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विमर्श

आजादी की जंग में महिलाएँ
अवंतिका शुक्ल


देश की आजादी की 69वीं वर्षगाँठ हमने हाल ही में मनाई है। देश भर में आजादी के शहीदों की कुर्बानियाँ याद की गईं। कार्यक्रम आयोजित किए गए। हर बार जब भी हम स्वतंत्रता आंदोलन पर बात करते हैं, तो हमारा मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाता है कि इस मिट्टी में जन्में लालों ने देश का आजादी के लिए हँसते-हँसते अपनी बलि चढ़ा दी। जब भी हम आजादी के शहीदों को याद करते हैं, तो उनमें अक्सर कर उन शहीद पुरुषों का वर्णन अधिक होता है, जिनके नाम इतिहास में स्वर्णाक्षर से लिख दिए गए हैं। लेकिन आजादी की जंग किसी धर्म, किसी वर्ण, किसी जाति, किसी क्षेत्र या किसी जेंडर में सीमित नहीं थी। देर से ही सही लेकिन कई इतिहासकारों ने कई ऐसे दस्तावेजों को खोज निकाला, जिन्होंने आजादी की जंग में महिलाओं के संघर्ष और उनकी भागीदारी को सामने लाकर रख दिया। इन महिलाओं में बेगमों से लेकर तमाम बाँदियाँ, तवायफों से लेकर शिक्षित-अशिक्षित, अमीर-गरीब, सवर्ण-दलित सभी श्रेणियों की महिलाओं के बड़े तबके शामिल थे। सभी तबकों का रक्त इस आजादी की लड़ाई में बहा। इस आलेख में ऐसी ही कुछ महिलाओं के आजादी के संघर्ष से जुड़े कुछ प्रसंगों का वर्णन किया गया है। इन प्रसंगों के माध्यम से हम जहाँ महिलाओं की बहादुरी को देख पाएँगे वहीं उनके संघर्षों के विभिन्न आयामों को भी समझ पाएँगे, उनके त्याग को सम्मान दे पाएँगे। किन सामाजिक, पारिवारिक चुनौतियों के बीच इन महिलाओं ने खुद को इस जंग में लगातार शामिल रखा और अपने जस्बे में कमी न आने दी, यह देखना सबसे महत्वपूर्ण है। इस आलेख में कई ऐसी महिलाओं के भी जिक्र हैं, जिन्हें इतिहास में बहुत देर से शामिल किया गया, जिनमें दलित महिलाएँ और तवायफें प्रमुख हैं पर जब उनका जिक्र आया तो उसने इतिहास के ऊपर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया कि ऐसा क्यों हुआ कि आजादी के आंदोलन में सहभागिता करने वाले बड़े तबके के अनुभव और संघर्षों को इतिहास में जगह नहीं मिल पाई। क्या इसमें ज्ञान की सत्ता पर नियंत्रण का मामला छिपा हुआ है?

आजादी के आंदोलन के प्रारंभ की चर्चा में सन 1857 से ही करना चाहूँगी। इस दौर में राजा, नवाब, जागीरदार के संघर्ष तो हमें मुख्यधारा का साहित्य देता है, लेकिन किसान, दलित, आदिवासी, महिलाओं आदि के संघर्ष उत्तर आधुनिक विमर्श, निम्नवर्गीय प्रसंगों, महिला अध्ययन आदि के माध्यम से ही हमें मिल पाए। यह सत्य है कि इन लोगों का दस्तावेजीकरण प्रारंभ में ही कई ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने संस्मरणों, डायरियों में किया था। पर हमारे इतिहास का हिस्सा बनने में इसे समय लगा और यह दलित आंदोलन, महिला आंदोलन के बाद इस तबके में आई जागरूकता के बाद ही संभव हो पाया। इन्हीं के प्रयासों से विभिन्न क्षेत्रों में दलितों और महिलाओं की अदृश्य भूमिकाओं को एक दृश्यता मिल पाई। लेकिन आजादी की जंग में शामिल हाशिए के उस तबके ने शायद ही कभी सोचा होगा कि उसके प्रयासों को कोई दृश्यता मिलेगी ही नहीं। इतिहास में गुम ऐसे नामों को जब हाशिए की वैचारिकी में रुचि लेने वाले इतिहासकार सामने लेकर आए तो एक नए ही इतिहास का सूत्रपात हुआ। कई मिथक बने तो कई टूटे भी। आजादी का यह नया इतिहास समग्र ज्ञान की दिशा की तरफ बढ़ा, तमाम खंडित जानकारियों को साथ जोड़ते हुए और यह सिलसिला आगे भी सक्रिय है।

1857 के संघर्ष में लक्ष्मीबाई के कौशल से हम बचपन से ही परिचित हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता "बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी" आज भी लोगों के दिलों पर राज करती है। रानी की वीरता हमारे बीच भी देश भक्ति और बहादुरी का भाव पैदा करती है। लेकिन एक नाम और है जो कि दलित आंदोलन के विकास के बाद उभरा। इतिहास में वह नाम दर्ज था पर उस पर दृष्टि नहीं डाली गई थी। यह नाम था रानी की सेविका झलकारीबाई का। झलकारीबाई रानी के एक साधारण सैनिक पूरन कोरी की पत्नी थीं। अपने पति से उन्होंने मल्लयुद्ध, घुड़सवारी, तलवार चलाना, बंदूक चलाने आदि का प्रशिक्षण लिया था। वह अपने पति के साथ कपड़े बुनने में मदद करती थी या महल में जाकर छोटे मोटे कामों में सहयोग करती थीं। कहा जाता है कि उनका शरीर और चेहरा रानी झाँसी से बहुत मिलता जुलता था। धीरे-धीरे वह रानी की मित्र बन गईं और रानी ने झलकारी की बहादुरी से प्रभावित होकर महिला सैनिकों के दल "दुर्गादल" की जिम्मेदारी झलकारीबाई को सौंप दी। झलकारी ने भी अंग्रेजों के खिलाफ रानी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी। युद्ध में उसके पति की मौत का समाचार सुनने के बाद वह और भी ज्यादा आक्रामकता से लड़ी। युद्ध में उनके कई गोलियाँ लगीं और झलकारी वीरगति को प्राप्त हुईं। यह भी कहा जाता है कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, और काफी समय बाद छोड़ दिया गया (गुप्ता, 2008)। चारु गुप्ता अपने आलेख में कई कविताओं, लेख पैंफलेट, पुस्तकों आदि का जिक्र करती हैं, जिसमें झलकारीबाई की वीरता का जिक्र है कि किस प्रकार उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया। अन्य दलित वीरांगनाओं में ऊदादेवी नामक पासी महिला का नाम आता है। लखनऊ में ब्रिटिश सेना को बड़ी टक्कर ऊदा देवी ने दी थी। जब लखनऊ पर आक्रमण हुआ तो वे सिकंदरबाग में मर्दाना वेश धारणकर पीपल के एक पेड़ पर चढ गईं और पत्तों में छिपकर वहीं से गोलियों से निशाना लगाती रहीं। इस तरह उन्होंने दसियों सिपाहियों को ढेर कर दिया। एक सिपाही की नजर उस पेड़ से आती गोलियों की बौछार पर पड़ गई और उसने तुरंत ऊदा देवी को गोलियों से छलनी कर दिया। जब नीचे गिरी लाश को देखा गया तो पता चला कि वह कोई महिला थी। जंग में ऊदा देवी की वीरता को देख कर अंग्रेज अधिकारी उनके प्रति नतमस्तक हो गए। (गुप्ता, 2008, पृ. 201)। एक और बहादुर वीरांगना थीं, महावीरी देवी जो कि भंगी जाति से थीं। वे मुजफ्फरनगर के मूंडभर गाँव की रहने वाली थीं। महावीरी देवी ने महिलाओं और बच्चों का एक संगठन बनाया था। जब मुजफ्फरनगर में ब्रिटिश हमला हुआ तो महावीरी देवी अपने संगठन की बाईस महिलाओं को लेकर युद्ध में सहभागिता हेतु निकल पड़ीं। युद्ध में सारी महिलाओं की मौत हो गई। मुजफ्फरनगर की ही आशा देवी गूजर को विद्रोह के जुर्म में फाँसी दे दी गई। (मिश्र, 2009)। दलित महिलाओं में वाल्मीकी देवी, रहीमी गुर्जर, भगवती देवी, कौशल देवी, हबीब गुर्जरी, सहेजा वाल्मीकि आदि अनगिनत दलित महिलाओं के योगदान को प्रकाश में लाया गया है। इनमें हिंदू मुस्लिम दोनों ही महिलाएँ शामिल थीं।

इसी दौर में बेगम हजरतमहल का नाम बहुत प्रमुखता से लिया जाता है। बेगम हजरतमहल नवाब वाजिद अली शाह की बेगम थीं, जब वाजिद अलीशाह को अय्याश करार कर लखनऊ से कलकत्ता के मटिया बुर्ज भेज दिया गया, तब बेगम हजरतमहल ने ही अपनी पूरी ताकत लगाकर ब्रिटिश आर्मी को लखनऊ पहुँचने से रोकने का प्रयास किया। अपने साध्य में उन्होंने अपने साधन की पवित्रता का भी पूरा खयाल रखा। जब अंग्रेजों के हमले से त्रस्त लोगों ने अंग्रेज बंदियों खासतौर पर महिला बंदियों की माँग की, ताकि अपने साथियों के साथ हुए दुर्व्यवहार का बदला उन बंदियों से लिया जा सके, तो रानी ने इसकी अनुमति नहीं दी। अपने जनानखाने में उन्होंने ब्रिटिश महिलाओं की सुरक्षा की। वे किसी भी स्थिति में किसी नारी का अपमान नहीं चाहती थीं। अंतिम सामर्थ्य तक उन्होंने सेना का संचालन करते हुए युद्ध किया और जब अपनी हार को पास पाया तो वे शरण के लिए नेपाल चली गईं। बेगम के नेपाल पहुँचने तक उनके पीछे आ रही ब्रिटिश सेना को रोकने रखने का काम किया तुलसीपुर की रानी राजेश्वरी ने। रानी राजेश्वरी के पति को पहले ही कैद किया जा चुका था। लड़ाई छिड़ने पर रानी ने अंतिम साँस तक युद्ध लड़ा और आत्मसमर्पण नहीं किया। राजेश्वरी की वीरता ने ही बेगम को नेपाल तक पहुँचने का समय दिलाया। नेपाल में बेगम ने बहुत अभावों में अपना जीवन जिया पर आत्मसमर्पण या कोई समझौता नहीं किया। रानी राजेश्वरी उस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुईं। इसी प्रकार नानासाहेब की बेटी मैनावती को भी ब्रिटिश शासन से माफी न माँगने पर जलती आग में फेंक दिया गया (मिश्र, 2009, पृ. 257)। ऐसे ही अनेकों विद्रोह में शामिल महिलाओं के जिक्र ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेजों में मिलते हैं।

बेगमों, दलित महिलाओं के साथ एक और तबका है, जिसके संघर्षों का भी अविस्मरणीय इतिहास हमारे सामने मौजूद है। डॉ. लता सिंह अपने आलेख हाशिए का दृश्य में आनारू अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह और तवायफें में अजीजुननिसा नामक तवायफ के माध्यम से 1857 की जंग में तवायफों की भागीदारी पर विस्तार से चर्चा करती हैं। वे बताती हैं कि अजीजुन के घर विद्रोहियों की बैठक हुआ करती थीं। अजीजुन ने औरतों का एक दल भी बनाया था। जो हथियारबंद सिपाहियों के साथ घूम-घूमकर युद्ध में घायल होने पर ऊनकी मरहम-पट्टी किया करता था और उनके बीच हथियार और गोला-बारूद बाँटता था तवायफों का विद्रोहियों को शरण देना और उन्हें वित्तीय सहायता पहुँचाना, इतना जोर-शोर से जारी था कि ब्रिटिश हुक्मरानों को तवायफों की संपत्ति को जब्त कराना पड़ा ताकि वे किसी प्रकार के वित्तीय सहयोग की स्थिति में ना रहें। उनके घरों को लुटवा दिया गया (सिंह, 2009)। ब्रिटिश सैनिकों के बीच तेजी से फैल रहे यौन रोगों की जिम्मेदारी भी तवायफों पर डाल कर उन्हें यौन कर्मी की श्रेणी में खड़ा कर शहर से खदेड़ दिया गया। चौक बाजारों की उनकी पूरी संपत्ति छीन ली गई। तवायफें शिक्षित और संपन्न होने के साथ साथ राजनैतिक समझ का बेहतर ज्ञान भी रखती थीं। नवाबों से सत्ता हड़पने के लिए जिस तरह तवायफों को अपमानित कर उन्हें मुहरा बनाया गया, उसने उनकी सांस्कृतिक सत्ता और सम्मान को बहुत गहरी ठेस पहुँचाई और उनके भीतर इस ब्रिटिश सत्ता के प्रति गहरे विरोध की भावना पैदा हो गई। तवायफों का यह विरोध स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आंदोलन तक चला। इस आंदोलन में सहभागिता करने एवं आर्थिक सहयोग देने हेतु जब तवायफों ने गांधी जी से आग्रह किया तो उन्होंने तवायफों के नैतिक रूप से पतित होने की बात कह कर उनके इस आग्रह को ठुकरा दिया। जब तवायफों ने यह बात सुनी तो उन्हें बहुत दुख पहुँचा। बहुत सारी तवायफों ने अपने नाचने गाने का काम बंद कर दिया। तमाम तवायफों ने अपने तानपुरे, तबले, सारंगी आदि बनारस में गंगा नदी में बहा दिए और अपने घर में चर्खा कातना शुरू किया (देवन, 2006)। यह निर्णय बहुत बड़ा था क्योंकि वे अपना आर्थिक आधार छोड़ रही थीं और उनके पास रोजी रोटी के दूसरे विकल्प नहीं थे। कई सारी तवायफों ने यह भी निर्णय लिया कि वे जब भी किसी महफिल में गाएँगी, तो सिर्फ देशभक्ति के गीत ही गाएँगी, श्रंगारिक गीत नहीं। इस प्रकार उन्होंने आजादी की लड़ाई में अपनी भागीदारी दी।

गांधी के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी ने संविधान के भीतर स्त्री पुरुषों के बीच समानता का बड़ा आधार तैयार किया। कस्तूरबा, सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, सरला देवी चौधरानी, दुर्गा भाभी, कमला देवी चट्टोपाध्याय, हंसा मेहता, दुर्गाबाई देशमुख, लाडो रानी जुत्शी, कमला नेहरू, अवंतिका बाई गोखले, पार्वती बाई आदि अनगिनत नाम महिलाओं की सहभागिता के बड़े प्रमाण रहे हैं। गांधीवादी आंदोलन के अतिरिक्त हथियार बंद आंदोलन में भी भगत सिंह की भाभी दुर्गा भाभी, बीना दास, शांति घोष, सुनिति चौधरी, प्रीतिलता वाडेदार आदि की भागीदारी रही। इसी कड़ी में रानी झाँसी रेजीमेंट की सिपाही और उनकी कमांडर कैप्टन लक्ष्मी का योगदान भुलाना असंभव है। सुभाष चंद्र बोस द्वारा महिला सैनिकों का बनाया दल रानी झाँसी रेजीमेंट देश से बाहर रहकर देश कि ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए सक्रिय रहा।

गांधी के अहिंसक आंदोलन या हथियार बंद आंदोलन, की समर्थक महिलाओं की स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी इतनी आसान नहीं थी। घर से बाहर निकल कर धरनों में शामिल होना, सड़कों पर नारे लगाना, जेल जाना, हथियार पहुँचाना, जंगलों में छिपाकर रहना उनकी पारंपरिक भूमिकाओं से बिल्कुल अलग था। पर्दे में रहने वाली महिलाएँ पर्दे से बाहर आ रही थी। राजनैतिक चेतना से लैस कुछ परिवारों को छोड दिया जाए, तो बाकी परिवार महिलाओं की भागीदारी को लेकर बहुत असमंजस में थे, या अपने परिवार की महिलाओं को राजनैतिक भूमिकाओं में स्वीकारना ही नहीं चाहते थे। मनमोहिनी सहगल ने जेल में उनकी माँ के साथ बंद सत्याग्रही स्त्री की घटना को याद करते हुए बताया कि उस स्त्री के क्लर्क पति ने जब सुना कि उसकी पत्नी जेल में बंद है, तो उसने अपने पत्नी के पास संदेश भिजवाया कि अब उसे घर वापस लौटने की जरूरत नहीं हैं। उसका कहना था कि अब उसकी पत्नी ने जेल जाने से पूर्व उससे इजाजत नहीं माँगी थी। वह तब जेल गई जब उसका पति ऑफिस में था (कुमार, 2009, पृ. 171)। उसी तरह कमला देवी चट्टोपाध्याय की सहेली के पति मिर्जा इस्माइल कमला देवी पर बहुत नाराज हुए। वे अपनी पत्नी की राजनीति सक्रियता को घर के लिए खतरा मान रहे थे। उनका मानना था कि कमला देवी के देश की आजादी और महिलाओं की आजादी के सवाल उनकी पत्नी को मनमाने व्यवहार हेतु प्रेरित कर रहे हैं। अतः कमला देवी को अब मिर्जा इस्माइल के घर नहीं आना चाहिए (कुमार, 2009)।

परिवारिक, सामाजिक दिक्कतों के बाद भी आजादी की आजादी में महिलाओं की सहभागिता कम नहीं हुई, बल्कि बढ़़ती गई। इस संदर्भ में उत्तर-पूर्व की रानी गिडयालू की बात किए बगैर महिलाओं की सहभागिता की बात अधूरी ही रहेगी। नागालैंड के उत्तरी कछार में रहने वाली रानी गिडयालू 13 वर्ष की आयु में ही स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बन गई। रानी गिडयालू के चचेरे भाई जोडयांग मणिपुर के ग्रामीणों को सत्याग्रह में शामिल करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उन्हें गिरफ्तार कर फाँसी पर लटका दिया गया। जोडयांग की मौत के बाद गिडयालू ने आंदोलन अपने हाथ में ले लिया और "नो टैक्स" अभियान छेडा। इस पर अंग्रेजों ने उनके गाँव के सारे हथियार जब्त कर सामूहिक जुर्माना लगा दिया। जिससे आंदोलन तेज हो गया। गिडयालू को बहुत श्रम के बाद पकड़ा गया और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उनकी मृत्यु भी गुमनामी में हुई। रानी गिडयालू आजादी की जंग में उत्तर-पूर्व की महिलाओं के सक्रिय सहभागिता की प्रतीक हैं। आजादी की जंग में बहन सत्यवती का जिक्र भी काफी रोचक और प्रभावशाली है। चंद्रगुप्त विद्यालंकार रानी सत्यवती के संस्मरणों के माध्यम से आजादी की इन योद्धाओं के व्यक्तित्व की मजबूती और आजादी के अदम्य इच्छा शक्ति को भी बताते हैं। सन 1932 के आंदोलन में अपनी 11 दिन की बच्ची को लेकर बहन सत्यवती जेल चली गईं, जबकी उनका स्वास्थ्य इस बात की इजाजत उन्हें नहीं देता था। इस संतान का लालन-पालन जेल में ही हुआ। जेल से बाहर आकर भी वे जुनून की हद तक मजदूर, तांगेवालों, झिल्लीवालों को संगठित करने का काम करती थी। उन्हें अपने खाने-पीने तक की भी सुधि नहीं रहती थी। पंद्रह वर्षों में बहन सत्यवती 11 बार जेल गईं। लाहौर जेल में उनके नेतृत्व में महिलाओं ने 9 अक्टूबर 1942 को ही जेल के मुख्य फाटक पर तिरंगा फहरा दिया। इस घटना पर लाहौर में बंद तमाम लड़कियों को बहुत ज्यादा हिंसा का सामना करना पड़ा। सत्यवती बहन को लाहौर से दूर अंबाला की सीलन भरी कोठरी की जेल में बंद कर दिया। जहाँ उन्हें तपेदिक हो गई। जब वे जेल में बंद थी, उनकी एक मात्र प्रिय पुत्री मुन्ना की मौत की सूचना उन्हें बहुत रहस्यमय तरीके से प्राप्त हुई, उस समय उनके स्वास्थ्य की हालत बेहद गंभीर थी। बेटी के मौत के खबर सुन वे तड़पती रहीं। वे उसे अंतिम समय में देख भी न सकीं। ना किसी परिवार वाले के साथ उसका शोक मना सकीं। लेकिन उनकी जीवटता कम नहीं हुई। वे बीमारी की हालत में भी जन-सभाओं को संबोधित करती रहीं। बीमारी की हालत में ही उनकी 11वीं और अंतिम गिरफ्तारी हुई। उन्हें रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर स्ट्रेचर से सीधे अस्पताल ले जाया गया। कुछ ही दिनों बाद बीमारी के बहुत ज्यादा बढ़ जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई (विद्यालंकार, 2006)। बहन सत्यवती तो एक उदाहरण हैं ऐसी तमाम महिलाओं का जिन्होंने अपना जीवन, अपना परिवार, अपने बच्चे सब इस आजादी के हवन में स्वाहा कर दिया तब जाकर हमें आजादी की साँस मिल पाई है। कितने लोगों का कर्ज है हमारे ऊपर और इस आजादी को सँभालने की कितनी बडी जिम्मेदारी है, हमारे ऊपर। 1857 से 1947 तक के 90 वर्ष के इस लंबे और सतत संघर्ष में खास से लेकर आम तक ढेरों महिलाओं ने अपनी कुर्बानी दी है। कुछ के नाम पता हैं, कुछ के नाम इतिहास में ही दफन हो गए या कर दिए गए। पर धीरे धीरे इनके नाम सामने आने पर हमें स्वाधीनता आंदोलन का एक अलग ही चेहरा देखने को मिल रहा है, जो देश की आजादी में संघर्षरत हाशिए के तबके के प्रयासों को जानने का और उन पर गर्व करने का मौका हमें देता है। ये क्रांतिकारी आजादी की नींव के वे पत्थर हैं, जो कहीं अँधेरों में दबे तब हमें रौशनी के कंगूरे मिल पाए। जब भी हम आजादी के संघर्ष को याद करेंगे इन तमाम महिलाओं की बातें हमारे माथे को गौरव से ऊँचा कर देंगी।

संदर्भ

चंद्रगुप्त विद्यालंकार। (2006)। शहीद बहन सत्यवती।

सुधा सिंह, जगदीश्वर चतुर्वेदी, स्वाधीनता संग्राम, हिंदी प्रेस और स्त्री का वैकल्पिक क्षेत्र। (नई दिल्ली, अनामिका)

चारु गुप्ता। (2008)। दलित वीरांगना एंड रिइनवेंशन ऑफ 1857। 1857 रूएसेज फ्रॉम इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली (पृ. 201) में। (हैदराबाद, ओरिएंट लोंग्मैन)

डॉ. लता सिंह। (2009)। हाशिए का दृश्य में आनारूसन 1857 का विद्रोह और तवायफें।

रेखा अवस्थी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह। 1857 बगावत का दौर (पृ. 271)। (नई दिल्ली, ग्रंथ शिल्पी)

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वंदना मिश्र। (2009)। महिलाओं की भूमिका।

रेखा अवस्थी मुरली मनोहर प्रसाद सिंह। 1857 बगावत के दौर का इतिहास (पृ. 258)। (नई दिल्ली, ग्रंथशिल्पी)

सबा देवन (निर्देशक)। (2006)। द अदर सांग। (चलचित्र)


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