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डायरी

अजीब दास्ताँ है ये...
रश्मि काला


मुझे बताया जाता है कि मेरे जन्म पर मेरे पिता बहुत खुश हुए थे... क्यों हुए यह तो आज तक समझ नहीं आया क्योंकि मुझसे बड़ा भाई भी था और बहन भी... खैर जन्म के कुछ बाद का वक्त... अब तो मुझे याद भी नहीं कि उस वक्त क्या उम्र थी... बस ये याद है कि बहुत छोटी थी... वो ही उम्र जिसे शायद 'होश सँभालना' कहते हैं... तब जबकि बातें धुँधली ही सही पर याद रह जाती हैं... मैं बेहद अंतर्मुखी थी... कुछ शायद प्राकृतिक रूप से और कुछ साथ घटी घटनाओं की वजह से (हालाँकि ये बात आज समझ पाती हूँ)... पर मुझे ये पता था कि बड़े होकर डॉक्टर बनना है... डॉक्टर की स्पेलिंग पता नहीं थी पर बनना है ये पता था... जरा सा और बड़े होने पर भी सहेलियाँ ज्यादा थीं नहीं और मेरा पसंदीदा खेल बस एक हुआ करता था... तौलिए को सिर पर बाँधकर जूड़ा बनाकर टीचर बन जाती... दरवाजे पर सवाल जवाब लिखती और एक काल्पनिक कक्षा को पढ़ाया करती... मेरे इस खेल से किसी को ज्यादा दिक्कत नहीं थी बल्कि पापा खुश ही होते क्योंकि मैं इस तरह अपने सबक याद कर लेती... बस ये था कि मकान मालिक के दरवाजे का हाल बुरा हो जाता... टीचर का वो खेल खेलते वक्त भी मुझे ये पता था कि मुझे बड़े होकर डॉक्टर बनना है... मेरी आँखों में ये ही सपना डाला गया था... मुझे ये अहसास कराया गया था कि मैं उस सफेद कोट के लिए ही बनी हूँ... हालाँकि मेरे खेलों में डॉक्टर बनने का खेल कभी भी शामिल न हुआ...

मेरे माँ पापा के इस सपने में कोई बुराई नहीं थी... बल्कि अच्छा ही था... बेहद सीमित संसाधनों वाले परिवार में मेरे अभिभावकों ने मेरे लिए एक बड़ा सपना बुना था... मेरे पापा की लखनऊ आ बसने की एक बड़ी वजह ये थी कि उन्हें पढ़ाई से बहुत प्यार था... अपने दिनों में उन्हें इसके लिए जो संघर्ष करने पड़े वो सुनकर हम लोग आज भी बेचैन हो जाते हैं... वे चाहते थे उनके बच्चों को पढ़ाई के लिए कभी कोई दिक्कत न हो... खाली हाथ आकर एक अजनबी शहर में बस जाना आसान नहीं होता... पर उन्होंने वो सब किया... बाकी सब जगह कटौती करके संसाधनों को पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया गया... माँ एक सभ्रांत परिवार से आने के बावजूद इन स्थितियों में हमेशा उनके साथ खड़ी रहीं... हमारे पास खिलौने, कपड़े, जूते चप्पल भले खूब सारे न हों पर पढ़ाई में कहीं कोई चूक नहीं... ये भी सच है कि अपनी बहन के मुकाबले मुझे सब कुछ ज्यादा मिला... उसकी रुचि नृत्य में थी और वो काफी कम उम्र से इसमें सक्रिय हो गई... घर में उसे रोका तो नहीं गया पर कुछ खास बढ़ावा भी नहीं मिला... ऐसा नहीं कि संगीत से कोई दिक्कत हो... मेरे खानदान में संगीत को लेकर बड़ा सकारात्मक माहौल रहा है... पापा तो चित्रकारी भी गजब की करते हैं... बिना किसी ट्रेनिंग के ऐसे क्रिएटिव हैं कि क्या कहा जाए... पर वह क्षेत्र क्योंकि माँ पापा के बुने हुए सपनों में नहीं था और उसकी पढ़ाई कुछ हद तक 100/100 वाली तरफ नहीं बढ़ रही थी तो सपनों की पूरी दिशा मेरी तरफ मुड़ गई... मुझे सबक घोंट के याद करा दिए जाते... कभी कक्षा में सेकंड की जगह थर्ड आ जाती तो इससे बड़ा अवसाद न होता... किताबें, सबक, नंबर ये ही मेरी दुनिया थी... मैं शायद पढ़ने में होशियार नहीं थी, पर याद कर लेती थी... 'डॉक्टर बनना है' इस बात को मैंने ओढ़ लिया... कुछ जानने वाले मुझे तब, मेरी उस छोटी उम्र से डॉक्टर साहब बुलाने लगे थे... तब क्या बल्कि आज भी बुलाते है... आप इन सपनों का बोझ समझ पा रहे हैं?

छठी में पहुँची तो 25-30 की जगह 50-60 लड़कियों की कक्षा थी... एक छोटे स्कूल से बड़े स्कूल पहुँची थी... वहाँ वो सब लड़कियाँ भी थीं जो कहीं ज्यादा होशियार और समझदार थीं... शायद किशोरावस्था की तरफ बढ़ रही थी तो तरह तरह की बातें सुनकर, बड़ा स्कूल देखकर, वहाँ के माहौल में भटकने लगी... इतनी भीड़ में अब मैं पहले की तरह सेलेब्रिटी नहीं थी... मेरे पास छुप जाने के, न पढ़ने के, होम वर्क न करने के मौके थे... और मैं पिछड़ गई... 60 की कक्षा में सरक कर छठे नंबर पर... शायद वो भी न आती अगर क्लास की एक लड़की ने दीदी से शिकायत न कर दी होती... तब दीदी और माँ ने मेरे सारे छूटे हुए काम पूरे किए थे... मुझे दीदी की तरह जीने का दिल करता... कितनी सारी सहेलियाँ थीं... डांस प्रोग्राम करने अलग अलग शहरों में जाती... वहाँ अपनी टीम में सबकी लाड़ली थी... इतनी व्यवहारकुशल थी कि सब जगह उसकी तारीफें होतीं... और मैं... मेरी सिर्फ पढ़ाई की बातें... जिनसे अब मैं दूर होती जा रही थी...

घर पर इसे और बेहतर करने के प्रयास जारी थे सो मुझे अँग्रेजी माध्यम के स्कूल में डाला गया... डॉक्टर बनना है ये अब सिर्फ माँ पापा का सपना नहीं था... भैया दीदी इस मुहिम से जुड़ चुके थे... दीदी ने क्योंकि हिंदी माध्यम में पढ़ने के बाद मिलने वाली दुश्वारियाँ झेली थीं तो उसका पूरा जोर था कि मुझे अँग्रेजी माध्यम में भेजा जाए... अब ये नया स्कूल तो मेरे लिए आफत हो गया... अँग्रेजी जो बिल्कुल नहीं आती थी... और यहाँ हिंदी छोड़ सब कुछ अँग्रेजी में... बल्कि नियम भी बना दिया जाता था कि कोई हिंदी में बात नहीं करेगा... उस स्कूल में सातवीं में पहुँची मैं हिंदी में सर्वाधिक नंबर लाती थी और बाकी विषयों में लाल निशान... ऐसा निशान जिसे देखने की आदत ही नहीं थी... सिखाया भी नहीं गया था कि असफलता से कैसे मुकाबला करना चाहिए... 'अँग्रेजी मीडियम कवर करना है', फिलहाल के लिए ये उद्देश्य था और रट्टू तोता के तौर पर मुझ पर और जोर शोर से मेहनत की जाने लगी... उस दबाव ने मुझे, मेरी रुचियों को पढ़ाई से और दूर किया... जो बदलाव उस उम्र में होते हैं वो भी दिमाग में हो ही रहे थे... स्कूल में मैं किसी टीचर को तब तक पसंद नहीं आई जब तक दसवीं के नतीजों में मैंने सबको पीछे छोड़ते हुए खुद को साबित नहीं किया... इसके बाद ग्यारहवीं में विज्ञान- बायोलॉजी क्योंकि डॉक्टर बनना है... मेरे विषय मेरे घर पर सबने मिल कर चुने थे... मेरा सपना डॉक्टर बनना था पर वो मेरी रुचि कभी नहीं बना... ये बात न मैंने समझी न मेरे घर पर किसी ने... ग्यारहवीं की पढ़ाई बहुत कठिन पड़ गई... उस पर से कहीं ज्यादा होशियार बच्चे थे इस बार क्लास में, जिनकी नींव बहुत मजबूत थी... मैं और मेरी तबीयत वो भार ले ही नहीं पाई... एक साल बाद बारहवीं विज्ञान से हुई तो पर डॉक्टर का सपना उसके बाद मैं आगे लेकर नहीं चली... ये निजी तौर पर मेरे और मेरे घर पर भी सभी के लिए बहुत कठिन था... हाँ इस बीच एक बात हुई थी... बहन ने महिला अध्ययन में एमए किया... उसकी बातें सुनती तो रोमांच से भर जाती थी... पहली बार मन में इतनी मजबूती से किसी विषय के लिए महसूस किया था कि मुझे भी ये पढ़ना है... उसकी किताबें लेकर पढ़ती, उसे सबसे बहस करते देखती... ये उसमें बड़ा बदलाव था... आत्मविश्वास और चमक से भरा... जाने कौन सी किताब थी, शायद छिन्नमस्ता जो तभी पढ़ ली थी और कितनी ही जगह पर खुद से जोड़ भी पाई थी... बहन 'अच्छी बेटी' थी तो एमए के बाद शादी के लिए उस वक्त ना न कह सकी... खैर...

बीए में घर वालों की आँखों में नया सपना आ गया था... आईएएस बनाने का... डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, टीचर... इसके सिवा होता ही क्या था... मेरे पास उन्हें समझाने को तर्क नहीं थे कि मैं पत्रकारिता या फाइन आर्ट्स क्यों पढ़ना चाहती हूँ... एक दिन गुस्से में आकर खुद के बनाए सारे स्केच कूड़ेदान के हवाले कर दिए... उस वक्त किसी का साथ भी नहीं था... विषय अपनी पसंद का एक ही मिला क्योंकि पढ़ना उसी कॉलेज में था और मनोविज्ञान की सारी सीटें भर चुकी थीं... एक मेरे, एक पापा के और एक भाई की पसंद के विषय से बीए हुआ जिसका हाल बिल्कुल मिली जुली सरकार जैसा था... अँग्रेजी साहित्य के अलावा मुझे सब कुछ किसी दूसरी दुनिया का लगता... पर इन सबके बीच अब एक बात अंदर बैठ गई थी कि कुछ बनना है... और प्रेम, अफेयर, लड़कों से दोस्ती इसमें बाधा होंगे... घर में माहौल तो यूँ भी ऐसा ही था... एमए में जाकर सबकी इच्छाओं के विरुद्ध महिला अध्ययन में दाखिला ले लिया... अब तक घर वालों का सपना बदल कर मुझे लेक्चरर, प्रोफेसर देखने का हो गया था... शायद बचपन में होता तो अभी तक का जीवन बेहद सफल व सकारात्मक रहा होता... क्योंकि वो जूड़ा बनाकर काल्पनिक क्लास को पढ़ाना शायद मेरी रुचि थी जिसे कोई समझ नहीं पाया... पर अब शायद मैं बदल चुकी थी...

महिला अध्ययन... यहाँ मैं बदलने लगी, खुद को, बाहर की दुनिया को समझने लगी, रूपरेखा मैम और विषय के जरिए मुझे मेरी अभी तक की बेतरतीब उलझी जिंदगी से निकाला जा रहा था... सवालों के जवाब मिल रहे थे... चुप नहीं कराया जा रहा था, सवाल करने की आदत को प्रोत्साहित किया जा रहा था... मैं पहली बार उस ऊर्जा, बदलाव, खुशी और सकारात्मकता के दौर में थी जब मुझे असल मायनों में खुद का कुछ होना महसूस हो रहा था... मैं वो कह और कर रही थी जो मुझे पसंद था... दूसरे साल में ठीक इसी वक्त घर में कुछ और दिक्कतें हुई जो आगे के लिए बहुत परेशानी खड़ी कर गईं... दिल्ली में थी जब पता चला अपने विभाग में टॉप किया है... आगे पढ़ने के लिए बाहर जाना चाहती थीं पर मना हो गया... बहुत टूटी... सोचा कोई बात नहीं मैम को गाइड चुन पीएचडी कर लूँगी पर तभी मैम ने खुद को विश्वविद्यालय से अलग कर लिया... नेट पहली बार में ही निकालने के बावजूद मेरे लिए सारे रास्ते बंद थे... वो पीएचडी अब तक न हो पाई... खैर...

इसके बाद एक संस्थान से पत्रकारिता हुई और उसके बाद नौकरी जो जारी ही है... मीडिया में जाने के बाद जो असहजता लगी तो दोबारा गई नहीं... अफसोस भी नहीं हुआ... माँ पापा के उस लेक्चरर वाले आखिरी सपने को भी किनारा कर दिया... पर आज जहाँ जिस क्षेत्र में हूँ, जिस जगह हूँ ये मेरी पसंद का है... यहाँ मिली हर सफलता असफलता मेरी है... तमाम दिक्कतों के बावजूद ये मुझे प्रिय है, मैं इसी में आगे बढ़ी हूँ और यहीं रहना भी चाहती हूँ... मुझे मिले तमाम दोस्तों के चलते मेरी इस क्षेत्र से मुहब्बत बढ़ी ही है क्योंकि जिंदगी के प्रति समझ बढ़ी है, लड़ने की ताकत मिली है... मैं शायद एक इनसान के तौर पर जिस तरह यहाँ विकसित और परिपक्व हुई हूँ और कहीं न हो पाती... आज मेरे माँ पापा भी मुझसे बहुत खुश हैं, ये अलग बात है कि डॉक्टर वाली कसक अब भी शायद है कहीं... पर आज उन्हें अपनी भी गलतियों का अहसास है और वो मेरे लिए बहुत है... मेरे पिता ने अपनी पहचान खुद गढ़ी थी, मुझे ऐसा करते देखना भी उन्हें अच्छा ही लगता है... अब इस हाल में हूँ कि मोटे तौर पर अपने रास्ते गिरते पड़ते रोते हँसते बना ही लेती हूँ... शादी को लेकर संग्राम जारी है पर उसमे भी समय के साथ साथ बड़े बदलाव आए हैं...

ये सारी गाथा और कहानी अभी कुछ दिन पहले ताजा हुई... जब एक फिल्म देख रही थी... बेहतरीन अभिनय से कसी और बेइंतिहा पसंद की जा रही फिल्म कहीं कहीं मुझे परेशान कर रही थी... अभिभावक को जिस संपूर्णता में सही दिखाकर भगवान जैसा बना दिया गया था वह मुझे उलझन दे रहा था... पिता की जिद, अहं, दीवानगी, गुस्सा, सोच सब कुछ सही दिखाया जा रहा था... बचपन, किशोरावस्था में लड़की की असहमतियों में उसे पूरी तरह लापरवाह और गलत साबित किया जाता है... सही गलत का अंतर और साफ तरीके से बताने के लिए दोनों बेटियों के बीच तुलना हो जाती है... पूरी फिल्म को यूँ बुना जाता है कि असहमति होने पर पूरी संवेदनाएँ पिता के साथ हो जाती हैं... बेटी को गलत साबित करने के लिए तब तक असफल होते दिखाया जाता है जब तक वो वापस पिता की शरण में नहीं आती... और वापस आते ही वो सही साबित होने लगती है... यहाँ बात सही गलत की नहीं रह जाती बल्कि हमेशा से चली आ रही 'आदर्श बच्चे' वाली बात को ही मजबूती देने की हो जाती है... जहाँ 'सही' तो अभिभावक ही होते हैं और गलतियाँ सिर्फ बच्चों से ही होती हैं... कहानी के साथ छेड़छाड़ होनी ही थी तो शायद बेहतरी के लिए की जा सकती थी... बेटी पर गर्व करने की बस एक ये ही स्थिति बन पाती है... माँ, हमेशा की तरह न के बराबर दिखती हैं... कुछ ऐसी रूढ़ियाँ या चलन जिन्हें चुनौती देने की जरूरत समझी ही नहीं जाती या यूँ कहें रिस्क नहीं लिया जाता... एक बात ये भी कि क्या विजेता होकर ही अस्तित्व माना जाएगा? उसके क्या मायने होंगे? जो शीर्ष पर न पहुँच सके उसके लिए जीवन का कोई अर्थ नहीं?

आमतौर पर कुछ विचार देने पर सबसे पहले निजी जीवन से जोड़ दिया जाता है... शायद इसीलिए अब मेरी आदत हो चली है कि मैं पहले बातों को व्यक्तिगत जीवन पर लेती हूँ तब सोचती हूँ... मैं बचपन में बेहद अंतर्मुखी थी... बड़े होने पर एक ऐसा समय आया जब जरा खुली पर दोस्तों से भरी जिंदगी को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता था क्योंकि अर्जुन की तरह चिड़िया की आँख पर सारा ध्यान लगाने को कहा जाता था... ये बहुत बाद तक रहा... मेरी आदत मेरे व्यवहार में शामिल होती गई... तमाम सारी दीवारें जो आज तक भी खड़ी हैं जिन्हें एक एक कर तोड़ने की कोशिश करती हूँ... उनमें कुछ हैं जो अब होती ही नहीं क्योंकि वो खुद मेरे व्यवहार में उतर आई हैं... जैसे दोस्त बनाना... उनसे मिलना जुलना, घूमना फिरना, घर आना जाना... खासतौर से पुरुष मित्र... मेरे इस व्यवहार में मेरे घर के साथ साथ बड़ी संख्या में उन पुरुष मित्रों ने मुझे ऐसा बनाया... घर में ऐसी दोस्तियों के लिए हतोत्साहित किया जाता और ज्यादातर पुरुष मित्र आज नहीं तो कल घर वालों की बातों को सही साबित कर देते... करते करते एक ऐसा दायरा बन गया कि अब इसके पार जाते भी नहीं बनता... एक वो समूह जिसमें सबको बहुत आराम से रहते या खुश होते देखती हूँ, लगता है मैं उससे कितनी दूर हो चुकी हूँ... पता नहीं इस खालीपन के लिए किसे जिम्मेदार ठहराऊँ... घर पर आज भी इसका इलाज शादी बताया जाता है...

ये ही मोटे तौर पर हमारा समाज है... मैं उन लड़कियों के समूह से हूँ जो पढ़ी लिखी हैं, जानकार हैं, अपनी और अपने से जुड़े और लोगों की जिम्मेदारियाँ ले सकती हैं, अपने हक जानती हैं, दूसरों की मदद करने की स्थिति में हैं, तरक्कीपसंद हैं, आजाद खयाल हैं... बराबरी और साथ में भरोसा रखती हैं, मजबूत हैं और भावुक भी... लेकिन अपनी सोच, इच्छाओं, विचारधारा, उसूल, ख्वाहिशों और परिवार के साथ सामंजस्य बैठाने में वे वो बड़ी कीमतें चुकाती हैं... ये एक ऐसा माहौल होता है जहाँ दोस्ती की जरूरत समझाई ही नहीं जा सकती... वो एक बेमतलब की चीज होती है... 'मन' तो सिर्फ भटकाने का काम करता है... महिला मित्रों के लिए भी कोई खास प्रोत्साहन या स्वीकार्यता नहीं होती... वजहें ढूँढ़ी जाती हैं कि क्यों मिला जाय, क्या काम है... क्यों कहीं जाओ या क्यों कोई आए... ये व्यर्थ समय नष्ट करना है... 'साथी' के विकल्प को उनके सामने पेश किया जाता है लेकिन वो मंजूर न होने पर दूसरा विकल्प खालीपन ही होता है... जब जिरह कर माहौल बदलने की कोशिश हो तो दोस्त बनने पहुँचे लोग ही कितनी बार आपको गलत साबित कर देते हैं... ये दुहरी मार दम घोंटती है... दिमाग का इतना इस्तेमाल कि वो थक जाता है और इसके बाद इस खालीपन में ही वो विकल्प तलाशे जाते हैं जिनसे इसे भरा जा सके... ये जिंदगी होती तो आपकी मर्जी वाली है पर वैसी नहीं जैसी आपने चाही थी... हम खुद को ये कहकर समझाते हैं कि कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता... और एक वक्त के बाद इसकी शिकायतें भी बंद हो जाती हैं... हम एडजस्ट कर लेते हैं... नहीं करना चाहिए था, बोलना चाहिए था, विरोध-जिद करनी चाहिए थी पर हम थक चुके होते हैं तो एडजस्ट कर लेते हैं... हम आज भी सवालों के घेरे में रहते हैं तो एडजस्ट करते हैं... हर उस जगह जहाँ किया जा सकता है क्योंकि कुछ बेनतीजा बहसें भीतर गुस्से को ही भरती हैं... और हम इन सवालों से दूर रहना चाहते हैं...

हम वे परिवार हैं जिनके दबाव बच्चों को उनके मन से जिंदगी के सपने बुनना सिखाते ही नहीं... उनकी फिक्र को सोच और व्यवहार में जैसे उतरना चाहिए था वो कभी उतरती नहीं... ये सभी कुछ काफी हद तक इस सामाजिक ढाँचे के असर में ही होता है... मुझे नहीं पता कि अपनी आँखों में जबरन डाले गए सपने को सच कर देती तो क्या होता? उस न्यूरोसर्जन के लिए सफलता और खुशी की क्या परिभाषाएँ होतीं? जीवन के प्रति नजरिया कितना इनसानियत भरा होता, किस तरह की स्थितियों में होती, क्या तब भी ऐसे ही दबाव और सवाल होते? क्या खुश और संतुष्ट होती? परिवार खुश होता ये तय है पर वह तो आज भी खुश ही है... क्या मेरे परिवार को और पीछे पड़ जाना चाहिए था? और मुझे? और पढ़ाई, कोचिंग, सुबह जल्दी उठना - देर तक पढ़ना... कुछ भी करना, सब कुछ भूल कहीं भीतर खुद को दफन कर खत्म कर देना पर उस सपने को पूरा करना और 'मिसाल' बन जाना... सपने के रंगीन काँच वाले चश्मे को यूँ पहनना कि कभी जिंदगी में आँखों से न उतारना... ऐसी स्थितियाँ कि जब वो कभी उतरे भी तो आँखों में रोशनी ही न बची हो... वो मेरी ही बेहतरी के लिए तो था... इस दुनिया में जहाँ लड़कियाँ जरूरत तो हैं पर बेटियाँ अनचाही होती हैं, ऐसे में उसके लिए इतना बड़ा सपना देखना, हर सुविधा मुहैया कराना, मेहनत करना (यकीन मानिए मेरे घर पर मेरे ऊपर सबने बहुत मेहनत की)... था तो मेरी ही बेहतरी के लिए पर उस 'बेहतरी' की परिभाषा क्या है? गर बहू, पत्नी, प्रेमिका की अस्मिता की इतनी बातें होती हैं तो बेटियों की क्यों नहीं या इस मामले में तो किसी भी बच्चे की क्यों नहीं... वंचित करना गलत है पर दबाव से भरकर जीवन कंट्रोल करना क्या सही है? परिवार की उलझनों में अब किसे सही और किसे गलत कहा जाएगा... पापा मेरी हर सफलता पर मारे खुशी के भावुक हो जाते थे, गर्व से भरी एक अलग ही आवाज होती थी उनकी... तो क्या अपनी राह चुनकर मैं उनकी अपराधी हो गई हूँ... क्या मेरे चुनाव को मेरी असफलता में गिना जाएगा? हर किसी की उम्मीदों से इतर चल अगर मैं अपराधी हुई हूँ तो क्या अपनी गुनाहगार नहीं? खुद से मेरी भी कई उम्मीदें थीं जिन्हें किनारे कर दिया और 'एडजस्ट' किया, अब भी करती हूँ... प्यार, फिक्र, खयाल सबको एक दूसरे का था और है भी पर शायद वैसा नहीं जैसे की सामनेवाले को जरूरत या ख्वाहिश थी... कोई भी किसी को संतुष्ट नहीं कर सका... किसी के हिसाब से नहीं चल सका... जाने क्यों हम चाहते हैं कि कोई हमारे हिसाब से चले... सफलता असफलता की परिभाषाएँ सिर्फ वो नहीं जो हम जानते हैं... आज मुखर हूँ, बहुतों के लिए बद्तमीज भी हूँ... मुझे मेरे भीतर का प्यार और कड़वाहट दोनों इसी समाज से मिले हैं... आत्मविश्वास भी और डर, कमजोरी भी... मैं 'मिसाल' नहीं बनी पर क्या जिंदगी में इसके सिवा कुछ भी नहीं? शायद कभी हम समझ सकें कि एक जिंदगी है जो महत्वाकांक्षाओं के परे है... गर नहीं भी है तो इसकी तैयारी कराने का सिर्फ एक ही तरीका तो नहीं...


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हिंदी समय में रश्मि काला की रचनाएँ