डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

व्याख्यान

हर शब्द कुचक्र के बारे में कुछ जानता है
हेर्टा म्यूएलर
संपादन - सरिता शर्मा


'क्या तुम्हारे पास रूमाल है?' मेरे सड़क पर बाहर जाने से पहले मेरी माँ हमारे घर के गेट के पास खड़ी होकर हर सुबह मुझसे सवाल पूछा करती थी। मेरे पास रूमाल नहीं होता था। और क्योंकि मेरे पास रूमाल नहीं होता था, मैं वापस अंदर जाकर रूमाल लेकर आती थी। मेरे पास रूमाल कभी भी नहीं होता था क्योंकि मैं हमेशा उनके प्रश्न का इंतजार किया करती थी। रूमाल इस बात का सबूत था कि मेरी माँ सुबह मेरा ध्यान रखेगी। बाकी पूरे दिन के लिए मैं अपने दम पर होती थी। 'क्या तुम्हारे पास रूमाल है?' यह सवाल स्नेह का अप्रत्यक्ष प्रदर्शन था। इससे अधिक कुछ भी प्रत्यक्ष शर्मनाक हो गया होता और किसानों के व्यवहार के अनुरूप नहीं होता। प्यार सवाल के रूप में होता था। यह बात इसी तरह की जा सकती थी : साफ-साफ, आदेश के स्वर में या काम कराने के लिए इस्तेमाल किए जानेवाली दक्ष युक्ति से। आवाज के रूखेपन में भी कोमलता प्रबल होती थी। हर सुबह मैं फाटक के पास एक बार बिना रूमाल के और दूसरी बार रूमाल के साथ जाया करती थी। मैं उसके बाद ही गली में बाहर निकलती थी मानो रूमाल होने का मतलब है कि मेरी माँ भी मेरे साथ थी।

बीस साल बाद मैं शहर में लंबे समय तक अपने दम पर रही और मैं एक विनिर्माण संयंत्र में अनुवादक के रूप में काम करती थी। मैं पाँच बजे उठ जाती थी; काम 6.30 बजे शुरू हो जाया करता था। हर सुबह लाउडस्पीकर कारखाने के अहाते में राष्ट्रीय गान की गर्जना करता था; दोपहर के भोजन के वक्त मजदूरों के समवेत स्वर होते थे। लेकिन मजदूर बस अपनी खाली टिनप्लेट सी आँखों और तेल से सने हाथों के साथ अपने भोजन के सामने बैठे रहते थे। उनके भोजन को अखबार में लपेटा जाता था। वे सूअर के गोश्त खाने से पहले उस पर से अखबारी कागज को खुरचते थे। दो साल तक हर दिन, एक ही जैसी दिनचर्या में गुजरता गया।

तीसरे वर्ष में दिनचर्या खत्म हो गई। सप्ताह में तीन बार एक आगंतुक सुबह- सुबह मेरे कार्यालय में आया करता था : चमकती हुई नीली आँखों वाला भारी-भरकम, लंबा-तगड़ा आदमी सुरक्षा विभाग से आने वाला भीमकाय व्यक्ति।

पहली बार उसने मुझे अपशब्द बोले और चल दिया।

दूसरी बार उसने अपनी हवारोधी जैकेट को उतारी और उसे अलमारी की कुंजी पर लटका कर बैठ गया। उस सुबह मैं घर से कुछ ट्यूलिप लाई थी और उन्हें गुलदस्ते में सजा दिया था। उस आदमी ने मुझे देखा और चरित्र की इतनी अच्छी निर्णायक होने के लिए मेरी प्रशंसा की। उनकी आवाज फिसलनभरी थी। मैंने असहज महसूस किया। मैंने उसकी बात काटते हुए आश्वासन दिया कि मुझे ट्यूलिप की समझ थी मगर लोगों को नहीं समझ पाती थी। तब उसने दुर्भावनापूर्वक कहा कि जितना मैं ट्यूलिप के बारे में जानती थी, उससे बेहतर वह मुझे समझता था। उसके बाद उसने जैकेट बाजुओं पर चढ़ाई और चला गया।

तीसरी बार वह बैठ गया, लेकिन मैं खड़ी रही क्योंकि उसकी अटैची रखी थी। मुझमें उसे नीचे टिकाने की हिम्मत नहीं थी। उसने मुझे बेवकूफ, कामचोर फूहड़ और आवारा कुतिया की तरह भ्रष्ट कहा। उसने ट्युलिपों को मेज के किनारे के करीब खिसका दिया, फिर कागज को एक खाली चादर और डेस्कटॉप के बीच में रखकर मुझ पर चिल्लाया : लिखो। मैं बैठे बिना, उसने जो भी लिखने को कहा लिखती गई - अपना नाम, जन्मतिथि और पता लिखा था। अगली बार, मैं किसी को नहीं बताऊँगी, कोई कितना भी करीबी दोस्त क्यों न हो कि मैं... और उसके बाद वह भयानक शब्द आया : जासूस -मैं जासूसी कर रही हूँ। उस समय मैंने लिखना बंद कर दिया। मैंने पैन नीचे रख दिया और खिड़की के पास गई और धूलभरी, कच्ची और गड्ढेवाली गली, और सभी कुबड़े घरों की तरफ बाहर देखा। सबसे बड़ी बात यह कि इस सड़क को स्त्रादा ग्लोरी - ग्लोरी स्ट्रीट कहा जाता था। ग्लोरी स्ट्रीट पर एक बिल्ली शहतूत के छोटे से पेड़ में बैठी हुई थी। वह कटे हुए कान वाली कारखाने की बिल्ली थी। और बिल्ली के ऊपर तड़के का सूरज पीले रंग के ड्रम की तरह चमक रहा था। मैंने कहा : मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। मैंने यह बात बाहर सड़क को कही। चरित्र शब्द ने सुरक्षा विभाग के आदमी को पागल बना दिया। उसने कागज के टुकड़े को फाड़ दिया और फर्श पर फेंक दिया। तब शायद उसे अहसास हुआ कि उसे अपने मालिक को कागज के टुकड़े को दिखाना पड़ेगा कि उसने मुझे भर्ती करने की कोशिश की। वह झुका, उस कागज के टुकड़े को उठाया और उसे अटैची में डाल दिया। उसके बाद उसने गहरी साँस भरी और पराजित महसूस करते हुए, ट्यूलिप के गुलदस्ते को दीवार पर दे मारा। जब वह टूटा तो पीसने की ध्वनि सुनाई दी मानो हवा के दाँत हों। उसने अपनी अटैची को बगल में दबाए हुए कहा : तुम पछताओगी, हम तुम्हें नदी में डुबा देंगे। मैंने मानो अपने आपसे कहा : अगर मैं उस पर हस्ताक्षर करती हूँ, तो मैं खुद के साथ नहीं जी पाऊँगी, और मुझे यह अपने दम पर करना होगा। इसलिए यह बेहतर होगा कि आप ऐसा कर दें। तब तक कार्यालय का दरवाजा पहले से ही खुल चुका था और वह चला गया था। और बाहर स्त्रादा ग्लोरी पर कारखाने की बिल्ली पेड़ से इमारत की छत पर कूद गई थी। एक शाखा ट्रेंपलिन की तरह उछल रही थी।

अगले दिन रस्साकशी शुरू हो गई। वे मुझे कारखाने की नौकरी से निकालना चाहते थे। मुझे हर सुबह 6:30 बजे निदेशक के पास हाजिरी देने के लिए जाना होता था। शासकीय श्रमिक संघ के प्रमुख और पार्टी सचिव भी उसके कार्यालय में थे। जिस तरह मेरी माँ कभी पूछा करती थी : क्या तुम्हारे पास रूमाल है, वैसे ही निदेशक अब हर सुबह मुझसे पूछता था : क्या तुम्हें और कहीं नौकरी मिल गई है? हर सुबह मैं एक ही जवाब देती थी : मैं और कहीं नौकरी नहीं खोज रही हूँ, मुझे यहाँ यह कारखाना पसंद है, मैं रिटायर होने तक यहाँ रहना चाहती हूँ।

एक सुबह मैं काम पर आई तो अपने भारी-भरकम शब्दकोशों को कार्यालय के बाहर हॉल के फर्श पर पड़ा हुआ पाया। मैंने दरवाजा खोला; एक इंजीनियर मेरी मेज पर बैठा हुआ था। उसने कहा : लोगों को कमरे में प्रवेश करने से पहले दस्तक देनी चाहिए। मेरी जगह है, तुम्हारा यहाँ कोई काम नहीं है। मैं घर नहीं जा सकती थी; किसी भी अक्षम्य गैरहाजिरी से उन्हें मुझे नौकरी से निकालने का बहाना मिल जाता। मेरे पास दफ्तर नहीं था तो मुझे सुनिश्चित करना था कि अब मुझे सच में काम पर आना था; किसी भी परिस्थिति में मैं वहाँ अनुपस्थित नहीं हो सकती थी।

मेरी जिस दोस्त को मैं दयनीय स्त्रादा ग्लोरी से गुजरते हुए सब कुछ बता दिया करती थी, उसने पहले, मेरे लिए अपने डेस्क के एक कोने को खाली किया। लेकिन एक सुबह वह अपने कार्यालय के बाहर खड़ी हुई थी और मुझसे कहा : मैं तुम्हें अंदर नहीं आने दे सकती हूँ। हर कोई कह रहा है कि तुम मुखबिर हो। उत्पीड़न निचले स्तरों तक चला गया था; मेरे सहयोगियों के बीच अफवाह फैला दी गई थी। यह सबसे बुरी बात थी। हम खुद को किसी हमले से बचा सकते हैं, लेकिन हम परिवाद के खिलाफ कुछ नहीं कर सकते हैं। मैं हर दिन, खुद को कुछ भी हो जाने, यहाँ तक कि मौत के लिए भी तैयार करती थी। लेकिन मैं इस नमकहरामी का मुकाबला नहीं कर सकती थी। किसी भी तरह की तैयारी इसे सहने योग्य नहीं बना सकती थी। बदनामी मनुष्य को गंदगी से भर देती है; उसका दम घुटता है क्योंकि वह अपना बचाव नहीं कर सकता है। मैं अपने सहयोगियों की नजरों में बिलकुल वही थी जैसा बनने से मैंने मना कर दिया था। अगर मैंने उनकी जासूसी की होती, तो वे बिना किसी झिझक मुझ पर भरोसा कर लेते। कुल मिलाकर, वे मुझे इसलिए सजा दे रहे थे क्योंकि मैंने उन्हें बख्श दिया था।

चूँकि अब मुझे सच में सुनिश्चित करना था कि मुझे काम पर आना था, लेकिन अब मेरे पास कार्यालय नहीं था, और मेरी दोस्त मुझे अपने दफ्तर में बैठने नहीं दे सकती थी, मैं सीढ़ियों में खड़ी रहती थी और तय नहीं कर पाती थी कि क्या करना है। मैं सीढ़ियों पर कई बार ऊपर-नीचे जाती थी और अचानक मैं फिर से अपनी माँ की बच्ची बन जाती थी क्योंकि मेरे पास रूमाल था। मैंने इसे दूसरी और तीसरी मंजिल के बीच सीढ़ियों पर रखा और ध्यान से उसकी तह लगाकर बैठ गई। मैंने अपने भारी शब्दकोशों को घुटने पर रखा और हाइड्रोलिक मशीन के विवरणों का अनुवाद किया। मैं एक सीढ़ियों की परिहासक थी और मेरा कार्यालय एक रूमाल था। मेरी दोस्त खाने के समय सीढ़ियों पर मेरे पास आ जाती थी। हम एक साथ खा लेते थे जैसे पहले उसके कार्यालय में खाते थे और उससे पहले मेरे दफ्तर में। अहाते में लाउडस्पीकर से हमेशा की तरह मजदूरों के समवेत गान चल रहा था जो लोगों की खुशी के बारे था। मेरी दोस्त अपना दोपहर का भोजन खाते हुए मेरे लिए रोया करती थी। मैं नहीं रोई। मुझे कठिन रहना था। बहुत लंबे समय तक। कुछ कभी खत्म न होने वाले सप्ताह, जब तक कि मुझे बर्खास्त नहीं कर दिया गया।

जिन दिनों मैं सीढ़ियों पर रहती थी, उस दौरान, मैंने 'स्टेयर' शब्द को शब्दकोश में देखा : पहला सोपान शुरुआती कदम, छोटा कदम या बुलनोज भी कहलाता है। जीना लहरदार पाइप पर पहली बार जिस दिशा में जाता है वह 'हैंड' है। पाइप के पीछे की ओर बाहर की तरफ निकले हुए किनारे को नोजिंग कहा जाता है। मुझे पहले ही हाइड्रोलिक मशीन के चिकने किए गए भागों से जुड़े अनेक सुंदर शब्दों की जानकारी थी जैसे : डबलचूल, गूजनेक, एकोर्न, नट और आई बोल्ट। अब मैं उसी तरह से सीढ़ी के भागों के काव्यात्मक नामों और तकनीकी भाषा के सौंदर्य से चकित थी। नोजिंग और हाथ - तो सीढ़ी के पास एक शरीर है। इनसान दुनिया में सबसे बोझिल चीजों पर भी अपने चेहरे लगाने पर जोर क्यों देते हैं चाहे वे लकड़ी या पत्थर पर काम कर रहे हों या सीमेंट या लोहे के साथ। वे मृत वस्तुओं पर जिंदा लोगों के नाम क्यों छापते हैं, उसे शरीर के भागों के रूप में मानवीकृत क्यों करते हैं हैं? क्या यह छिपी हुई कोमलता तकनीशियनों के लिए कठोर काम को सहने करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक है? क्या हर क्षेत्र में हर काम में उसी सिद्धांत का पालन किया जाता है जैसे कि मेरी माँ का रूमाल के बारे सवाल होता था?

जब मैं छोटी थी घर पर एक रूमाल की दराज हुआ करती थी जो हमेशा दो खाँचों में बँटी थी जिनमें तीन ढेर लगे हुए थे :

     बाईं तरफ मेरे पिता और दादा के लिए पुरुषों के रूमाल।
         दाईं तरफ मेरी माँ और दादी के लिए महिलाओं के रूमाल।
         बीच में मेरे लिए बच्चों के रूमाल।

दराज रूमाल के रूप में परिवार का चित्र था। पुरुषों के रूमाल सबसे बड़े थे जिनके किनारों पर भूरे रंग की गहरी धारियाँ थीं। महिलाओं के रूमाल छोटे थे, और उनके किनारे हल्के नीले, लाल या हरे रंग के थे। तीन प्रकार के रूमालों को इस तरह विभाजित किया गया था, आगे की पंक्ति में, हर रोज के इस्तेमाल के लिए और उनके पीछे की तरफ, रविवार के लिए आरक्षित रूमाल। रविवार को रूमाल कपड़े के रंग से मेल खाता हुआ होना चाहिए था चाहे वह दिखाई नहीं देता था।

घर में कोई अन्य वस्तु, यहाँ तक कि हम खुद भी, कभी इतने महत्वपूर्ण नहीं जितना कि रूमाल था। इसके उपयोग दुनिया भर के थे : छींकें, नकसीर, हाथ, कोहनी या घुटने में चोट लगना; रुलाई को रोकने के लिए इसे चबाना आदि। सिर दर्द के लिए माथे पर एक ठंडा गीला रूमाल। चारों कोनों पर बाँधने से यह धूप लगने या बारिश से सिर की रक्षा करता था। यदि आप कुछ याद रखना होता था, तो स्मृति संकेत करने के लिए गाँठ बना सकते थे। भारी बैग ले जाने के लिए इसे हाथ के चारों ओर लपेट सकते थे। जब रेलगाड़ी स्टेशन से चल पड़ती थी, तो रूमाल को अलविदा कहने के लिए लहराया जाता था। और, चूँकि हमारी बोली में आँसू शब्द रोमानियाई शब्द रेल की तरह लगता है, पटरियों पर रेल के डिब्बों के गुजरने की आवाज मुझे हमेशा रोने की तरह सुनाई देती थी। अगर गाँव में किसी के घर पर मौत हो जाती थी तो लोग तुरंत उसकी ठोड़ी के चारों ओर रूमाल बाँध दिया करते थे ताकि जब कठोरता का क्षण आए तो उसका मुँह बंद रहे। शहर में कोई व्यक्ति सड़क के किनारे पर गिर पड़ता था, तो कोई राहगीर हमेशा रूमाल ले कर उसके चेहरे को ढक देता था ताकि मृतक का पहला शांति स्थल रूमाल हो।

गर्मी के गर्म दिनों में माता-पिता अपने बच्चों को फूलों को पानी देने के लिए कब्रिस्तान शाम को देर से भेजा करते थे। हम दो या तीन के समूह में एक साथ रहते थे और जल्दी से पहले एक कब्र और फिर अगली कब्र को पानी देते थे। उसके बाद हम चैपल की सीढ़ी पर इकट्ठे बैठ कर कुछ कब्रों से सफेद धुंध के बादल उठते देखा करते थे। वे थोड़ी दूर उड़कर अँधेरे में गायब हो जाते थे। हमारे लिए वे मृतकों की आत्माएँ थीं : पशुओं की आकृतियाँ, चश्मे, छोटी बोतलें और कप, दस्ताने और मोजे। और यहाँ-वहाँ काली रात की किनारी वाला सफेद रूमाल।

बाद में, जब मैंने ऑस्कर पास्तिओर के साथ मुलाकात की ताकि मैं सोवियत श्रम शिविर में उनके निर्वासन के बारे में लिख सकूँ तो उन्होंने मुझे बताया कि एक बुजुर्ग रूसी माँ ने उन्हें महीन कपड़े से बना सफेद रूमाल दिया था। रूसी महिला ने कहा था -भगवान करे तुम दोनों भाग्यशाली हो, और तुम जल्दी घर आओ और मेरा बेटा भी आ जाएगा। उन्होंने बताया कि उसका बेटा उनकी तरह घर से दूर था लेकिन विपरीत दिशा में दंड बटालियन में था। ऑस्कर पास्तिओर ने उसके दरवाजे पर दस्तक दी थी, आधा भूखा भिखारी जो कोयले के टुकड़े के बदले थोड़ा सा भोजन पाने का इच्छुक था। उसने उन्हें अंदर आने दिया और उन्हें गर्म सूप दिया। और जब उसने उनकी नाक को कटोरे में टपकते देखा, तो उसने उन्हें महीन कपड़े से बना सफेद रूमाल दिया जिसे पहले किसी ने कभी भी इस्तेमाल नहीं किया था। रूमाल की एक दिन की किनारी, रेशम के धागे के साथ सिले डंठल और गुलाब उसे सौंदर्य की वस्तु बना रहे थे जिससे भिखारी अपनापन महसूस करने के साथ-साथ आहत भी हो रहा था। यह एक मेल था : महीन वस्त्र सांत्वना दे रहा था और रेशम की टहनी उनकी जीर्णता का पैमाना था। महिला के लिए, ओस्कर पास्तिओर भी एक संयोजन था। घर पर अनूठा भिखारी और दुनिया में खोया हुआ उसका बेटा। वे दोनों पात्र खुश थे और उस महिला के परोपकार से अभिभूत थे जिसमें उन्हें दो पात्र नजर आते थे : एक अज्ञात रूसी महिला और सवाल पूछने वाली चिंतित माँ : क्या तुम्हारे पास रूमाल है?

जबसे मैंने यह कहानी सुनी तब से मेरा खुद का एक सवाल है कि क्या तुम्हारे पास रूमाल है? यह प्रश्न हर जगह मान्य है? यह ठंड और विगलन के बीच बर्फीली चमक में दुनिया भर में आधे हिस्से तक फैला हुआ है? क्या यह हर सीमा को पार करने के लिए पहाड़ों और मैदान के बीच से गुजरता है; यह दंड और यातना शिविरों से भरे हुए विशाल साम्राज्य तक पहुँच सकता है? क्या तुम्हारे पास रूमाल है इस प्रश्न से छुटकारा पाना असंभव है, चाहे हाथ में हथौड़ा और दरांती हों या स्तालिनवादी पुनःशिक्षा के शिविर हों?

यद्यपि मैंने दशकों तक रोमानियाई भाषा में बात की है, ओस्कर पास्तिओर के साथ बात करके यह अहसास हुआ कि रूमाल के लिए रोमानियाई शब्द बतिस्ता है। यह इस बात का उदाहरण है कि रोमानियाई भाषा के शब्द लगातार सीधे दिल तक पहुँचते हैं। रूमाल के कपड़े से मिटाने का चिह्न नहीं बनता, बल्कि यह खुद को रूमाल यानी बतिस्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। मानो सभी रूमाल, जब भी और जहाँ भी हों बतिस्ता के बने हुए थे।

ऑस्कर पास्तिओर ने एक दोहरे बेटे के रूप में दोहरी माँ की यादगार रूप में अपने रूमाल को ट्रंक में रखा। और शिविरों में जीवन के पाँच साल बिताने के बाद वह उसे घर ले आए। क्योंकि उनका महीन कपड़े का सफेद रूमाल आशा और भय था। जब आप आशा और भय को खत्म कर देते हैं, तो आप मर जाते हैं।

सफेद रूमाल के बारे में हमारी बातचीत के बाद मैंने आधी रात सफेद कार्ड पर ओस्कर पास्तिओर के लिए शब्द का संग्रह चिपकाने में बिताई :

     यहाँ बिंदु नाच रहे हैं बिया कहते हैं
         आप एक लंबे तने के दूध के गिलास में आ रहे हैं
         सफेद, भूरे, हरे जस्ते के टब में लिनेन
         लगभग सभी वस्तुएँ
         सुपुर्दगी पर संवाद करती हैं
         यहाँ देखो
         मैं ट्रेनराइड हूँ और
         साबुनदानी में चेरी
         कभी अजनबी पुरुषों से बात नहीं करना
         या स्विचबोर्ड पर कुछ कहना है

मैं बाद में जब सप्ताह में उन्हें शब्द संग्रह देने के लिए गई, तो उन्होंने कहा : तुम्हें इस पर 'ओस्कर के लिए' भी लिखकर चिपकाना है। मैंने कहा : मैं तुम्हें जो कुछ भी देती हूँ वह तुम्हारा है। उन्होंने कहा : आपको यह चिपकाना पड़ेगा क्योंकि कार्ड को इसका पता नहीं होगा है। मैं उसे घर वापस ले गई और उस पर चिपकाया : ऑस्कर के लिए। और मैंने अगले हफ्ते उन्हें फिर वह दे दिया मानो मैं पहले फाटक से बिना रूमाल के गई थी और अब दूसरी बार रूमाल के साथ लौट आई थी।

एक और कहानी भी रूमाल के साथ समाप्त होती है :

मेरे दादा-दादी का मेट्ज़ नाम का बेटा था। उसे 1930 के दशक में कारोबार की पढ़ाई करने के लिए तिमिसोआरा में भेजा गया था ताकि वह परिवार के अनाज के कारोबार और किराने की दुकान को सँभाल सके। स्कूल में जर्मन रेइच के असली नाजी शिक्षक थे। मेट्ज़ को दल में कारोबारी के रूप में प्रशिक्षित किया जा सकता था, लेकिन उसे योजना के अनुसार विचार बदलकर नाजी बनना सिखाया गया था। अध्ययन समाप्त हो जाने के बाद, मेट्ज़ एक भावुक नाजी और बदला हुआ व्यक्ति था। वह यहूदी विरोधी नारों पर चिल्लाता था, और इतना मूर्ख हो गया था कि उससे बात नहीं की जा सकती थी। मेरे दादा ने उसे कई बार डाँटा : उनकी सारी संपत्ति यहूदी व्यापारी दोस्तों के द्वारा दिए गए उधार की बदौलत थी। और जब उससे बात नहीं बनी तो उन्होंने मेट्ज़ के कान पर कई बार तमाचे मारे। लेकिन उस युवक की सोचने की क्षमता को मिटा दिया गया था। उसने विचारक की भूमिका निभाई और अपने उन साथियों को धौंस दिखाई जो मोर्चे पर जाने से कतरा रहे थे। मेट्ज़ का रोमानियाई सेना में लिखने का काम था। फिर भी उसे सिद्धांत की जगह अभ्यास करने की इच्छा महसूस हुई, तो उसने एस एस के लिए स्वेच्छा जाहिर की और मोर्चे पर भेजे जाने की माँग की। कुछ महीने बाद वह शादी करने के लिए घर आया था। वह मोर्चे पर अपराधों देखने की वजह से समझदार हो गया था, इसलिए उसने कुछ दिनों तक युद्ध से बचने के लिए उस समय के जादुई फार्मूले को इस्तेमाल किया। जादुई फार्मूले का नाम था : शादी की छुट्टी।

मेरी दादी ने अपने बेटे मेट्ज़ की दो तस्वीरें दराज में रखी हुई थीं : एक शादी की तसवीर और दूसरी मौत की तसवीर। शादी की तसवीर में सफेद कपड़ों में दुल्हन है जो मेट्ज़ से एक हाथ लंबी, पतली और गंभीर है - एक प्लास्टर मैडोना है। उसके सिर पर मोम से बनी माला थी बर्फ से ढके पत्तों जैसी लग रही थी। उसकी बगल में नाजी वर्दी में मेट्ज़, पति के बजाय सैनिक, और दूल्हे के बजाय ब्रिजगार्ड लग रहा था। जैसे ही वह मोर्चे पर लौटा, उसकी मौत का फोटो आ गया था। इसमें गरीब सिपाही है जिसकी बारूदी बम से धज्जियाँ उड़ गई थीं। मौत का फोटो हाथ के आकार का है : एक काले खेत के बीच में मानव अवशेष का एक छोटा सा भूरा ढेर सफेद कपड़े पर रखा दिखाई देता है। काले खेत के बीच सफेद कपड़ा बच्चों के रूमाल जितना छोटा दिखता है, सफेद वर्ग जिसके बीच में अजीब डिजाइन चित्रित है। मेरी दादी के लिए यह तसवीर संयोजन भी था : सफेद रूमाल पर एक मृत नाजी था, उनकी स्मृति में एक जीवित बेटा था। मेरी दादी ने अपनी पूरी जिंदगी इस दोहरे चित्र को अपनी प्रार्थना पुस्तक के अंदर रखा। उन्होंने हर दिन प्रार्थना की, और निश्चित रूप से उनकी प्रार्थना का दोहरा अर्थ था। प्रिय पुत्र से नाजी हठधर्मी बन जाने को स्वीकार करना, प्रार्थनाओं में भगवान से बेटे को प्रेम करने और नाजी को माफ करके संतुलन कायम करने का अनुरोध था।

मेरे दादा प्रथम विश्व युद्ध में एक सैनिक थे। जब वह अपने बेटे मेट्ज़ के बारे में बोलते थे तो वह जानते थे कि किसके बारे में बात कर रहे थे : जब झंडा फहराना शुरू करता है तो व्यावहारिक बुद्धि तुरही में चली जाती है। यह चेतावनी बाद में आने वाली तानाशाही पर भी लागू होती थी जिसे मैंने अनुभव किया था। हर दिन आप बड़े और छोटे, दोनों मुनाफाखोरों की सहज बुद्धि को सीधे तुरही में जाते हुए देख सकते थे। मैंने तुरही को नहीं बजाने का फैसला लिया।

हालाँकि मुझे बचपन में मेरी मर्जी के खिलाफ अकोर्डियन बजाना सीखना पड़ा था। क्योंकि हमारे पास घर पर मृत सैनिक मेट्ज़ का लाल अकोर्डियन था। उसकी पट्टियाँ मेरे लिए ज्यादा ही लंबी थी। मेरे कंधों से फिसलने से बचाने के लिए, अकोर्डियन के शिक्षक ने उन्हें मेरी पीठ पर एक रूमाल से एक साथ बाँध दिया था।

क्या हम कह सकते हैं कि छोटी से छोटी वस्तुएँ हैं - चाहे वे तुरही, अकोर्डियन हो या रूमाल, जीवन में बिलकुल अलग चीजों को जोड़ती हैं? वस्तुएँ कक्षा में हैं और उनके विचलन से पुनरावृत्ति के पैटर्न का पता चलता है - एक दुष्चक्र है, या जिसे हम जर्मन में शैतान का घेरा कहते हैं। हम इस पर विश्वास कर सकते हैं, लेकिन यह कह नहीं सकते हैं। मगर जो कहा नहीं जा सकता है, उसे लिखा जा सकता है। क्योंकि लेखन एक मूक कार्य है, सिर से पैर तक परिश्रम है। मुँह को छोड़ दिया जाता है। मुझे लगता है मैंने तानाशाही के दौरान ज्यादा बात मुख्यतः इसलिए की क्योंकि मैंने तुरही नहीं बजाने का फैसला किया था। आमतौर पर मेरी बात कष्टदायी परिणाम तक लिए चली जाया करती थी। लेकिन लेखन सीढ़ियों पर, चुप्पी में शुरू हुआ जहाँ मुझे उससे समझौता करना था जिसे कहा नहीं जा सकता था। जो हो रहा था अब उसे बोल कर व्यक्त नहीं किया जा सकता था। ज्यादा से ज्यादा बाहरी बातों को बताया जा सकता था, लेकिन घटनाओं को समग्रता में व्यक्त नहीं किया जा सकता था। उसे मैं केवल लेखन कार्य के दौरान शब्दों के दुष्चक्र के भीतर बेआवाज मन में कह सकती थी। मैंने प्राणघातक डर के प्रति जीवन के लिए प्यास से प्रतिक्रिया व्यक्त की। शब्दों के लिए एक भूख। शब्दों के बवंडर के सिवाय कोई भी मेरी स्थिति को समझ नहीं सकता था, उसने वह बताया जोकि मुँह नहीं कह सकता था। घटनाओं द्वारा पीछा किए जाने पर, शब्दों और उनके शैतानी चक्कर में फँस कुछ ऐसा उभरा जो मैंने पहले कभी नहीं जाना था। वास्तविकता के समानांतर, शब्दों का मूकाभिनय असली आयामों का सम्मान किए बिना कार्यशील हो गया जिसने सबसे महत्वपूर्ण को सिकोड़ दिया और मामूली बैटन को लंबा खींच दिया। शब्दों का यह दुष्चक्र पागलों की तरह आगे बढ़ते हुए जीये हुए जीवन के पर शापित तर्क का एक प्रकार थोप देता है। उनकी मूकाभिनय क्रूर और अशांत होता है, हमेशा अधिक के लिए तरसता है, लेकिन रंत क्लांत हो जाता है। तानाशाही का मामला आवश्यक रूप से मौजूद है क्योंकि कोई भी मामला जब हमें लगभग हर उस चीज से वंचित कर दिया गया हो जिसे हमने मिला हुआ जाना था। व्यक्ति अव्यक्त रूप में मौजूद है, लेकिन शब्द मुझ पर कब्जा कर लेते हैं। वे जहाँ चाहे कहीं भी व्यक्ति को मना लेते हैं। और किसी भी बात का अर्थ समझ में नहीं आता है और सब कुछ सच है।

जब मैं सीढ़ियों पर रहती थी मैं नदी घाटी में गायों को चराने वाले बच्चे की तरह अकेली थी। मैं पत्तियाँ और फूल खाती थी ताकि मैं उनसे जुड़ सकूँ क्योंकि वे जानते थे कि जीवन को कैसे जीया जाए जिसे मैं नहीं जानती थी। मैं उनसे नाम लेकर बात करती थी : दूध भटकैया काँटेदार पौधा था जिसके डंठल में दूध होता था। लेकिन पौधे ने दूध भटकैया नाम नहीं सुना। इसलिए तो मैंने दूध और भटकैया शब्दों के बिना नाम तलाश करने की कोशिश की : थोर्नरिब, नीडलनेक... इन मनगढ़ंत नामों ने पौधों और मेरे बीच अंतर को जाहिर कर दिया, और अंतर खाईं में बदल गया जिसमें मेरे पौधे से नहीं खुद से बात करने का कलंक था। लेकिन अपमान मेरे लिए अच्छा साबित हुआ था। मैंने गायों की देखरेख की और शब्दों की ध्वनि ने मेरा ध्यान रखा था। मैंने महसूस किया :

     अपने चेहरे में हर शब्द,
         दुष्चक्र के कुछ जानता है
         लेकिन यह बताता नहीं है

शब्दों की ध्वनि जानती है कि उसके पास धोखा देने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है क्योंकि वस्तुएँ अपनी सामग्री के साथ धोखा देती हैं और भावनाएँ अपने इशारों से गुमराह करती हैं। शब्दों की ध्वनि, उसके द्वारा रचे गए सत्य के साथ-साथ अंतरापृष्ठ पर रहती है, जहाँ सामग्री और इशारों के छल आपस में मिल जाते हैं। लेखन में, भरोसा करने की बात नहीं है बल्कि छल की ईमानदारी का मामला है।

बहुत पहले जब मैं सीढ़ियों पर रहती थी और रूमाल मेरा दफ्तर, मैंने एक खूबसूरत शब्द ट्रेपेंजिन्स यानी चढ़ती हुई ब्याज दर पढ़ा था जिसमें ऋण के लिए ब्याज दर एक सीढ़ी की तरह ऊपर चढती है (जर्मन में इस 'सीढ़ी ब्याज' कहा जाता है) ये आरोही चढती हुए दरें एक व्यक्ति के लिए खर्च और किसी अन्य व्यक्ति के लिए आय हुआ करती थीं। मैं गहराई से लेखन में उतरती हूँ तो ये खर्च और आमदनी बन जाते हैं। मैं जितना ज्यादा लिखती हूँ उससे उतना ही अधिक पता चलता है जीया गया अनुभव किस चीज से वंचित था। केवल शब्द यह खोज करते हैं क्योंकि उन्हें इसका पहले पता नहीं था। और जब वे जीये हुए अनुभवों को अचानक पकड़ते हैं, तो वे सबसे अच्छा अभिव्यक्त करते हैं। अंत में वे इतने दमदार हो जाते हैं कि जीये हुए अनुभव को उनसे जुड़ना पड़ता है ताकि वह अलग-थलग न पड़ जाए।

मुझे लगता है कि वस्तुएँ अपनी सामग्री को नहीं जानती हैं, इशारों को उनकी भावनाओं को पता नहीं है, और शब्दों को उस मुँह के बारे में पता नहीं है जो उन्हें बोलता है। लेकिन हमें अपने अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए वस्तुओं, इशारों और शब्दों की जरूरत है। आखिरकार, हमें जितने अधिक शब्दों को लेने दिया जाता है हम उतने ही मुक्त हो जाते हैं। अगर हमारे मुँह पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है, तो फिर हम इशारों, यहाँ तक कि वस्तुओं के माध्यम से खुद को व्यक्त करने का प्रयास करते हैं। उनकी व्याख्या करना अधिक कठिन है, और उन पर संदेह करने में समय लगता है। वे हमें अपमान को एक प्रकार की गरिमा में बदलने में मदद करते हैं जिसमें संदेह उत्पन्न होने में समय लगता है।

मेरे रोमानिया से प्रवास से पहले एक सुबह, एक ग्रामीण पुलिसकर्मी मेरी माँ को तलाश करने के लिए आया था। वह पहले से ही गेट पर थी जब उनके दिमाग में आया : क्या तुम्हारे पास रूमाल है? उनके पास नहीं था। हालाँकि पुलिसकर्मी अधीर था, वह रूमाल लेने के वापस अंदर चली गई। स्टेशन पर पुलिसकर्मी गुस्से से चिल्लाने लगा। मेरी माँ की रोमानियाई भाषा की सीमित समझ के कारण वह चिल्लाने का अर्थ नहीं समझ पाई। इसलिए वह दफ्तर से निकल गया और दरवाजा बाहर से बंद कर लिया। मेरी माँ वहाँ पूरे दिन लॉक-अप में बंद बैठी रही। पहले कुछ घंटे वह मेज पर बैठ गई और रोई। तब उन्होंने ऊपर-नीचे चलना शुरू किया और अपने आँसुओं से भीगे रूमाल का इस्तेमाल फर्नीचर की धूल साफ करने में करना शुरू कर दिया। उसके बाद उन्होंने कोने से पानी की बाल्टी उठाई और दीवार पर खूँटी से तौलिया लेकर फर्श पर पोछा लगा दिया। जब उन्होंने मुझे यह बताया तो मैं भयभीत हो गई। मैंने पूछा कि आप उसके लिए इस तरह दफ्तर कैसे साफ कर सकती हो। उन्होंने शर्मिंदगी के बिना कहा : मैं समय बिताने के लिए किसी काम की तलाश में थी। और कार्यालय इतना गंदा था। अच्छी बात यह हुई कि मैंने बड़े पुरुषोंवाला बड़ा रूमाल अपने साथ ले लिया था।

उसके बाद ही मुझे समझ में आया कि इस अतिरिक्त, लेकिन स्वैच्छिक अपमान के माध्यम से, उन्होंने हिरासत में खुद के लिए कुछ गरिमा निर्मित की थी। मैंने एक संयोजन में इसके लिए शब्द तलाशने की कोशिश की :

     मैंने अपने दिल में मजबूत गुलाब और
         चलनी की तरह बेकार आत्मा के बारे में सोचा
         लेकिन रखवाले ने पूछा :
         बड़प्पन कौन हासिल करेगा
         मैंने कहा : खुद को बचाना
         वह चिल्लाया : अस्मिता
         बिना व्यावहारिक बुद्धि वाले
         अपमानित महीन कपड़े के सिवाय कुछ भी नहीं है।

मुझे लगता है जिन्हें तानाशाही ने हर दिन अब तक गरिमा से वंचित कर दिया है, मैं उन सभी के लिए एक वाक्य बोल सकूँ। वर्ना प्रश्न होगा : क्या तुम्हारे पास रूमाल है?

क्या ऐसा हो सकता है कि रूमाल के बारे में सवाल कभी रूमाल के बारे में नहीं था, बल्कि इनसान के निपट अकेलेपन के बारे में था?


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में हेर्टा म्यूएलर की रचनाएँ