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कविता

क्या तुम भूल पाओगे
मनीषा जैन


तुम थक कर आए हो घर
क्या तुम उस स्त्री को भूल पाओगे?
जो अपने हाथों से सजाती है
तुम्हारे सपनीले घर

क्या तुम्हारी आँखें
उसे ढूँढ़ती हैं
जो बिछाती थी पलकें
तुम्हारे इंतजार में

क्या तुमने कभी उन आँखों में झाँका
जिनमें तुम्हारी ही तसवीर बसती है

तुम यह देख कर हैरान हो जाओगे
वह स्त्री जब भी आईना देखती थी
तुम ही नजर आते हो आईने में उसे
अब जब तुम थक कर घर आओगे
फिर उसे ना पाओगे
तब तुम क्या उसे कभी भूल पाओगे।
 


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