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लोककथा

गले में घंटी
गीता गैरोला


सुदूर पहाड़ी गाँव में पठाली से छाए लाल मिट्टी और गोबर से लिपे एक घर के कोने में लगाई जांद्री (चक्की) में झुरझुराती पूस की बर्फीली झुसमुसी भोर में उस घर की बूढ़ी दादी घुर्र-घुर्र गेहूँ पीस रही थी। उम्र की मारी जब पीसते-पीसते ऊँघने लगती तो घुर्र-घुर्र थमने लगती। घर की मुखिया अपने बिस्तर से सटा कर रखे टिमरू के लंबे सोंटे से पिस्वार की पीठ को कोंच देती। सोंटे की कोंच से बिलबिलाती पिस्वार हाथों को तेजी से घुमाने लगती घुर्र...घुरर्र। मुखिया ने तरतीब निकली, अगर पिस्वार के गले में बैलों वाली घंटी बाँध दूँ तो जितनी देर ये पीसती रहेगी गले में बँधी घंटी टन्न-टन्न बजती रहेगी और दूसरे दिन से झुसमुसी भोर जांद्री की घुर्र-घुर्र के साथ घंटी की टन्न-टन्न से गूँजने लगी। एक दिन घंटी गायब। पूरे घर का ओना कोना छान मारा। घंटी के तो जैसे पैर लग गए। घर में मची सरबरी में घर का चार-पाँच बरस का बच्चा भी शामिल हो गया पर बच्चे को ये समझ नहीं आया कि पूरा घर ढूँढ़ क्या रहा है। जब उसे पता चला कि घंटी की खोज हो रही है। वो बोला अरे घंटी तो मैंने छिपाई है। लो भई घंटी हाजिर। अरे माँ ये घंटी मैंने तेरे लिए छुपाई है। बूढ़ी हो के जब तू पीसेगी तो मैं यही घंटी तेरे गले में बाँधूँगा।


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