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विमर्श

लोक गीत परंपरा में स्त्री वेदना के स्वर
अनुराधा गुप्ता


पश्चिमी शक्तिशाली और विकसित राष्ट्रों की अपनी संस्कृतियों के वर्चस्ववादी अभियान के तहत वैश्वीकरण अथवा ग्लोबलाइजेशन की आधुनिक संकल्पना का प्रसार चरम पर है। इस अभियान के अंतर्गत, बाजारवाद के वृहद शक्तिशाली जाल में पूरी दुनिया को जकड़कर स्थानीयता (लोकल) से बेदखल करने के षड्यंत्र को, संवेदनशील प्रबुद्ध व्यक्ति भली-भाँति समझने लगा है । इसीलिए आज पुनः 'लोक' से जुड़ी अस्मिताओं की पहचान और संरक्षण के सवाल उठने लगे हैं। इसी प्रयास में हमारी दृष्टि सबसे पहले लोक साहित्य की तरफ उठती है क्योंकि इसी में हमारी संस्कृति अपने खालिस रूप में अजस्र रूप से बहती नजर आती है। लोककंठ से प्रस्फुटित यह लोक साहित्य, लोक हृदय, लोक चेतना, लोक संवेदना का परिचायक साहित्य है जिसमें भारतीय हृदय की सांस्कॄतिक अस्मिता का सच्चा उद्गार है तथा 'स्वदेश' भाव की अभिव्यक्ति है।

लोक का सहज आकर्षण हर किसी को प्रिय होता है। उसके सामने कृत्रिम सुंदरता हेय प्रतीत होती है। महाकवि कालिदास ने कहा है - 'दुरीकृता खलूद्यानलता वनलताभिः' अर्थात वनलताओं ने उद्यानलताओं को पीछे रख दिया। उन्होंने बिल्कुल सही ही कहा कि जो आकृति से मधुर होते हैं उन्हें मंडन (मेकअप) की आवश्यकता नहीं होती - 'किमिव हि मधुराणां मंडनं नाकृतीनाम।' लोक स्वभाव से मधुर होता है। उसे अलंकरण की आवश्यकता नहीं होती। वैदिक साहित्य में जो स्वाभाविक अभिव्यक्तियाँ हैं वे दीर्घकालीन लोकव्यापी मनोभावों का ही प्रकटीकरण है। यही स्थिति संस्कृत प्राकृत तथा अपभ्रंश साहित्य में व्याप्त देखी जा सकती है।

लोकसाहित्य हर क्षेत्र का अपना होता है परंतु फिर भी वह पड़ोसी बोली से अप्रभावित नहीं रहता है। प्रभाव की यह परंपरा बढ़ती सुदूर देशों तक चली जाती है। एक लहर से दूसरी लहर तक बनती आगे बढ़ती जाती है। इस प्रकार लोकप्रवाह बनता बढ़ता और थोड़ा-थोड़ा रूपांतरित होता जाता है किंतु मूल रूप नहीं बदलता। उसमें निहित स्थानीयता का बीज ही उसे स्थानीयता का रंग देता है। जैसे लोकगीतों में भरथरी गीत। "भरथरी गीत वही होते हुए भी कभी मालवी, कभी बघेली, कभी राजस्थानी और कभी छत्तीसगढ़ी हो जाता है और वही बनता बहता नेपाल तक भी पहुँच जाता है, बिहार तक चला जाता है और बंगाल में भी अपना रूप पा लेता है। मराठी में कुछ और रूप पा लेता है। 'एकोअहं बहु स्याम' का प्रत्यक्ष प्रमाण।" (लोकभाषा और साहित्य : बी.एल. राजपुरोहित)

लोकसाहित्य की जड़ें वैदिक साहित्य में भी मिलती हैं। ॠग्वेद में लोक शब्द का प्रयोग स्थान और भुवन के अर्थ में प्राप्त होता है। भारत में आर्यों के आगमन के बाद 'आर्य' एवं 'आर्येतर' जातियों के मध्य 'वेद' एवं 'वेदेतर' स्थिति का आविर्भाव हुआ। उस दशा में वेदेतर शब्द का प्रयोग लोक के लिए होने लगा। यहाँ 'लोक' शब्द वेद विरोधी अर्थ में लिया गया। किंतु आगे चलकर लोक शब्द इस संकुचित सीमा से आगे उठ गया। बौद्ध धर्म के विकास के साथ मानव भावना का महत्व बढ़ने लगा और लोक शब्द मानवीय उत्कृष्टताओं का बोधक बन गया।

लोक की व्यापक भावसत्ता को ग्राम या नगर की संकुचित सीमा में बद्ध नहीं किया जा सकता। इस संबंध में डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है कि "लोक शब्द का अर्थ 'जनपद' या 'ग्राम्य' नहीं है। बल्कि नगरों और ग्रामों में फैली समस्त जनता है जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं। ये लोग नगर में परिष्कृत रुचि संपन्न सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यासी होते हैं तथा परिष्कृत रुचि संपन्न व्यक्तियों की विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने वाली आवश्यक वस्तुएँ उत्पन्न करते हैं। (डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी : जनपद, वर्ष-१, अंक-१, पृ.६५) डा. द्विवेदी के इस कथन से स्पष्ट है कि जो अपनी परंपराओं से जुड़े हुए कृत्रिमता से दूर हैं उन्हें 'लोक' की संज्ञा दी गई है। लोक की परंपरा, संस्कृति, विचार, रीति-रिवाज आदि को संरक्षित और संवर्धित करने वाले साहित्य को ही लोक साहित्य कहा जाता है। जनजीवन के सहज स्वाभाविक और सच्चे चित्रण का आधार यही साहित्य है। सामान्य जन समूह ,जो अपनी नैसर्गिक प्रकृति के सौन्दर्य से संस्कृति का निर्माण करता है, लोक साहित्य की अभिव्यक्ति का आधार है। "उच्चवर्गीय शिष्ट समाज ने अपने कृतित्व को लिपिबद्ध किया और अध्ययन-अध्यापन की परंपरा द्वारा समस्त अर्जित ज्ञान को सुरक्षित और संरक्षित रखने का प्रयास किया। इसके विपरीत निम्नवर्गीय सामान्य जनता पठन-पाठन की सुविधा से वंचित रही, अतः सुविधाविहीन लोकजन ने अपने संस्कारों, रिवाजों, परंपराओं एवं संस्कृति को लोकगीतों, लोककथाओं एवं लोकनाटकों के माध्यम से सुरक्षित रखने का प्रयास किया। अन्य की अपेक्षा लोकगीत लोक-साहित्य की सबसे सशक्त विधा है।" (प्रतीक्षा दुबे, आजकल, मार्च-२०१५)

लोकगीतों में जनमानस के हार्दिक राग विराग से पूर्ण, स्वर और लय के संगीतात्मक आवरण से लिपटी, भावानुभूतियों का निश्छल प्रवाह बहता है। जिसमें लोकजीवन के समस्त रीति-रिवाज, लोकपरंपराएँ, धार्मिक कृत्य, विधि-विधान, मिथक, लोककथाएँ, प्रतिरोध, आशाएँ, उम्मीदें, हर्ष-विषाद, उल्लास-नैराश्य सभी कुछ प्रतिबिंबित होता है। लोक साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान श्री कृष्णदेव उपाध्याय लिखते हैं - "किसी देश के लोकगीत उस देश की जनता के हृदय के उद्गार हैं। वे उनकी हार्दिक भावनाओं के सच्चे प्रतीक होते हैं। यदि किसी देश की सभ्यता का अध्ययन करना हो तो सर्वप्रथम उनके लोकगीतों का अध्ययन करना होगा। लोकगीत लोकमानस की वस्तु है, अतः उनमें जनता का हृदय लिपटा रहता है।"

भारतीय लोक साहित्य के निर्माण में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का योगदान अधिक रहा। लोकगीतों में सदियों से झरते स्त्री मन के अथाह दर्द, पीड़ा, प्रेम, आशा, आकांक्षा, प्रताड़ना आदि को साफ महसूस किया जा सकता है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में नारी के कंठ से उसके अपने भाव और अभाव के उद्गार प्रकट होते रहे हैं। वस्तुतः ये लोकगीत समाज के घात-प्रतिघात का सच्चा रूप व्यक्त करते हैं।

समाज की बड़ी विडंबना रही है कि जिस घर में एक लड़की का जन्म होता है वह उसे अपना घर नहीं कह सकती क्योंकि विवाह के बाद वह जिस घर में जाएगी वही परंपरा के अनुसार उसका 'अपना' घर है। किंतु वास्तविकता में ससुराल में बेगाने लोगों के बीच वो उस घर को भी अपना नहीं समझ पाती। आत्मीयता के अभाव में उसे मायका ही याद आता है जहाँ अब वह सिर्फ मेहमान की हैसियत रखती है। बेटी की मायके के प्रति हुलस, सास-ननद का भय और दोनों पक्षों का एक दूसरे के प्रति कड़वापन भारतीय समाजिक स्थिति की विडंबना को उजागर करते हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं -

"क्यों रे नऊआ पेट कटऊआ क्यों (चों) दीनी परदेस जी,
कहा करूँ जिजमान की बेटी करम लिखा परदेस जी,
चिट्ठी होय तो बाँच लेउ पै करम न बांचौ जाय जी।
"सासू तो ऐ मैया बुढ़िया डोकरिया
आजु मरै की काल्हि रे।
ननदी तो ए भैया बन की कोइलिया
आजु उड़ै की तो काल्हि रे"।

पति स्त्री का सर्वस्व है, उसके सुख-दुख का सहभागी है। पुत्राभाव की वेदना दोनों के लिए समान है, जिसमें दोनों को एक-दूसरे का दर्द समझना चाहिए। किंतु हमारे समाज में हमेशा से इसके लिए सिर्फ स्त्री ही उत्तरदायी मानी जाती है। संतानहीनता का सारा दोष उसके ही सिर मढ़ा जाता रहा है। ऐसे में अगर पति भी उसे ही दोषी मान कर उसकी अवहेलना करे, व्यंग्य कसे तो स्त्री के लिए यह स्थिति बेहद तकलीफदेह और असहनीय हो जाती है। एक अवधी लोकगीत का उदाहरण दृष्टव्य है -

"पानु ऐसी पतरी बहुरिया, कुसुम रंग सुंदरि रे।
सुंदरि चढ़ गई पिया की अटरिया, सोवहि सुख निंदिया रे।
सोइ सोइ जब जागी पलंग चढ़ि बैठी रे।
राजा छांड़ि देउ अँचरा हमार घरै हम जइवे रे॥
की तोरी सासु बोलावहि, कि ननद जगावे रे।
सुदरि की तोरे बारे होरिलवा, जिनहि लई बैठो॥
न मोरी सासु बोलावै, न ननद जगावै रे।
न मोरी बारे होरिलवा, जिनहि लइ बैठो रे॥
महल से उतरी बहुरिया, आंगन बिच ठाढ़ी रे ।
भइया तोरे बोले हैं बोल,
कलेजे मोरे सालै, जनम नहि बिसरहिं रे"।

पति के व्यंग्यात्मक शब्द स्त्री के मन में शूल की तरह चुभ जाते हैं। संतानहीन स्त्री जब सूर्य उपासना से पुत्र प्राप्त करती है तब सास-ससुर देवर और अपने भाग्य को तो सराहती है किंतु पति के लिए कुछ नहीं कहती। पति के संबंध में मौन रहती है। पति द्वारा किया गया अपमान उसके मन में अभिमान जगा देता है। हिंदू समाज में निःसंतान स्त्री-पुरुष दोनों की भर्त्सना की गई है। किंतु निःसंतान स्त्री सर्वाधिक उपेक्षा की पात्र रही है। निम्नलिखित भोजपुरी गीत में स्त्री-करुणा की पराकाष्ठा है। जहाँ बाँझ स्त्री की चर-अचर सर्वत्र घोर उपेक्षा की मार्मिक व्यंजना की गई है।

"सासु मोरी कहेली बंझनियाँ ननद ब्रजवासिनि हो।
रामा जिनके मैं बारी रे बिआही अहो घर से निकसलनि हो॥
घरवा से निकसी बंझनियाँ जंगल बिच ठाढ़ भइली हो"।

इसमें ऐसी स्त्री की अपार पीड़ा झर रही है जो अपनी ससुराल से संतानहीनता के अपराध में निष्कासित किए जाने पर जंगल में बाघिन और नागिन की शरण में जाती है वे भी उसे नहीं रखती। जन्म देने वाली माता भी उसे नहीं रखती। और अपार वात्सलयमयी, सबकी शरणस्थली धरती माँ भी उसे 'ऊसर' होने के भय से शरण नहीं देती। यह गीत संतानहीन स्त्री की पीड़ा सामाजिक तिरस्कार और अन्याय को बखूबी शब्दों में ढाल देता है। अवधी क्षेत्र में भी किंचित शाब्दिक परिवर्तन के साथ यह गीत प्रचलित है -

"सासु मोरी कहेसि बंझनिया ननद ब्रजवासिनि हो।
रामा जिनकी मैं बारी रे बियाही उइ घर से निकारेनि हो"॥

दहेज प्रथा सभ्य मानव समाज का कलंक है। घर में बालिका के जन्म के समय मातम, कन्या भ्रूण हत्या, माता-पिता के लिए लड़की बोझ के समान होना, अनमेल विवाह और दहेज के कारण स्त्री की नर पिशाचों द्वारा हत्या आदि इसी प्रथा के अभिशाप के कारण हैं। निर्धन या औसत आमदनी वाले पिता को अपनी पुत्री के विवाह के लिए दहेज जुटाने की चिंता खाए जाती है। इसीलिए स्त्रियाँ गाती हैं -

"धी होवे तो धन होवे, धन बिन धी न हो।
धी रखी मेरे बाप ने, जेड़ा झुर-झुर पिंजर हो।
कोठे तो कोयल कूकदी धी न रखिओ कोई"। (पंजाबी लोकगीत)

दहेज यदि जैसे-तैसे जुटा भी दिया गया हो, या यदि पिता संपन्न हो, तो भी विवाह के बाद बेटी की सकुशलता के प्रति निश्चिंत नहीं रह पाते जब तक बेटी अपने ससुराल से आकर अपने सकुशल होने की खबर नहीं देती। ससुराल से आकर बेटी माँ से गले मिलती है और दोनों फूट-फूट कर रोते हैं। अपनी जड़ों से उखाड़ दी गई बेटी दुखी होकर सोचती है कि बेटियाँ पैदा ही क्यों होती हैं -

"मांवां ते धियां रल बैठियांनी माय / कुज करदियां गलोड़िया (बातें)
नी कनका लम्मियां धियां क्यों जम्मियां माय नी माय"। (पंजाबी लोकगीत)

आज भी हमारे देश के कई या कहें अमूमन सभी प्रांतों में स्त्री का सम्मान उसके पुत्र पैदा करने से होता है। पुत्र को जन्म देने वाली स्त्री का महत्व बढ़ जाता है, जबकि पुत्री को जन्म देने वाली जननी को परिवार में उपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। प्रसवोपरांत उसके साथ तमाम तरह के दुर्व्यवहार किए जाते हैं। पुत्र जन्म पर खाने में मेवे, फल आदि, ओढ़ने के लिए दुशाला और पसंगी में चंदन की लकड़ी जलाई जाती है, जबकि पुत्री को जन्म देने पर कुश की घास बिछाने व ओढ़ने के लिए तथा खाने में जंगली फल और पसंगी में खुखुड़ी (सूखा भुस)। इस प्रकार के भेदभाव के वर्णन अनेक लोकगीतों में मिलते हैं -

"अइसन दइ में के पुरहन, दहे बिच कांपेले रे।
ए ललना, ओइसन कांपेले हमरो हरिजी, धिया का रे जनम नु रे।
कुस ओढ़न कुस डासन, बनफल भोजन रे।
ए ललना, खुखुरी के जरेला पसंगिया, निनरियो ना आवेला रे"।

वस्तुतः भारत देश के अलग-अलग प्रांतों में, क्षेत्रीय बोली-बानी के अनुसार लोकगीतों की अत्यंत समृद्ध, विस्तृत और मजबूत परंपरा देखी जा सकती है। भिन्न-भिन्न अवसरों, रोजमर्रा के क्रिया कलापों, भिन्न-भिन्न भावों की अभिव्यक्ति के लिए, गाए जाने वाले इन लोकगीतों की विस्तृत और समृद्ध परंपरा की जड़ लोकमानस में गहरे तक धँसी हुई है। इन्ही लोकगीतों के बहाने लोक समाज की स्त्री-मन के विविध भावोच्छ्वास अपनी संपूर्ण तरलता और उद्दाम वेदना के साथ प्रकट हुए हैं। यह स्त्री उस समाज की है जहाँ आज भी वह; स्त्री सशक्तिकरण के तमाम तामझाम के बावजूद; पीड़ित है, पराधीन है, अशिक्षित है और शोषित है किंतु संघर्षरत है। अपनी इन विपरीत परिस्थितियों से बाहर निकलने की उसकी छटपटाहट इन गीतों में साफ दिखती है। ये लोकगीत न सिर्फ उसकी वेदना को बयाँ करते हैं बल्कि इनमें उसका प्रतिरोध भी दर्ज हुआ है। कन्या जन्म पर परिवार की उपेक्षित प्रतिक्रिया पर स्त्री का गुबार इस लोकगीत में साफ दिखता है जहाँ वह कहती है कि यदि उसे पता होता कि उसके गर्भ में कन्या है तो वह उसे जन्मने ही न देती -

"जाहु हम जनिती धियवा कोखी रे जनमिहे,
पिहितों में मरिच झराई रे,
मरिच के झाके झुके धियवा मरि रे जाइति,
छुटि जाइते गरुवा संताप रे"।

भला कौन सी माँ अपने कोख के जाए को अपने हाथों से मौत देना चाहेगी। सॄष्टि की हर माँ अपने शिशु के लिए दुनिया भर की बलाएँ अपने सिर ले उसके लिए लंबी से लंबी उम्र की कामना करती है। किंतु यहाँ माँ का अपने नवजात शिशु के लिए मृत्यु की कामना इसलिए करना कि वह कन्या है; समाज के विकृत रूप को सामने लाता है। यह गीत स्त्री के मन के गहरे विक्षोभ और वितृष्णा का परिचायक है।


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