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डायरी

बेतरतीब तिथियों में कहीं मैं फिर मिलूँ
साधना अग्रवाल


एक साथ अपनी दो दुनियाओं में जीने के लिए मैं अभिशप्त हूँ। एक विवाह से पहले की दुनिया, जहाँ मेरा जन्म हुआ, पढ़ाई-लिखाई के साथ मेरा बचपन बीता और दूसरी यानी विवाह के बाद की दुनिया। इतिहास में कभी तीसरी दुनिया भी हुआ करती थी। यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद की दुनिया थी। तब एक दुनिया अमेरिका की थी और दूसरी दुनिया सोवियत संघ की थी। बीच में तीसरी दुनिया ऐसे अविकसित देशों की थी जिसे औपनिवेशिक गुलामी से दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्रता मिली थी। इन दो दुनियाओं में प्रायः वर्चस्व की लड़ाई होती रहती थी और अमेरिकी पूँजीवादी दुनिया ने तीसरी दुनिया के कुछ देशों पर अपना प्रभाव और वर्चस्व बढ़ा लिया था, तो सोवियत संघ भी पीछे नहीं था। तीसरी दुनिया के देश - एक लंबी औपनिवेशिक गुलामी के बाद कहने मात्र को स्वतंत्र हुए इन दो दुनियाओं की टकराहट में पिस रहे थे। उदाहरण के लिए क्यूबा के साथ अमेरिका का व्यवहार। बहरहाल, यह अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की दुनिया थी।

लेकिन अभी बात मैं अपनी दो दुनियाओं की करना चाहती हूँ जो पहले की तीसरी दुनिया से बिल्कुल अलग है। मेरा जन्म उ.प्र. के बरेली जनपद के छोटे से गाँव-कस्बे बहेड़ी में एक सुखी-संपन्न समृद्ध व्यापारी परिवार में हुआ था। जहाँ मुझे हर सुख-सुविधा प्राप्त थी। मैं खूब पढ़-लिख रही थी। लेकिन पढ़ाई-लिखाई के बारे में मेरे परिवार का दृष्टिकोण बहुत पुरातन और संकीर्ण था। लड़कों को ज्यादा क्या पढ़ाना-लिखाना क्योंकि उन्हें तो विरासत में मिले व्यवसाय को सँभालना है और लड़कियों को बस इतना पढ़ाना चाहिए कि किसी अच्छे घर में उनकी शादी हो जाए। यानी दोनों के लिए मैट्रिक या ग्रेजुएशन की शिक्षा के आगे कोई गुजांइश नहीं थी। तब के समाज में पारिवारिक मर्यादा का उल्लंघन करना कम से कम किसी लड़की के लिए भारी पड़ सकता था। मैं पढ़ने-लिखने में न केवल बहुत अच्छी थी बल्कि बहुत महत्वाकांक्षी भी। मेरा एक बड़ा सपना था। बीए और एमए की परीक्षा पारिवारिक विरोध के बावजूद मैंने दी और आश्चर्यजनक रूप से दोनों परीक्षाओं में मुझे प्रथम श्रेणी मिली। विडंबना की बात यह है कि परिवार के जो लोग मेरी उच्च शिक्षा का विरोध कर रहे थे, एम.ए. की परीक्षा में मेरे प्रथम श्रेणी में पास होने की अखबार में प्रकाशित खबर को गर्व के साथ पूरे कस्बे में दिखा रहे थे। मैं थोड़ी जिद्दी भी थी और अपनी महत्वाकांक्षा को परवान चढ़ाते मैं यूपीएससी की परीक्षा में बैठ गई बिना किसी तैयारी के। परिवार के लोगों ने मेरा मजाक बनाते हुए कहा - अब यह कलेक्टर, कमिश्नर बनकर रहेगी। होना-जाना क्या था क्योंकि मेरी तो कोई तैयारी ही नहीं थी।

पहले मैंने जो पहली दुनिया की बात की है, अब उसका उल्लेख करना चाहती हूँ। उच्च शिक्षा के लिए बेशक मैंने अपने परिवार से विद्रोह किया लेकिन शादी के लिए नहीं क्योंकि तब तक के परिवार-समाज में कुछ पारंपरिक मर्यादा के मूल्य बचे हुए थे। माता-पिता ही अपने बच्चों की शादी का निर्णय लिया करते थे उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए। अल्मोड़ा में मेरी शादी तय हुई और पहली दुनिया की मान-मर्यादा, गरिमा और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए इसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया। शादी के बाद मैं मैदान से पहाड़ पर चली गई। घर-परिवार, पति सुखी, संपन्न और बहुत अच्छे थे, मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। अपनी दोनों बेटियों - मानसी और साँची को हमने खूब पढ़ाया-लिखाया ही नहीं बल्कि उन्हें इस काबिल भी बनाया कि हमें उन पर गर्व है। बड़ी बेटी मानसी दिल्ली वि.वि. के मिरांडा हाउस से बीएससी आनर्स और सेंट स्टीफेंस से एमएससी करने के बाद आईआईटी दिल्ली से फिजिक्स में पीएचडी कर रही है तो साँची अभी बीए एलएलबी आनर्स।

अब मेरे सामने जो दूसरी भयावह दुनिया खुल रही है उससे मैं हैरान हूँ। पिछले कुछ दिनों से मैं मानसी की शादी के लिए प्रयासरत हूँ। मेट्रोमोनियल कॉलम के अतिरिक्त व्यक्तिगत प्रयत्नों से भी कई जगह बात हुई। जिस दूसरी दुनिया की बात मैं कर रही हूँ वह एलिस के आश्चर्यजनक लोक की तरह मेरे सामने खुली। पिछले दिनों एक वर पक्ष के माता-पिता ने जब मुझसे बेलाग पूछा - 'क्या आपका कोई बेटा नहीं है?' मेरे 'न' कहने पर उन्होंने फोन बंद कर दिया। इतना ही नहीं हैरानी मुझे तब और हुई जब एक प्रतिष्ठित अखबार के वैवाहिक कॉलम में वर पक्ष ने यह शर्त रखी कि लड़की का भाई होना अनिवार्य है।' यह सीधे-सीधे हमारे संविधान पर हमला था। यह सोचकर मैं हैरान हूँ कि अब जो दुनिया मेरे सामने है, उसकी मानसिकता किस तरह तेजी से बदल गई है। यह मेरे सामने दूसरी दुनिया का भयावह ही नहीं, एक डरावना सच है। क्या केबल बेटियों की माँ होना एक त्रासदी है? बेशक रोज दुनिया बदलती है लेकिन भूमंडलीकरण के प्रभाव में पूँजीवादी बाजार के बाद जिस तरह तेजी से दुनिया बदली है, इसने हमारे पारिवारिक संरचना की चूलें हिला कर रख दी हैं। इस पर हम बस चकित और स्तब्ध ही हो सकते हैं। बस एक नई दुनिया की तलाश में। क्या बेटी का जन्म एक अपराध है? इस पर किसी का वश नहीं, यह तो प्रकृति का नियम है। आप हम कुछ नहीं कर सकते, कम से कम निम्न/मध्य वर्ग की मानसिकता को तो बदल नहीं सकते। दुनिया इसी तरह चलती, बनती, बिगड़ती रहेगी। बस, मनुष्यता या मानवीय संवेदना का हृास हो रहा है। यह चिंता का विषय है। सिर्फ मेरे लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए। क्योंकि हमारे समाज में वर्ग या वर्ण के भीतर भी एक संकीर्ण, कुंठित और विगलित ऐसा समाज है, जिसकी मानसिकता में लड़की या औरत के लिए कोई सम्मान नहीं है, वे उसे परिवार में लड़के होने के वजन पर तौलते हैं। क्या यह बताने की जरूरत है कि इक्कीसवीं सदी के हमारे समाज के एक वर्ग की मानसिकता, मध्यकाल की है? मुझे हैरानी नहीं होगी यदि कोई लड़की ऐसी स्थिति में आजीवन कुँवारी ही रहना पसंद करे। लेकिन यह एक गंभीर समस्या है जिस पर हमें विचार करने की जरूरत है।

(बिना किसी तारीख के)

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कभी मैंने अपने बचपन के बहेड़ी में उगते सूरज को देखा था। खेलते-खेलते जब शाम को घर लौटती, अनायास डूबता सूरज भी दिख जाता था। अल्मोड़ा में तो वर्षों-बरस मैंने पहाड़ों के पास सिर्फ उगता सूरज देखा है, डूबता सूरज कभी नहीं क्योंकि मेरा घर घाटी में नीचे स्थित था और जहाँ से डूबता सूरज नहीं दिखता था। फिर जब मैं डिग्री कॉलेज बेरीनाग में हिंदी प्रवक्ता के रूप में गई, मेरे किराए के मकान से हिमालय की धवल-उज्जवल चोटियों के पड़ोस से जिस तरह उगते सूरज का दृश्य दिखता था, सहसा मुझे प्रसाद जी की काव्य पंक्तियाँ याद आतीं - 'अरुण यह मधुमय देश हमारा'। और डूबते सूरज के नाज-नखरे गजब के थे, एक पहाड़ी ऊँचाई से ओझल होते दूसरी पहाड़ी पर डूब जाते, ऐसा लगता जैसे किसी ने अज्ञात दिशा में लाल रंग का गोल सेटेलाइट छोड़ दिया हो। सूरज के डूबते-उगते बिंबों को आधुनिक हिंदी कविता में कई कवि सामने लाए हैं। लेकिन दिल्ली के अपने किराए के मकान से जिस तरह उगते सूरज की आकृति देखी, पहली बार देखी। दरअसल जब मुझे अपने कस्बे बहेड़ी के उसी कॉलेज, जहाँ से मैंने अपनी स्नातक की पढ़ाई की, 'गन्ना उत्पादक महाविद्यालय' से 'वर्तमान सदी की चुनौतियाँ एवं राष्ट्रभाषा हिंदी' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोलने के लिए आमंत्रण मिला, मैं भीतर से बेहद रोमांचित महसूस कर रही थी। यह वही मेरा मायका बहेड़ी है जहाँ पारिवारिक विरोध के बावजूद अपने संकल्प के कारण मैंने बीए और एमए की उच्च शिक्षा प्राप्त की। मेरी शादी हुई और मेरी पढ़ाई-लिखाई की मेरी इच्छा को मेरे पारिवारिक जनों ने मेरा विरोध समझ लिया था। मन ही मन इसे मैं अपनी जीत मान रही थी कि अंततः हमारी धरती ने हमारे होने को स्वीकार कर लिया। इस बात से मेरे मन में लावा फूट रहा था और अचानक बीच रात में जब मेरी नींद टूटी, सूर्योदय देखने का अवसर मिला। यह उल्लेख करना मैं भूल गई कि जब मुझे निमंत्रण पत्र मिला था, तत्काल मैंने अपने मायके के तमाम परिवार जनों को सूचित किया कि जिस बहेड़ी से आपने मुझे बेदखल कर दिया था, उसी बहेड़ी में मैं सेंध मारने आ रही हूँ। उनके लिए यह एक बड़ी सूचना थी कि जिस कॉलेज से मैं पढ़ी थी, उसी कॉलेज के एक समारोह में एक अतिथि वक्ता के रूप में ससम्मान बुलाया गया है लेकिन उनकी प्रतिक्रिया बेहद ठंडी थी। शायद उन लोगों ने मन में सोचा होगा कि जिस पगली की शादी करके हमने छुट्टी पा ली थी, यहाँ आकर कोई मुसीबत न खड़ी कर दे कि हमारे परिवार की मान-मर्यादा पर कोई आँच न आ जाए। लेकिन अब मुझे किसी की परवाह नहीं, जो होना होगा, वह होगा।

(24 फरवरी 2016, दिल्ली)

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दिल्ली से कल रात्रि 1:45 पर रानीखेत एक्सप्रेस से चलकर मैं सुबह 6 बजे हल्द्वानी पहुँची। वहाँ से बस से किच्छा पहुँचकर सीधे पंत मार्केट में सौरभ होटल में कमरे में जाते ही चाय पी और निढाल हो गई। किच्छा से बहेड़ी में तैनात हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. उमापति दीक्षित के साथ कार में हम लोग बहेड़ी डिग्री कॉलेज पहुँचे। चूँकि किच्छा और बहेड़ी की दूरी बहुत कम है लगभग मात्र 15 किलोमीटर। लेकिन वहाँ पहुँचने पर मुझे हैरानी हुई कि सूचित करने के बाद मेरे मायके का कोई भी व्यक्ति मुझसे मिलने नहीं आया। लेकिन मेरे लिए यह बड़ी बात नहीं थी। अब तक परिवार में मेरी जैसी विद्रोही छवि रही है, काहे के लिए कोई मुसीबत मोल लेता। लगभग 25 वर्ष पहले इसी कॉलेज में बीए की पढ़ाई के दिन याद कर मैं रोमांचित हो उठी। तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. साहनी तथा अपने गुरुजनों श्री रामप्रसाद गंगवार सर, वाजपेयी सर, पांडे सर, शब्बीर अहमद सर आदि में से गंगवार सर, पांडे सर और शब्बीर सर को वहाँ पाकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। वे लोग भी मुझे वहाँ अतिथि रूप में देखकर न केवल हैरान थे वल्कि गौरान्वित भी महसूस कर रहे थे। पूरे कार्यक्रम के दौरान लगातार मेरी आँखे भीड़ में अपने सगे-संबंधियों को तलाश रही थीं लेकिन दुर्भाग्य से मेरी उम्मीदों पर पानी फिर गया।

अंततः न चाहते हुए भी मुझे अपने भाई-भाभी से मिलने घर जाना पड़ा क्योंकि अनायास मेरे कदम उस घर की ओर बढ़ चले थे जहाँ मैंने अपनी जिंदगी के 21-22 साल बिताए थे। लगभग आधा घंटा वहाँ रुककर, उन लोगों का हाल-चाल जानकर मैं वापसी के लिए चल पड़ी। मुझे स्टेशन पर छोड़ने के लिए मेरे भाई या भतीजे मेरे साथ नहीं थे बल्कि मेरा सहपाठी एन.पी. सिंह था। रानीखेत एक्सप्रेस खुल चुकी थी और मेरी आँखों की कोर में आँसू थे, पता नहीं 25 साल छोड़े अपने कॉलेज में अतिथि रूप में आने की खुशी में थे या फिर अपने मायके के पारिवारिक जनों के व्यवहार से आहत।

(25 फरवरी 2016, बहेड़ी)


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