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सिनेमा

मैगते चंग्नेइजैग से मैरी कॉम बनने की कहानी
संजीव खुदशाह


फिल्म मैरी कॉम एक नए जुमले को जन्म देती है कि स्त्री की सफलता के पीछे भी एक पुरूष का हाथ होता है। यह फिल्म मणिपुर राज्य के एक गाँव में निवास करने वाली लड़की की कहानी है। जिसका परिवार तंगहाली में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। और वह आठ साल की लड़की बॉक्सिंग ग्लब्ज को सीने से लगाए रहती है। चूँकि उसके पिता रेसलिंग के एथलीट रह चुके है इसलिए उसे एक एथलीट बनने के लिए क्लब भेजते हैं। लेकिन गुपचुप वह लडकी बॉक्सिंग सीखती है और राष्ट्रीय चैंपियन बन जाती है। पिता को जब ये बात पता चलती है तो वे नाराज होते है जो पहले से ही उसके इस खेल के विरोध में थे। उनका मानना था कि लड़कियाँ बॉक्सिंग खेलेंगी तो चेहरे में चोट लगेगी और शादी में अड़चन आएगी। पिता अपनी बेटी मैरी से पूछते है आज तुम्हें मुझे या बॉक्सिंग दोनो में से किसी एक को चुनना होगा। मैरी कहती है "बॉक्सिंग"।

ऐसे मजबूत जज्बे को लेकर सामने आती मैरी कॉम (प्रियंका चोपड़ा) अपने किरदार से भारतीय लड़कियों को बहुत कुछ सिखाती है। जहाँ एक आम लड़की अपने लक्ष्य की खातिर भले ही ससुराल में विरोध करने की हिम्मत जुटा लेती है लेकिन माता पिता से विरोध करने की कल्पना भी नही कर सकती।

मैरी कॉम जब अपने कोच (सुनील थापा, चर्चित नेपाली कलाकार) के पास जाकर मुक्केबाजी सिखाने के लिए कहती है, तो वह उम्रदराज कोच उससे प्रश्न पूछता है कि तुम मुक्केबाजी क्यों सीखना चाहती हो पाँच कारण बताओ? तभी मैं तुम्हें मुक्केबाजी सिखाऊँगा। तो जवाब में मैरी कॉम कहती है आई लव बॉक्सिंग, आई लव बॉक्सिंग, आई लव बॉक्सिंग, आई लव बॉक्सिंग अब क्या और एक बार कहना होगा? कोच मैरी को कोचिंग देने के लिए तैयार हो जाते है। यहाँ पर बताना चाहूँगा कि मैरी कॉम की जिंदगी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि वे मणिपुर से आती हैं। वो मणिपुर जो 60 सालों से आतंकवाद और विशेष सशस्त्र बल अधिनियम से जूझ रहा है। वहाँ की जिंदगी यहाँ जैसी आजाद माहौल में बसर नही कर रही है। यहाँ के हर आमोखास को शक की निगाह से देखा जाता है। यहाँ आदमी औरत बच्चे कोई भी महफूज नही है, खौफ का साया हमेशा मंडराता रहता है। यहीं की इरोम शर्मिला पिछले 13 सालों से इस अधिनियम को हटाए जाने के विरोध में भूख हड़ताल कर रही हैं।

इस फिल्म में भी ऐसे माहौल की झलक मिलती है जब मैरी कॉम की डिलीवरी होने वाली होती है। और उन्हें लेबर पेन के कारण अस्पताल ले जाना पड़ता है। पुलिस द्वारा उन्हें रोक लिया जाता है और बाद में पुलिस उन्हें मदद करती है तो उग्रवादियों द्वारा उन्हें जाने नही दिया जाता पर जब उन्हें पता चलता है कि ये राष्ट्रीय चैंपियन मैरी कॉम है तो उन्हें छोड़ दिया जाता है।

इस फिल्म के बहाने यह बखूबी बताया गया है कि किस प्रकार खेल के पीछे एक बड़ा खेल होता है। सरकारी चयन समिति के अधिकारी श्री शर्मा अयोग्य खिलाड़ियों का चयन करते हैं और योग्य खिलाड़ियों का शोषण करते है। सिर्फ अपने निजी हितों की खातिर। यहाँ यह बात भी खुल कर सामने आती है कि किस प्रकार खेल विभाग से आए पैसों से चयन समिति के अधिकारी मौज उड़ाते हैं और खिलाड़ियों को आहार के नाम पर सिर्फ एक केला और दलिया दिया जाता है। ये अधिकारी विदेश में भी विदेशियों के सामने खिलाड़ियों को जलील करने से बाज नहीं आते। यहाँ मैरी कॉम का एक डायलॉग महत्वपूर्ण है "हम यहाँ डारमेटरी में रहते है और तुम खिलाड़ियों के नाम पर अपने परिवार को लाकर पाँच सितारा होटलों में मौज करते हो।" एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है जब मैरी कॉम जैसी देश का नाम रोशन करने वाले चैंपियन को चौथे दर्जे की सरकारी नौकरी के काबिल समझा जाता है।

मैरी कॉम का पति ओन्लर कॉम (दर्शन कुमार) दो जुड़वाँ बच्चे होने के बावजूद मैरी को फिर से बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए प्रेरित करता है। और कदम कदम पर उसकी मदद करता है। उसके कोच नहीं चाहते थे कि मैरी शादी करे क्योंकि उनका मानना था कि एक बार शादी के बंधन में कोई लड़की बँध जाती है तो फिर घर के दायरे में बँध कर रह जाती है। लेकिन दो बच्चे की माँ होने के बाद फिर मैरी उस कोच के पास आती है तो कोच उसकी हिम्मत से बेहद प्रभावित होता है और कहता है कि "एक औरत माँ बनके और स्ट्रांग हो जाता है और अब तुम्हारा ताकत दो गुना बढ़ गया।"

मैरी कॉम का असली नाम मैगते चंग्नेइजैग मैरी है जिसका जन्म 1 मार्च 1983 को मणिपुर के चुराचाँदपुर में हुआ था। मैरी कॉम का यह नाम उनके कोच ने दिया था। मैरी कॉम पाँच बार विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता की चैंपियन रह चुकी हैं और लंदन ओलंपिक में कांस्यपदक विजेता हैं। मैरी कॉम एक आदिवासी इसाई पृष्ठभूमि में पली बढ़ी और एक ऐसे गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं जहाँ संस्कृति के नाम पर लड़कियों को खेल में भाग लेने के लिए मनाही नहीं है। मैरी कॉम की जिंदगी की कहानी बताती है कि वह मैगते चंग्नेइजैग से मैरी कॉम बनने के दौरान कई बार क्षेत्रवाद, जाति भेद, लिंग भेद, धर्म भेद का शिकार हुईं।

चूँकि यह फिल्म मैरी के कॉम की असल जिंदगी का फिल्मांकन (नाट्य रुपांतरण) है इसलिए जरूरी नहीं है कि सारी घटनाएँ और संवाद हू ब हू हो़ं, लेकिन यह फिल्म भारतीय खेल की ओछी राजनीति, एक औरत के संघर्ष की कहानी की सच्चाई बयाँ करती है। हर व्यक्ति को यह फिल्म देखनी चाहिए खासकर उन्हें जो किसी भी प्रकार के खेल में अपना भविष्य देखते हैं।

इससे कुछ भी फर्क नही पड़ता कि प्रियंका चोपड़ा मैरी जैसी नही दिखती, लेकिन उसके हाव भाव, बोली भाषा मैरी कॉम का आभास कराते हैं, प्रियंका ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। पृष्ठभूमि मजबूत है। इस फिल्म के सेट मणिपुर के गाँव का वास्तविक एहसास कराते हैं। सह कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया है। संवाद सधे हुऐ हैं। फिल्म दर्शकों को मैरी कॉम और खेल की दुनिया के अंदर झाँकने, समझने का एक बेहतरीन मौका मुहैया कराती है। संगीत उम्दा है। निर्देशन उच्च कोटि का है जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है और देश प्रेम के जज्बे से ओत प्रोत कर देता है।


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