीजिए महाराज, लोग आपको पूजते हैं, आप चाहें तो...'' मैं पूरा बोल भी नहीं पाई थी कि महाराज ने तेजी से अपना हाथ छुड़ाते हुए बुद्ध की मुद्रा में अपना दाहिना पंजा उठा मुझे शांत रहने को कहा। मैंने फिर उन्हें झँझोड़ा तो महाराज थोड़ा परे हट गए, पर उनके श्रावक मुझ पर बरस पड़े, ''आप शांत क्यों नहीं रहतीं... महाराज सांसारिक पचड़ों में नहीं पड़ते... आप बार-बार उन्हें स्पर्श कर दोष लगा रही हैं। उन्हें प्रायश्चित्त करना पड़ेगा। क्या आपको इतना भी विवेक नहीं कि जैन साधु-संहिता के अनुसार कोई भी महिला साधु का स्पर्श नहीं कर सकती।''

मैं अवाक्। न चाहते हुए भी आवाज तल्ख हो उठी, ''...कैसा साधुत्व... कोई मर रहा है और आपको अपने...'' मैं पूरी तरह बोल नहीं पाई कि उस साथी डोली वाले ने फिर हाथ जोड़ मुझे शांत रहने को कहा। उसे डर था कि इस घटना की जानकारी प्रबंधकों तक न पहुँच जाए। बहरहाल, मेरा सारा आक्रोश, सारा गुस्सा एक आँधी की तरह उन महाराज के सामने से गुजर गया... करुण दृष्टि से मुझे देखते हुए वे पास से इस प्रकार गुजर गए जैसे कोई चूहा गुजर जाता है।

राख हुई मैं वहीं उसके सिरहाने सूनी-सी खड़ी रही। जहाँ से उजास फूटना था वहीं अँधेरा सबसे सघन था। शायद इसी कारण देवताओं की उस नगरी में सबके भीतर के देवता सोए हुए थे। यदि मैं स्वयं चश्मदीद गवाह नहीं होती तो कदाचित् इस घटना पर विश्वास करना मुश्किल था।

बहरहाल, कुछ पलों बाद खयाल आया कि उसका साथी तो उसके सिरहाने बैठा ही है, क्यों न मैं नीचे उतरकर देखूँ, शायद कोई मिल जाए। इस नए विचार के साथ ही मैं तेजी से नीचे उतरने लगी। करीब डेढ़ किलोमीटर की उतराई के बाद मुझे वही लँगड़ा डोली वाला शिबू दिख गया। मेरी बदहवासी और दुर्घटना के बारे में सुनकर उसने तुरंत अपनी पत्नी को हाँक लगाई, ''लक्खी!''

वह बिना चप्पल और ओढ़नी के ही उलटे पाँव दौड़ पड़ी।

डोली वाला अभी तक बेहोश था... खून अभी भी टप-टप बह रहा था। हम तीनों उसे चटाई पर लिटाकर नीचे लक्खी की पर्णकुटी में ले आए थे। साथी डोली वाले ने राहत की साँस ली और मुझसे अनुरोध किया, ''अब हम सँभाल लेंगे... आप कृपया चली जाएँ... यदि आप नहीं गईं तो आपके साथ के लोग आपको खोजते हुए इहाँ आ जाएँगे, तो बेकार में बखेड़ा हो जाएगा। उसे कुछ नहीं हुआ है... बस, भूख से जरा चक्कर आ गया था।''

उसके जीवन में बस इतने भर पलों की हिस्सेदारी कर मैं नीचे उतर गई। पर पिछले दिन की तरह आज न स्वप्निल पहाड़ियाँ मेरे साथ थीं, न हवाएँ और न ही कोई स्वप्न। साथ थे बालू उठाते नन्हें हाथ, फैले हुए बेडौल, खुरदरे पाँव और थरथराती एक आवाज, 'ई भिखारी नहीं है।'


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