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कविता

समय
मनीषा जैन


सड़कों पर चींटियों से
बेशुमार आदमी
सब चुप्प
अपने में गुम
कोई नहीं बोलता किसी से
सारे हैं बेदम, भौचके, घबराए से

कोई नहीं खोलता स्वयं को
सभी चले जा रहे हैं / पता नहीं कहाँ ?
समय चलता हुआ तेजी से
ठेलता हुआ आदमी को
फिर आदमी चला जाता है पता नहीं कहाँ ?

कहते हैं समय भाग रहा है
लेकिन समय नहीं आदमी भाग रहा है
न समय रुकता है न ही आदमी
बस रुक जाती है नियति
फिर इनसान देखता रह जाता है
और समय निकल जाता है दूर
हाथ खाली 
खेल खत्म।
 


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