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संस्मरण

मैं जिन अशोक जी को जानती थी
शर्मिला बोहरा जालान


मैं एक छोटे से शहर की संकोची, अपने में सिमटी एक ऐसी लड़की थी जिसकी दुनिया घर-परिवार और कुछ सहेलियों तक फैली हुई थी। जो कोलकाता महानगर को अपना नहीं पा रही थी। अपनी नासमझ और मासूम नजरों से दुनिया को देखती हुईं, अविकसित और लंपट संसार से सँभलती हुई कच्ची पगडंडी पर उस समय लिखी गई अपनी एकमात्र कहानी को लेकर चल रही थी कि अशोक जी मिले। वे उस कहानी के पाठक बने। वैसे उस कहानी को पहले भी दो विदुषी पाठक मिल चुके थे, पर अशोक जी की बात कुछ अलग थी। बोले - अच्छी कहानी है, एक बार फिर लिखना चाहिए। सोचिए। फिर उन्होंने कुछ बातें पूछनी शुरू कर दी। एक के बाद एक बातों के तार निकलते ही गए और उस पहली मुलाकात में ही वह ताड़ गए कि मेरे मन में एक बहुत बडा 'गुबार' है। अपने सख्त ब कठोर स्वभाव के पिता के प्रति। वे पिताजी की बात खोद-खोदकर पूछने लगे और जान-समझ गए कि मेरा मन क्यों और किन कारणों से भारी रहता है। इस प्रक्रिया में मैं उनसे खुल गई। मैं उनसे बार-बार मिलने लगी। वे हर बात गंभीरता से सुनते, कहते 'हाँ', विस्मय उनकी आँखों में बना रहता। वे टकटकी बाँधकर देखते जाते मानों कहीं और देख रहे हों। उनका मामूली बातों को ध्यान से सुनना, उस पर संवाद करना मुझे आश्वस्त करता कि जो भी कहती हूँ वह सब निर्रथक बातें नहीं हैं। उनसे कथा बुनी जा सकती है। सो उन दिनों मैंने जोश और उत्साह में कई कहानियाँ लिख डाली। मैं टुइयाँ सी एक लड़की नन्हीं लेखिका बन बैठी; और मेरा साहस तो देखिए मैंने पूरा का पूरा एक साबुत उपन्यास भी लिख डाला।

गर्मी की दोपहर उन दिनों कहानी उपन्यास के 'पाठ' में बीतती। वे चाय पीते, सिगरेट सुलगाते कहते - सुनाओ। एकाग्र होकर सुनते, बहुत सोचकर प्रतिक्रिया देते। बीच-बीच में शौचालय चले जाते और कुछ सोचते हुए निकलते। कभी किसी कहानी का दो-तीन शीर्षक सुझाते, कभी कहानी के किसी भाग और शब्द से जुड़ी अन्य कई कहानियाँ और प्रसंग सुनाते। कहानी पर भरपूर चर्चा होती। कहानी से 'इतर' जो चर्चाएँ होती उनको सँजोकर रखने के संस्कार अगर मुझमें होते तो सच मानिए आपको पता चलता कि वे कितनी दिलचस्प, ज्ञानवर्द्धक, प्रेरणादायक और उत्साहपूर्ण हुआ करतीं। उनमें से कथा-कहानी-उपन्यास लिखने के कई विधि-प्रविधि भी खोज निकाली जा सकती थीं।

वे कहानी को कई बार लिखने को कहते कि दम निकल जाता। जीवन-जगत की देर सारी बातें होतीं। बहुत मन लगता। सारी गाँठें खुल जातीं। हम बच्चे बन जाते। बहुत मजा भी आता। जब तब किसी की आलोचना भी करते पर यह निंदा या परनिंदा में रस लेने जैसा नहीं होता। यह कुछ दूसरी तरह का होता जिसमें अशोक जी का यह भाव रहता कि जिस इनसान की हम आलोचना कर रहे हैं वह अविकसित और मूर्ख इसलिए है कि उसे सुसंस्कृत अभिभावक, संस्कार और पृष्ठभूमि नहीं मिली। मैंने बुद्ध को नहीं देखा, पर जो पढ़ा, सुना बुद्ध करुणा शब्द के पर्याय थे। शायद अशोक जी भी कुछ-कुछ बुद्ध की ही तरह के थे।

मैं जब भी उनके पास जाती या तो कोई अखबार पढ़ रहे होते या फिर किसी को पत्र लिख रहे होते। एक शब्द को लेकर शब्दकोश खंगाल डालते। या दुनिया जब अपने में व्यस्त होती - महिलाएँ अपनी गृहस्थी में, पुरुष दफ्तर में, बच्चे स्कूल, कॉलेज में, अशोक जी गंभीरता से कुछ लिखते-पढ़ते दिखाई पड़ते। क्या वे ऊबते नहीं थे? कहाँ से रस खींचते थे? कई बार वे कहते लेखक बोर नहीं होता। यह पूरे समय का आक्यूपेशन है। मैंने जहाँ तक मुझे याद है कभी उन्हें ऊबते नहीं देखा। मैं उनके कई मित्रों को जानती हूँ जो अशोक जी की उम्र में आकर नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों से निवृत्त हो अकेलापन महसूस करने लगे थे। किसी से बात, संवाद करें - यह कमी महसूस करने लगे थे पर अशोक जी के साथ ऐसा कुछ होता था मुझे तो नहीं लगता। हर समय उनको लिखते-पढ़ते हुए देखकर में विनोद में कहती - आप क्या एम.बी.ए. की तैयारी कर रहे हैं? वे सुनकर कोई जवाब नहीं देते, मुस्काते भी तो नहीं थे।

मैं कुछ दिनों के अंतराल के बाद जब उनसे मिलने आती वह पूछते कैसे किस सवारी से आई? गाड़ी बस या टैक्सी? टैक्सी का भाड़ा कितना लग गया? विवाह के बाद शशांक के जन्म के बाद यह पूछते शशांक के स्कूल की फीस कितनी है? बच्चों के कपड़े कितने महँगे हो गए हैं?

पैसों का हिसाब-किताब, पैसों की खोज-खबर खोद-खोदकर लेते। उत्खनन चलता जाता। फिर अपने पाई-पाई का हिसाब जो उनकी उँगलियों पर होता धीरे-धीरे बताते। इस प्रक्रिया में जो बातें घटती वह यह कि मैं स्वयं को 'देखती' कि क्या मेरे पास पाई-पाई का हिसाब है, नहीं है तो क्यों? लापरवाह हूँ क्या? झुँझलाहट होती। खीझ कि अशोक जी यह सब क्यों पूछते हैं? यह क्या 'खटराग' लेकर बैठ गए हैं।

अपराधबोध होता कि पैसे क्यों और कैसे हाथ से यूँ ही उड़ जाते हैं। यह बात भी मन में आती कि जब थोड़े से पैसे ज्यादा खर्च करके सुविधा मिल सकती है तो उन पैसों को बचाकर इतना कष्ट क्यों पाना? जो भी हो अशोक जी द्वारा छेड़ा गया यह राग बहुत देर तक बजता रहता। मन में कई प्रश्न पैदा कस्ता...। उनको लेकर सोचती कि अशोक जी का हाथ किसी को उपहार देने में या किसी को नगद रुपये देकर मदद करने में जितना खुला हुआ है अपने मामले में उतना ही तंग और कसा हुआ क्यों?

अशोक जी के साथ में कलकत्ते में कई जगहों पर गई थी। रासबिहारी में स्थित 'मैलोडी' नामक कैसेटों की पुरानी दुकान में 'तसलीमा नसरीन' 'गोल्लाछूट' कैसेट का लोकार्पण करने आई थीं। हमने तसलीमा को दूर से देखा फिर पास से भी देखा। मैं अशोक जी और मनोरंजन व्यापारी वहाँ गए थे। हमने तसलीमा के हस्ताक्षर कैसेट के मलाट (आवरण) पर लिए और 16 लार्ड सिन्हा लौटकर चर्चा भी की।

हम श्री शिक्षायतन में गौरी अयूब के शोक सभा में गए थे। चित्रकार, कलाकार, कोलाज कलाकार पनेसरजी से मिलने गए थे। 'सौगल' नामक पुस्तकों की दुकान में उनके एक कवि मित्र के साथ गई थी। नंदन फिल्मोत्सव में कई फिल्में उनके साथ देखी। कोलकाता पुस्तक मेले में जब 'आलोआंधारि' निकली थी तब भी मैं उनके साथ थी।

'आकृति आर्ट गैलरी में रामकुमार की प्रदर्शनी देखने हम साथ-साथ गए थे। यह सूची लंबी है पर कहना यह चाहती उनकी संगति में लोगों से मिलना, उनको देखना, सुनना कुछ अलग तरह का अनुभव होता।

मैंने अशोक जी की सत्संगति की। मैं लेखिका हूँ या नहीं इस बात का मुझे ठीक से इल्म नहीं है पर यह उनका आशीर्वाद है कि मेरे पिता के प्रति मुझमें 'समझ' पैदा हुई।

मेरे पिताजी जब अशोक जी से मिले उनके 'मुरीद' हो गए। और यह ईश्वर का आशीर्वाद है कि वर्ष में दो-चार बार उनसे मिलने उनके पास जाने लगे। जिन दिनों अशोक जी अस्पताल में थे वे उन्हें देखने गए। उनके निधन की खबर सुनकर फूट-फूट कर रोए और उनकी अर्थी को कंधा ही नहीं दिया उनके पार्थिव शरीर के साथ श्मशान-घाट भी गए।

2014 वर्ष कैसा साल रहा! इसी साल 24 मार्च को 61 वर्ष की उम्र में मेरी माँ का निधन हो गया। और वर्ष के अंत में अशोक जी नहीं रहे। दोनों ही मेरे रोएँ-रोएँ में तन-मन-प्राण में समाए हुए हैं। माँ ने जीवन दिया तो अशोक जी ने समझ और संस्कार। उनके जाने के बाद जीवन क्या उसी गति से ही नहीं चल रहा पर कुछ तो बदल ही गया है।

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अशोक जी के जाने के बाद 20-25 वर्षों तक जिस रास्ते पर उनसे मिलने जाती रही वह 11 लार्ड सिन्हा रोड बहुत याद आता है। ऐसा नहीं है कि उस रास्ते पर सिर्फ उनसे मिलने ही जाती थी, वहाँ मेरा स्कूल व कॉलेज श्री शिक्षायतन भी है। जहाँ मैंने अध्ययन और अध्यापन भी किया है। स्कूल और कॉलेज के दिनों की मधुर यादें हैं पर पता नहीं क्यों लार्ड सिन्हा रोड तो अशोक जी के संदर्भ में ज्यादा याद आता है।

जब मैं उनसे मिली, पाया सभी उन्हें अशोक जी कहकर बुलाते हैं। सो मैं भी उन्हें अशोक 'जी' बुलाने लगी। वैसे मुझे अटपटा लगता रहा सोचती इतने बड़े हैं मुझसे। उमर में बड़ों का नाम नहीं लेना चाहिए घर परिवार में यह सुन रखा है, अशोभनीय लगता है। मैं उन्हें उनके नाम से ही सिर्फ 'जी' लगाकर संबोधित करती रही। हाँ कोशिश यह रहती कि जितना कम नाम ले सकूँ अच्छा हो।

कोई उनका पाँव छुए तो वे असहज हो जाते थे। प्रणाम करने की यह रीत भी वहाँ नहीं चलती। शायद शुरू के कुछ वर्षों में हाथ जोड़कर प्रणाम किया हो पर बाद में तो बस यूँ ही मिली रही। तो बात वहाँ से शुरू हुई थी कि लार्ड सिन्हा रोड बहुत याद आता है। उस रास्ते का अर्थ मेरे लिए बदल गया है।

पच्चीस वर्ष पहले के लार्ड सिन्हा रोड को याद करूँ तो आज की तुलना में वह लार्ड सिन्हा रोड भी तो बहुत बदल गया है। उन दिनों वहाँ गिनी चुनी दुकानें हुआ करती थीं। लार्ड सिन्हा रोड व ए.जी.सी. बोस रोड के कोने पर 'कैतलीन' केक की दुकान नई-नई खुली थी। उससे थोड़ा आगे बढ़ने पर 'विजय लक्ष्मी' मोदी दुकान का आधुनिक संस्करण था। चमकती आकर्षित करती वातानुकुलित राशन की दुकान जहाँ तेल व आटे की, गंध नहीं उठती थी। उससे सटकर 'गोगुल' मिठाई की दुकान।

लार्ड सिन्हा रोड के दूसरे छोर पर नटराज बिल्डिंग के सामने मायाराम पावभाजी वाला हुआ करता था। जिसका आधुनिक संस्करण आज भी वहाँ है, पर वह पुराना स्वाद नहीं रहा। उन दिनों वहाँ गोयनका सुपस का इमामी मार्केट (स्टार मार्क) नहीं था, ना ही उसके नीचे जलपान गृह रिद्धि-सिद्धि थी। और कहाँ थी पूरे साल 'सेल' का बोर्ड लगाए 'गा गा' नामक जूते चप्पलों की सम्मोहित करती दुकान। आज उस नुककड़ पर लोगों का जितना जमावड़ा दिखाई पड़ता है उन दिनों उतना नहीं था।

अशोक जी 16 लार्ड सिन्हा रोड में बहुत ही साधारण दिखने वाले असाधारण कमरे में रहा करते थे। एक अनोखी दुनिया थी वह। तरह-तरह के लोग वहाँ आया करते थे। मैं कैमेक स्ट्रीट में रहती थी और प्रिटोरिया स्ट्रीट से निकल एक चोर रास्ता पकड़ उनके घर तुरंत पहुँच जाती। अशोक जी से हुई कुछ मुलाकातों में मैं यह समझ गई कि उन्हें कलकत्ते की सभी गलियों-सड़कों का नाम ठिकाना मालूम है। चप्पे-चप्पे की खबर है कि किसके बाद किसका मकान है और किसके बाद फलाँ की दुकान है वगैरह...। इसी प्रसंग में एक बात कहूँगी कि वह एक घटना अक्सर दुहराते - एक बार निर्मल वर्मा के साथ पार्क स्ट्रीट पर चल रहे थे निर्मल वर्मा ने साड़ियों की एक के बाद एक कई दुकानों को देख कर उनसे पूछा था कि इन सभी का नाम 'स' से क्यों शुरू होता है - श्रेयांस, सुरुचि, सुचित्रा, सबेरा।

मैं भी रास्ते-घाट का नाम जानती हूँ यह प्रदर्शन करने के लिए कहाँ से किस रास्ते आई एक-एक चीजों के नाम लेने लगती परंतु जैसे ही वह प्रश्न करते अमुक गली के बाद कौन सी दुकान मिली या फलाँ दुकान के पास जो फलाँ लैंडमार्क है वहाँ क्या देखा, मैं धराशायी हो जाती। मैं चीजों पर उड़ती निगाह डालने वाली। वहीं अशोक जी हर चीज को गहराई से देखने समझने वाले। इस प्रक्रिया में पहला संस्कार यही पड़ा कि चीजों को ध्यान से देखो, गंभीरता से उस पर सोचो। चीजों को उसकी पृष्ठभूमि के संदर्भ में परखो, जाँचो। अशोक जी प्रश्न करने के बाद तुरंत कहते चाय पियोगी? हाँ, मैं बनाती हूँ कह मैं उनकी चिर परिचित रसोई की तरफ मुड़ जाती।

अशोक जी के साथ पी ढेर सारी चाय मेरे लिए आजकल के 'कॉफी कैफे डे','केकस', 'पिजाहट्स', 'बरिस्ता' वगैरह में मिलने वाली कॉफी से ज्यादा ताजगी और ऊर्जा देने वाली होती। दिल्ली के एक खास दौरे के कनॉट प्लेस प्लाजा सिनेमा के करीब बीस कदम के शालीमार कैफे से कम नहीं था उस कमरे का आनंद। वह कमरा हमारा शांतिनिकेतन था। खुला खिला कमरा - जीवन जगत की ढेरों चर्चाएँ वहाँ होतीं, कविता, कथा, उपन्यास का पाठ होता।

इस दौरान अकसर मानव मन की चर्चा होती। मनुष्य के अंतर्द्वंद्व, ऊहापोह, दुविधाओं पर कई स्तरों में बातचीत हुआ करती। अशोक जी के साथ बैठकर कई बार लगता था हम रचना की नहीं रचनाकार के, मनुष्य के विकास की बात कर रहे हैं। लेखक लिखते हुए कितना विकसित हुआ, हुआ या नहीं। कई बार यह बात सामने आती कि रचना तो बहुत अच्छी है पर लेखक घटिया है। पर उत्कृष्ट रचना का रचयिता घटिया कैसे रह सकता है? यह प्रश्न निरुत्तर ही रहा जाता।

अशोक जी भाषा जाल को 'गुझिया के बाल' कहा करते थे। कहते लेखन रचनात्मक कार्य है और लेखक का उद्देश्य रचनात्मक होना ही चाहिए। लिखना, आगे बढ़ना, जीवन-जगत को जानना, निरंतर विकसित होना यह लेखन प्रक्रिया का एक अंश है, यह समझाते।

उन्होंने मुझे सबसे पहले जो पुस्तक पढ़ने को दी थी वह थी चेखव की कहानियाँ - दो भाग में। उन दिनों उसे पढ़ा था पर समझना आज भी जारी है। कभी किसी प्रसंग में तो कभी किसी नए संदर्भ में। कहानी का अर्थ नए ढंग से खुलता है मन को आलोकित कर जाता।

उन्होंने टॉलस्टाय, दोस्तोव्यस्की पढ़ने को कहा।

बांग्ला साहित्य में आशापूर्णा देवी, ताराशंकर बंद्योपाध्याय पर बात की।

कई लेखक कवि पत्रकार जो उनके मित्र थे उनकी कोई नई पुस्तक उनके पास भेंटस्वरूप आती वे पढ़ने देते। महेंद्र भल्ला का उपन्यास 'दो देश और तीसरी उदासी' पढ़ने दिया। वहाँ उस कमरे में मनोहर श्याम जोशी पर चर्चा सुनी। विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं पर हम बात करते। मुझे चाँद चाहिए पर हुई बातचीत भी मैंने सुनी।

उनका कमरा उन वर्षों क्या दोपहर क्या शाम नए आगंतुकों से लबालब रहता। कभी सच्चिदानंद सिन्हा आने वाले हैं तो कभी किशन पटनायक। कभी प्रभाकर सिन्हा रुकने वाले हैं तो कभी प्रबोध कुमार श्रीवास्तव। प्रयाग शुक्ल से वहाँ मिली। इन लोगों से यहाँ सिर्फ मिलना भेंट करना नहीं हुआ। पत्र व्यवहार भी हुए। इस बात की समझ हुई कि चिंतक लेखक कवि पत्रकार प्रकाशक मेरे जैसे ही इनसान हैं कोई अजूबा नहीं।

कृष्णा सोबती भारतीय भाषा परिषद में जब कलकत्ता आई थीं, अशोक जी से मिलने 16 लार्ड सिन्हा रोड आईं। उन्हें बहुत पास से देखा। अशोक वाजपेयी के साथ अशोक जी को बात करते सुना। उदयन वाजपेयी बात-बात पर हँस पड़ते। रमेशचंद्र शाह को महीन अक्षरों में पोस्टकार्ड पर पत्र लिखते देखा। ज्योत्स्ना जी से मिलने के बाद 'अ अस्तु का' पढ़ा। शंपा राजुला से मिली।

अशोक जी के कमरे में पद व ओहदे का अंतर नहीं रहता। वे सबसे समान भाव से मिलते। नौकर मालिक का अंतर मिट जाता। अशोक जी के लिए प्रत्येक लोग विभिन्न छोटे बड़े पेशे व्यवसाय से जुड़े, छोटी या बड़ी नौकरी करने वाले, साधारण या अरबपति सभी ऐसे चरित्र थे जो किसी न किसी दुख के 'मारे' हैं। अशोक जी का एकमात्र धर्म यह है कि एक करुण मनोचिकित्सक की तरह सबसे दिल की बात सुने और निदान सुझाएँ।

आज के काउंसलरों की तुलना में वे महान मनोचिकित्सक थे। मनुष्य के मन में किस तरह उतरा जाता है तथा कैसे एक इनसान पर्त दर पर्त स्वयं को किस प्रकार खोलता जाता है यह वही जान सकता है जिसने अशोक जी की संगति की हो। सैकड़ों लोग उनसे अपने मन का इलाज करवाने चले जाते थे। ऐसा यदि कहूँ तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अशोक जी उनका रचनात्मक इलाज करते थे। वे कहते डायरी लिखो, कथा, कविता, रचो, आत्मकथा लिख डालो। वे लिखने की बात करते पुस्तकें पढ़ने के लिए देते। उन्होंने इस प्रक्रिया में कई लेखकों को खोज निकाला। इस तरह उनके कमरे की और उनकी खिड़की के सामने स्थित अरविंद आश्रम की पीली रोशनी में नहाकर कई लोग रोशन हो जाते।

शुरू के कुछ वर्षों में मुझे लगता रहा कि अशोक जी दूसरों के शोक का हरण करते हैं और स्वयं वे शोकरहित हैं, पर यह सच नहीं था। बाद के वर्षों में जब उनके घर में एक पारिवारिक व घरेलू समस्या पैदा हुई तब अशोक जी को उसमें घुलते-मिलते हुए देखा। वे अक्सर डर और आशंकाओं से घिरे रहते। लिखते-पढ़ते रहते कि व्यस्त रहें। यातना से मुक्त हो सकें। छोटी-छोटी ढेरों कविताएँ भी उन्होंने लिखीं।

अंत में एक बात कहूँगी कि साहित्य की दुनिया में प्रवेश मैंने 16 लार्ड सिन्हा रोड के उनके घर में प्रवेश करने पर ही किया। उनसे मिलने से पहले ही कहानी लिखने लगी पर 'समझ' उनसे मिली। इस प्रसंग का अंत एक उद्धरण के द्वारा करने का मन है। ये बातें मनमोहन ठाकौर ने स्व. मदनमोहन अग्रवाल - कलकत्ता के सांस्कृतिक-साहित्यिक क्षेत्र में उन्हें बड़े प्रेम और आदर से सभी स्मरण करते हैं - के लिए (कलकत्ता 1985) पुस्तक की भूमिका में लिखी है पर अशोक जी के लिए भी अंशतः सत्य है।

"कलकत्ता चित्तरंजन एवेन्यू स्थित कॉफी हाउस उनका प्रिय स्थल था। यहाँ उन दिनों सभी साहित्यकार आ जुटते थे और मदन बाबू बड़े उत्साह और उल्लासपूर्वक उन पर कॉफी सिगरेट न्योछावर करते रहते थे। कालक्रम में स्थिति यह बन गई कि प्रत्येक साहित्यकार विश्वास करने लगा था कि औरों की अपेक्षा केवल वही मदन बाबू के सबसे निकट हैं। गुप्त रूप से दी जाने वाली उनकी मौन उदार सहायता हर किसी को मिलती रही।

      तुम एक वृक्ष थे जिसकी डालें, मिट्टी तक झुक आईं थी।
          छाया लेकर, माया लेकर, पच्छिम फूल-पत्तियों के साथ॥*

मदन बाबू एक ऐसे पेड़ थे जो हरा-भरा था, फूल-पत्तियों और पत्तों से लदा, अपने ही बोझ से झुका, जिसकी छाया शीतलता प्रदान करती थी, जिसका अंतर मनुष्यत्व से भरपूर था; जो आदमी को पहले आदमी और बाद में साहित्यकार, कलाकार, बड़ा अफसर या धनपति के रूप में महत्व देता था; जो किसी के लिए कुछ करके किसी स्थूल या सूक्ष्म लाभ की आकांक्षा नहीं करता था; जिसका बायाँ हाथ सचमुच नहीं जानता था कि उसका दायाँ हाथ क्या देता था; जो किसी प्रकार के दंभ या दिखावे को बर्दाश्त नहीं कर पाता था; जो ईमानदारी से हर काम करने में विश्वास रखता था और दूसरों से भी ऐसी ही अपेक्षा रखता था; जो पैसे के फलस्वरूप आ जाने वाले अभिमान के प्रति अत्यंत कटु था; जो पैसे को बाँटकर उसका उपभोग करने का अभ्यासी थी, जो धर्म-कर्म में विश्वास नहीं करता था तथापि आस्थावान था; जो परंपरावादी भी था और आधुनिक भी; जो पढ़ा-लिखा था; जिसे साहित्य कला-संगीत से प्रेम था; जो कभी-कभार स्वयं लिखता भी था; जो व्यापारी था पर जिसका तौर-तरीका एवं मनोवृत्ति व्यापारी नहीं था; जो स्नेहशील था, सहृदय अक्खड़ था; कटु था, जो साथियों के स्वाभिमान को जाग्रत करना जानता था; जिसे तमाचा लगाना भी आता था और सहलाना भी; जो बड़े का भी था और छोटे का भी; जो हमारा आपका सबका अपना था।"

(* कवि श्री अलखनारायण की कुछ पंक्तियाँ : 'कहानी मदन बाबू की' से साभार उद्धृत)


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