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कविता

प्यार
गिर्गिस शौकरी

अनुवाद - कुणाल सिंह


खिड़की को देखकर बादल हँस पड़ा है
दोनों बिस्तरे पर निढाल हो पड़ते हैं
धीरे धीरे अपने कपड़े उतारते हैं
देखो
बिस्तरे की सिलवटों में वे टूट गिरे हैं
बिस्तर उनकी निझूम नींद को अगोर रहा है
बरजता है अलमारी में रह रहे कपड़ों को
कि आवाज मत करो
दीवारें पडोसियों से चुगली कर
भीतर का भेद बताती हैं
और छतें न्यौता देती हैं आकाश को
कि आओ घर के सब मिल जुल बैठें, बातें हों

दीवारों की देह से एक बहुत बड़ी हँसी छूटकर भाग रही है
जल्दी से पकड़ो
हमें उसे पकड़ लाना ही होगा
वरना पूरी दुनिया हँसते हँसते फट पड़ेगी।

(इजिप्टियन कवि, यह अनुवाद अंग्रेजी से)
 


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