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सिनेमा

‘द कलर ऑफ पैराडाईज’ और ‘फादर’ : पिता-पुत्र संबंधों की दो इबारतें
विमल चंद्र पांडेय


वैसे तो माजिद मजीदी की हर फिल्म पर बहुत लिखा गया है और लिखा जाना चाहिए लेकिन इन दो फिल्मों पर एक साथ बात करने को मन इसलिए करता है क्योंकि इनमें काफी कुछ कॉमन है। दोनों फिल्में पिता और पुत्र के संबंधों के कई आयामों पर रोशनी डालती हैं।

दोनों ही फिल्में 'द कलर ऑफ पैराडाईज' (रंग-ए-खुदा) और 'फादर' (पेदर) एक तरह से पिता और पुत्र के संबंधों पर निर्भर हैं। एक तरफ ऐसा पिता है जो अपनी दूसरी शादी के लिए अपने अंधे पुत्र को अपनी जिंदगी से दूर कर देना चाहता है वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा पुत्र है जो अपनी माँ के दूसरे पति को अपना पिता मानने को तैयार नहीं है।

'द कलर ऑफ पैराडाईज' में मिस्टर रमजानी अपने अंधे बेटे मोहम्मद को विकलांग बच्चों के स्कूल से लेने आते हैं तो विद्यालय प्रशासन से दरख्वास्त करते हैं कि उनके बेटे को यहीं रख लिया जाए क्योंकि घर पर उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। मगर इसके पीछे उनका मकसद है कि वे अपनी दूसरी शादी आराम से कर सकें जबकि गाँव में मोहम्मद की दादी और उसकी बहनें बहुत बेसब्री से उसका इंतजार कर रही हैं। मोहम्मद भले ही विकलांगों के विद्यालय में पढता है लेकिन उसकी इंद्रियाँ सामान्य लोगों से कहीं अधिक जागृत हैं और वह सिर्फ आवाज और अपनी संवेदना के बल पर पेड़ पर अपने घोंसले से गिरे गौरैया के बच्चे को बिल्ली से बचा कर उसके घोंसले में डाल सकता है। उसका पिता उसे लेकर गाँव जाता है और रास्ते में एक दुकान पर रुकता हैं जहाँ मोहम्मद को दुकान में बज रहे किसी ईरानी गाने के बीच पक्षियों की आवाज सुनाई देती है। वह वहाँ बैठे-बैठे अपने गाँव पहुँच चुका है। बस से गाँव पहुँचने की यात्रा में उसका पिता उससे खिड़की से हाथ बाहर न निकालने को कहता है तो वह कहता है कि वह हवा को पकड़ना चाहता है। वह हवा को पकड़ सकता है, इस बात को वह गाँव के स्कूल में साबित भी करता है जब वह सामान्य बच्चों के स्कूल में टेस्ट में बीस नंबर पता है और उसके टीचर उसे अगले दिन से स्कूल आने की इजाजत दे देते हैं। पर उसके पिता उसे पढ़ाई के लिए तेहरान भेजना चाहते हैं और अपनी शादी के लिए रास्ता साफ करना चाहते हैं। मोहम्मद की दादी यानी रमजानी की माँ सब समझती है और उसे स्वार्थी होने के लिए कोसती भी है। रमजानी मोहम्मद को एक बढ़ई के पास काम सीखने के लिए रखवा देता है। बढ़ई भी अंधा है। मोहम्मद उसे रोता हुआ बताता है की कोई भी उसे प्यार नहीं करता क्योंकि वो अंधा है और उसके टीचर ने बताया है कि खुदा अंधे बच्चों से ज्यादा प्यार करता है। खुदा को देखा नहीं जा सकता सिर्फ उसे उँगलियों से छूकर महसूस किया जा सकता है। अंधा बढ़ई कहता है कि उसके टीचर ने उसे स्कूल में बिलकुल सही पढ़ाया है। रमजानी की माँ अपने बेटे की हरकत से नाखुश है और घर छोड़ कर जाना चाहती है पर रमजानी उसे वापस ले आता है। माजिद ने बहुत सूक्ष्म तरीके से दिखाया है कि रमजानी अपने बेटे से छुटकारा पाने को इस हद तक बेताब है की वह उसे मौत के मुँह तक में जाने दे सकता है। जंगल में उसे खतरनाक रास्ते पर बढ़ता देख वह उसे नहीं रोकता। अपनी शादी तय होकर टूट जाने के बाद बढ़ई के यहाँ से अपने बेटे को लाने से पहले रमजानी बहुत उहापोह में पड़ा हुआ है। वह बस से उतर कर भी मोहम्मद के पास नहीं जाना चाहता। बस को रुकवा कर वह फिर उसे जाने को कह देता है। पूरी तरह से टूटा हुआ रमजानी जब अपने बेटे को वापस उस बढ़ई के यहाँ से लेकर लौट रहा होता है तब एक लकड़ी के पुल के टूट जाने की वजह से मोहम्मद अपने घोड़े समेत पानी में गिर जाता है। रमजानी इस दृश्य को फटी आँखों से देख रहा है। उसे झील में गिरे अपने बेटे और अपने घोड़े के दृश्य दिखाई पड़ते हैं। पल भर तक ऐसा लगता है उसे काठ मार गया हो। उसे पानी में अपना बेटा मोहम्मद दिखाई देता है जो अपनी जान बचाने के लिए हाथ पाँव मार रहा है। इसी पल उसके भीतर का पिता जागता है और वह मोहम्मद मोहम्मद की पुकार लगाता हुआ अपने बेटे को बचाने भागता है। बहुत संघर्षों के बाद पिता और पुत्र दोनों किनारे लगते हैं। रमजानी होश आने पर दौड़ कर अपने बेटे के पास जाता है और उसे गले लगा लेता है और जोर-जोर से चीख कर रोता है। उसे लगता है कि उसका बेटा मर चुका है। आसमान में पंक्षियों का एक झुंड वापस अपने घर लौट रहा है। अचानक मोहम्मद की उँगलियों में हरकत होती है। उन्हीं उँगलियों में जिनसे खुदा को छूकर महसूस किया जा सकता है। मोहम्मद अंधा है और इस अंधेपन की वजह से दुनिया की खूबसूरती को देखने का एक अलग तरीका विकसित करता है। उँगलियों से छूकर देखने का। वह खुदा से मिलना चाहता है और कहता है कि खुदा को वह अपने दिल की हर बात बता देगा, बड़े से बड़ा राज। फिल्म प्रकृति की सुंदरता को मोहम्मद की आँखों से दिखाती है और इस कदर की पूरी दुनिया एक खूबसूरत लैंडस्केप लगने लगती है। बैकग्राउंड स्कोर भी कमाल का है क्योंकि मोहम्मद देख नहीं सकता और ऐसा लगता है हम सारी आवाजें मोहम्मद के कानों से ही सुन रहे हैं चाहे वो चिड़ियों की आवाजें हों या बरसते हुए पानी की रिमझिम। फिल्म कहीं से भी मोहम्मद के पिता की तरफ से अन्याय नहीं करती और कहीं भी उसके खिलाफ खड़ी नहीं होती। वह एक साधारण इनसान है जिसकी तमन्ना है कि उसकी शादी हो जाए और उम्र के इस पड़ाव पर उसे एक साथी मिल सके। उसकी कमजोरियाँ वही हैं जो एक आम इनसान की हो सकती हैं।

इस पिता के विपरीत फादर में जो पिता है वह ज्यादा सहज और मानवीय है। मेहरोल्ला शहर में काम करता है और अपनी माँ और बहनों के लिए कपड़े और जेवर लेकर जब घर पहुँचता है तो उसे पता चलता है की उसकी माँ ने किसी पुलिस वाले से शादी कर ली है। चूँकि अपने परिवार में वह एकमात्र कमाने वाला था, उसे धक्का लगता है और एक 13-14 साल के पुरुष के अहम को ठेस लगती है। मेहरोल्ला जब शहर से कमा कर गाँव लौटता है तो एक सोते में हाथ मुँह धोते समय एक फोटो नीचे गिरती है जिसमें वह अपने पहले परिवार के साथ खड़ा है। उसका दोस्त उसे बताता है कि उस पुलिस वाले ने उसकी बहन के इलाज में पैसे खर्च किए थे तो वह उन पैसों को चुका कर उसका कर्ज उतारना चाहता है। पुलिस वाला मेहरोल्ला को पूरा वक्त देता है और कोशिश करता है कि वह खुद को उस परिवार का हिस्सा मान ले लेकिन वह उससे नफरत करता है। आखिर जब वह पुलिस वाले की सर्विस रिवाल्वर चुराकर भाग जाता है तो पुलिसवाला गुस्से में भरा उसे पकड़ने शहर जाता है। जब वे दोनों लौटते हैं तो रास्ते में अंधड़ आ जाता है जिसमे दोनों फँस जाते हैं। दोनों प्यास से बेहाल हो जाते हैं और पुलिस वाला मेहरोल्ला की हथकड़ी खोल देता है ताकि कम से कम वह अपनी जान बचा सके। पुलिस वाला बेहोश हो जाता है लेकिन तभी मेहरोल्ला को ऊँटों का एक समूह दिखाई देता है। उसे अंदाजा लगता है कि आसपास कहीं पानी है और वह पानी के एक छोटे से सोते के पास पहुँचता है। वह वहाँ अपने से तिगुने वजन वाले पुलिसमैन को भी खींच लाता है और दोनों उस पानी में पड़ जाते हैं। अंतिम दृश्य में पुलिस वाले की जेब से एक तस्वीर गिरती है जिसमे मेहरोल्ला की माँ और उसकी बहनें उस पुलिस वाले के साथ खड़ी हैं। माजिद की फिल्मों के अंतिम दृश्य कमाल के होते हैं और इस फिल्म में भी ऐसा ही है। 'द कलर ऑफ पैराडाईज' में जिस तरह बेटे की उँगलियों में हरकत होती है, फादर में अंतिम दृश्य में पुलिसवाले के हाथों में हरकत होती है। इसके बाद वह तस्वीर उसकी जेब से निकल कर पानी में बहती हुई मेहरोल्ला की आँखों के सामने चली जाती है। उस तस्वीर में भी मेहरोल्ला का पूरा परिवार है, सिर्फ उसके पहले पिता की जगह वह पुलिस वाला है जिसे वह अपना पिता नहीं मान पाया है। लेकिन इस बार वह तस्वीर को बहुत गौर से देखता है। उसमें वह पुलिस वाला उसकी बहनों को उँगली से कुछ दिखा रहा है मानो वे सब मेहरोल्ला की तरफ ही देख रहे हैं। पानी में गिरी तस्वीर फिर पानी में ही उसे वापस मिलती है। वह तस्वीर की तरफ गौर से देखता रहता है और फिल्म खत्म हो जाती है। जाहिर है कि उसने उस पुलिसवाले को अपना पिता स्वीकार कर लिया है। किसी संवेदनशील कविता को भी पीछे छोड़ता यह दृश्य इस फिल्म की कई खासियतों में से एक है।

माजिद मजीदी अपनी फिल्मों में ईरान में फैली सामाजिक बुराइयों को अपना विषय नहीं बनाते बल्कि उनके विषय इनसान के भीतर बैठी अच्छाइयाँ, बुराइयाँ, प्रश्न और उलझनें होती हैं इसलिए उनका सिनेमा बहुत आसानी से वैश्विक हो जाता है। वे अपनी फिल्मों में इतना आसान और इतना खूबसूरत वितान रचते हैं कि लगने लगता है कि पूरा ईरान ही बहुत सुंदर है और वहाँ कोई समस्या नहीं हैं।


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