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कविता

हर्ष रहे नव वर्ष रहे !
गिरीश्वर मिश्र


 

हे प्रभु !
सकल सुमंगल से परिपूरित
करुणाकलित हृदय से सज्जित ।
ऋद्धि-सिद्धि से जीवनगर्भित
ज्ञान-दृष्टि-परितोष-सुसुरभित ।।

मिथ्यागर्व करे न दिग्भ्रमित
रहे न मन संशय से विजड़ित ।
मोहग्रस्त अतिराग-विकंपित
दिग्विहीन मन बने न कलुषित ।।

नई पहल कर करें सुवासित
स्वजन समस्त-जगत परिपूरित ।
नव अरुणाभा से अभिसिंचित
सुखमय जीवन रहे अकंपित ।।

सहज, सरल, सुंदर हों भाषित
चित्त रहे मधुमय आह्लादित ।
शुभ-अशेष भावाभिप्लावित
जगमग धरती रहे प्रकाशित ।।

मलयानिल से रहे सुवासित
जनगण सब गरिमा से मंडित ।
सखासहित सब हों आनंदित
वाणी - सरस, मृदुल, संकल्पित ।।

विमल विचारों से आलोकित
नई कल्पनाओं से हो दीपित ।
कीर्ति-सुयश से हो मन पुलकित
दृढ़ प्रतिज्ञ संकल्प समन्वित ।।

दृष्टि रहे मूल्यों से कीलित
कर्मपुष्ट जीवन हो तरंगित ।
धरा बने सम-भाव उल्लसित
जय हो जीवन जनमनरंजित ।।

 


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