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आलोचना

ठहरे हुए जीवन का गतिशील चित्र
रोहिणी अग्रवाल


मैं ज्ञानरंजन की कहानियाँ पढ़ रही हूँ और वॉन गॉग की पेंटिंग्स की स्मृतियाँ कहानियों की प्रभाव-लहरियों के साथ घुलमिल कर एकमेक हो रही हैं। खासतौर पर 'पोटैटो ईटर्स' पेंटिंग की स्मृति जो पेट में आक्रोश और करुणा के कितने ही गोले उमड़ा कर साँस के द्वार रुद्ध कर देती है। लेकिन ताज्जुब है कि दम घुटने की प्रतीति दम तोड़ने की क्रमिक प्रक्रिया में विघटित नहीं होती, दम साध कर स्वस्थ माहौल की रचना की प्रक्रिया में अपनी सर्जनात्मक संभावनाओं को खंगालने लगती है। यही कला की अपराजेय शक्ति है जो मृत्यु के पार जीवन का संधान और अभिषेक करती है। ज्ञानरंजन की कहानियों में जीवन के प्रति अनुराग मनुष्य, उसकी जिजीविषा और मानवीय संबंधों के प्रति अगाध विश्वास के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। लेकिन यह घोर चुप्पा और अंतर्मुखी कहानीकार अपनी भावनाओं को व्यक्त करना भी तो नहीं चाहता। मन में जो है - आत्मीयता और कन्सर्न (लगाव) के रेशमी धागों से बुना एक विवेकशील संवेदन - उसे मन के ही किसी तहखाने में जतन से छिपा कर खाली हाथ सबके बीच लौट आता है और फिर नाज से अपना परिचय देता है कि ''घर में भी मैं हमेशा बुरे लोगों के संदर्भ में उपलब्ध रहा करता हूँ और किसी न्यायपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए एक आवश्यक बुरे पक्ष की तरह लोकप्रिय हूँ।'' (संबंध) नहीं, यह ज्ञानरंजन नहीं हैं, यह उनकी अभिव्यक्ति-शैली है, कहन की भंगिमा जो अपने संवेदनात्मक चिंतन के मर्म को इतनी नजाकत से अर्थ-बेधन की महीनतर परतों में लपेटे रखती है कि उन्हें खोलते हुए धीर-गंभीर-संवेदनशील पाठक अपने को क्रमशः समृद्ध करता चले और फिर 'तूँ तूँ करता तूँ भया मुझमें रही न हूँ' वाली एकात्म अवस्थिति में पहुँच जाए। ज्ञानरंजन की कहानियों को रसलोलुप पाठक की दरकार नहीं, वे रचयिता पाठक की तलाश में बाँहें फैलाए खड़ी प्रतीक्षा हैं कि मिलजुल कर भीतर और बाहर के लोक को आलोकमय कर दें।

ज्ञानरंजन की कहानियाँ भीतरी अँधेरों की शिनाख्त की कहानियाँ हैं, हालाँकि ऐसी किसी भी उदात्त कोशिश का दावा न करते हुए वे इन्हें नैरेटर की लाउड बड़बड़ाहट का रूप देकर स्वयं नेपथ्य में चले जाते हैं। जाहिर है बड़बड़ाहट में और जो भी हो, राग और उल्लास, संतोष और आत्मसार्थकता का भाव नहीं होता। बड़बड़ाहट दबे हुए आक्रोश, घुटे हुए रोष, उफनती हुई घृणा और धीरे-धीरे वजूद में पैबस्त होती हताशा की सूचक है जो व्यक्ति और परिवेश के आपसी तालमेल के अभाव को रेखांकित करते हुए सवाल उठाती है कि इस अ-समन्वयात्मक स्थिति के लिए आखिरकार दोषी कौन है? ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती - नैरेटर को धकिया कर ज्ञानरंजन कथा-परिदृश्य में एक बार भी अवतरित नहीं होते, लेकिन मानो दसों दिशाओं से उनका ही स्वर बार-बार गूँज उठता है। मैं तल्लीनता से अनुपस्थित लेखक की गूँजती पुकार सुनने लगती हूँ तो कहानी के पाठ के भीतर खुलती कितनी ही अछोर सीढ़ियों के मुहाने आ खड़ी होती हूँ। इन सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते अनायास नैरेटर के संग एक जज्बाती संबंध बनने लगता है, हाथों का स्पर्श दोनों के भीतर सोई कितनी ही तरलताओं को जगाने लगता है, और फिर जाने कब किसी कमजोर क्षण में (शेयरिंग का क्षण क्या वाकई कमजोर होता है?) अपने भीतरी जख्मों को दिखाते हुए वह फफक-फफक कर रो पड़ता है - ''क्या तुम भी यही सोचती हो कि मैं अपने माता-पिता से नफरत करता हूँ - इतनी नफरत कि उन्हें झेलना-देखना भी न चाहूँ - उन माँ-बाप को जिन्होंने मुझे जन्म ही नहीं दिया, वजूद भी दिया और दुनिया का सबसे अच्छा इनसान होने का विश्वास भी?'' मैं जानती हूँ यह सवाल नहीं, आत्मालाप है। दंभ से ऐंठती ग्रंथियाँ जब पिघलने लगती हैं, तब धुल-गल कर मुखौटे इनसान की असलियत को उघाड़ने लगते हैं। अलबत्ता मुझे हैरत से 'मर' जाना चाहिए था कि यह आवेगहीन भावहीन निहायत ठंडा नैरेटर रोना और भाव विगलित होना भी जानता है? हाँ, ज्ञानरंजन की कहानियों की यही तो खासियत है कि वे अदृश्य, अमूर्त, अनुपस्थित को फोकस में लाती हैं, और रोज के जाने-चीन्हे व्यक्तियों/स्थितियों को एकदम नए रूप में उद्घाटित करती हैं। पिता को लेकर ढेरों ढेर शिकायतें पाले बैठा है नैरेटर कि ''मौसम की गर्मी से कहीं अधिक प्रबल पिता हैं'; कि ''पिता एक बुलंद भीमकाय दरवाजे की तरह खड़े हैं जिससे टकरा कर हम सब निहायत पिद्दी और दयनीय होते जा रहे हैं''; कि ''पिता की अड़ में कभी कोई झोल नहीं आता''; कि सदा चुप रहने वाले पिता मौका लगने पर 'काफी करारी और हिंसात्मक बातें' कह कर घर भर को अपना शत्रु बनाए रखते हैं। अलबत्ता इतना सजग वह है कि शिकायतों को विरोध का पर्याय नहीं बनने देता। जानता है पिता के प्रति 'असंतोष और सहानुभूति' ने उसे खासा अस्थिर कर दिया है मानो 'भूखे के सामने खाने' की व्यथा झेल रहा हो वह हर समय। भौतिक सुविधाओं और घर के 'अंतःपुर' से कट कर बाहरी व्यक्ति बनते चले जाने वाले इस 'पुरुष' के मनोविज्ञान को जानने की कोशिश भी करता है वह कि ''हमारे समाज में बड़े-बूढ़े लोग जैसे बहू-बेटियों के निजी जीवन को स्वच्छंद रहने देने के लिए अपना अधिकांश समय बाहर व्यतीत किया करते हैं, क्या पिता ने भी वैसा ही करना तो शुरु नहीं कर दिया है?'' उषा प्रियंवदा की कहानी 'वापसी' का विलोम रचता है 'पिता' कहानी का नैरेटर जहाँ संबंध की स्वीकृति ही नहीं, उसे अमूल्य निधि की तरह सहेजे रखने की चिंता भी है। ''उसे पिता के बूढ़ेपन का ख्याल आने पर सिहरन हुई। फिर उसने दृढ़ता से सोचा, पिता अभी बूढ़े नहीं हुए हैं। उन्हें प्रति क्षण हमारे साथ-साथ जीवित रहना चाहिए, भरसक।'' इस निर्लिप्त आवेगहीन नैरेटर ने मेरे भीतर खलबली मचा दी है - तो मैं अकेली नहीं हूँ जो दिन ब दिन बुढ़ाते पिता (माँ भी) की ओर बेआहट बढ़ती मौत की पदचापों को सुन कर रात-रात भर अँधेरे से लड़ती रहती हूँ। प्रार्थना में ढल कर संबल बनती यह चिंता संबंधों को मजबूत करने की डोरी ही तो है। लेकिन क्या कहानी निरी इतनी है? ऐसा होता तो नैरेटर के पिता का व्यक्ति-चरित्र मेरे पिता का चित्र बन कर वर्ग-चरित्र में न ढल जाता। क्या यह महज संयोग है कि हम दोनों के पिता 'जीवन की अनिवार्य सुविधाओं से चिढ़ते हैं'; हमारे (वयस्क संतान) द्वारा लाई गई चीजों की श्रेष्ठता से कभी प्रभावित नहीं होते, बल्कि अपने अर्जन में संतोष कर कहीं हमारे अहं (केयरिंग संतान होने का दंभ) पर चोट पहुँचाते हैं? या पिताओं का वर्ग ही ऐसा होता है - वत्सल और निरंकुश एक साथ? मैं सोच में डूब जाती हूँ कि वह कौन सी ताकत या उत्प्रेरणा है जो अधेड़ होते पुत्र को अपनी संतान के सामने हू ब हू पिता के नैन-नक्श के साथ पेश करती है? ज्ञानरंजन कहानी में अंतर्ध्वनियों को गूँथते हैं, उनका खुलासा नहीं करते। इसलिए अनुत्तरित मौन के साथ जब कहानी पाठक की चेतना पर दस्तक देती है, तब इन सवालों के साथ निपटना और उनका जवाब ढूँढ़ने के लिए व्यवस्था के मनोविज्ञान से टकराना उसकी मजबूरी बन जाता है। पड़ताल की प्रक्रिया में वह जान जाता है कि पिता की ही तरह माँ से भी ढेरों शिकायतें हैं उसे। माँ की करुण आँखें, हरदम घबराई-ममताई मुद्राएँ, चौकन्नापन और बेबसी, अपने को तिल-तिल मार कर बच्चों का हर सुख बचा लेने की व्यग्रता, बचपन में भले ही उसे सुरक्षा और सुकून देते हों, युवावस्था में अपराध-बोध की सृष्टि करते हैं - माँ का भावनात्मक शोषण करने या उसकी मानवीय शख्सियत की अवमानना करने से उपजा अपराध-बोध। 'यू वुमैन!'' 'संबंध कहानी का नैरेटर मानता है कि दाँत पीस कर बड़बड़ाई गई इस गाली में माँ से मुक्ति की कामना छिपी है - ''जिस तरह बचपन में आपकी माँ मर गई थी, मेरी भी मर गई होती तो बहुत सी बेहूदा स्थितियों से मेरा भी बचाव हो जाता।'' (संबंध)

उल्लेखनीय है कि 'शेष होते हुए' कहानी में भी माँ के प्रति प्रत्यक्षतया उड़ेली जा रही उत्कट हिकारत में अपनी अकिंचनता से उत्पन्न अपराध बोध की ग्रंथि छुपी है। मझला जानता है कि सात सदस्यों वाले इस घर के भीतर जगह-जगह कई 'घर' उग आए हैं, और इन 'घरों' के इर्द-गिर्द ऊँची मजबूत दीवारें उठाने में सभी कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अकेली माँ है जो रोज इन दीवारों को ढहा कर घर को 'सबका' घर बनाने की जी-तोड़ मेहनत कर रही है। सबके साथ जुड़ी और सबको एक साथ जोड़ लेने को आतुर माँ सबकी चिंता में दुबली होती जा रही है और सबको एक-दूसरे की चिंताओं में शरीक होने की दुर्बल कोशिशें कर रही है। माँ की इन 'खतरनाक' गतिविधियों से खौफजदा है मझला। फिर भी यदि माँ की आँखों में झाँकने की मजबूरी न हो तो माँ क्षम्य भी है और सह्य भी। शायद इसलिए कि माँ ऐसी खूँटी है जिस पर पिता सहित परिवार का हर स्दस्य अपना असंतोष आसानी से टाँग कर स्वयं को भारमुक्त कर सकता है। लेकिन पिता के साथ ऐसा करना संभव नहीं। पिता से भी कहीं ज्यादा बड़ा है पिता का श्रेष्ठता दंभ। परिवार के अर्जक, पोषक, कर्ता, स्वामी होने के अहं ने उन्हें हमेशा अपने को सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च होने का अहसास दिया है। वे निरंकुश आचरण करें न करें, अधिनायकवादी तत्व बहुतायत में उनके व्यक्तित्व की संरचना में सक्रिय रहे हैं। पत्नी और बेटियों से उन्हें असुविधा नहीं क्योंकि 'औरत' होने का प्रशिक्षण पाकर वे न अहं का अर्थ समझती हैं, न अर्जन का सुख। प्रतिद्वंद्वी है बेटा जिसे उन्होंने स्वयं अपनी ही तरह अर्जक, पोषक, कर्ता और स्वामी होने का प्रशिक्षण दिया है और अब एक म्यान में दो तलवारें आ पड़ने की स्थिति में अपने-अपने स्थान के लिए 'शीत युद्ध' चलाए जा रहे हैं दोनों - सहानुभूति और असंतोष के परस्पर विरोधी भावों से बिलबिलाते हुए। जब तक पितृसत्तात्मक व्यवस्था लैंगिक विभाजन के बहाने पुरुष को अधिनायक बना कर मनुष्य न बनने का प्रशिक्षण देती रहेगी, तब तक अपने-अपने अहं का बघनखा लेकर पिता-पुत्र एक-दूसरे को घायल करते स्वयं भी घायल पड़े रहेंगे। जाहिर है अकेलापन और आत्मनिर्वासन पिता का अपना चुनाव है, उन पर लादी गई स्थितियाँ नहीं। गूढ़ प्रतीकार्थ की सृष्टि करते हुए वे उस सामंतवादी मानसिकता का प्रतिरूप बन जाते हैं, जो 'हाइरार्की' को संबंधों की अपेक्षा वरीयता देकर शिखर पर अकेली रह जाती है। ठीक इसी तरह 'फेंस के इधर और उधर' कहानी का अंतर्पाठ कहानी को न पड़ोसी के घर की ताक-झाँक की मध्यवर्गीय कोशिश का रूप देता है, न दो भिन्न जीवन-दृष्टियों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए किसी एक के पक्ष में खड़े होने का भाव। यह कहानी निःसंगता के नीचे खदबदाती व्याकुलता की कहानी है जहाँ पड़ोसी लड़की के बरक्स पम्मी और भाभी, तथा पड़ोसी पिता के बरक्स नैरेटर के पिता के परस्पर विरोधी युग्म पितृसत्तात्मक व्यवस्था की आधारभूत संरचना और उसके दुष्प्रभावों को समझने का विवेक देते हैं। सिर्फ शिक्षा नहीं, मेंटल रि-ओरिएंटेशन भी घेराबंदी कर डालने वाली किसी भी व्यवस्था को प्रश्नांकित करने और बदल डालने की ताकत रखती है। स्त्री को 'माल' समझने का भाव अपने मन में होगा तो घर के आँगन में खेलती बेटी भी अपहृत कर लिए जाने वाले कीमती सामान की तरह जिम्मेदारी और असुरक्षा का सबब बनेगी; अपने ही भीतर का भय बहू-बेटियों को भय के साये में बांधे रखने की दुश्चिंता देगा; अपनी ही लंपटता उन्हें सड़क के शोहदों से बचाने की फिक्र में तालाबंद सुरक्षा के एकमात्र विकल्प में कैद करने की विवशता बनती होगी। इस पिता/पुरुष की नजर में हर युवक लंपट है और हर लड़की मौका मिलते ही बदचलनी करने को तैयार। इसलिए पिता/संरक्षक होने के नाते संतान (पुत्र व पुत्री दोनों) के चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करने की स्वस्थ चिंता से कहीं ज्यादा पुत्री (अपना बेटा लंपट नहीं होता, ठीक उसी तरह जैसे दूसरों की बेटी 'माल' होती है) के चरित्र को बचाए रखने की व्यग्रता उन्हें पहरेदार या पुलिस कांस्टेबल की भूमिका में उतारती है। इसलिए परिवार की स्त्रियाँ 'बाहर भी डरती है और घर में भी'; भाई के दोस्तों को 'आवारा हिंसक जानवर' मान कर सामना होते ही अपने में गुड़ीमुड़ी हो जाती हैं; और जीवन-जगत की समस्याओं और सरोकारों से जुड़ने-जूझने की बजाय चूल्हा-चौका, मौसम-मच्छर, प्रजनन-शिकायतों में रम कर भरी-पूरी जिंदगी को शून्य की परिक्रमा करते हुए काट लेती हैं। लेखक जानते हैं कि हर घर का अंतःपुर ऐसी ही डरी हुई लड़कियाँ पाकर धन्य हो उठता है। पड़ोसी लड़की जैसी बेखौफ अलमस्त उन्मुक्त लड़की उनकी 'बंदी रियाआ' के लिए खतरा हो सकती है, इसलिए उसकी बदचलनी की कहानियाँ प्रचारित कर वह बिना लड़े ही बड़ी जंग जीत लेता है। लेखक यह भी जानते हैं कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था से दीक्षित दोनों लिंग अपनी-अपनी भूमिकाओं का मुस्तैदी से निर्वहण किए जा रहे हैं, लेकिन यह विचार नहीं करते कि फेंस के उस पार शिक्षा और वैचारिक उदारता के आलोक में जो 'मनुष्य-लोक' है, वहाँ क्या आपसी विश्वास, सद्भाव और संबंधों का मजबूत, बेहतर आधार नहीं? यदि पितृसत्तात्मक व्यवस्था यथास्थितिवाद और वैचारिक संकीर्णता की पोषक है तो उसके चंगुल से मुक्त होने के लिए क्या खुद अपने भीतर बैठी सुविधाभोगी सामंतवादी मानसिकता से लड़ना जरूरी नहीं?

सादगी ज्ञानरंजन की कहानियों की अप्रतिम विशेषता है। अक्सर यह सादगी आडंबरहीन सपाटबयानी के रूप में अभिव्यक्त हुई है जहाँ न घटनाओं का मुखर घात-प्रतिघात है, न स्थितियों का द्वंद्वात्मक टकराव। एक सीध में चलती इन कहानियों में चरमोत्कर्ष का आरोहण नहीं, बल्कि तथ्य तो यह है कि ये कहानियाँ क्लाइमैक्स के बाद के गतिहीन शैथिल्य के बीच से गुजर कर देखे हुए जीवन को देखने का नाट्य करती हैं। इसलिए कहानियों की सादगी अनुर्वर नहीं, वक्रता और व्यंग्यात्मकता से भरपूर है जो अनंत धीरज के साथ ठहरी हुई जिंदगी के भीतर दबे स्पंदनों को सुनती-उकेरती हैं। इन कहानियों मे चित्रित जीवन प्रायः घटनाविहीन है (अनुभव) या इतनी गहरी निरुद्विग्नता कि घटनाओं का अप्रत्याशित गति से घटना भी चौंकाता नहीं (संबंध)। हलचल और उत्साह से हीन ये कहानियाँ बेरोजगारी और पारिवारिक विघटन से जूझते मध्यवर्गीय युवक (जिसकी उम्र अमूमन हर कहानी में अट्ठाइस साल है) के अवसाद और अनास्था की कहानियाँ जान पड़ती हैं जिसके लिए ''अच्छा खाना, अच्छा बिस्तर, आराम और दूसरी बहुत सी सहूलियतें'' मिलने के बावजूद घर 'घर' न हो कर 'आश्रम' है। घर/आश्रम के प्रति हिकारत इतनी प्रबल है कि बार-बार एक ही सवाल दोहराए जा रहा है, ''इस तरह की स्पंदनहीन जगहें अब तक क्यों और कैसे बची हुई हैं?'' (अनुभव) इस युवक के लिए पच्चीस वर्षीय छोटे भाई के लापता होने की सूचना और आत्महत्या करने की आशंका (संबंध) महज एक खबर है जिसके आरपार श्रद्धांजलिस्वरूप भाई की स्मृतियों को घड़ी दो घड़ी जीने का उपक्रम रचा गया है। ज्ञानरंजन का नैरेटर अपने सर्जक की तरह बेहद कौशल और संयम के साथ एक-एक कर अपने पत्ते खोलता है। तीन साल से नौकरी की असफल तलाश में असमय 'बुढ़ा' गए भाई को लेकर करुणाविगलित नहीं होता नैरेटर, बल्कि चाहता है कि वह 'आत्महत्या कर ले और एक बहुत ही घिसटती हुई निर्मम समस्या का समाधान हो जाए।'' यह न क्रूरता है, न संबंधहीनता से उपजी संवेदनहीनता, और न ही कठोर यथार्थ से पलायन। यह सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के बर्बर चेहरे पर करारा तमाचा है जो अपने नागरिकों को वर्तमान और भविष्य की रक्षा के लिए बुनियादी जरूरतें जुटाने और न्यूनतम मानवीय गरिमा को बचाए रखने का अवसर तक नहीं देतीं। ज्ञानरंजन रोमान, आदर्श और भावुकता जैसी किसी भी लिजलिजी चीज से प्रभावति हुए बिना अपनी कहानियों में एक मारक निस्पृहता के साथ दो परस्पर विरोधी बातें संग-संग रख देते हैं। चूँकि उनकी शैली में चीर कर रख देने वाली ठंडी निःसंगता है, इसलिए वे परस्पर विरोधी बातें अंतर्द्वंद्व से जूझते एक ही पात्र की दो मनःस्थितियाँ नहीं लगतीं, बल्कि पाठक की स्मृति को भ्रमित करने या नायक को पुनर्सर्जित करने की लेखकीय युक्तियाँ अधिक लगती हैं। जैसे 'घर' के नाम से बिदकने वाले नैरेटर का बार-बार दावा करना कि उसे अपने शहर से 'घातक लगाव' है (अनुभव) या आत्महत्या की पैरवी करते नैरेटर (आत्महत्या) का 'एक सार्थक आत्महत्या' करने का प्रयास ताकि युगों-युगों तक वह अमर रहे। ज्ञानरंजन एक चौकन्नी सादगी के साथ इन युक्तियों को कहानी में पिरोते हैं क्योंकि इन्हीं के जरिए वे सतह पर दीखते अर्थ को धकिया कर उसमें गहरे व्यंग्यार्थ की निष्पत्ति करते हैं। तब 'आत्महत्या' और 'संबंध' कहानियाँ साथ-साथ पढ़ने पर जिजीविषा और आत्मसार्थकता की तलाश की कहानियाँ बन जाती हैं - मौत से पहले जीवन को कुछ सार्थक, कुछ अमूल्य दे जाने के विश्वास की कहानियाँ, जीवन को समृद्ध करते संबंधों को बचाने की कहानियाँ।

ज्ञानरंजन की विशेषता है कि उनका नायक चहलकदमी करते हुए इस कहानी से उस कहानी की जमीन पर आराम से चला आता है। इसलिए उनकी हर कहानी स्वायत्त होते हुए भी एक-दूसरे से बहुत गहरे सम्पृक्त है। जैसे 'यात्रा' कहानी के साथ जुड़ी हैं 'अनुभव', 'शेष होते हुए' और 'संबंध' कहानियाँ। अंतिम तीन कहानियों की फिजा में तैरता पारिवारिक संबंधों के प्रति अवज्ञा और उपेक्षा का प्रबल भाव 'यात्रा' में मानो आत्मसमर्पण कर देता है। यह यात्रा दम्मो दा की मृत्यु पर मातमपुर्सी के लिए की जाने वाली यात्रा नहीं, आत्मसाक्षात्कार की संश्लिष्ट यात्रा है जहाँ एक-एक कर सामाजिक मर्यादाओं के कृत्रिम आवरण फेंकते हुए नैरेटर अपने को डिस्कवर करता है। आवरण की क्रमिक प्रक्रिया में स्वयं को 'नए' (नग्न?) रूप में देख पहले-पहल वह आतंकित है, शर्म और ग्लानि से अपने से भी मुँह चुराता हुआ। ''जिस व्यक्ति का मृतात्मा से लंबा दिली रिश्ता रहा हो, उसके लिए ऐसे समय में समोसा भकोसना या उसकी इच्छा मात्र ही करना चांडालपना नहीं तो और क्या है?'' (यात्रा) वह अपने 'लोभी' 'भूखे' मन को धमका कर सुसंस्कृत बनाए रखना चाहता है लेकिन घर लौटने का रोमांच उसे ढीठ और निर्लज्ज बनाए जा रहा है। ''अगले स्टेशन पर मैंने संतरे खाए'' - मानो अँगूठा दिखा-दिखा कर वह व्यक्तित्व पर आरोपित व्यवहार की सारी कृत्रिमताओं को चिढ़ा रहा है। लो, और सुनो, मृतक की याद में ऊभ-डूब का चेहरे पर मुर्दनी पोतने का विचार 'मुझे अप्रिय सा लगने लगा है।' अलबत्ता यह विचार उसके रोम-रोम में रोमांच भर रहा है पिछली बार घर के सामने वाली जो सड़क मुरम्मत के लिए खुद रही थी, उस पर चलने का सुख अब कुछ ही घंटे दूर है। नैरेटर के लिए मृत्यु, कलेजे में उठती टीस की हिलोर, अतीत में बहा ले जाने वाली स्मृतियाँ सब सच हैं, लेकिन इनसे भी बड़ा सच है मृत्यु पर विजय-पताका फहरा कर अबाध गति से आगे बढ़ता जीवन। फिर वह अपने पैरों को पीछे क्यों धकेले? जीवन का सत्कार मृत्यु के स्वीकार के बाद ही संभव है, अन्यथा भय-ग्रंथि बन कर मृत्यु जीवन को बुनते गति और उल्लास के पलों को कुतरती रहती है। ''अस्तित्व की रक्षा की मानवीय क्रियाओं को कमीनगी समझना उचित नहीं है'' - जीवन के प्रति आस्थावान है लेखक/नैरेटर; जीवन जो परिवार और समाज के बीच संबंधों से पगी सुरक्षा और विश्वास देता है; जीवन जो अपने आप को 'मनुष्य' के संदर्भ में चीन्हने और पाने का संवेदनात्मक विवेक देता है। तब सामाजिक आडंबर पाखंड बन जाते हैं और नैतिक/मूल्यधर्मी प्रतिमान जड़ताओं का जखीरा जो समग्र मनुष्य को जाँचने की कुव्वत न होने के कारण अंग भंग कर उसकी विकलांगता को ही पोषित करते हैं। इसलिए नैरेटर जब अपने पाखंडहीन वास्तविक चरित्र से साक्षात्कार कर 'लोक' से भिन्न होने की प्रतीति में किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा है, उसके भीतर का मनुष्य हौसला बंधाने आगे आता है कि ''करुणा तुम्हारी छाती के अंदर उस तरह से अदृश्य रहा करती है जिस तरह से पहाड़ों के पेट में जल।'' ज्ञानरंजन भीतर के इस मनुष्य को जिलाने और प्रतिष्ठित करने के कहानीकार हैं। इसलिए यहाँ हाय-हाय का क्रंदन नहीं, रुक कर स्थितियों पर विचार करने का निमंत्रण है। जाहिर है क्रॉस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया में कठघरे में व्यवस्था को रखने का सुख नहीं, अपने अंदर के अभियुक्त से शातिर वकील की तरह तीखी जिरह करने की जरूरत है।

व्यंग्य ज्ञानरंजन की कहानियों में प्राण की तरह विन्यस्त है। वह चेखव की कहानियों की तरह टीस बन कर नहीं उमड़ता, मनुष्य और समय के संदर्भ में एक-दूसरे को जाँचने का अवसर देता है। 'घंटा' कहानी में तथाकथित बुद्धिजीवियों के भीतर पलती तृष्णाओं और मरीचिकाओं का मखौल उड़ा कर उन्हें कैरीकेचर के रूप में प्रस्तुत जरुर किया गया है, लेकिन उनकी अपमान की एक भी गर्हित कोशिश नहीं करते ज्ञानरंजन। इक्कीसवीं सदी के कथा लेखन से भिन्न वे हर पतन और विघटन के लिए 'मैं' को जिम्मेदार मानते हुए अपना कैरीकेचर खुद रचने का सामर्थ्य रखते हैं। 'बहिर्गमन' में अलबत्ता व्यंग्य की उजास को अपनी ही आँखों में धूल झोंकती आत्मप्रवंचना के शेड में रंग कर एक नया ही रूप दिया है ज्ञानरंजन ने जहाँ विश्लेषण और उद्बोधन काफी मुखर होकर कहानी से बाहर छलक आए हैं। 'बहिर्गमन' इस अर्थ में उनकी विशिष्ट कहानी है कि पारिवारिक संबंधों की परिधि से बाहर निकल कर वह एक नए बनते हुए समय, समाज और संस्कृति के साथ व्यक्ति के संबंध के बनने और इस प्रक्रिया में अपनी जड़ों से कटते चले जाने के बृहत्तर संदर्भों को समाविष्ट करती है। बेशक 'अनुभव' कहानी का पाठ 'बहिर्गमन' की पूर्व पीठिका के रूप में भी किया जा सकता है जहाँ दबे पाँव चल कर आती उपभोक्तावादी संस्कृति (जिसे लेखक ने शहर में घूमते 'सुदर्शन चक्र का नाम दिया है) धीमे-धीमे अपने को अनावृत्त करने लगी है। बिना किसी विद्वेष के ज्ञानरंजन नैरेटर के जरिए सूचना देते हैं कि अब उनका शहर काफी सुंदर होता जा रहा है क्योंकि ''अच्छी अमरीकन पैटर्न की इमारतें बन गई हैं।'' (अनुभव) शहर से 'घातक लगाव' होने के कारण शहरवासी भी उनके आत्मीय हैं, इसलिए बिना किसी धिक्कार के वे जहाँ-तहाँ सुनी उनकी बातें उद्धृत कर देते हैं, बस, कि 'मैं तो पुराने शहर की तरफ जाता ही नहीं। वहाँ मेरा दम घुटता है। ...भीड़ में जीवन की उत्तेजना नष्ट हो जाती है। ...अंग्रेजों के समय अच्छा था जब सिविल लाइंस में हिंदुस्तानी घुसने नहीं पाते थे। असली बात यह है कि इन लोगों को ज्यादा आजादी दी तो ये इतने असभ्य हैं कि बीच सड़क पर ही हगने लगेंगे।' लेखक उत्तेजित नहीं है, लेकिन उसकी निःसंग टिप्पणियाँ संदर्भों से जुड़ते ही व्यंग्यात्मक हो उठती हैं। उल्लेखनीय है कि यहाँ व्यंग्य घन बन कर सीने को चोटिल नहीं करता, अभियोग बन कर चेहरे पर कालिख पोत देता है। यह विषमतावादी आत्मरतिग्रस्त उद्धत स्वर क्या किसी मनुष्य का हो सकता है जो आभिजात्य में ढकी हैवानियत में लहालोट हो इतराए जा रहा है? क्या यह उसके आत्मदैन्य और असुरक्षा बोध का ही प्रदर्शन नहीं जो चारों ओर स्फीत अहं की बाड़ाबंदी करके अपने को बचा लेना चाहता है? लेकिन क्या बाड़ाबंदी सिर्फ जानवरों की नहीं की जाती जिनका न अपने मस्तिष्क पर अधिकार है, न अंतःकरण में सिमट कर बैठे विवेक, संवेदना और कल्पना के सर्जनात्मक उपकरणों का ज्ञान? तो क्या बाड़े में बंद इन्हीं 'मनुष्य-जानवरों' का 'चारा' है उपभोक्तावादी संस्कृति?

'अनुभव' कहानी ज्ञानरंजन की दुधारी तलवार है। एक ओर अनुभव की प्रामाणिकता का नारा लगा कर अपनी पैठ बनाने वाली 'नई कहानी' का मजाक उड़ाती दीखती है तो दूसरी ओर विकास की जगमगाहट के पीछे छुपे घुप्प अँधेरों को समय रहते पहचानने का आग्रह भी करती है - ''उद्योग और वाणिज्य बड़े बहुरंगी उत्पादन पेश कर रहे हैं। उनकी मदहोशी को तिलिस्मी लखलखा भी नहीं उड़ा सकता।'' ज्ञानरंजन की आर्त पुकार में चौकन्नेपन का मिकदार कुछ ज्यादा ही है। इसलिए कहानी इन अँधेरों से उपजे और त्रिशंकु की तरह अधर में लटके 'नए युवक' पर फब्तियाँ कसती है जिसके लिए लोगों का अस्तित्व अपने 'होने' के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि उन्हें उल्लू बना कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए है। ''अच्छा खासा साढ़े पाँच फुटा आदमी ऐसी नींद ले रहा है जैसे गर्भाशय में पिंड।'' फब्तियाँ कसते-कसते वे संजीदा हो गए हैं और गमगीन भी। क्या मदहोश नई पीढ़ी नई चुनौतियों का नई ऊर्जा और दृष्टि के साथ सामना कर पाएगी? 'अनुभव' कहानी का हताशा के नोट के साथ हुआ अंत चौंकाता है। आस्था (आशा, विश्वास और कर्मनिष्ठा का संयुक्त रूप) के सहारे सारे विचलनों-विघटनों से दो-दो हाथ कर लेने वाला कहानीकार क्या आत्मग्लानि और बेहयाई की परिधि में घूमती मतवाली नई पीढ़ी से निराश हो गया है? तो क्या रपटीली ढलानों से लुढ़कते वक्त को थाम कर गरिमा देने वाला कोई नहीं? लेखक के पास अब सिर्फ बेचैन सवाल हैं और आगे के वक्त को सूँघ लेने की पैनी घ्राण शक्ति। तब ताज्जुब नहीं होता कि आठवें दशक में रची गई कहानी समय का लंबा अंतराल पाटते हुए इक्कीसवीं सदी के ग्लोबल समाज का मनोविज्ञान कैसे जान सकी।

'तुम जू में रह सकते हो, इस देश में नहीं... यहाँ रहना अपने को किल करना है।' 'अनुभव' का नाक भौं सिकोड़ता नाराज नागरिक 'बहिर्गमन' में आकर मनोहर नाम ले लेता है। देश (दिल्ली) को चिड़ियाघर से भी बदतर किसी जगह की संज्ञा देने वाला मनोहर पहले-पहल इसी देश (दिल्ली) में आने के लिए 'मरा' जा रहा था। तब कस्बा उसके पैर की बेड़ी था ('पिछड़ी और मरी हुई जगह') और आँखों में अनंत आकाश समाया हुआ था। टुकड़ा भर आसमान पाकर कैसे संतुष्ट होता वह? आत्मविकास की ललक यदि आत्मविस्तार का सकारात्मक रूप लेकर व्यक्ति और समाज से नहीं जुड़ती तो वह अपने को सिकोड़ कर लालसाओं की धधकती भट्ठी में बंद कर लेती है जहाँ मनुष्यत्व की मौत अवश्यंभावी है। दरअसल लोभ के मायावी लोक में घुसने के बाद उससे बाहर निकलना संभव नहीं होता। भीतर कितनी ही सुरंगों और तिलिस्मी लोकों की रचना करते हुए वह व्यक्ति को उसके आधार - मनुष्य लोक - से इतनी दूर ले आता है कि रेंगते-रपटते वह खुद अपनी असली योनि भूल जाता है। जाहिर है 'बहिर्गमन' कहानी सारी व्यंजनाओं को पैनाते हुए इस 'कृमि-कीट' के बाहर निकलने की कथा नहीं कहती, इसी में गहरे डूब-लिथड़ कर 'सुख' पाने के दारुण सत्य को रचती है। अपने विवेक का सदुपयोग करने की बजाय मनोहर ''सीधे मुनाफे की तरफ चला गया... वह तिकड़मी होता गया और उसकी अभूतपूर्व आक्रामकता की गर्दन टूटती गई''। लेखक परेशान है कि ऐसे 'बोदे' या 'गिद्ध' आदमी के पीछे 'एक अच्छा खासा अहो-अहो दल' कैसे जुट गया? तो क्या पूरी की पूरी पीढ़ी ही 'मनोहर' हो गई है? 'छाती में मानवता का दर्द और मुँह में लोकतंत्र की चुसनी' लिए ये लोग समूची मनुष्यता के कत्ल की साजिश क्यों कर रच रहे हैं? जनता क्या इतनी नादान है कि इनकी हर कुटिल चाल पर 'मूँड़ हिला कर हाँ करे और हुक्का गुड़गुड़ाने' लगे? क्या ''अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में सोए हुए से चुपचाप और शांत चल रहे लोग' अपनी यथास्थितिवादी मानसिकता के कारण युगीन पतन के लिए उतने ही जिम्मेदार और अपराधी नहीं जितने मनोहर सरीखे लोग? एक कठिन कठोर मुद्रा अपना कर ज्ञानरंजन किसी भी निष्क्रिय-नकारात्मक ताकत को क्षमा नहीं करते। ''पुख्ता आदमी बनने की अभिलाषा लेकर पिछले पच्चीस वर्षों से कछुआ'' बने नैरेटर पर भी क्षुब्ध है लेखक। क्या शून्य में तब्दील होने की यह निरर्थक निष्क्रियता आत्महत्या का ही पर्याय नहीं? 'पुख्ता आदमी' की पहचान उसकी संघर्षशीलता और रचनात्मक हठ में निहित है, हाशिए पर आकर अदृश्य होने में नहीं। क्या इसीलिए नगर पर 'वनमानुषों' और 'गिद्धों' का कब्जा होने लगा है? मनोहर हिकारत से इस देश को 'सूअर और गधों का देश' कहता है। तो क्या अपनी ही बेखबरी में अलमस्त 'सूअर और गधे' ही इस देश में बचे रह जाएँगे? 'गिद्ध और वनमानुष' बहिर्गमन कर अपनी रमणीक दुनिया अलग बसा लेंगे?

'मैं' ज्ञानरंजन का नैरेटर जरूर है, किंतु वह उनसे दुलार और सहानुभूति नहीं पाता। उसकी अकर्मण्यता उन्हें तिलमिलाती है, लेकिन उसकी संवेदनशक्ति, पर्यवेक्षण क्षमता और विवेकशीलता के कारण वे कहीं आशान्वित भी हैं और उसे 'जगा' डालने हेतु जब-तब उसका उद्बोधन भी करते रहते हैं। वे उसे निरंतर मनोहर के संपर्क में रखे हुए हैं, दोस्त होने के भ्रम के नीचे दबी सेकेंड रेट सिटिजन होने की असलियत के साथ। मनोहर को 'टूटा हुआ पत्ता' के रूपक में बांध कर वे उसे बताते हैं कि ''अपनी जगह बेमिसाल होती है'; कि ''मनोहर का छोड़ना छूटने की करुणा' जैसा नहीं है, न ही 'छोड़ना छप्पर और पेट की मजबूरियों में उजड़ जाने जैसा' है, बल्कि वह 'गुमनाम लोभ से पराभूत, अज्ञात दुनिया के प्रति चमत्कृत एक बेबुनियाद भागमभाग' है। गाँव से शहर, शहर से महानगर, महानगर से 'महादेश' - वे उसे समझाते हैं कि तृष्णाओं को जीत न ले आदमी तो मनोहर से सोमदत्त बनने की दौड़ में कतरा-कतरा कुतरता रहता है अपने वजूद को। आज के दौर में उपभोक्तावाद के दुष्प्रभावों पर रची गई कई बेहतरीन कहानियों के साथ बेशक 'बहिर्गमन' की तुलना करना सही नहीं, लेकिन इतना तय है कि उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभावों की अपेक्षा यह इसकी प्रकृति और नीति को सतह पर लाती है। सामंतवाद और पितृसत्तात्मक व्यवस्था की तरह भेदभाव (डिस्क्रिमेशन) और विषमता को आधार बना कर चलती है उपभोक्तावादी संस्कृति। पैसा, स्टेटस, ग्लैमर, वर्जनाहीन उच्छृंखल जीवन, मूल्यहीनता - डिस्क्रिमेशन के प्रतिमान हैं जो 'जूझते हुए लोगों' को 'मूर्ख' का खिताब दे दरकिनार कर डालते हैं। जड़ों से कटे अधर में लटके हर भगोड़े को नायक बना कर पूजने वाली इस संस्कृति में न राम-रावण के मूल्यधर्मी बुनियादी भेद हैं, न आजादी के साथ अनिवार्यतः जुड़ी आत्मानुशासन की पाबंदी। व्यक्ति को हवा की तरह निर्बाध-निर्बंध बनाने की जुगत में यह उसे शाख से झरे सूखे पत्ते की तरह जहाँ-तहाँ उड़ाए जा रही है। कहीं भी बो कर, कहीं भी उगाने, और कहीं भी काट लेने का दर्शन देती उपभोक्तावादी संस्कृति ने उसे ग्लोबल भी किया है और 'अपनी भाषा', 'अपना धर्म', 'अपना क्षेत्र' के नॉस्टेल्जिक व्यामोह में खींच कठमुल्ला भी बनाया है। (क्या इन दिनों हो रहे सारे आंदोलनों के मूल में अपनी 'मैं' का ही घिनौना प्रदर्शन नहीं?) कमिटमेंट और संघर्ष जैसी चीजें यहाँ प्रतिबंधित हैं। द्रष्टा के भीतर उगे विवेक, संवेदना और विजन को जब्त कर और उस रिक्त स्थान पर याँत्रिक जुमलेबाजी को आरोपित कर वह उसे 'दर्शक' की भूमिका में उतार रही है - जल में कमलवत रहने की दार्शनिक ऊँचाइयों का मुलम्मा चढ़ा कर। ''जुड़ोगे तो भागोगे। लोगों को पहचानने में व्यर्थ वक्त जाया न करो।'' (अनुभव) - जीवन का मूलमंत्र हो तो 'स्व' से बड़ा और कौन? नहीं, पतन का यह कुत्सित राग और देर तक नहीं छेड़ सकते लेखक। ''(मैं) एक नौजवान आदमी के इस अंत का समारोह नहीं मना सकता था'' - मनोहर के बहिर्गमन में उसके व्यक्तित्व, समय और समाज के विकास की समस्त सर्जनात्मक संभावनाओं का निषेध देखते हैं ज्ञानरंजन। यह पलायन है और पलायन आत्म-पराजय और आत्मघात का मुखर स्वीकार है।

ज्ञानरंजन इस अर्थ में रचनात्मक कहानीकार हैं कि वे रोने, गरियाने और सरापने वाले 'मैन्युफैक्चर्ड' कहानीकार का विलोम प्रस्तुत करते हैं। बेशक जड़ता में सुख ढूँढ़ते, यथास्थितिवाद को सांस्कृतिक विरासत मानते, विघटनशील ताकतों के दबाव तले कुचले जाते दिशाहारा मध्यवर्गीय शहरी युवक की कहानियाँ रचते हैं वे, लेकिन इस युवक में अपनी पराजय और पतनशीलता की निर्लज्ज उत्सवधर्मिता नहीं, अपने 'होने' के अर्थ को उदात्त संदर्भों में पाने की जिद है। जाहिर है उनकी कहानियाँ उपभोग की जमीन पर टिके मध्यवर्गीय युवक के स्खलन-विघटन, सपनों-आकांक्षाओं की कहानियाँ नहीं, तमाम अराजक और क्रूर परिस्थितियों के बीच से अपनी डगर आप बनाते संकल्पों और दायित्वों की कहानियाँ हैं। इसलिए ये कहानियाँ अर्थ को पाने और गुनने के लिए पाठक से जितनी गहरी तल्लीनता की माँग करती हैं, उतनी ही प्रकट निःसंगता की भी कि राग-द्वेष से परे वस्तुपरक दृष्टि से स्वयं को और परिवेश को जाँच कर सुधरने-बदलने की प्रक्रिया को वह भीतर-बाहर अनवरत चलाए रखे। विराट को क्षुद्र में तब्दील कर देना या क्षुद्र के भीतर छिपे विराटत्व को प्रकट करना - सब अंतर्दृष्टि पर ही तो निर्भर है जो सत्य की पहचान और कर्म के सौंदर्य के साथ जुड़ कर मनुष्य मात्र के शिवत्व का संधान करती है।

संदर्भ

1 . मझले के अनुसार मानो ''माँ की आँखों में दर्द की एक शिला है जो अंदर ही अंदर उसे भेदती है'' (शेष होते हुए, सपना नहीं, पृ. 177) और 'संबंध' के नैरेटर के अनुसार 'माँ की आँखें इस तरह की थीं जैसे खाल को चाकू से चीर दिया गया हो और लहू समाप्त होकर लपलपाती हुई सफेदी में बदल गया हो।'' (प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. 75)

2 . हालाँकि जिस तरह 'संबंध' का नैरेटर बात-बात पर पिता द्वारा हड़का/अपमानित कर दिए जाने की घटनाओं का जिक्र करता है और 'शेष होते हुए' के पिता मुद्दत बाद घर लौटे जवान बेटे को गले लगाने की आंतरिक इच्छा का 'निषेध' कर खाँसी के सहारे उसका ध्यान आकर्षित करने की 'दयनीय' कोशिशें करते हैं, वे उनके विशिष्ट~, वर्चस्ववादी और निरंकुश होने के प्रमाण ही तो हैं।

3 . यानी पैसा कमाना भर नहीं, उस पैसे को धौंस और अहसान बना कर 'अपनों' की परवरिश में लगाना जिस शहादत भरे सुख की सृष्टि कर परिवार के मुखिया के मुख पर ओज और रोब की कांति फैलाता है, उसे 'बेचारी' औरतजात क्या जाने? हाँ, अति विकसित छठी इंद्रिय के बल पर इतना जरूर जानती है कि अपनी कमाई को 'अपना' कह देने भर से ही कोर्ट-कचहरी-हवालात सब तुरंत घर में ही मुहैया करा दिए जाते हैं। इसलिए भरण-पोषण के लिए 'दूसरों' पर निर्भर रहने के भाव को रोम-रोम में बसा कर रहे तो खुश रह सकती है, वरना कुलटाओं के साथ कौन गृहस्थी बसाना चाहता है?

4 . ऐसे पिताओं के लिए चरित्रवान होने का अर्थ है सतीत्व की रक्षा। चरित्र यौन शुचिता के नैतिक प्रतिमानों के पार एक गहन सर्जनात्मक शक्ति है जिसे निरंतर अर्जित और संवर्धित करते रहने पर ही जड़ताओं और विडंबनाओं से अकेले अपने दम जूझने का साहस पाया जा सकता है - यह बात उनके लिए न समझने की है, न समझाने की।

5 . ''लगा कि घर पहुँच कर, लोगों से मिल कर उनकी मृत्यु की याद करते हुए मैं बहुत शक्तिशाली हो जाऊँगा। कोई तकलीफ नहीं होगी और धीरे-धीरे मिलने-जुलने की खुशी सब लोग महसूस करने लगेंगे।'' यात्रा, प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. 103 तथा ''मैं निडर उतरा और अपने को सुरक्षित महसूस किया। उनकी मृत्यु को सोच कर कभी-कभी जो अकेलापन छा जाता था, उसका नामोनिशान नहीं था। हल्की स्फूर्ति और दबंगई से मैं सामान उतरवाता रहा। यहाँ मुझे कोई डर नहीं, यह शहर मेरे काबू में है। यहाँ अगर मैं रो भी दूँ तो अफसोस की कोई बात नहीं।'' वही, पृ. 103

6 . ''उखड़े होने के कारण लग सकता था, समय के साथ सबसे अधिक हम हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बैठे-बैठे हम आपस में ही फुफकार लेते हैं, हिलते नहीं हैं'' तथा ''हमारे शरीर में लोथड़ों जैसी शांति भर गई है। नशे की वजह से कभी-कभी थोड़ा-बहुत गुस्सा बन जाता है और आपसी चिल्ल-पों के बाद ऊपर आसमान में गुम हो जाता है।'' घंटा, पृ. 104

7 . उल्लेखनीय है कि प्रभात रंजन की कहानी 'फ्लैशबैक' हो (''दिल्ली के सांसद निवास में रहूँगा। ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैसा बनाऊँगा। किस्मत चली तो रूस में लड़कों को मेडिकल-इंजीनियरिंग में दाखिला दिला कर कमाऊँगा... न सही टाटा सफारी, टाटा सूमो तो खरीद ही लूँगा। समाजसेवा और उसके माध्यम से मेवा बनाने के अनेक रास्ते अपने आप निकलने लगेंगे।'' 'जानकीपुल', पृ. 22) या रवि बुले की 'एक असाहित्यिक की कथा' (''फिलहाल लिखने की छोड़ दे। पैसा बनाने की सोच। असली चीज वही है। ...पैसा कमाने का मौका कभी-कभी आता है ...वह निकल गया तो हाथ मलते रह जाएँगे। ...पैसा बनता है हाथ की सफाई से।'' पृ. 97), अथवा कुणाल सिंह की 'शोकगीत' ( ''मेरी उम्र महज पच्चीस साल है। मैं सिर्फ इश्तहारों को पढ़ सकता हूँ और लड़कियों के साथ फ्लर्ट कर सकता हूँ। या ज्यादा हुआ तो मल्टीप्लैक्स सिनेमा पर बहस कर सकता हूँ।'' पृ. 18), अपने नायक से एक सुरक्षित दूरी बना कर लेखक उसके पतन की कथा रस ले-लेकर कहते हैं। जाहिर है इसलिए वे मात्र 'दर्शक' हैं या रिपोर्टर। द्रष्टा बन कर स्थितियों में हस्तक्षेप करना, अपना रचनात्मक प्रतिरोध दर्ज करना और यथार्थ का अतिक्रमण कर एक उदात्त भाव लोक की रचना करना उनके बूते का काम नहीं रहता।

8 . 'घंटा' कहानी में पूरे समय नैरेटर के साथ मिल कर अपने 'मैं' का मजाक उड़ाने वाले ज्ञानरंजन 'बहिर्गमन' में बस एक बार ही खुल कर सहल होते हैं जहाँ फॉरेन रिटर्न्ड (परमादरणीय विशिष्ट व्यक्ति?) सोमदत्त की जुबानी अमरीका को 'बहिश्त' बनाने वाली 'आजादी' की कथा कहते हैं। आजादी की बात, जाहिर है, लड़कियों के संदर्भ में ही होगी। कल की दबी-कुचली लड़कियाँ प्रोग्रेसिव समाज में रह कर इतनी 'विकसित' हो गई हैं कि कामातुर पति को वेश्या का फोन नंबर देकर शयन कक्ष का दरवाजा बंद कर लेती हैं या नंदन कानन मे चार 'ताजा' प्रेमियों संग प्रेम क्रीड़ाएँ करते हुए 'बासी' प्रेमी को गोली से उड़ा देती हैं। ''दिल्ली में अब काफी आक्रामक गतिविधियाँ हैं और तनाव भी, और लड़कियाँ खूब दुस्साहसी, बुद्धिमान तथा आजाद हो चली हैं'' - बादशाह पर जोकर फेंकते मनोहर की खिसियानी टिप्पणी का लुत्फ लेते हैं ज्ञानरंजन। लेकिन क्या हर हँसी निर्मल आनंद की सूचक होती है?


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