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निबंध

पहुँचना सही जगह पर...
दीप्ति कुशवाह


वाशी, नवी मुंबई के पश्चिमी छोर पर महाकाय अरब सागर थका-माँदा सा पहुँचता है। सागर के विशाल वक्ष पर शक्तिप्रदर्शन करने के बाद लहरें यहाँ खाड़ी में विश्राम करती दिखाई देती हैं। यहाँ लहरों के स्वभाव में, गर्जन-तर्जन वाली उनकी चिरंतन प्रकृति की कोई प्रतिध्वनि सुनाई नहीं देती। अन्य समुद्रतटों सी गहमागहमी नहीं यहाँ। वातावरण में एक अबोलापन उपस्थित रहता है जो मन को वाचाल बनने का अवसर देता है।

पिघलती हुई उस शाम को सिंदूरी वस्त्र पहने सूरज परले किनारे की अट्टालिकाओं से बतियाता अधिक देर के लिए रुका हुआ था। हवा, सामुद्रिक गंध की गलबहियाँ डाले धीरे-धीरे बह रही थी। तट पर बालू से अधिक मिट्टी की चादर पसरी हुई थी। उदास सी एक दूसरे को ताकती छोटी-बड़ी नावों को देखकर जाने क्यों बुद्ध याद आए, "मैंने तुम्हें नदी पार करने के लिए नाव दी थी, नदी पार करने के बाद कंधे पर ढोने के लिए नहीं।" नदी की अजेय धारा को पार करने के लिए उपयोगी नाव को सदा साथ रखने की इच्छा करना मानव की शाश्वत वृत्ति है पर जिसने साहस कर लिया नाव को छोड़ सागर में उतरने का, लहरें उसके हौसले को लाड़ लड़ाती हैं। किनारे की सुविधा और नावों का मोह तजना, अपने अंदर बुद्धत्व के लिए, छोटी ही सही, एक खिड़की को खुलते पाना है। विचार की इस भूमि पर कबीर, बुद्ध के समीप ही तो खड़े हैं... "जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूड़न डरा रहा किनारे बैठ"। कैसा अनोखा साम्य है! अंदर ही अंदर मुस्कुरा उठी मैं।

तट से लगा हुआ एक बगीचा था। सरकारी देखभाल का शिकार। गमलों की बेतरतीब कतारें थीं और गमलों में जम्हाइयाँ लेते पौधे थे। नीचे खरपतवार का साम्राज्य था। उसके बीच-बीच में घास अस्तित्व की लड़ाई लड़ती नजर आ रही थी। सीमेंट की कुछ कुर्सियाँ सीधी बैठी थीं और कुछ घुटने टेके। हाँ, बगीचे में कुछ बच्चों का खेलना दृश्य में जीवन भर रहा था।

तट के निकट भी कम ही लोग थे। शायद वे थे, जो बातें करना चाहते हैं, अपने आप से। इन भागते-दौड़ते शहरों में चारों तरफ लोगों की भीड़ है पर फिर भी साथ कोई किसी के नहीं है। किसी के पास दूसरे के लिए समय और सहानुभूति नहीं है। "भीड़ है कयामत की फिर भी हम अकेले हैं..." यही अकेलापन सबका वर्तमान है। इसी से जूझते वे स्व के निकट चले आते हैं। सागर का यह सुनसान किनारा स्व से संबोधित होने की संधि उपलब्ध कराता था। आधुनिक जीवनशैली में यह दुष्कर हो गया है, अपरिहार्य भी।

मैं फुरसत का एक टुकड़ा साथ लिए इस उनींदे तट पर चली आई थी। हम नर्मदा तीरे बसने और उसे प्राणों में धारण करने वालों को तो जलतत्व का सम्मोहन घुट्टी में मिलता है। अपार जलराशि का सामीप्य हममें अध्यात्म घोलता है। हमारे देश में कोटि-कोटि लोगों के लिए नदियाँ आराध्या हैं... प्रार्थना हैं... संवेदना हैं। नदियाँ देख सिर झुक जाना संस्कार है हमारा।

यही आसक्ति खींच लाई थी मुझे यहाँ। स्थूल अर्थ में मैं अकेली थी पर समुद्र का विराट अकेले कहाँ रहने देता है किसी को! वह हमारे एकांत में साधिकार प्रवेश करता है और अंतस तक भिगोकर ही मानता है।

आत्मा तक आर्द्रता को उतरते अनुभव करना ही साध्य था मेरा। दृष्टि सोती-जागती लहरों के साथ डोल रही थी और हृदय के किसी झरोखे से बरमान ग्राम की सुधियाँ एड़ियाँ उठा-उठाकर झाँक रही थीं। चट्टानों के बीच सहस्त्रधारा रेवा का फेनिल महाराग याद आ रहा था। दूर कहीं से टेर रही थीं रेवाप्रिया सिंधिया रानी की लालकोठी से जुड़ी कहानियाँ! लालकोठी... जो कभी राजसी रूपमयी इमारत थी पर आज वीरान जर्जर खंडहर।

विगत के धागों को पकड़े हुए मैं तट पर दूर तक चली आई थी। छोटे-छोटे दादुर कदमों की आहट सुनते तो मिहिर सेन की तरह पानी में डुबकी लगा देते और नन्हीं मछलियाँ पी.टी. ऊषा की तरह सरपट्टा मार जातीं। चिकनी लिरबिरी गोंचों से बच कर चलना पड़ रहा था। कुछ अनजान जीव आँखें तरेर कर और विचित्र ध्वनि निकालकर ही मुझे ही चौंका देते। वहाँ सीपियाँ थीं, घोंघे थे, शंकु थे। बालू में चिकनी-चिकनी बटइयाँ बिखरी हुई थीं।

तभी नजर पड़ी... प्रतिमा सी दिखती उस आकृति पर। किनारे पर एक जगह कुछ समुद्र के लाए, कुछ मनुष्य के जुटाए कूड़े-करकट के बड़े से ढेर में औंधी पड़ी थी वह। रोक नहीं सकी स्वयं को। बढ़ चली उस ओर।

इस पृथ्वी पर सबसे बड़ा कचरा-उत्पादक मनुष्य है। समुद्र, नदी, जंगल, अंतरिक्ष... किसी को नहीं छोड़ा हमने अपनी इस कृतघ्न वृत्ति का शिकार बनाने से। यहाँ तक कि अपने मनों में भी टनों मैला इकट्ठा कर लिया है हमने...!

कीचड़ और कचरे के बीच बामुश्किल जगह बनाते हुए उस तक पहुँच सकी। प्लास्टिक पन्नियों की इतनी बड़ी मात्रा... उफ! झुँझलाहट हो रही थी। वहाँ वनस्पति और भोज्यपदार्थों के क्षय से उत्पन्न दुर्गंध भी बहुत थी। निकट जाकर देखा, वह एक काष्ठप्रतिमा थी। गंदगी में लिथड़ी पड़ी थी। उसे सीधा करना चाहा तो भारी लगी। दोनों हाथ लगाकर सप्रयास सीधा किया। गणेश की त्रिमुखी-षट्भुज-संपूर्ण काष्ठप्रतिमा। लहरों के साथ यहाँ आ टिकी हुई। लग रहा था, महीनों पानी में रही है। छोटी अँगुली की चौड़ाई वाली पाँच-छै इंच लंबी दरारें पड़ गई थीं। प्रतिमा को खड़ी रखने के लिए आधार भी रहा होगा जो अब साथ छोड़ चुका था। दोनों पैरों की कुछ अँगुलियों को भी साथ ले गया था। इस सबके बावजूद प्रतिमा अपने सौंदर्य का स्वयंप्रमाण थी।

मैं सोच में पड़ गई... कौन होगा वह जिसने इस कलाकृति को समुद्र के हवाले कर दिया? ...कोई धर्मभीरु, जिसने प्रतिमा खंडित हो जाने के कारण या अन्य किसी दोष के चलते प्रवाहित जल में किया इसे विसर्जित...? ...या ईश्वर में नहीं, कला और संस्कृति में आस्था रखने वाला है कोई... जिसने पुरानी हो जाने के कारण या ऊब जाने की वजह से इसे घर से कर दिया बेघर...? वह कोई अभिजात भी हो सकता है... नए मॉडल के टीवी के लिए जगह बनाने की इच्छा से छुट्टी पा ली हो इससे...!

एक दूसरे को धकियाते अनुमानों का मन में आना-जाना जारी था...

मुंबई बेघरों का घर कहलाती है। अपनी जड़-जमीन से उखड़े हजारों लोग डेरा-डंगर उठाए रोजाना मुंबई की और चले आ रहे हैं। पचासी साल पहले, प्रेमचंद ने गोदान में इस स्थिति की भविष्यवाणी कर दी थी। दो जून भोजन की तलाश में अपनी सुबहों-शामों को तमाम करते अनेक अभागे ऐसे दड़बों में रहने को शापित हैं जहाँ परिवार का निस्तार बड़ी कठिनाई से होता है। ऐसा ही हो सकता है कोई विवश-विपन्न मूर्तिकार... अपनी कृति को हटाकर बीमार माँ के बिस्तर के लिए जगह बनाने वाला...! अंतस में एक हूक सी महसूस हुई।

प्रतिमा ने अनायास हमारे महाराष्ट्र के गणेशोत्सव का चित्र भी आँखों के सामने रख दिया। अकेले महाराष्ट्र में हर वर्ष लगभग डेढ़ करोड़ छोटी-बड़ी प्रतिमाओं का नदियों, तालाबों या समुद्र में विसर्जन होता है। अन्य प्रदेशों को मिला लें तो यह आँकड़ा डरावना हो जाता है। जलाशयों में मूर्ति विसर्जन, पूजन सामग्री या निर्माल्य विसर्जन, ताजिया विसर्जन, अस्थि विसर्जन या शव प्रवाहन जैसी प्रथाएँ पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि, आर्थिकी आदि को गंभीर क्षति पहुँचा रही हैं। कभी इनका औचित्य रहा होगा पर अब तो ये निषेध के योग्य हो गई हैं। इनके विकल्प क्यों नहीं खोजते हम? ...और यह जिम्मेदारी केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड के खाते में न डालकर क्या हमें स्वचेतना से कदम नहीं उठाने चाहिए...?

विचार इस सुंदर कलाकृति की जीर्ण-शीर्ण अवस्था के आसपास ही भटक रहे थे ...जाने किस कलाकार के हुनर का प्रमाण थी यह! दक्षिण-भारतीय मूर्तिकला... कांचीपुरम के आसपास की निर्मिति लग रही थी। सुडौल देहयष्टि और नक्काशी का बारीक काम बता रहे थे कि बहुत समय लगाकर, बड़ी लगन से इसे गढ़ा गया होगा ।

हमारे देश में कला का लोक उपेक्षा का शिकार है। कला आमदनी का समुचित जरिया नहीं मानी जाती। जाने कितने कलाकार दुर्दशा के शिकार हैं। मधुबनी की मिथिला चित्रकारी हमारे अंतरराष्ट्रीय विमानतलों पर देश की सांस्कृतिक विरासत के रूप में शोभायमान है पर रौंदी पासवान जैसा उम्दा मधुबनी कलाकार गुमनामी के अँधेरों में घिरकर चिरविदाई ले लेता है, हमारी दुनिया में कोई हलचल ही नहीं होती!

अगर किसी कलाकार द्वारा यह कृति बेची गई तो उसे अपनी मेहनत और कौशल का उचित मूल्य मिला होगा या नहीं...? किसी श्रमजीवी की काव्यात्मक कारीगरी यह! इसे बेचकर कितने दिन भरपेट भोजन कर पाया होगा वह? लोकशिल्पकारों को तो न नाम मिलता है न दाम। हकीकत यही है कि सारी मलाई बिचौलियों के पेट में जाती है।

व्यथित थी मैं। अब भले ही अपना मौलिक सौंदर्य खो चुकी थी, एक कलाकृति को सड़-गल कर दफ्न हो जाने के लिए वहाँ छोड़ जाने का मन न हुआ और मैंने उसे साथ ले जाने का इरादा बनाया।

तट पर टहल रहे महानगरीय आत्मलीन लोगों को तो किसी से कोई मतलब नहीं। महत्वाकांक्षाओं और व्यस्तताओं ने इतना स्पेस छोड़ा ही कहाँ है उनके भीतर !

'लोकमित्र गौतम' के शब्दों में कहूँ तो -

व्यस्तता ने हमें
    अजनबी बना दिया
    गूँगा, बहरा और अंधा बना दिया...

लोगों ने मुझे देखा-अनदेखा कर दिया था किंतु तट पर देखरेख (!) के लिए नियुक्त रक्षक ने मुझे किसी वस्तु में रुचि लेते देखा तो उसे अपनी ड्यूटी याद आ गई। जल्दी-जल्दी चलता हुआ वह निकट आ गया। मैंने उससे अनुमति लेना ही उचित समझा। खुशामदी लहजे में भूमिका बनाने के बाद जैसे ही प्रतिमा को ले जाने के लिए पूछा, उसकी सपाट "ना" से मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया। हाँ, समुद्र का।

भले ही प्रतिमा वहाँ पड़ी-पड़ी घुल जाए, उसकी जिद थी कि किसी को कोई वस्तु न ले जाने देने की वफादारी निभाएगा। बुद्धिदाता को साथ ले जाने के लिए उस अक्खड़ और अड़ियल अधेड़ की बुद्धि को भरसक प्रयासों के बाद भी न पलट सकी। अब लौट जाने का समय भी हो गया था सो घर की राह ली...।

उसकी बुद्धि पलटने में मैं भले ही सफल नहीं रही, मेरी अक्ल का अंत:कपाट खुल चुका था।

घर लौटकर दोनों बेटों, दिव्य और यश को पूरा प्रसंग बताया। यह भी कि थोड़ी सी कलाकारी के बाद प्रतिमा बहुत भव्य दिखने लगेगी और ऐसी एंटीक वस्तुएँ हजारों रुपए खर्च करने पर मिलती हैं। कलात्मक उपादानों से मेरा लगाव उन्हें ज्ञात ही था। यश की टीनएजर खुराफाती अक्ल को पूरा अभिप्राय बताने की आवश्यकता नहीं पड़ी। समाधान उपस्थित था, "हम रात को उठा लाएँगे।"

हमारे निर्णय भी समयसापेक्ष होते हैं न! एक परिस्थिति में जो बात अनुचित प्रतीत होती है, दूसरी परिस्थिति में वही उचित लगती है। हम तटरक्षक को झाँसा देकर, बिना अनुमति प्रतिमा उठा लाएँ यह उचित तो नहीं पर विपरीत स्थिति में इसका नष्ट हो जाना भी निश्चित था। मैंने एक बार स्वयं पर अवसरवादिता का आरोप लगाया। फिर बुहार दिया।

"चोरी करना बुरी बात है" को परे झटकते हुए दोनों आधुनिक श्रवणकुमार रात्रिकालीन-जनविहीन-रक्षकविहीन तट से कार में, गणपति की ससम्मान विदाई करा लाए।

पतिदेव की प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान था मुझे। सूखी जड़ें, तने, टहनियाँ ला-लाकर घर भरने की मेरी कलाप्रियता, कंप्यूटर और नई तकनीक के परम अनुरागी पतिदेव के पल्ले न पड़ती थी पर यह बात उनकी सहमति के आड़े भी न आती थी। घर को मनचाही शैली से सजाने में उनका कोई हस्तक्षेप न था। सो वही हुआ, मेरे इस अटपटे करतब पर उनकी भवें पहले तनीं किंतु शीघ्र ही सम पर आ गईं।

प्रतिमा के साथ अब जो चुनौती थी, वह थी, मुंबई से गृहनगर नागपुर तक ले जाने की कवायद! प्रतिमा का भार लगभग सात-आठ किलो था। आकार ढाई फीट गुणा दो फीट। इसे ले जाना सरल तो न था।

एक बार तो अपने निर्णय पर स्वयं मुझे पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस हुई। हम दो विवाह-समारोहों में सम्मिलित होने मुंबई आए थे इसलिए बड़े-बड़े सूटकेस साथ थे। जिनमें सबसे अधिक भार तो मेरे ही परिधानों-प्रसाधनों का था। एक अनाकर्षक - अंगभंग प्रतिमा की उठाई-धराई, और हाँ ढुलाई भी, करे कौन, समय का सबसे बड़ा प्रश्न था।

अनैच्छिक भारवाहक बनने से दिव्य और पापा ने हाथ खड़े कर दिए तो मेरी उम्मीदों के गिरते महल को टेका लगाने यश फिर अवतार रूप में प्रकट हुए, "मैं हूँ न!" उसकी तैयारी देखकर भैया और पापा ने भी हरी झंडी हिला दी।

इतना तो तय कि प्रतिमा से लगाव सिर्फ मुझे था। शेष तीनों मेरी इच्छा का मान रख रहे थे, मात्र। यह अनुभूति मेरे लिए सदैव सुखद और संतोषदायी रही है।

शेष सारे मेहमानों के लिए यह एक रोचक और अनूठा किस्सा था। भांति-भांति के सुझाव दिए जा रहे थे। अंततः गणपति एक बड़ी चादर में बँधकर बिना टिकट रेलयात्रा के लिए तैयार हो गए।

मुंबई में छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर दुरंतो रेल का प्लेटफ़ॉर्म क्रमांक सोलह या सत्रह होता है। पदचाल की परीक्षा हो जाती है। एक तो करेला उस पर नीम का लेप भी... कुली-सेवा पर कम से कम निर्भरता की फितरत है पतिदेव की। यही मानसिकता बच्चों में भी घर कर चुकी थी। तो कमर कस कर तैयार होना ही था सुपुत्र को।

लंबी चलाई में यश की भुजाओं ने हार मानी तो उसकी पीठ पर लद गए गणपति बप्पा मोरया। उसकी मेहनत देखकर, अपराधबोध में डुबकियाँ लगाती मैं मदद की पेशकश करती रही। जिम की साख पर बट्टा लगना उन्हें मंजूर न हुआ पर छुक-छुक के चलते न चलते फरमान आ ही गया, "मम्मी, घर पहुँच के पीठ की मालिश कर दीजिएगा।"

खैर! गणपति को विघ्नहर्ता कहा जाता है तो बाधाएँ दूर होनी ही थीं। उन्होंने यश को सद्बुद्धि और सद्शक्ति दोनों दीं और उसने भारी काष्ठप्रतिमा को सुरक्षित घर पहुँचाने का पराक्रम कर दिखाया।

अब अगली चुनौती सीधे-सीधे मुझे लेनी थी। जिस भव्य स्वरूप की कल्पना मैंने की और दिखाई थी, उसे साकार करना था। अब पीछे हटने का तो सवाल ही न था।

सिरेमिक पाउडर में फेविकोल मिलाकर तैयार मिश्रण से दरारें भरीं। अंग-प्रत्यंग सुधारे और सजाए। साधारण को सराहनीय में बदलने में सफलता मिलती लग रही थी। साथ-साथ यश की पीठ की मालिश चल रही थी। शेष दो का रवैया भी सहयोगात्मक हो गया था। वे सुझाव देते और निरीक्षक की तरह जायजा लेते, काम कहाँ तक पहुँचा है।

प्रतिमा ने पुराना चोला उतार दिया था, उसका आकर्षण झलकने लगा था। चेहरे पर नाक की प्रतिष्ठा हो गई थी। अंगुलियाँ भी रोप दी गईं थीं। ग्रीवा से लेकर उन्नत उदर तक आभूषण भी सजा दिए थे। अब आधार बनवाना था। उसके बिना वह खड़ी नहीं रह सकती थी।

पाँच कारपेंटरों ने "आड़ा-तिरछा" काम लेने से इनकार कर दिया। यह प्रयोगात्मक टास्क लेने में छठवें ने रुचि दिखाई। पहले प्रतिमा को आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ घुमा-घुमा कर निहारा फिर सद्वाक्य उचारे, "पुरानी चीज है। टूट-फूट भी हो सकती है।"

यह अपने काम की कीमत बढाने का नुस्खा था उसका। मैंने कड़ी चेतावनी दी कि टूटना नहीं चाहिए। फीस के संदर्भ में, उसने अपनी अपेक्षा में थोड़ी कमी की, मैंने अपनी तय सीमा में थोड़ी बढ़ोत्तरी की और एक राशि पर हमारे बीच समझौता हो गया। समय माँगा गया, डेढ़-दो महीने। रोजमर्रा के कार्यों से अलग हटकर कार्य था सो इतनी अवधि के लिए भी हामी भर दी। अन्य कहीं से आश्वासन का उजाला आ भी नहीं रहा था। कल्पना में प्रतिमा की लुभावनी छवि लिए मैं पुलक के पंखों पर सवार घर लौटी।

आगे हुआ यह कि दो क्या... कैलेंडर पर एक-एक करके चार पन्नों ने मेरी तरफ पीठ कर ली। फोन करने पर कारपेंटर हर बार वही, रिकार्डेड जैसा उत्तर देता, "अभी नहीं हुआ है मैडम।" मुझ अधीरा के लिए यह कड़ी परीक्षा थी। यश भी अपनी पीठतोड़ मेहनत का सुफल देखने के लिए लालायित थे। कारपेंटर के बार-बार के इनकार से यह विचार मन को खरोंचने लगता कि प्रतिमा में टूटफूट की जो आशंका वह जता रहा था, कहीं सच न हो गई हो। जल्द आशंकित हो जाने की आदत जो ठहरी मन की !

खैर! अब दुकान की फेरियाँ प्रारंभ हुईं। हर बार ढाक के तीन पत्ते ही हाथ लगते। कभी ये बहाना, कभी वो बहाना। दिक् होकर एक दिन धरना ही दे दिया, ले कर ही जाऊँगी आज अपनी धरोहर, चाहे काम हुआ हो या नहीं। इस जिद से, अंततः इतने दिनों की टालमटोल का राज खुला। और यूँ खुला कि कारपेंटर ने बातचीत को घुमा-फिराकर प्रतिमा को स्वयं खरीद लेने का प्रस्ताव रख दिया। कौतूहल तो बहुत हुआ पर सहमति न दी मैंने। प्रतिमा वापस देने का दबाव बनाया। जब उसकी समझ में आया कि किसी घोर हठीली से पाला पड़ा है, वह अंदर के कक्ष से प्रतिमा उठा कर ले आया।

ओहो! तो यह बात थी!! प्रतिमा को देखकर चमत्कृत हो जाना स्वाभाविक था।

आयताकार-डिजाइनदार आधार पर खड़ी किए जाने और चमकदार वुड वार्निश के बाद प्रतिमा बहुत भव्य और मोहक लग रही थी। प्रथम दृष्टि में तो वह पहचानी भी नहीं जा रही थी। खारे पानी से हुई क्षति विदा हो चुकी थी। किसी पंचसितारा कलावीथिका में प्रदर्शित मूल्यवान आर्टपीस का आभास हो रहा था। दुकान पर आने वाले कुछ लोगों ने प्रतिमा खरीदने के लिए कारपेंटर के सामने अच्छी-खासी राशि की पेशकश की थी और वह चाहता था मुझे कुछ कीमत देकर उससे अधिक की कमाई कर ले।

बचपन में, चंदामामा में इस तरह की कहानियाँ पढ़ते थे... किसी स्त्री को गहनों से भरा हुआ एक संदूक नदी में बहता हुआ मिला जिन्हें बेचकर उसने बहुत सारा धन प्राप्त किया।

एकबारगी मेरे दिमाग ने भी आर्थिक लाभ से शेकहैंड करना चाहा पर प्रतिमा को अपने पास रखने के लोभ ने उसे जल्द ही फटकार दिया। इस सुख को वरीयता दी कि किसी अनजान कलानिपुण की विलक्षण रचना को वाशी तट पर शनैःशनैः शून्य हो जाने से बचाया और वह साक्ष्य बनकर मेरे पास सुरक्षित रहे। प्रतिमा के कायाकल्प से उपजे आनंद ने कारपेंटर के प्रति नाराजगी का आयतन शून्य कर दिया था। उसके प्रति आभार का भाव भी कम न था। वह इस प्रतिमा का दूसरा जन्मदाता था।

अब अथाह और अछोर समुद्र की गोद छोड़कर, नए जन्म में गजानन मेरे घर में अधिक प्रसन्न दिखाई देते हैं। मुस्कान बताती है कि नया बसेरा उन्हें भा रहा है और भा रहा है आगंतुकों का उनके प्रति कौतुक।

उत्तराखंड के आध्यात्मिक गुरु अमित रे को कहीं सुना था, "कीचड़ में कमल के बीज सदैव होते हैं, अंकुरित होने की प्रतीक्षा में।"

यह कीचड़ से प्राप्त अनुपम कमल ही तो है हमारे लिए!


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