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कहानी

को जाने कौन भेस नारायन!
अशोक कुमार


मल्टीप्लेक्सेस और डीवीडी के चलते झाँसी में चित्रा सिनेमा का नमोनिशान मिट चुका है और नौजवान लोग चित्रा सिनेमा के नाम से अब इस जगह को जानते भी नहीं हैं। अब ये जगह भंडारा चौराहा के नाम से जानी जाती है। भंडारा इसलिए कि कभी किसी छुटभैय्ये ने चौराहे के बगल में एक मंदिरनुमा रख लिया था। मटमैली लंगोटी लगाए, भभूत मले उघारे बदन त्रिपुंड लगा कर पंचा डाल कर वहाँ के ये भइया जी पुजारी बन गए। हालाँकि मंदिर के चलते इस जगह से तो स्वतंत्र भारत में कोई माई का लाल उन्हें हटा नहीं सकता था लेकिन सिवाय छोटे मोटे चढ़ावे के आमदनी की कमी भैय्या जी को बहुत खलती थी।

तालबेहट से झाँसी आ कर बहुत दिनों फाकों में गुजार कर बड़ी मुश्किल से तो इस जगह पर वे कब्जा कर पाए थे लेकिन इससे क्या होता है! दुनिया है तो माल का सवाल है! भैय्या जी ने देखा लोग गरीबों को भोजन करवाने में बड़ा सवाब मानते हैं। उनकी बुद्धि चली और उन्होने मंदिर में हर रविवार दोपहर को भंडारा आयोजित करना शुरू कर दिया। लोगों ने इनकी भरपूर तारीफ की और तकरीबन हर शख्स ने इच्छा जाहिर की कि 'हम भी भंडारा के लिए दान देना चाहते हैं' इस तरह ये भंडारा रोज दोपहर होने लगा। अब ये हाल है कि हर दोपहर में शहर के कम से कम पाँच सौ भिखारी यहाँ 'प्रसाद' खाने पंगत लगा कर सड़क और चित्रा खंडहर की खाली जगह पर बैठते हैं। एक बार के भंडारा में दानस्वरूप दस हजार से कम राशि स्वीकार नहीं की जाती। भैय्या जी अब मंदिर में नहीं बैठते, अब वे कभी कभी अपनी एयरकंडीशंड श्कोडा लौरा में इस तरफ से यदि निकले तो नजर मार लेते हैं वरना काम काज सब उनके 'भक्तों', 'कार्यकर्ताओं' की देख रेख में सुचारु रूप से चल रहा है। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट है जो हिसाब किताब करता रहता है। जब से भंडारा हिट हुआ है भैया जी ने राजनीति का रुख कर लिया है। राजनेताओं ने इनकी इमेज को भुनाने के हिसाब से इन्हें एम.एल.ए. का चुनाव लड़वा लिया। अब भैय्या जी तीन बार से बराबर झाँसी से चुने जा चुके हैं और दो बार - जब इनकी पार्टी की सरकार थी - मंत्री पद पर भी रह चुके हैं।

भैय्या जी का नाम - जब ये तालबेहट की छोटी सी तहसील में रहते थे - रखा गया था हैरान सिंग यादव। हैरान नाम का हालाँकि कोई औचित्य नहीं था। लेकिन नाम तो था। जैसे कल्लू, लल्लू, बल्लू, जंगली, मन्नू इत्यादि। नौवीं तक तो खैर ये पढ़ लिए, दसवीं में तीन बार फेल हो गए तो पिता ने बड़ी फटकार लगाई। फटकार बुंदेलखंड का लड़का - वो चाहे बाप से ही क्यों न हो - भला सुन कैसे ले! सो ये घर से भाग लिए। अब तालबेहट से भागें तो कहाँ भागें! झाँसी आ गए। कुछ दिन जूते चटकाए फिर देखा पब्लिक सबसे ज्यादा भगवान से दबती है सो इन्होने भभूत रचाई, लंगोटी लगाई और चित्रा चौराहे पर बैठ गए। रोज सुबह छ बजे से शाम सात बजे तक। दो एक दिन में कुछ लोग खाना दे जाने लगे। फिर औरतें आकर चारों तरफ बैठकर भजन गाने लगीं। उसके बाद कुछ लोग सिद्ध पुरुष मानकर इन्हें 'दंडवत-प्रणाम' करने आने लगे। कोने के होटल वाले ने कहा "भैय्या जी महाराज! हियाँ बैठिए... भोजन हमारे यहाँ कीजिए।" तब इन्हें चौराहे के बगल का कोना मिल गया जहाँ इन्होने मंदिर बना लिया और पूजा करने लगे। अब उस अच्छी खासी जगह पर इनका कब्जा है और भंडारे का खाना उसी होटल में बनता है।

भंडारा, भैय्या जी की पॉपुलैरिटी, उनके भक्तों-श्रद्धालुओं की संख्या और इनकी लोगों में पैठ प्रदेश के नेताओं की नजर में आई। उन्हें भैय्या जी से बढ़ कर जीतने वाला उम्मीदवार पूरे उत्तर प्रदेश भर में न दिखा। धर्म भी, कर्म भी, मर्म भी और ऊपर से जनाधार भी और धनाधार भी! एक पार्टी ने इनको सीधे एम.एल.ए. का इलेक्शन लड़ाने का फैसला किया।

भैया जी से जब इलेक्शन का परचा भरवाया गया तब नाम के कॉलम में हैरान सिंग यादव लिखा गया। पार्टी के वरिष्ठ ने कहा, "बदल दो... हरी ओम सिंग यादव लिख दो।"

- "ऐसे कैसे बदल दो? स्कूल में लिखा हुआ है।"

- "तो क्या हुआ? नेता बनाने के बाद सब बदल जाता है। लल्लू का लालू और रबड़ी का राबड़ी हो सकता है तो हैरान और हरी ओम में तो केवल ध्वनि का अंतर है!" लेकिन सरकारी नाम कुछ भी हो जाने बहरहाल अब भी ये भैय्या जी के नाम से ही जाते हैं।

चित्रा चौराहे से - भंडारा चौराहे से - जो सड़क सीधी सीपरी की तरफ जाती है, रेलवे पुल के बाद बाईं तरफ जो ताँगों का अस्तबल है उसके ठीक सामने मेन सड़क पर एक बहुत बड़ा अहाता है जिसमें कम से कम पचास दुकानें हैं और उनके ऊपर बानी जगहों में तकरीबन सौ परिवार रहते हैं। ये सारा इलाका एक शब्बीर अहमद खान की मिलकियत में है। शब्बीर अहमद खानदानी पैसे वाले थे। बाप-दादे ये जगह और पास के गाँव हंसारी में तमाम लंबी चौड़ी खेती छोड़ गए थे। इतना सब कुछ इतनी आमदनी देता था कि उन्होने न कभी किराए बढ़ाने की सोची न किसी को दुकान खाली करने को कहा। इसलिए सन उन्नीस सौ पच्चीस में जिसके बाप ने पाँच रुपये माहवार पर दुकान किराये पर ली थी उसकी तीसरी पीढ़ी आज भी पाँच रुपया महीना किराया ही दे रही थी। फिर आजादी के बाद आ गया रेंट कंट्रोल एक्ट सो मकान मालिक जाए दोजख में लेकिन क्या मजाल कि किराया बढ़ा पाए किराएदार को निकलना तो लोहा चबाने से भी मुश्किल था। शब्बीर खान के पाँच औलादें थीं। पाँचों जहीन और होशियार। दो लड़कियों की तो - एक की बरेली में दूसरी की लखनऊ में शादी हो गई। एक लड़की की शादी झाँसी में ही इतवारी गंज में एक काजी के लड़के से हो गई। लड़के बचे दो - जिसमें से एक डाक्टर बन गया और दूसरे ने अपना स्टोन क्रेशर का बिजनेस डाल लिया दोनों के अपने अपने परिवार थे। बहरहाल सब तरह जीवन ठीक ठाक चल रहा था। लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था कि पाँच एकड़ और पचास दुकानों के इस ऐन मेन रोड वाले प्लाट पर भैय्या जी रीझे हुए हैं! पिछली बार चुनाव तो वे जीत गए थे लेकिन सत्ता में दूसरी पार्टी थी इसलिए वे कुछ कर नहीं पाए थे। लेकिन इस बार तो प्रदेश में सत्ता उन्हीं की पार्टी की थी और उसमें वे एक महत्वपूर्ण मंत्री थे। इस बार उन्हें कौन रोक सकता था! आखिर उनकी पार्टी के छोटे छोटे स्थानीय नेता तक तो बंद घरों के ताले तोड़ तोड़ कर उन पर कब्जा कर चुके थे। एक तो सीधा मेसोनिक लॉज के बगल वाले दो एकड़ में बने बंगले पर पहुँच गया और उसने एक तरफ तो रखी पिस्तौल और दूसरी तरफ रखे एक लाख के नोट और घर के मालिक से सीधे पूछा, "चाहे जे ले लो...। चाहे जे ले लो... लेकिन चौबीस घंटों में बंगला हमें खाली चाहिए..."

- "हम यहाँ तीन पुश्त से रहते हैं... हम कहाँ जाएँगे?"

- "जे हम का बताएँ! ...हाँ कल तक मकान खाली मिलना चाहिए नहीं तो समझ लो..." और उसने हवा में पिस्तौल से फायर कर दिया। मकान के मालिक श्यामा प्रसाद श्रीवास्तव डर गए। घर में अकेले बुजुर्ग मियाँ बीवी रहते थे। बच्चे कोई अमरीका में कोई सिंगापुर में थे। उनके आने का या मुकदमा/लड़ाई करने का सवाल नहीं था। श्यामा रात भर सोए नहीं। लेकिन उनके लड़के अच्छे थे। उन्होने कहा, "गुंडे हैं... लखनऊ में सरकार भी इनकी ही है...। हम क्या कर लेंगे... आप तो हमारे पास आ कर रहिए...। छोड़ दीजिए झाँसी...। पैसा जायदाद जो भी भगवान ने दिया सो दिया, न दिया न दिया...!" श्रीवास्तव साहेब मन मारते आँसू बहाते चले गए। ऐसे तमाम और भी किस्से थे, तमाम और हादसे थे। इस पार्टी के नेताओं के हौसले बुलंद थे। इनके कार्यकर्ता तक तो अपनी गाड़ी की खिड़की से बंदूक की नली निकाले चला करते थे!

एक दिन दोपहर के करीब तीन बजे की बात होगी शब्बीर मियाँ - बुजुर्ग हो चुके थे - खाना खा कर आराम कर रहे थे कि नौकर ने इत्तिला की कि भैय्या जी आए हैं। सीपरी के इलाके के लिहाज से पहचानते तो थे ही लेकिन इस वक्त उसके अचानक आ धमकने से शब्बीर को जरा अचंभा हुआ।

-"पा लागूँ खान साब...!" शब्बीर के बैठक में आते साथ हैरान सिंग ने झुक कर पाँव छूने का नाटक किया।

शब्बीर खानदानी आदमी थे। उन्होने गुंडों को कभी मुँह नहीं लगाया। सीधे बोले, "कहो क्या बात है? कैसे आना हुआ?"

- "अरे दद्दा... आना तो बहुत दिना से हता लेकिन संजोग नई भिड़ रिया था..."

- "कहो कहो..."

- "दद्दा... जे इत्ती बड़ी जमीन पड़ी तुमाई ...तुम क्या करोगे? जे हमें दे दो!"

शब्बीर को जैसे ४४० वाल्ट का करंट लगा... बोले - "हमारी पुश्तैनी जमीन है भाई...। दे दें तो पुरखों को क्या मुँह दिखाएँ!"

- "उनके लिए हम दिए दे रये आपको जे बीस लाख रुपये।" भैय्या जी ने नोटों की एक पुट्टालिया शब्बीर के सामने रखकर खोल दी।

- "देखो भैय्या जी...। हमें इसमें न डालो...।" शब्बीर खान ने अपने हाथ मलते मलते खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, "आप कोई और जमीन ले लो..." फिर उन्होंने सीधे भैय्या जी से मुखातिब हो कर कहा, "इससे तो हम कुछ कमाते भी नहीं हैं...। ये तो बुजुर्गों की निशानी के बतौर हम रखे हुए हैं..." खान साहेब ने पुतलिया में नोटों को वापस लपेटा और मेज पर भैय्या जी की तरफ खिसका दिया।

- "सोच लो खान साब!" हैरान सिंग ने कुर्सी में पीछे सरककर आराम से टिकते हुए एक टाँग पर दूसरी रखकर तेज नजर खान को देखते हुए कहा, "हमें कोऊ जल्दी नई है...। आराम से सोच लो...। हप्ता भर!"

- "पहली बार आए हो चाय पीते जाओ..." शब्बीर ने अपने नौकर को आवाज लगाई, " मुजम्मिल! जरा चाय दे जाना यहाँ।"

- "नई खान साब...। अब चलेंगे...। हप्ते भर बाद फिर मिलेंगे। फाइनल कर देओ अब आप बस!" हैरान सिंग यादव ने कुर्सी से उठ कर अपना लाल अँगोछा दाएँ कंधे से उतार कर एक बार झटका और फिर उसे बाएँ कंधे पर डाल लिया।, "चलते हैं।!"

शब्बीर खान ठगे से देखते रह गए।

किस्से तो उन्होने इस पार्टी की गुंडागर्दी के तमाम सुन रखे थे लेकिन ऐसा एक दिन उनके साथ भी होगा इसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी।

दो दिन गुजरे होंगे कि एक अरमाडा गाड़ी रात के दस बजे के आस पास शब्बीर खान के घर के दरवाजे पर आ कर रुकी और उसमें से दो डाकू किस्म के घुटनों तक की मैली सी सफेद धोती पहने हाथों में बंदूक लिए लोग उतरे।

- "खान किदर है?"

- "डाक्टर खान? ...दवाखाना तो बंद हो गया।" वॉचमैन ने कहा।

- "मादर...!" वॉचमैन के गाल पर तड़ाक से बड़ी जोर का थप्पड़ पड़ा, "हम तुझे बीमार लगत हैं? हम डाक्टर के पास आए हैं? ...डाक्टर का बाप कहाँ है? ...बुड्ढा!"

वॉचमैन अंदर गया। शब्बीर खान सोने की तैयारी कर रहे थे। बाहर निकले।

- "देखो हम जे कैने आए हैं कि भैय्या जी ने अभी तो बीस लाख का ऑफर दिया है... हप्ता भर में जा इलाका हमें बेच दो नई तो बुढ़ऊ जो तुमे हम दे रय हैं बो भी नई मिलेगा और जमीन तो तुमाई हम लेई लेंगे...। सोच लो!"

उसके बाद बगैर कुछ कहे सुने दोनों बंदूकधारी वापस अपनी स्टार्ट करी रखी हुई अरमाडा में बैठकर वापस चलने लगे। शब्बीर खान समझ गए कि अब बात हाथ से निकली जा रही है... इन गुंडों की सरकार है और जब सरकार इनकी है तो सुनेगा कौन! बोले, "सुनो!" गाड़ी रुक गई। शब्बीर ने कहा, "भैय्या जी से कहना एक बार आ के मिल लें।"

- "ठीक है।" गाड़ी चली गई

- "देखो भाई हैरान सिंग," दूसरे दिन शब्बीर अहमद ने मुलाकात में भैय्या जी को पुश्तैनी सुनहरे रिम वाले नाजुक से नायाब चीनी के प्यालों में इलायची की चाय थमाते हुए कहा, "जबरदस्ती हो रही है!"

- "हम! ...जबरजस्ती? ...कभी नई... हम ठाकुर हैं... जादव ठाकुर..." शब्बीर अहमद ने अपनी चाय की चुस्की लेते हुए मन में सोचा, 'कब से?...। गैय्या चराने वाले अहीर कब से ठाकुर हो गए?' लेकिन बोले कुछ नहीं। सुनते रहे। भैया जी बोलते गए।

- "जीबन हमारा गया पूजा पाठ में...। भगबान में लीन हैं हम... और समाजबाद में बिस्वास रखते हैं, अत्याचारबाद या जबर्जस्तीबाद में नई ...हम तो आपको सीदा सदा ऑफर दे रए हैं...। आप इज्जतदार अपने पुराने बुजुरुग हैं इसलिए, नई तो आपकी जगह कोई और होता तो हम का इत्ता रुकते? सीधे ले न लेते! आपसे कोई जबरजस्ती नई है और बीस लाख कोई कम भी नई हैं।"

- "ऐन शहर के बीच मेन सड़क पर पाँच एकड़ जमीन के बीस लाख!"

- "और क्या चाहते हो? सड़ी दुकानें हैं और गंदी नालियाँ भैय रई हैं इते और है क्या इसमें...?" भैय्या जी अब अपनी रूखी औकात पर उतर आए।

- "देखो भैय्या जी... तुम हो सक्षम... नेता हो...। सरकार तुम्हारी है...। हम तुमसे कुछ कह नहीं सकते। जमीन तो जो है सो है लेकिन इसमें बैठे हैं पुराने किरायेदार ...उनको अगर हम कोर्ट जाएँगे तो भी हटवा नहीं पाएँगे...। इसलिए दुकानें खाली कराने का जिम्मा हम नहीं ले सकते!"

- "अरे$$..." भैय्या जी ने इत्मीनान से अपनी जाँघ पर दायीं हाथ की ताली मारी, "दुकानें हम खाली करवा लेंगे...। वो टेंसन आप मत लीजिए। आप तो रजिस्टरी करवा दीजिए फिर सब सालों को हम देख लेंगे...। कल हम नखलऊ जा रए हैं... तीन दिना में लौटेंगे। तब तक बैनामे का बंदोबस्त कर लीजिए।"

मीटिंग बर्खास्त हो गई। भैय्या जी सर हवा में उठाए अपनी स्कार्पियो के सामने वाली सीट पर बैठ कर चले गए। शब्बीर अहमद की त्योरियों पर बल पड़ गए... वे चाय भूल कर न जाने कहाँ अंतरिक्ष में खो गए। रात भर सोचते रहे कि करें क्या। फिर सोचा कि अपनी जमीन जाएगी सो तो जाएगी ही इन पुश्तों से बैठे किरायेदारों को ये लोग निकाल देंगे तो इनका तो धंधा चौपट हो जाएगा! सुबह होते ही शब्बीर खान ने सब किरायेदारों की एक मीटिंग बुलाई। कुछ आए, कुछ नहीं आए।

हैरान सिंग जमीन हड़पना चाहता है सुनकर सब के होश सुन्न पड़ गए। छोटे बड़े सब दुकानदार शब्बीर अहमद की मजबूरी समझते थे। इन किरायेदारों में पाँच छ डाक्टर भी थे जो यहीं से प्रैक्टिस शुरू कर के यहीं बुड्ढे हो चुके थे। डाक्टर मनचंदा भी उनमें से एक थे। डाक्टर मनचंदा ने उसी शाम उस इलाके के सभी डाक्टरों की अलग से मीटिंग बुलाई। डॉ. मनचंदा झाँसी में वो शख्स थे जिनके यहाँ शहर के कलक्टर, कमिश्नर और पुलिस तक के वरिष्ठ अधिकारी इलाज के लिए आते थे। एक का तबादला होता तो वो अपनी जगह आए नए अफसर को इनका पता दे जाता। हाथ में शफा थी और इख्लास में चाशनी। डॉ. मनचंदा ने कलक्टर को फोन किया। कलक्टर ने कहा, "मेरी तो नौकरी का सवाल पड़ रहा है...। भैय्या जी से कुछ कहना मतलब कैरियर बर्बाद करना है...।" सुपरिंटेंडेंट पुलिस ने बात सुन ली और उसके बाद इनका फोन लेना बंद कर दिया। मिस्टर जीवराजका जिले में नए कमिश्नर हो कर आए थे। उनकी ईमानदारी और निष्पक्षता के चर्चे जोर शोर से थे। मनचंदा उनसे मिले। कमिश्नर ने कहा कि एक्शन लेने के लिए कोई कारण, कोई कम्प्लेंट कुछ तो होना चाहिए। एक आदमी जमीन बेच रहा है दूसरा खरीद रहा है - वो चाहे जैसे भी हो चाहे जितनी जोर जबरदस्ती से हो - कोई कानून तो नहीं टूट रहा है न...। कोई शिकायत तो दर्ज नहीं की जा रही है न... तो सरकार क्या और कैसे एक्शन ले!" डॉ. मनचंदा ने रातोंरात खबर सब किरायेदारों को पहुँचा दी कि अब समझ लो कि ये जगह गई।

कुछ ने आनन फानन में शब्बीर अहमद से अपनी दुकान के बैनामे करवाने का इंतजाम कर लिया। कुछ ने सोचा कि दुकान खरीद भी लें तो भी पाला तो हैरान सिंग से ही पड़ेगा। तब उससे कौन बैर लेगा इसलिए जगह छोड़ देने में ही भलाई समझी।

एक किरायेदार उसमें सुनिया काछिन भी थी। उसके पति ने कभी एक छोटी सी दुकान वहाँ भाजी-तरकारी की लगाईं थी। उसकी मृत्यु के बाद उसकी पत्नी सुनिया वहाँ बैठने लगी थी। काली, मोटी, बदजबान, रहमदिल और बेहद ईमानदार औरत जिसे कुछ पास के स्कूल से निकलते हुए लौंडे लपाड़े जब 'भटा-चाची' कह कर चिढ़ाते थे तो जिस तरह वह उनके पीछे सोंटा ले कर मारने दौड़ती थी उससे लौंडों को बड़ा मजा आता था। मजा तो सुनिया भी लेती थी और इतवार के दिन जब ये लड़के नहीं गुजरते थे उस दिन उन्हें वह बहुत 'मिस' करती थी - शायद इसलिए कि उसके एक लड़का हो के सिधार चुका था और उसके बाद उसकी कोई औलाद नहीं हुई। अकेली थी और शायद किसी तरह अपने को व्यस्त रखने के लिए हमेशा कुछ न कुछ करती ही रहती थी।

'ये जगह गई' वाली बात जब सुनिया ने सुनी तो भड़क उठी। बोली, "जे जगा हमाये मरद की है... और जब तक हम मरहें नई जे हम छोड़बे बारे नई। खूब जानत हैं हम बा भभूतिया हैरान सिंग की असलियत... हराम को जनो...।" फिर सुनिया ने सब किरायेदारों को खरी खरी सुनाई, " तुम ससुरो आदमी हो के गैय्या बकरिया...। एक गुंडा आ के हमें हकाले और तुम हकल गए!" लेकिन दुकानदारों में तो सब्र में, सहिष्णुता, सौहार्द्र और भाईचारे का खून भरा था सो उन्होने सुनिया की बात सुन ली, मान भी ली और चुप भी रह लिए।

हालाँकि भैय्या जी 'नखलऊ' चले गए थे लेकिन उनके भक्त तो झाँसी में ही थे। और ये तो तकरीबन तय ही हो चुका था कि अब ये इलाका भैय्या जी ही लेने वाले हैं। इसलिए इस जगह में जहाँ जहाँ खुदा पड़ा था उसे समतल करने और मिटटी पूरने के आर्डर हो चुके थे। दो बड़े बड़े फ्रंट डिगर/लोडर - एक मेन सड़क से और दूसरा अंदर की तरफ से - खुदाई करने और जमीन समतल करने पहुँच गए।

शाम हो चुकी थी। सूरज डूबने का वक्त था। मगरिब की अजान हो चुकी थी और रोशनी बस जलने ही वाली थी कि एक लड़का दौड़ता हुआ सुनिया की दुकान के सामने से गुजरा, उसने एक सेकंड के लिए सुनिया की तरफ देखा और उसे 'भटा-चाची' चिढ़ा कर मुस्कुरा कर भागा। सुनिया उसके पीछे एक लंबी लौकी लिए मारने उतरी। लड़का और तेज भागा। उसी दम अहाते के अंदर की तरफ से आने वाले तेज रफ्तार डिगर/डंपर ने इलाके के अंदर आकर जमीन में अपना फन गाड़ दिया। इस आनन फानन और तेज रफ्तारी में इत्तेफाक ये कि डंपर के फन में लिपट कर आ गया वो तेज भागता हुआ बच्चा और तकरीबन समझिए कि जमीन में गड़ ही तो गया। बच्चे की चिल्लाहट और चीत्कार डिगर की दहाड़ती आवाज में डूब गई लेकिन आस पड़ोस ने देखा तो अफरा तफरी मच गई। सुनिया ने देखा तो उसके जान हलक में और खून आँखों में उत्तर आया। और जब उसने लड़के को जख्मी देखा तो वो दौड़ कर आई और डिगर/डंपर वाले के सामने आकर खड़ी हो गई। चिल्लाई, " उतर साले...। नीचे उतर।"

डिगर का ड्राइवर नीचे आया तो सुनिया ने उसे तड़ातड़ तमाचे लगाए। आस पास खड़े लोगों को ललकारा कि वे जख्मी बच्चे को डाक्टर के यहाँ ले जाएँ और फिर अड़ गई कि जब तक भैय्या जी नहीं आते ये डंपर/डिगर और उसका ड्राइवर कहीं नहीं जाएगा। भैय्या जी के गुंडों को खबर लगी। वे अपनी अरमाडा में पधारे। उन्होने सुनिया को लातों और घूसों से नवाजा। लेकिन तब तक एक तो चारों तरफ भीड़ बढ़ गई दूसरे डॉ. मनचंदा ने पुलिस स्टेशन को रिपोर्ट कर दी और कमिश्नर को इत्तिला कर दी। पुलिस की गाड़ी आ तो गई लेकिन उसने टालमटोल करना शुरू कर दिया। आखिर नौकर अपने सरकार के खिलाफ कैसे जाता! अखबार वालों को खबर लग गई। वे भी पहुँच गए। अरमाडा और गुंडे बीच में, भीड़ चारों तरफ और सुनिया सीधे सामने अड़ी हुई! लाख पिटाई खा कर भी वो उन गुंडों को छोड़ने को तैयार नहीं थी।

- "तैने बच्चा को मारा है...। में तोय नई छोड़ूँगी...।"

- "हट जा चुड़ैल... नई तो गोली मार दूँगा!"

- "मार दे... मेरा कौन बैठा है रोने को..."

भैय्या जी के गुंडे ने तमंचा निकाल लिया। इंस्पेक्टर ने उसके कान में कहा, "सर, ऐसा मत कीजिए वरना मजबूरन केस बनाना पड़ेगा।" गुंडे ने इंस्पेक्टर को बाएँ हाथ से धक्का मारा, - "केस की माँ का...। साले तुम हमाये खिलाफ केस बनाओगे? मादर...!"

इंस्पेक्टर ने गुंडे से फिर इसरार किया और उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की। इस अफरातफरी में पिस्तौल चल गई और सामने खड़ी एक औरत की पसलियों में गोली लग गई। इस हादिसे की एक पत्रकार ने फोटो खींच ली और सीधा भागा अपने अखबार के दफ्तर ताकि कल की 'ताजा खबर' में छपवा सके, औरत मरती-जीती स्थिति में डाक्टर के पास ले जाई गई। लोगों में रोष तो था लेकिन सब तमाशबीन बने खड़े थे। फिर अचानक किसने किया ये तो पता चलना मुश्किल रहा लेकिन किसी ने अरमाडा का फ्यूल पाइप निकाल कर उस पर जलता लाइटर फेक दिया। अरमाडा में आग लग गई। गाड़ी जलने लगी। लोग छँटने लगे। सुनिया अड़ी रही, पिटती रही और गुंडों को कोल्लर से पकड़े खड़ी रही। दूसरे दिन से भंडारा चौराहे से इधर नगरा और उधर आर्य कन्या विद्यालय तक कर्फ्यू लगा दिया गया।

भैय्या जी 'नखलऊ' से तीन दिन की बजाय दो दिनों में ही वापस आ गए। हालाँकि इस वारदात का जिक्र झाँसी के बाहर के अखबारों तक में हुआ लेकिन भैय्या जी की पार्टी के वरिष्ठों के लिए ये कोई 'बड़ा' हादसा नहीं था। हाँ! ये ताकीद जरूर की गई कि 'अभी मामला गर्म है, थोड़े दिन के लिए जमीन लेना मुल्तवी कर दो'। लोगों को मौका मिल गया। इस दौरान इलाके के सबने मिल कर अदालत में जमीन के हस्तांतरण पर स्टे ले लिया। औरत जिसे गोली लगी थी उसका एक हिस्सा बेकार हो गया था और लड़का जिसके साथ दुर्घटना हुई थी उसके दोनों हाथ जाते रहे थे। सब गुस्से में थे और नेता से बदला न ले पाने के कारण क्षुब्ध भी थे। 'नखलऊ' से लौट कर दूसरे दिन भैय्या जी ने इलाके में मीटिंग बुलाई। मंच बना, माइक लगा, फूल बिछाए गए। लोगों की भीड़ बुलाई गई। कुछ लोग आए भी। रात को भैय्या जी आए। बस उन्होंने घटना के लिए अफसोस जाहिर करना शुरू ही किया था कि सुनिया काछिन सिक्योरिटी वालों के लाख रोकने के बावुजूद स्टेज पर चढ़ गई और उसने भैय्या जी की कमीज फाड़ डाली।

सुनिया की हिम्मत देख कर जिसकी बीवी और जिसका बेटा जख्मी हुए थे वे लोग भी मंच पर चढ़ने लगे। हालात हाथ से निकलते लगे तो भैय्या जी तो सिक्योरिटी की मदद से स्कार्पियो में वापस चले गए। कमांडोज ने सुनिया को मंच से सड़क पर फेंक कर खचोर खचोर कर मारा। फिर जब वो अधमरी और बेहोश हो गई तो उस पर अपनी मशीनगन से कई कई गोलियाँ दाग कर उसे वहीं सड़ने के लिए छोड़ कर चले गए। शायद लोगों को इबरत हासिल कराने के लिए।

इस वारदात को तकरीबन साल भर के ऊपर होने आया है। अब आप सीपरी में अगर वहाँ से गुजरें तो देखिएगा कि इलाके के शुरू में मेन सड़क पर सीमेंट का एक बड़ा सा दरवाजा बनाया गया है और अंदर घुसते साथ ही बीचोंबीच लगी है सुनिया काछिन की एक ऊँची सी मूर्ति जिसको आते जाते लड़के अब मुँह नहीं चिढ़ाते, उसके पैर छू कर गुजरते हैं।

अब ये इलाका सुनिया कंपाउंड के नाम से जाना जाने लगा है और ये तय हो चुका है कि प्रदेश में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की आए सुनिया कंपाउंड को कोई अब हथिया नहीं पाएगा!


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