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कहानी

हादसा
चंद्रकला त्रिपाठी


कारें भागी जा रहीं थीं, रास्ते के दोनों ओर पहाड़ियाँ, जंगल, काँटेदार झाड़ियाँ और रंग-बिरंगे फूल। थोड़ी-थोड़ी दूर पर झरने भी। सितंबर का आखिरी सप्ताह, आकाश में तैरते हल्के बादल कभी कहीं गहरे होकर एक सुकून भरी छाया डाल देते।

दयाल अपनी गाड़ी खुद ड्राइव कर रहा था। शिखा चुप बैठी थी। बिल्कुल मूर्ति की तरह लंबी पतली उम्रदराज स्त्री, असाधारण रूप से सफेद पड़ गया चेहरा, एक साथ जैसे कई दुनियाओं में, बहुत बेचैन, बड़ी अकुलाहट में। भारी असमंजस के बाद वह दयाल के करीब बैठी थी। सभी कह रहे थे कि वह उसका पति है। डॉक्टर ने दयाल से इसे हैरतअंगेज बताया। पचपन साल की यह प्रौढ़ स्त्री इस समय अपने उम्र के बीसवें वर्ष में चली गई है। बहुत चकित कर देने वाली बात है मगर शायद यह भयानक डिप्रेशन के कारण हुआ है। वहाँ शायद इनकी जिंदगी का सबसे प्रसन्न समय रहा होगा... यह डॉक्टर की राय थी।

बीस वर्ष की शिखा... यानी जहाँ दयाल भी नहीं था। कॉलेज के आखिरी दिनों में, अपने स्कूल टीचर पिता की इकलौती मेधावी बेटी, बेटों की तरह निर्भीक सादा और पिता की ही तरह क्रॉनिक तरीके से आदर्शवादी। दयाल को वह पसंद आ गई थी, अक्सर उसके पिता की दुकान के नीचे साइकिल मरम्मत की दुकान पर अपनी खस्ताहाल साइकिल का कोई न कोई पुर्जा दुरुस्त कराती हुई... पीले दुपट्टे से इतना पसीना पोछती कि नाक-मुँह सब लाल-लाल।

दयाल जान-बूझ कर कई बार उसके आगे से गुजरता, वह वैसे ही उचटती सी देखती, बेहद हड़बड़ी में साइकिल बनते ही उड़नछू। मुहल्ले में उतनी लंबी गोरी कोई लड़की न थी। लिहाजा दयाल का दिल उस पर आ गया। उसे छूने, उसकी आँखों में झाँकने के लिए उसने उसके पिता के यहाँ अपने भतीजों का ट्यूशन लगवा दिया था। बेटू, मिट्ठू को उन वृद्ध सज्जन की चश्मे में चमकती आँखों के सामने कर वह बाहर के कमरे में बैठ कर अखबार पढ़ता। खिड़की दरवाजे का पर्दा हिल जाने पर वह भी हिलक कर भीतर झाँक लेता। सपनों में आना शुरू कर चुकी इस सुंदरी का दरो-दीवार उसका काबा बन चुके थे।

शादी के वक्त भी उसने उसके लिए वही पीला रंग तय किया थ। गोटे बुंदक वाली पीली जार्जेट। पहली रात उसने शिखा को 'शी' कर दिया। शिखा रोमांचित होती 'इतना भी कोई किसी से प्यार कर सकता है?'

ये प्यार के बादलों पर पहली सवारी के दिन थे। डॉक्टर ने पूछा था - 'याद है आपको, आप किसी के लिए केवल 'शी' हैं?'

शिखा उसे एकटक देखती रही। उनके बेटे के उम्र का डॉक्टर, बहुत सहृदय विनम्र, हरदम भरोसे से भरा हुआ था। दयाल को इस भरोसे में वह लपेटे ले रहा था। जबकि सभी अब ऊब चुके थे। उर्वी को तो यह बाकायदा ड्रामा लग रहा था। सोशलिज्म के बुखार से ग्रस्त मम्मी जी का एक और नाटक... मगर अब सीन में बहुत कुछ आ चुका था। कड़े परिश्रम से अमीरी के शिखर पर पहुँचे उद्योगपति दयाल की सादा जीवन जीने वाली आदर्शवादी पत्नी को गहरा डिप्रेशन। अखबार, न्यूज चैनेल्स, मातहत, शहर सब इस फिराक में कि क्या हुआ, क्यों, कैसे?

'काउंसिलर को सब कुछ बताना पड़ेगा सिस्टर!' नौजवान डॉक्टर की मीठी सपाट आवाज दयाल की उलझनों को बढ़ा रही थी। 'उस रात यह मर भी तो सकती थी, बल्कि डींगरे ने तो उसे मरा हुआ ही बताया... काश - 'दयाल बुदबुदा रहा था। 'सब कुछ बताने कौन आएगा डैड!' उर्वी समझ गई कि उसके ससुर को तत्काल दिलासे की जरूरत है। 'आप जो कहेंगे वही जाना जाएगा न, मॉम तो कुछ बताने से रही,' एक क्षण के लिए वह रुकी, उसकी आँखों में एक चतुर चमक थी - 'घर ले चलते है इन्हें, यहीं से नर्स अरेंज हो जाएगी, ठीक... लोग तो यही देखेंगे न कि हम इनका कितना खयाल कर रहे है?'

दयाल को सचमुच दिलासा मिल रहा था। ठीक है, बनी रहे यह अपनी उम्र के बीसवें वर्ष में हुँह, चाहे चार दस वर्ष और पीछे चली जाए, क्या करना है? कामयाबी के रास्तों में ऊँच-नीच तो होती ही है और कुछ ऐसा-वैसा भी... 'ठीक यहीं दयाल की सोच टूट गई थी। टूटी हुई सूई की नोक जैसे उसकी ओर मुड़ गई। नशे की जिंदगी से जैसे किसी ने खींच कर जगा दिया हो खाल पर सारी उँगलियाँ धँसा कर... 'हाँ वह सब कुछ वीभत्स था, नारकीय ओह, अमानवीय भी' वह खुद भी उस रात को सोचना नहीं चाहता, सालों से चले आते पतन के उस खेल में शिखा के ऐसे चले आने से उसके लिए भी सब कुछ बदल रहा है। उसके भीतर पक्की तौर पर चिनी जा चुकी विलासिता की परतें उसे गहरी यातना में डाल रही हैं। बढ़ती हुई लालसा और ऐश के लिए लगातार असुविधा बनती इस स्त्री ने इस समय उसे गहरे अपराधबोध की तरफ ढकेल दिया है। उर्वी गहरी नाराजगी से उसे देख रही है। रोहित को जता भी चुकी है - 'तुम्हारे डैड इतने सेंटिमेंटल हैं... शिट्।' रोहित सपाट है। कारोबार की व्यूह रचनाओं के साथ जवान हुआ व्यक्ति... पत्नी काफी पैसा बटोर रही है, सुंदर स्मार्ट और स्वतंत्र है... उस पर लदी हुई नहीं... दोनों अपना-अपना स्पेस भोग रहे हैं उत्तेजक और आरामदेह। माँ जैसी भटकी हुई आत्मा को समझना उसकी कभी भी समस्या नहीं। मोबाइल पर प्रतिक्षण आती काल्स में आधी से ज्यादा संवेदना प्रकट करने वालों की हैं। वह ऊब रहा है, आशंकित है ओर जल्दी में भी। इस मामले को जल्दी से जल्दी सलटना चाहिए - 'यू आर राइट उर्वी, माम को हमें घर ले चलना चाहिए... देख लो नर्स का इंतजाम तो डॉक्टर कर ही देगा।'

डॉक्टर ने और सलाहें दे डालीं। मिस्टर दयाल और उनके परिवार को शिखा के लिए अतिचिंतित मान प्रेस मीडिया वगैरह की आवाजाही से बेहद दबाव में आए डॉक्टर ने शिखा को पुरानी जगहों पर ले जाने के लिए कहा, 'शायद फर्क पड़े, डिप्रेशन नेचर में इनबिल्ट नहीं है, यह एक अस्थायी दौरा भी हो सकता है... हमें कोशिश तो करनी ही चाहिए।

दयाल उसकी समझदारियों पर काफी झल्ला चुका था। शिखा तो कार में उसके पास बैठना भी नहीं चाहती थी - 'आप? ...कहाँ जाना है मुझे... क्यों? कृपया मुझे जाने दें, मैं कितने दिनों से यहाँ हूँ...' आवाज में अजीब सी थर्राहट, डर से चिरे हुए कलेजे की गूँज। दयाल के भीतर पसरा तीस साला दांपत्य कुछ नए अंकुर फेंकने लगा। उसे थामकर गाड़ी में अपने पास बैठाते हुए उसने अनुभव किया कि पता नहीं कैसे वह बहुत कोमल हो रहा था। उसके भीतर शी को सँभालने की पुरानी इच्छा सर उठा रही थी।

पाठक! आप चाहें तो इसे पहले प्रेम की विजय मान सकते हैं। स्पर्श में बहुत दूर तक जिंदा रहता है ऐसा प्रेम...।

'सुंदर रास्ता है न...?' उसने शिखा से पूछा।

'हम पहले भी इस ओर आ चुके हैं शायद, या शायद यहीं कहीं रहते थे। शायद आज भी यहीं...' शिखा की उलटबासियाँ शुरू हो गई थीं।

'हम कहीं रुक लें' - दयाल ने अपनी आवाज में गहरी ममता अनुभव की। क्या वह भी पुराने दयाल में लौट रहा है। साइकिल में हवा भरवाने के लिए दुकान के टप्पर में खड़ी शिखा पीले दुपट्टे से नाक मुँह लाल करती हुई... इतनी काम्य कि देखते ही छूने को जी चाहे छूते ही चूमने को... पूरी ताकत से सीने में बटोर लेने को अनंतकाल तक काले चमकदार बालों में सिर छुपाने को...।

यह कितना प्रकृत और निर्दोष था मगर कितनी सारी गर्द के नीचे दबा हुआ। उसे अचरज हुआ जब उसने अपनी ऐसी पवित्रता पर इन दिनों के कीचड़ का एक कतरा भी नहीं देखा। कितनी अजीब बात है कि इस समय वह बगल में बैठी हुई इस स्त्री को छूना चाहता है। उसकी पत्नी के वजूद से बाहर निकल आने के कारण ही क्या ये देह उसे काम्य हो उठी है...।

सुमना की गाड़ी पीछे है। वह अकेली ड्राइव करती चली आ रही है। हरदम नारकीय उत्तेजना के शिखर पर रहने वाली औरत। दयाल की जिंदगी का यह सीन उसके लिए खासा दिलचस्प है। इस खेल में वह अंत तक बनी रहना चाहती है। दयाल उसका जीता हुआ किला था। उसमें व्यस्त और उसके लिए व्यस्त। दोनों एक जैसे उत्पीड़क ढंग से विलासी हैं। नए तरह की उत्तेजनाओं की ईजाद में सबसे आगे। एक साथ मगर एक दूसरे पर कब्जे के पिछड़ेपन से बाहर। उसे कभी नहीं लगा कि दयाल की जिंदगी में कोई तिनका कोई कुर्सी, वजूद या कोई भावना ऐसी थी जिसे ठेलकर उसे अपनी जगह लेनी पड़ी। शिखा तो उसके प्रति बहुत उनुत्सुक और नॉर्मल थी, किसी विचित्र सी व्यस्तता के बीचोंबीच, बाकी दुनिया से ऊबी और उचाट। सबकी तरह सुमना ने भी उसे एक असंभव चीज मान लिया था।

इस समय ऐसी शिखा के इर्द-गिर्द सब सिमट आए हैं, दयाल उसे पास बैठाकर पुरानी जगहों में ले जा रहा है, वहाँ जहाँ वह बस के ऊपर अपनी साइकिल लाद कर आता था, घने जंगल के बीचों-बीच रात उतरने के पहले तक घास और जंगली फूलों की गाढ़ी गंध के बीच... 'शी' को यह पसंद था।' अस्पताल से चलने से पहले वह बता रहा था। उसकी खाल, उसकी आँखें और उसकी साँसों में भी आज एक नई बात थी। सुमना रोमांचित थी। कार की विंडोज उसने खोल दीं। तेज हवा थी जोर की आवाज करती हुई। सुमना खुद को देखना चाहती है। जी होता है कार रोक कर हवा से टकरा कर ठंडी हुई त्वचा पर हाथ फेरे, कुछ देर किसी सुनसान पुलिया पर साथ बैठने के लिए दयाल को पुकार ले... उसने रास्ते के दोनों ओर फैले जंगल को देखा।

'आप देखिए कि जंगल कहाँ कैसे असर करता है। पशुता की आदत में ढले हुए लोगों के भीतर भी ऐसी बची हुई चीजों का पता और कौन दे सकता है...'

'ओह फुलिश...'

सुमना ने सिर झटक कर रियरव्यूमिरर में देखा। उर्वी की गाड़ी उसी की तरह उसे गुस्से में दिखाई दी। उसे हँसी आई। उर्वी का तो बस एक लक्ष्य है, शिखा के इस बीस वर्ष से दयाल को साबुत बाहर निकाल लाना। इस इमोशनल ड्रामे को वह एकदम सह नहीं पा रही है। 'ओह हॉरिबल' की खब्त में उसकी भौहें हरदम चढ़ी रहती हैं, इस वक्त तो सचमुच ऐसा हो गया है... मिडिल क्लास आइडियलिस्ट वैल्यूज वाली वह मद्धिम-मद्धिम सी औरत... अचानक ऐसा सब पर सवारी गाँठ रही है कि सब चित्त। वह सबको इस तरह बौना कैसे कर सकती है... क्लास गैदरिंग में अब कौन उसकी नोटिस लेता था, वैसे भी वह पार्टीज में आना कब का छोड़ चुकी थी... सब उसकी एबसेंट लगा चुके थे, एक तय हो चुकी अनुपस्थिति... उस रात कहाँ से कैसे बेआवाज चली आई थी...।

सब अपने आप से पूछ रे थे, सब सिर धुन रहे थे...

दयाल की गाड़ी रुक गई थी। सड़क के किनारे एक पुराने टेंट की तरह की जगह के बाहर चौकोर चबूतरे में चूल्हे बने हुए थे। कोई ढका-दबा सा ढाबा था शायद। सड़क के दूसरे छोर पर एक ट्रक खड़ी थी। तेज आवाज में बजता फिल्मी गाना चारों तरफ बिखर रहा था। नीम के घने पेड़े के नीचे पड़ी चारपाइयाँ, उधर छप्पर के नीचे लगी कुछ मेज-कुर्सियाँ... थोड़ी सी दूर पर कुएँ की पक्की जगत पर नहाते हुए कुछ ट्रक ड्राइवरों ने धड़ाधड़ आकर रुकी गाड़ियों से उतरते चिकने स्त्री-पुरुषों को देखा तो वे अपने संवाद जोर-जोर से बोलने लगे, उर्वी का पारा सचमुच आसमान पर पहुँच रहा था। उसको छोड़ किसी को ऐसी जगह के लिए खास असुविधा नहीं थी। सुमना ने कुएँ की तरफ से अपनी ओर आते हुए छींटों में तुत्फ लेना शुरू कर दिया था। यह जिंदगी का एक और रंग था जो उसकी उत्तेजनाओं के मिजाज को अपने ढंग से गाढ़ा कर रहा था। अपनी दुनिया के साँवले हिस्सों में होती तो उन उघड़ी देहों के बीच खुद पहुँच जाती, एक अलग फ्लेवर जोरदार...। उसकी आँखें वहाँ चिपक सी गई थीं। दयाल कुछ नहीं देख रहा था। शिखा को किसी सँभाली जाने वाली चीज की तरह सहारा दे रहा था वह... रोहित को सब कुछ बहुत बेवकूफी भरा लग रहा था - 'क्या है यहाँ माम के लिए... अब यहाँ हम खाना भी खाएँगे क्या?

उर्वी तो लगभग चीख ही पड़ी - 'खाना हमारे पास है डैड!'

उर्वी की माँ काले लेंस वाले चश्मे में एक फैशनेबल परतों वाली महिला थी। अपनी क्लास के मिजाज में मीठी मद्धिम और निर्वेद में बोलने वाली। बस अपनी बेटी से बात करते वक्त वे असली और स्वाभाविक होतीं। उसे इस समय वे भारी मुसीबत में पड़ा हुआ अनुभव कर रही थी। मिस्टर दयाल का अपनी लद्धड़ मिडिल क्लास वाइफ के लिए अचानक ऐसे केयरिंग हो उठना उन्हें कतई समझ में नहीं आ रहा था। सब कुछ तो लगभग तय हो चला था इनके घर में... अजीबोगरीब कामों में डूबी रहने वाली या किताबों में गर्क हो चुकी शिखा, दयाल की छाया बन चुकी और उर्वी के लिए काफी जगह निकालती सुमना...।

सुमना उनके लिए बिल्कुल अनकंफर्ट नहीं थी। एक सुंदर शानदार औरत थी वह। अपनी सफलता से दुनिया के ओर-छोर नापती वह जब-तब आकर दयाल की गोद में गिर जाती। वे सब एक दोस्ती के रिश्ते में थे, हमराजों वाली दोस्ती के रिश्ते में...।

'तेरी सास को क्या सचमुच कुछ याद नहीं... उन्होंने उर्वी से दसवीं या बारहवीं बार पूछा...।'

ओह मॉम! यू आर रियली इंपासिबिल! प्लीज, अब ऐसे सड़े सवाल पड़ोसियों के लिए छोड़ दो। वो सब तो ऐसे ही हमारी फेमिली की ऐसी-तैसी कर रहे हैं... उर्वी उखड़ गई।

उखड़ती क्यों न। उसके पास इस फनी ट्रिप के लिए समय ही कहाँ था। कितनी मुश्किल से एक एन.जी.ओ. को पटा पाई थी वह। एकाध ओरिएंटेशन कैंप के बाद उसका काम बस शुरू हो जाता। उनके साथ मीटिंग करनी थी, रजिस्ट्रेशन वगैरह कितने काम... बस पंद्रह दिनों में सारे रॉ हैंड पेशेवर हो जाते। थोड़ा-बहुत पैसा ट्रांसपोर्टेशन में जाना था मगर काम बहुत क्लास होने वाला था। गारमेंट फैक्टरी के लिए इस रहस्य लोक की परिकल्पना उसकी अपनी थी। रोहित तो बस उसे देखता रह गया।

'आप कम से कम दस गुना ऑर्डर ले सकते हैं डैड! और अपनी फैक्टरी में आपको एक भी वर्कर नहीं बढ़ाना पड़ेगा, उससे चार गुना कम पेमेंट और हजार गुना अच्छे काम का बंदोबस्त किया है मैंने, सोशल वेलफेयर का तमगा अलग से...' उसने दयाल से बताया था। सब कुछ उर्वी ने अपने बल-बूते पर ही किया था। नदी के दूसरे पटान के पास की बस्ती में ऑक एन.जी.ओ. के जरिए जाकर उसने वहाँ की गरीब औरतों को प्रशिक्षित करने का पूरा प्लान लिया। ट्रेनिंग सर्टिफिकेट और उन्हें लगातार काम... सब कुछ पट गया था। नदी के उस सुनसान नीले किनारे पर अपनी जन्नत का जन्म लिखने ही वाली थी उर्वी... एक सफल महिला उद्यमी यहाँ वहाँ फ्लैश होती उपलब्धियाँ, समाज सेवा की छौंक बराबर लगी हुई। चौधरी भी उसके साथ था।

तड़ तड़ की आवाज में उसी का फोन बज रहा था - 'मैम! आपका फोन' उसने फोन उर्वी की ओर बढ़ा दिया था।

'मेरा?' उसे हैरत हुई। रोहित था - 'तुमने अपना सेल क्यों ऑफ कर रखा है' वह चिल्ला रहा था। तुम बात तो बताओ, कौन मर गया है?' उर्वी ने अपना पारा चौगुना चढ़ा लिया। थोड़ी सी असुविधा होने पर रोहित जानवर हो जाता है। उर्वी भी उससे दबती नहीं...।

'क्या? ...होश आ गया है तो मैं क्या करूँ' उसका गुस्सा अब बढ़ रहा था। शिखा के लिए तुरंत अस्पताल पहुँचना उसे बहुत नागवार गुजरा। अस्पताल में पूरा मजमा लगा था। सबकी निगाहें उस पर। यह पब्लिक थी। अपनी गाड़ी से उतरने से पहले उर्वी ने अपनी सभ्यता का खोल चमका लिया। माँ के साथ होने के कारण वह और भली-भली दिख रही थी। गहरी चिंता झलकाते हुए वह रोहित की ओर बढ़ गई थी।

उर्वी पर दयाल को नाज था। वह 'क्लास' दुनिया की थी। उसके कारण वह उनके बीच स्वीकृत था। उसकी पिछली मिडिल क्लास जिंदगी कहीं चर्चा में नहीं आती। शिखर चढ़ते हुए वह अपनी आदतें-तरीके से बदलता रहा मगर शिखा... बस थोड़ी दूर साथ चली थी। थोड़ा पैसा आने की सहूलियतें उसे भी हल्का गुदगुदा रहीं थीं। खर्च भी बढ़ने वाले थे। रोहित के आने की आहट मिल चुकी थी। कितना काम करती थी शिखा उन दिनों। उसने कमीशन पर इलेक्ट्रानिक सामान बेचने का काम शुरू किया था। शिखा पास के एक फटीचर कान्वेंट स्कूल में पढ़ाने जाती। लद्धड़ सा वेतन और दम निकाल लेने वाला काम। दुबली-पतली शिखा धूप में तांबे की रंग की हो गई थी।

'कितनी कल्लू होती जा रही हो तुम शी।' 'अजी! ये तो मेरे ही दिन हैं... तुम्हारी कोयलिया के, जैसे-जैसे आम सयाने होंगे, पकने को तैयार... उधर रिजल्ट आ जाएगा, स्कूल की छुट्टी तब दिन भर घर में पहूँगी... फिर तुम्हारी रूप की रानी बन जाऊँगी...।'

'रूप की रानी? हाँ ठीक-ठाक तो है सब कुछ... बस ये तुम्हारी नाक थोड़ी पतली हो जाएँ, ज्यादा नहीं, यह किनारे-किनारे का मांस... बस जरा सा..'

दयाल ने उसे छेड़ा था।

'अच्छा, ऐसा करते हैं, यह किनारे-किनारे का मांस थोड़ा छिलवा लेते हैं।' शिखा ने ऐसी गंभीरता से कहा जैसे यही सबसे सही तरीका हो नाक पतली करने का। चुहल उसकी आँखों से छलक रही थी।

शिखा सोचती थी कि ऐसी छोटी-छोटी चुहलें ही उनकी जिंदगी का सारा अर्थ है। कोई बर्तन, कोई उम्मीद, कोई कोना इस अर्थ से खाली नहीं है। वह हरदम तृप्ति में थी मगर दयाल बेचैन था। उसे यह खुश रंग थोड़ा सा बाँधता मगर बहुत दूर तक खाली छोड़ देता। उसे सब ओर अपनी जिल्लत दिखाई देती। शहर था कि जरूरतों के विस्फोट से फटा पड़ रहा था। दुकानें शो रूम्स में बदल रहीं थीं। पैसे की प्रचंडता पूरे उफान पर थी। डींगरे ने पूछा - 'तीन-चार लाख का जुगाड़ कर सकते हो?' उसके पास जबरदस्त प्लान था, पक्की कमाई का। दयाल ने उसे निराश ही किया था मगर वह टिका रहा - 'चलो कोई बात नहीं, कुछ करते हैं।'

और वह 'कुछ' जम गया था। शुरू के दिनों में शिखा सचमुच खुश थी। कौतुक के साथ दयाल की सफलताएँ देखती, मगर धीरे-धीरे वह आतंकित होने लगी थी - 'इतना पैसा हम क्या करेगे डी।' दयाल के पास तब वक्त और जवाब दोनों कम पड़ने लगे थे। नौकरों से अटे बड़े घर में वह शिखा को रोहित की मालिश में लगा देखता तो कुढ़ जाता - 'शी, तुम्हें अपने को बदलना चाहिए।'

सरसों के तेल की तीखी गंध में डूबी शिखा कोई जवाब नहीं देती। दयाल के आस-पास के लोग खुस-फुस करते - 'लोअर मिडिल क्लास।' दयाल की बढ़ती चमक के बीच वह एक बेरौनक फीकी फाँक सी उलझी थी। अपने मामूलीपन को उसने इस साम्राज्य के विरूद्ध एक हथियार बना लिया था शायद...।

'आप इन्हें प्रवचनों में क्यों नहीं भेजते' - सुचित्रा दत्त ने बड़ी सहानुभूति के साथ दयाल को सलाह भी दे डाली थी। दयाल अपमानित हुआ था शायद या फिर क्या - उसने खुद को मिसेज दत्त को चिढ़ाता हुआ पाया। वह एक अभद्र जवाब दे रहा था, जान-बूझ कर उनको बौना करने के लिए - 'शिखा उस स्टफ की नहीं हैं मिसेज दत्त! ऐसे प्रवचन को वह वल्गैरिटी का दूसरा रूप मानती हैं' - ऐसे कुछ आध्यात्मिक आवेग दयाल कभी-कभार अनुभव करता था। तेज बहाव में कभी ऐसे पाँव उखड़े कि चित्त, बस आकाश नजर आए ऐसे, वरना अक्सर वह बेइंतहा पैसे के साथ क्रूर सुविधापरस्त और स्वार्थी होता हुआ आदमी थी। इन दिनों उसके भीतर भी बर्बर राग अपनी जड़ें फैला रहे थे। ऐसे स्वाद को तोड़ती हुई शिखा कभी प्रेत छाया की तरह बुदबुदाती - 'हमें इतना पैसा नहीं चाहिए... यह बहुत अश्लील होता है...', नौकरों-चाकरों ने दया-माया के साथ अनुभव किया - 'बड़ी साहब का दिमाग ठिकाने नहीं।'

शुरू में दयाल ने समझाया भी - शिखा! क्या तुम पाप-पुण्य मानती हो, उसका भय तो नहीं तुम्हारे ऊपर? देखो, मेहनत से कमाया हुआ पैसा कभी अपावन नहीं होता... मैं और रोहित कितना खटते हैं, उर्वी भी कितनी मेहनत करती हैं, हम एंपायर बना रहे हैं अपना शी, तुम भोगो... बस मस्त रहो, देखो पैसे ने हमें कितना कुछ दिया है, याद करो वो गर्मी से पिघलती सड़कें, मैं कमीशन पर फ्रिज बेचता था मगर मेरे घर में फ्रिज नहीं था, तुम मिट्टी के घड़े को खिड़की के पास रखती थी ताकि लू से पानी ठंडा होता रहे...।'

शिखा की आँखें चमक गईं 'और तुम्हें एक गिलास ठंडा पानी देते हुए कहती थीं -'यह देखो न हवा ने कमीशन लिया न मिट्टी ने, यह तुम्हारा ठंडा पानी तुम्हें दिया... याद रखोगे?'

दयाल मुरझा जाता। वह समझता गया कि उसके भोग लालसा से भरे जीवन का सामना करने के लिए शिखा ने ये विचित्रताएँ खोज ली हैं...।

'क्या हुआ था उस रात मिस्टर दयाल। डॉक्टर अपने सवाल पर अड़ा था। दयाल फिर उस सवाल के सामने था। वैसी कितनी ही रातों के भीतर से पक कर निकलने के बावजूद डॉक्टर के सामने घनघोर असुविधा महसूस करता हुआ लेकिन एक भयानक ग्लानि और घृणा को हर बार जीने के लिए अभिशप्त!

उर्वी की माँ एक खाट पर बैठ गई थी। ढाबे का दुबला पतला बच्चा सा नौकर उन्हें किसी तत्काल सुविधा के बारे में बता रहा था। वे उठीं और उसके पीछे चल दीं। वे ढाबे के परली तरफ जा रहीं थीं' ...शायद टॉयलेट!

शिखा धीरे-धीरे पुलिया के नीचे उतर रही थीं। थोड़ी ही दूर पर रेल की पटरियाँ थीं।

'अगर हम यहीं बस जाएँ...' उस दिन वह इन पटरियों से बहुत सट कर बैठी थी, रेल आने की थरथराहट सुनना था उन्हें। शाम उतर रहीं थी। पत्तों के रंग गाढ़े साँवले हो रहे थे। मच्छरों का सघन झुंड उनके ऊपर मंडरा रहा था। अक्टूबर था वह शायद, अट्ठाइस साल पीछे की जिंदगी का मस्त बिंदास अक्टूबर...।

'शी चलो यार, आखिरी बस का समय हो रहा है' उसने हड़बड़ी मचाई तो शिखा मचल गई थी। 'आज यहीं रुकते हैं दयाल! देखो करना भी क्या है, बिस्तर तो इतना जानदार है ही', खूँटियों से भरी घास को हथेली में उठाते हुए उसने कहा था।

'और ठंड लगेगी, तो आकाश ओढ़ लेंगे, राइट?'

और क्या! खूब खींच कर लाड़ के साथ बोली थी वो।

दयाल के भीतर कुछ चमक गया है क्या उसे याद आ रही है वह जगह, क्या उसे दयाल याद आ रहा है, क्या वह सब कुछ याद कर लेगी... सब कुछ... वह रात भी... ओह!'

वह पसीने में डूब गया। उधर सब निश्चिंत थे। धीरे-धीरे पिकनिक जैसा मामला जम रहा था। रोहित उर्वी से खाना लगाने के लिए कह रहा था, उर्वी खुद के ऐसे काम में लगाए जाने के सख्त खिलाफ भौहों में तनी हुई थी, उसकी माँ दूर आड़ में बने शौचालय से लौट रही थीं...।

शिखा पटरियों के पास बैठ गई, मुट्ठी भर घास को ऊपर उछालती... वह उस रात की स्मृति के करीब थी... या उस रात के समूचे नरक से थरथराती...।

अब तो वह एक मनहूस रात थी, उसकी पिछली कई ऐसी रातों के सिलसिले की एक रात, हल्की फुहारों वाली बरसात थी, सभी भीग रहे थे मगर कोई लॉन से नहीं टला। वे सब दयाल के यहाँ ऐसे अक्सर नशे में गर्क होने के लिए इकठ्ठा होते थे। खाने की मेजें बिखर चुकी थीं। नशे से बेदम होते लोगों ने खाया कम बिखेरा ज्यादा था। गंजा अधेड़ प्रीतम नाचने के लिए कुर्सी पर चढ़ गया था। सब उसे परचम कहते। अपने नशे को वह जरूरत से ज्यादा लहराता, खास तौर से औरतों के सामने... इससे वह उनसे काफी छूट ले लेता। बच कर निकलना चाहती औरतों के आगे वह विचित्र ढंग से कमर मटकाने लगता। सब खूब हँसते थे। उस रात भी वह सिर के ऊपर बोतल लगा कर कमर मटका रहा था। चलानी भी हमेशा की तरह लॉन की पहले से गीली घास पर शराब डाल कर लोट-मोट हो रहा था। थोड़ी-थोड़ी देर बाद उठता, वहीं कही खड़ा होकर मूतने लगता। वह सचमुच के नशे में था। हिचकोले खाता लाचार... नशे में हमेशा उसका घिनौनापन और बढ़ जाता था। रात आखिरी छोर के करीब थी। ठंडी और भीगी हुई। गीले-नशीले झोंकों में सब आगे पीछे डोल रहे थे। बेशुमार अमीरी के पनालों से फूहड़ता यहाँ-वहाँ सुरंग बना रही थी। दुष्टताएँ उनके लिए हमेशा उत्तेजक थीं। ऐसी दुष्टताओं के लिए कुछ लोग बेहोशी को अलग तरीके से भोगने में जुट गए। निर्वस्त्र आवाजों फुसफुसाहटों का जोर था। स्त्री-पुरुष नर मादा के बर्बर घिनौनेपन में नीली मद्धिम रोशनी में डोलते प्रेत जैसे...।

शिखा का आना किसी ने नहीं देखा था। लड़खड़ाते चलानी के पैरों से कोई पड़ी हुई चीज टकराई। वह बुदबुदाने लगा और फिर चीखने लगा। धीरे-धीरे सब वहाँ जुट आए। पशुओं की तरह उसे सूँघने टटोलने लगे... 'अरे औरत है यार! प्रीतम जोर से चिल्लाया था। दयाल की आँखें नशे से बंद हो रही थीं, शरीर भी अवश। किसी तरह इस शोर में औरत की देह को टटोलने वह भी पहुँच गया। सब सीटियाँ बजा रहे थे यहाँ वहाँ से उस निश्चल शरीर को टटोलते। डींगरे थोड़ा डरा - 'यार मर तो नहीं गई है?'

दयाल का नशा चिटक गया। वह उस देह को रोशनी में खींचने लगा। पहचानते ही वह ध्वस्त हो गया था - शिखा?

सबके होश उड़ गए थे। सबके नशे का फूहड़ तमाशा टूट गया 'शिखा? दयाल की वाइफ?

कितनी बार दयाल की चेतना से गुजरी है यह रात। ग्लानि अपराधबोध और एक डर... दयाल इस डर से आँखें नहीं मिलाना चाहता।

ढाबे के आस-पास के दृश्य में एक व्यवस्था हो चली थी। उस बच्चे जैसे नौकर को उर्वी ने अपने प्रभाव में ले लिया था। अब वह कृतार्थ होता हुआ सा उनके लंच के लिए साफ-सलीके की जगह बना रहा था। सुमना कुएँ के दृश्य के इतने पास चली गई थी कि वे ड्राइवरनुमा लोग अपना फब्तियाँ और इशारे समेटने को मजबूर हो गए थे।

इतनी लंपट औरत उन बेचारों ने पहले शायद ही देखा हो। जैसे-तैसे वे अपना नहाना निपटा रहे थे। रोहित की सास चारपाई पर अब चित्त पड़ गई थी सोचती हुई कि उर्वी से छूटे तो वे उस बच्चे को सेवा में लें...।

शिखा ने बेआवाज अपनी और बढ़ते दयाल को अनुभव किया मगर वह लोहे में भरती कँपकँपाहट पर हाथ फेरती रहीं। ठंडा उदास लोहा! ...वह अपने पोर-पोर में जैसे उस गूँज को भरना चाहती थी। दयाल ने देखा शिखा की नाक, होठ, वक्ष, बाँहें सब उस लोहे की नम थरथराहट पर बिछे जा रहे थे। पटरियों की थरथराहट से उभरती गूँज को उसने साफ सुना। आस पास चरती बकरियाँ डर के मारे पटरियों से दूर दौड़ने लगीं।

दयाल जोर से चीखा 'शिखा ऽऽ!'

लेकिन नहीं... उसके गले से कोई आवाज नहीं निकली थी। शिखा ने एक क्षण के लिए उसे घूम कर देखा। डूबते सूरज का रंग उसकी आँखों में चमक रहा था साथ कुछ और... कुछ और भी... ओह!

दयाल ठगा सा रह गया। उन आँखों में घृणा थी... धिक्कारती हुई बेपनाह घृणा... डर की तीखी लहर दयाल के कलेजे को चीर गई।

शिखा के होठ सख्ती से बंद थे। वह क्या धरती में समाने का रास्ता खोजती आ निकली थी यहाँ...?

'दयाल चलो हम चिड़िया बन जाते हैं, अपनी मासूम उड़ानों के दिनों में उसने कहा था, बंद आँखें, चेहरे की पवित्रता से चमकती ढेर सारी हँसी। वह उसकी हँसी से ज्यादा उसकी देह से खेल रहा था - 'कौआ बन जाता हूँ... 'नहीं...' उसने जोर कहा था... 'क्यों...?'

'पता है कौए का रूप धर कर...' वह अपनी माइथोलोजी में घुसने वाली थी कि दयाल उकता गया था - 'शी प्लीज अपने राम-सीता से मुझे डराया मत करो।' शिखा हँस पड़ी - 'और गिद्ध भी मत बनना।' 'क्यों?, गिद्ध तो डील-डौल वाले होते हैं, पावरफुल हैं कि नहीं, उसने छेड़ा था। 'नहीं, गिद्ध पतित होते हैं, आँखें निकाल कर खा जाते हैं।'

'अरे यार तुम तो...' दयाल का रस भंग नहीं हुआ था, मगर वह हमेशा की तरह झल्लाया था।

पास के पेड़ों से चिड़िया भी उड़ चली थी। आवाज बढ़ती जा रही थी। गाड़ी कहीं बहुत करीब थी, शिखा दयाल से कुछ कदमों की दूरी पर, डर... नफरत... अविश्वास... धिक्कार... वह सह नहीं पा रहा था। उसकी दुनिया के लोग वहाँ ढाबे में व्यवस्थित हो चले थे। उसे याद आया डॉक्टर ने कहा था - 'देखिए, सँभालिएगा, शी इज वेरी इंपल्पिसव... यू नो, एक्यूट डिप्रेशन में ऐसे लोग आत्महत्या भी कर लेते हैं।'

जंगल हादसे के बहुत करीब था। ड्राइवर टाइप लोगों को लगा शायद कि आज वे ढाबा एफोर्ड नहीं कर सकते। सुमना अपने बैग से बीयर निकाल रही थी। उर्वी की माँ ने लंच से पहले शीशे में अपना हुलिया देखना जरूरी समझा। लंच लग चुका था। उर्वी चिल्लाई - 'रोहित! तुम्हारे डैड कहाँ हैं?'

'वो आ रहे हैं -' रोहित ने इशारा किया।

दयाल के लिए इस वक्त सिर्फ बीयर काफी नहीं थी... पीछे छूटी शिखा की देह में फँसी रह गई चीजों में काश उसकी आत्मा भी होती। वह यहाँ तीखे दर्द की तरह कलेजे में उठ रही थी। उसे बहुत कमजोर करती हुई कोई चीज, वह शायद काँप रहा था, आँखों में सब कुछ हिलता सा... जैसे ढाबे पर गरम होते पानी की भाप ने सब कुछ ढक लिया हो।

उसने रोहित को देखा... वह हमेशा की तरह मस्त और बेपरवाह लगा।

उसे यह सब कुछ भूलने में काफी वक्त लगेगा... मगर जिंदगी भर का नहीं शायद...

ढाबे के पीछे से गुजरती पटरियों पर से धड़-धड़ करती हुई ट्रेन गुजर रही गई। ढाबे के टीन-टप्पर धरती-आकाश सब काँप गए। धीरे-धीरे दूर गई गड़गड़ाहट के बाद छूटा सन्नाटा उन्हें अपनी लपेट में लेना चाहता था, बावजूद इसके कि यह उनके न समझ में आने वाली बात थी।

'ओह! कितनी भयानक आवाज होती है ट्रेन की', रोहित ने कहा और अंदर की ओर बढ़ लिया।

अपनी सुरुचि और सफाई से मेज लग जाने के बाद उर्वी खुश थी। झिंगली खाट में लगभग धँस चुकी उसकी माँ अपनी देह वहाँ निकालने के लिए जोर लगा रही थीं। गहरे होते बादलों ने सूरज पर ओट डाल दी थी।

सुमना को यह मौसम खूब मौजूँ लगा। उसे भूख भी लग लाई थी। उसे दयाल की पीठ दिखाई दी - 'ओ शिट! यह इतना हिल क्यों रहा है,' हैरान होती हुई सुमना उसकी ओर बढ़ने लगी। एक स्त्री की पूरी देह कुचलकर ट्रेन आगे जा चुकी थी। दुनिया के लिए यह एक दुर्घटना थी। उर्वी के लिए सुकून, दयाल के भीतर उतने ही खून में लथपथ पिरी हुई पिसी उसकी आत्मा की चीत्कारे भीं। पता नहीं उसे सँभालने की जरूरत किसी को समझ में आई थी नहीं...।


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हिंदी समय में चंद्रकला त्रिपाठी की रचनाएँ