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कविता

अस्तित्व
मनीषा जैन


झूठ कहते हो तुम
कि स्त्रियाँ डर गई तुमसे
तुम्हारी ही इज्जत की खातिर
छोड़ दिया हमने सपने देखना

हमने टाँग दी अपनी इच्छाएँ
किसी बूढ़े बरगद पर
ताकि बरगद की जटाओं की तरह
बढ़ते रहें सपने तुम्हारें
और मरती रहें आकांक्षाएँ हमारी

लेकिन तुम कब बरगद बनोगे?
क्या यह झूठ था?
कि तुम अपनी छाया में पोषित करोगें हमें
तुम तो कोई भी वचन पूरा न कर सके
हमसें वचन की उम्मीद लगा बैठे हो तुम

सात फेरों की अग्नि में
स्वाहा क्यों नहीं कर देते
तुम अपने पुरुष रूपी अहं को
कब तक पालोगे अपने अहं को
आस्तीन के साँप की तरह
 
हम तो हमेशा ही देते रहे
सिर्फ तुम्हारी इज्जत की खातिर
बलि अपने अस्तित्व की।
 


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