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कहानी

एक का पहाड़ा
सुभाष पंत


ये मेरे पिता के अंतिम क्षण थे।

उनकी आवाज का करारापन टूट गया था और ऐसा लगता था, जैसे वह किसी अंधे कुएँ की अतल गहराई नमी और अँधेरे से निकलकर और इन्हें साथ लेकर आ रही है। एकाएक यह समझ पाना मेरे लिए मुश्किल था कि उनकी आवाज थकी हुई है या हारी हुई। उनके चेहरे पर अलबत्ता एक आध्यात्मिक किस्म की उदासी थी, जैसी इससे पहले मैंने कभी नहीं देखी थी। वे अपने अंतिम दिनों में भक्त किस्म के अवश्य हो गए थे, लेकिन आध्यात्मिक वे कतई नहीं थे और इसके अलावा मैंने उन्हें कभी उदास भी नहीं देखा था। उनकी शख़्सियत का सबसे मनोहारी, निर्मल और महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे हँसना जानते थे और कभी उदास नहीं होते थे।

यह उस अगस्त की बात है जब मैं हाई-स्कूल का दरम्याने किस्म का छात्र था और मेरा खयाल है यह चौदह अगस्त थी क्योंकि अगले दिन जिस समय हम पिछली रात बैठी अपनी घर की दीवार की मरम्मत कर रहे थे, जिसमें एक शानदार झरोखा खुल गया था, उस झरोखे से मैंने अपनी सबसे उम्दा पोशाकों में हाथ में कागज के तिरंगे झंडे लिए खरगोश की तरह फुदकते बच्चों को देखा था, जो स्वाधीनता दिवस मनाने के लिए अपनी पाठशाला जा रहे थे। मेरे सिर पर गारे का तसला था और बच्चों के सिरों के ऊपर एक ऐसा आसमान था, जिसमे काले बादल घुमड़ रहे थे।

बहुत तेज तूफान था जिससे दिशाएँ काली पड़ गई थीं। माँ ने तूफान की आशंका से एहतियात के तौर पर घर के सभी जंगलों के पल्लों पर पहले ही साँकलें चढ़ा दी थी। लेकिन ये साँकलें तूफान के पहले ही वार में पस्त होकर लड़खड़ा गई थीं और पल्ले भयाक्रांत चीखते हुए टेक की दीवार पर टकरा रहे थे। तूफान किसी आतताई की तरह जँगलों के रास्ते भीतर घुस गया था और उसने दीवार पर टँगे कैलेंडरों वगैरह को रौंदते हुए कानस पर सजे मिट्टी, भूसे, तार और पेरिस के प्लास्टर से बने खिलौनों के हमारे संसार को धराशायी कर दिया था। ये खिलौने हमने दीर्घ प्रतीक्षाओं और विकल हसरतों से मेलों से खरीदे थे और इनमें से कोई भी दस-बारह आने से ज्यादा कीमत का नहीं था, लेकिन माँ टूट जाने का भय दिखाकर हमें इनसे कभी खेलने नहीं देती थी और मेलों से लाने के तुरंत बाद ये अमूल्य थाती की तरह आकार के हिसाब से कानस पर सजा दिए जाते थे। ऐसे वक्त जब माँ इन्हें हमारे हाथ से छीनकर कानस पर सजाती तब वह हमें बहुत निर्मोही और स्पंदनहीन औरत की तरह लगती। लेकिन जब हमारे घर मेहमान आते, जिनका उन दिनों आना-जाना सहज ढंग से लगा रहता था, और उनकी निगाह खिलौनों पर पड़ती, जो कानस पर सजे होते और जिनके नीचे माँ की धोती से काटकर बनाया और फ्रेल लगा पोश होता तो मुझे लगता कि उनकी निगाह में हमारी हैसियत कुछ बढ़ गई है। मैं माँ के सौंदर्यबोध और उसकी सामाजिक समझ पर मुग्ध हो जाता जिससे मेरे भीतर गर्वीली चमक लहकने लगती...

खिलौने के टूटकर बिखरने की आवाज के साथ माँ दौड़ी हुई आई और हमें जँगलों के पल्ले बंद करने का आदेश देकर खुद भी इस काम में जुट गई। उसे डर था कि तूफान से घर की टिनें उड़ जाएगी, उसका यह डर भावुक नहीं व्यवहारिक था, क्योंकि तूफान के पहले झटके ने भीतर घुसते ही घर की आत्मा को झकझोर दिया था। मैं तब हाई-स्कूल का दरम्याने किस्म का छात्र था और मुझे घर की उज्ज्वल संभावना माना जाता था, जिसकी वजह से मैं घर में विशिष्ट व्यवहार का हकदार हो गया था और मेरी बात को महत्व दिया जाता था। चूँकि मेरे भीतर विज्ञान की थोड़ी-बहुत समझ पैदा हो गई थी इसलिए मैं माँ को समझाना चाहता था कि अगर टिनों पर भीतरी और बाहरी वायुदाब बराबर होगा तो वे अपनी जगह पर टिकी रहेंगी जिसके लिए पल्ले खुले रहने चाहिए। लेकिन माँ इतनी घबराहट भरी हड़बड़ी में पल्ले बंद कर रही थी कि तर्क स्थगित करके मैं भी अपने भाई-बहनों के साथ उसके काम में हाथ बँटाने लगा। दोनों बहनें तब इतनी छोटी, कमजोर, कोमल और मासूम थीं कि उनसे पल्ले बंद नहीं हो रहे थे। तूफान उन्हें पीछे धकेल देता, उनके हाथों से पल्लों की पकड़ छूटती और वे टेक पर तेजी से भड़भड़ा उठते। लेकिन हिम्मत न हारते हुए और बावजूद इसके की उनकी फ्राकें तूफान के साथ आए जलकणों से नम थीं, आँखें उसके प्रबल आवेग को झेल न पाने की वजह से झिपी जा रहीं थी, उनके भीगे रेशमी बाल हवा में भयाक्रांत फरफरा रहे थे और उनकी स्थिति उस प्रचंड तूफान के सामने नन्हीं-सी चिड़ियाओं की तरह थी, वे उससे लड़ रही थी, क्योंकि वे उस घर की लड़कियाँ थीं। छोटा भाई भी, जो हँसोड़, फक्कड़, कामचोर और मस्त किस्म का था, जिसे माँ अकसर औलिया-मौलिया कहती लेकिन घर में सबसे ज्यादा प्यार करती थी, व्यग्रता दर्शाते हुए उठा-पटक कर रहा था, पर माँ या बहनों के साथ ठिठोली का कोई अवसर ढूँढ़ती एक बेचैन मुसकराहट उसके होंठों पर छुपी थी।

पल्ले बंद कर लेने और उनके कुंडों में मोटी कीलें फँसाने के बाद माँ हमारी भावनाओं को सम्मान देते हुए नारियल की सींकोंवाले सख्त झाड़ू की जगह फूलझाड़ू से टूटे खिलौने समेटने लगी। खिलौनों के अवशेष बुहारते हुए उसकी आँखें इतनी भरी थीं कि लगता था मानो ये जो खिलौने टूटे थे वे हमारे नहीं उसके खुद के खिलौने थे। बाहर प्रलयंकारी तूफान से टिन की छत शरारती बच्चे के हाथ के झुनझुने-सी बज रही थी पर हमारी प्रार्थनों का, जिन्हें हम मन ही मन अपने-अपने विश्वासों के साथ बुदबुदा रहे थे, सम्मान रखते हुए अभी वह सड़ी बल्लियों-बत्तों और जंग खाई कीलों-ढिबरियों के कमजोर सहारे छत पर टिकी हुई थी। लेकिन पूरी श्रद्धा से की गई हमारी प्रार्थनाएँ बहुत देर अपनी गरिमा नहीं बनाए रख सकी और तूफान के अगले और अधिक प्रखर झटके से हमारे सहन की कुछ टिनों के जबड़े खुल गए और वे धौंकनी की तरह ऊपर-नीचे डोलने लगे। माँ ने घबराकर हमें अपने सीने में समेट लिया जो कपड़ा सिलती मशीन के शटल की तरह धड़धड़ा रहा था। जब हमने माँ के सीने से अपने सिर उठाए तब तक सहन की कई टिनें उड़ चुकी थीं, हमारा संकुचित संसार एकाएक बहुत विस्तृत हो गया था और हमारे सिरों पर आसमान की छत थी, हालाँकि उस वक्त उसमें गहरे भूरे और हाथियों की तरह चिंघाड़ते बादल थे। कई दिनों से बरसती बारिश, जो कुछ देर के लिए साँस लेने को रुकी थी, फिर से बरसने लगी और एकदम झटके से बहुत तेज। हम उड़ी टिनों के नीचे के सामान को उस निरापद स्थान पर सरकाने लगे, जहाँ छत की टिनें फिलहाल सुरक्षित थी, लेकिन वे भी जगह-जगह टपक रही थी और हमें बार-बार सुरक्षित जगह की तलाश करनी पड़ रही थी। इसी समय यह हुआ कि घर की दक्षिणी दीवार का एक हिस्सा धप्प से जीने में गिर पड़ा, जिसकी पक्की मुंडेर में तरेड़ आ जाने की वजह से उसमें पानी मरकर नीचे कच्ची दीवार में आ गया था और वह भीगकर फूल गई थी। उसकी वजह से हमारा ऊपर-नीचे जाने का रास्ता बंद हो गया, क्योंकि दीवार का गिरा थक्का गीला और चिकना था। परिवार के सब सदस्य चिंतातुर हो गए कि वे अब नीचे रसोई में कैसे जाएँगे और शाम का खाना कैसे बनेगा?

मेरी चिंता पिता को लेकर थी कि जब वे रात को पस्त, हारे और अगर तब भी बारिश हो रही होगी तो भीगते हुए काम से लौटकर आएँगे और घर की उड़ी छत और गिरी दीवार देखेंगे तो उन पर क्या बीतेगी? रात को पिता के लौटने के बाद, जिनके लिए हमने जीने में गिरी मिट्टी के बीच ऐसा रास्ता बना दिया था जिस पर सावधानी से चला जा सकता था, मेरी चिंता निर्मूल सिद्ध हुई। मेरी सूचना से हतप्रभ हुए बिना उन्होंने एक हाथ में थामा साइनबोर्ड दीवार से सटाया, जो तूफान में किसी दुकान से उखड़कर सड़क पर पड़ा होगा, जिसे वे घर के दीमक से सड़े दरवाजे के पल्ले में ठोककर उसे दुरस्त करने के लिए लाए थे। फिर अपनी लंबी टार्च से, जिसमें ऐवर-रेडी के चार सैल पड़ते थे और जो उन्हें छविगृह के दफ्तर से मिली थी, घर की उड़ी छत को कुछ क्षणों तक अवाक से देखते रहे और फिर खिलखिलाकर हँसते हुए बोले, ''तो उड़ गई। इसे भी कमबख्त आज ही उड़ना था।''

छत उड़ने और जीने की दीवार गिरने का उन्हें कोई मलाल नहीं हुआ। इसे उन्होंने बहुत सहज भाव से स्वीकार कर लिया था, हँसते-हँसते। शायद उन्हें अपने पौरुष और बाहुबल पर जरूरत से ज्यादा विश्वास था। उनके पास दीवार की मरम्मत और टिन जड़ने के पैसे नहीं थे लेकिन वे कतई भी निराश नहीं हुए और उन्होंने खुद गिरी दीवार चिनी, अपने हाथों से सड़े बत्ते और बल्लियाँ बदलकर टिन को फिर से छत पर बैठाया और सड़क से उठाकर लाए साइनबोर्ड को, जो किसी सोडा-वाटर की दुकान का था, काट कर मुख्य दरवाजे़ के उन हिस्सों पर ठोककर उन्हें दुरस्त किया, जिन हिस्सों को दीमक चाट गए थे। हालाँकि उनकी चिनी दीवार बहुत भोंडी थी, उनके हाथ से बैठाई गई टिनें कतई एकसार नहीं थीं और साइनबोर्ड काट कर की गई दरवाजे की मरम्मत से हमारा घर काफी हास्यासपद हो गया था। हमें इसकी वजह हीन भावनाग्रस्त होना पड़ता था और उस वक्त तो मुझे बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी जब पहली बार मेरी प्रेमिका पल्ली हमारे यहाँ आई थी और दरवाजे़ के निचले हिस्सों पर सोडा-वाटर कंपनी का साइनबोर्ड ठुका देखकर भौंचक्की रह गई थी। वह लहलहाती आत्मा और कोमल सौंदर्य-बोध की तरंगित उम्र की कल्पनाशील लड़की थी, जिसके पारदर्शी नयनों में सोते-जागते सपने थे। स्टील के गिलास में पानी पिलाकर जब मैंने उसके भौंचक्केपन और मानसिक झटके को सामान्य कर दिया था तब भी मैंने देखा था कि उसकी आँखें मुझसे उस कलाकार के बारे में पूछ रही थी जिसकी उसके खयाल से यह नायाब रचना थी। मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था कि उसका वास्तविक निर्माता कौन था? मेरे पिता, या मेरे पिता की गरीबी? पिता ने इसे पाँच साल पहले दरवाजे़ पर ठोका था और उनकी गरीबी ने उसे इतने अरसे तक ठुके ही रहने दिया था और अभी पता नहीं कितने अरसे और उसका इरादा उसे इसी प्रकार वहाँ ठुके रहने देने का था। लोग कुछ भी कहते रहें लेकिन पिता इससे कतई भी हतोत्साहित नहीं होते थे। वे ठहाका लगाकर कहते आखिर कोई न कोई खासियत तो है न इस घर में कि यह बराबर लोगों की निगाह और चर्चा में रहता है... और यह भी कि दरवाजे़ के साइनबोर्ड जड़े हिस्से इतने पुख्ता हो गए हैं कि अब दीमक उन्हें चाटने की हिम्मत नहीं कर सकते।

उनका इस तरह अध्यात्मिक किस्म से उदास होना मुझे बुरा लगा। उन्होंने सारा जीवन हँसते हुए काटा था और अब जब वे अपने जीवन की अंतिम यात्रा पर थे तो मैं यह चाहता था कि वे इसे भी हँसते हुए पूरा करें...

उनकी आँखें, जो मुझे लगी कि सिकुड़कर छोटी पड़ गई हैं, हालाँकि सर्वाधिक संवेदनशील होने के बावजूद आँखें कभी अपना आकार नहीं बदलती, हौले से काँपीं और फिर कुछ देर एकटक मेरी ओर देखते रहने के बाद उन्होंने ऐसी आवाज में कहा, जिसका करारापन टूट चुका था और जो रेस में थके घोड़े-सी हाँफ रही थी, ''एक पुल है जिसे मैं पार करना चाहता था। इसे पार करने के लिए मैंने तमाम उम्र संघर्ष किया...''

वे हर समय किसी जुस्तजू में लगे रहते थे, लेकिन उनकी यह संलग्नता उस पुल को पार करने की थी, जिसके पार कोई बहुत सुखद जिंदगी आँखें बिछाए उनकी प्रतीक्षा कर रही होगी, इसकी जानकारी ने मुझे एक बेचैन छटपटाहट से भर दिया।

जहाँ तक मुझे याद है वह दिसंबर का ठिठुरता महीना था। पहाड़ों पर बर्फ पड़ गई थी और हवा पागल कुत्ते की तरह काटने को झपटती थी। पाला बर्फ की चादर की तरह मैदानों में पसरता और हवा के साथ उड़कर उँगलियों के पोरों और नाक को इतना सुन्न कर देता कि लगता मानों वे झड़ गए हों। तब पिता की उम्र पैंसठ साल थी और ऐसी ठंडी रात में उनका एक्सीडेंट हो गया था।

वे रात में आखरी शो बंद करके अपने काम से लौट रहे थे। उनके एक हाथ में शिकारी टार्च थी और दूसरे हाथ में भी कोई न कोई चीज अवश्य रही होगी क्योंकि वे रात को काम से लौटते वक्त कुछ न कुछ जरूर बटोरकर लाते थे, जैसे ईंट, लौह-लंगड, टिन का पतरा, भिन्न-भिन्न किस्म की लकड़ियाँ, दफ्ती, कीलें वगैरह जिसे देखकर माँ भुनभुनाती तो जरूर थी पर इस सौगात को सहेजकर रख लेती थी। मैं उनकी इस आदत से बहुत नाराज होता, लेकिन उनका यह तर्क मुझे खारिज कर देता कि प्रतिदिन एक ईंट जोड़ने से तीस साल में घर बनाने लायक ईंटें जोड़ी जा सकती हैं, और सही बात तो यह भी थी कि उनका यह धनागार भीड़ बखत पर हमारे बहुत काम आता था। वे लदे-फदे, मुँह से भाप उड़ाते और उम्र की वजह से डगमगाते कदमों से आ रहे थे कि पीछे से आती मोटर साइकिल ने टक्कर मारकर उन्हें गिरा दिया। मोटरसाइकिल वाला उन्हें ऐसी हालत में सड़क पर छोड़कर भाग सकता था लेकिन शालीन संस्कारों का होने की वजह से वह उन्हें सड़क पर नहीं हमारे घर के दरवाजे़ पर छोड़कर भागा था। अगले दिन इस घटना की सारी जानकारी दर्द से कराहते हुए और फटफटिया पर पींघने के मौलिक आभिजात्य-सुख के साथ पिता ने ही हमें दी थी। बहरहाल इस एक्सीडेंट से उनके दाएँ पैर की हड्डी टूट गई थी और डाक्टर की राय थी कि इस उम्र में टूटी हड्डी का जुड़ना काफी मुश्किल होगा और अगर जुड़ भी गई तो इनका यह पैर सिकुड़कर सामान्य आकार से कुछ छोटा पड़ जाएगा।

हम पिता की बुढ़ापे में होनेवाली संभावित दुर्गति को लेकर बहुत चिंतित थे लेकिन उन्हें पूरा यकीन था कि वे बहुत जल्दी ठीक होकर अपने काम पर लौट जाएँगे। हालाँकि नौकरी करने की उम्र वे कब की बिता चुके थे, लेकिन वे आराम करना नहीं जानते थे और अंतिम समय तक संघर्ष के बीच रहना चाहते थे, जिसका पता मुझे अब हुआ जब वे अपनी अंतिम साँसें ले रहे थे कि उनका वह संघर्ष किसी पुल को पार करने का था।

हमने एक सस्ते हड्डी विशेषज्ञ से, जिसके बारे में लोगों की राय थी कि उसे डाक्टरी का पेशा छोड़कर पंसारी की दुकान चलानी चाहिए, घर पर ही उनकी टूटी टाँग पर प्लास्टर बँधवा लिया था जो बाहर से उतना चिकना नहीं था जितना किसी विशेषज्ञ के हाथ से बँधे प्लास्टर को होना चाहिए था। हमारे पास लोहे के खाँचों और स्प्रिंग के जालवाले अस्पताली पलंग थे जिन्हें पिता ने कबाड़-मूल्य में कबाड़ी बाजार से इसलिए खरीदे थे कि एक तो उनमे नीवाड़ का चक्कर नहीं था और दूसरे उनमें खटमल पैदा होने की गुंजाइश नहीं के बराबर थी। डाक्टर ने जाँचकर उनमें से एक पलंग के पैताने को ईंटों से उठाया और पैताने पर ही एक कुर्सी बाँधकर रोगी-शय्या का निर्माण कर दिया था, जिससे इस अज्ञात तथ्य का पता चलता था कि वह सिर्फ डाक्टर ही नहीं था बल्कि उसके भीतर किसी कलाकार की आत्मा और गहरी लेकिन सुप्त रचनात्मक-प्रतिभा सुयोग्य अवसर की बेचैन तलाश में थी। प्लास्टर के बाद पिता को उस रोगी-शय्या पर ऐसे लेटा दिया गया कि उनका प्लास्टर चढ़ा पैर पैंताने बँधी कुर्सी के सिर की टेक पर टिका रहे और प्लास्टर पर एक रस्सी के सहारे दो अव्वल ईंटें बाँधकर कुर्सी की सीट पर टिका दी गई थी ताकि रस्सी के तनाव से पैर अपनी जगह से बहके नहीं। यह बहुत भोंडी और हास्यास्पद व्यवस्था थी, लेकिन फिर भी यह किसी सिविल अस्पताल के जनरल वार्ड से हजार गुना बेहतर थी और सबसे अहम बात तो यह थी कि यह मरीज और उसके तिमारदारों को रास आ गई थी। बहरहाल ये पिता के जीवन के सर्वोच्च ऐश्वर्य के दिन थे, यह बात गीता पर हाथ रखकर शपथ से कही जा सकती है। वे अपने हाथ से जड़ी टिन के नीचे अनोखी रोगी-शय्या पर लेटे और अपनी छाती पर छोटे बेटे की बेटी को, जो जरूरत से ज्यादा बातूनी और चालाक थी, बैठा कर उसे कहानियाँ सुनाते या उसकी तोतली आवाज में उससे कहानियाँ सुनते और जैहिंद बीड़ी का सेवन करते रहते। दो बहुएँ और अपनी पत्नी उनकी तिमारदारी में तैनात रहती। चाय में दूध की कटौती करके उनके लिए रात को पानी मिले एक गिलास दूध की व्यवस्था भी करली जाती और गाहे बगाहे उनके लिए फल और पनीर भी मँगा लिया जाता।

तीन महीने के बाद प्रगति जाँच के लिए उनकी टाँग का एक्स-रे निकाला गया। उसे देखकर डाक्टर अपनी सफलता पर बौरा गया। ''इस उम्र में इतना अच्छा कैल्शियम फार्मेशन!''

लेकिन यह डाक्टर का नहीं, 'सिमफाइटम वन मिलियन' का कमाल था जो दवा मैंने होम्योपैथी की किताब पढ़ कर उनके लिए ढूँढ़ ली थी और चुपचाप उन्हें देता रहता था, क्योंकि मैं उन्हें फिर से अपने पैरों पर खड़ा होता देखना चाहता था।

''बाउजी आप जल्दी ही बिलकुल ठीक हो जाएँगे। पहले तो मैं डर गया था कि कहीं पैर का आप्रेशन करके उसमें रॉड न डालनी पड़ जाए। आपने कमाल कर दिया... बस तीन महीनें की बात और है।'' डाक्टर ने कहा।

पिता उसकी बात सुनकर गुम-सुम हो गए थे।

अगले दिन जब मैं दफ्तर गया हुआ था उस दौरान उन्होंने माँ को डपटकर और फिर उसकी सहायता से अपने पैर का प्लास्टर काट दिया, लौटने पर मैंने देखा कि उनके सूजकर कुप्पा हुए पैर को माँ आकाशबेल से उबले निमाए पानी से सेंक रही है।

''यह क्या किया आपने? तीन महीने की हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। अब ये पैर ठीक होने से रहा...''

''चार दिन में आकाशबेल के पानी से सिंककर ठीक हो जाएगा।'' बहुत सहज भाव और विश्वास से भरा उत्तर था उनका।

''फिर भी ऐसी क्या आफत आ गई थी?''

''मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता। अभी भी सालों ने मैटनी के पैसे काट लिए, आगे तो तन्खा भी नहीं मिलेगी। नौकरी भी जा सकती है। जैसे तैसे तो चल रही है ये नौकरी।''

''नौकरी को लात मारिए। अब आराम करिए... आखिर कभी तो आदमी को आराम करना चाहिए।''

वे टपटप मेरी ओर देखने लगे, देखते ही रहे कुछ देर और फिर जैसा कि अमूमन होता था वे हँसे और बोले, ''हमारी जैसी औकात के आदमी के नसीब में कहीं आराम होता है क्या?''

दो एक दिन की सिंकाई के बाद वे किसी तरह दीवार पकड़कर खड़े हुए, फिर चीखते-कराहते हुए हाथ में लाठी लेकर दो एक कदम चले, फिर आँगन तक निकलने लगे और दस-पंद्रह दिन में अपने काम पर चले गए। उनका पैर फिर कभी ठीक नहीं हुआ। वह कुछ छोटा पड़ गया था और उसमें कोई स्थायी किस्म की विकृति हो जाने के कारण वे लचक कर चलते। थोड़ा चलने पर वह सूज जाता और दर्द करने लगता, कभी-कभी तो इतना कि वे कई-कई घंटे कराहते रहते। उनकी चाल बहुत सुस्त हो गई थी। बारह बजे के मैटनी शो के लिए उन्हें दस बजे घर से निकलना पड़ता, जो उनके सिनेमा से सिर्फ दो किलोमीटर की दूरी पर था। इसके अलावा उनका पैर मौसम के प्रति अति संवेदनशील हो गया था और वे उसके संबंध में मौसम विभाग द्वारा की गई भविष्यवाणी से कहीं अधिक विश्वसनीय भविष्यवाणी कर सकते थे। सात तालों के भीतर बंद रहने के बाद भी सही सही बता सकते थे कि आसमान में बादल हैं या नहीं, मौसम आमतौर पर सूखा रहेगा या गरज के साथ छींटें पड़ेंगे या कि उत्तर भारत की पहाड़ियों पर बर्फ पड़ेगी वगैरा। लेकिन वे अपनी इस अनायास प्राप्त हुई प्रतिभा का कोई फायदा नहीं उठा पाए, जबकि इस व्यवस्था में तो लोग हकलाने के भी पैसे पीट लेते हैं और वह भी हजारों-लाखों में। लेकिन पिता सिर्फ अपने काम पर लौटे। वह भी सिनेमा की ऑप्रेटरी। वेतन एक सौ पच्चीस रुपया, तीस रुपया मैटिनी शो चलाने का अलग से। फिल्म अगर सामान्य चौदह रील की हो तो काम सुबह के ग्यारह से रात के एक बजे तक वरना फिल्म की लंबाई के अनुपात में कुछ और ज्यादा। हारी-बिमारी में छुट्टियाँ प्रबंधक की दया पर। सुविधाओं के नाम पर केबिन के झरोखे से पिक्चर देखने की सहूलियत। मशीन में 'आर्क लाइट' के लिए उपयोग में आनेवाली कार्बन छड़ें बचा कर चोरी से बेचकर ऊपर की कमाई और सिनेमा द्वारा दी एक लंबी चार सैल वाली टार्च, जिसे पिता बैटरी कहते और जिसके उजले प्रकाश-वृत में अँधेरी और काले बादलों की रात में घर की उड़ी छत भी देखी जा सकती थी। कभी-कभी छीड़ के समय मनोरंजन-कर देकर सिनेमा देखने का फ्री पास और इसके अलावा वितरक की ओर से फिल्म के पच्चीस सप्ताह चलने पर इनाम और पार्टी -जिसमें पेस्ट्री भी मिलती थी। संयोग से इसकी जानकारी मुझे इस तरह हुई थी -

बात कब की है? याद नहीं, लेकिन इस बात को काफी अरसा हो गया है। मैं स्कूल जा रहा था तो पिता ने कोट की जेब में सहेजी पुड़िया निकालकर दिखाते हुए गर्वीली चमक के साथ मुझसे पूछा था, ''क्या चीज है? रात दावत में मिली थी।''

''पेस्ट्री है, खाई क्यों नहीं, ले क्यों आए?''

''यह एक झीने-से कागज मे लिपटी हुई थी, मेरी समझ में नहीं आया - सहुरी चाँदी के वरक की तरह कागज समेत खाई जाएगी या कागज निकालकर।''

तो वे अपनी छोटी पड़ी, दर्द से कड़कती लेकिन मौसम के प्रति संवेदनशील टाँग से प्रकाश टॉकीज के सहायक मशीन-चालक के अपने काम पर चले गए, जिस काम में उन्होंने अपनी बारह साल की उम्र से अब तक की सारी जिंदगी दी थी और जिसके वे निश्चय ही बहुत माहिर थे। नगर के सभी छविगृहों के मशीन चालक कभी न कभी उनके शागीर्द रह चुके थे। किसी भी सिनेमा की मशीन खराब होती तो सबसे पहले प्रकाश टॉकीज के पंडितजी को ही बुलाया जाता और वे कोई न कोई जोड़-जुगत भिड़ाकर उसे चालू कर ही देते। वे इस फन के उस्ताद थे।

इतना बेशकीमती दिमाग वाला आदमी और पैंसठ साल की उमर मे सिर्फ जूनियर ऑप्रेटर! कहीं कोई गलती तो नहीं कर रहे हो लेखक महोदय कहानी सुनाने में?

नहीं, कोई गलती नहीं... सही बात तो यह है कि मैं आपको यह कहानी कभी गलत सुना ही नहीं सकता। क्यों? वजह आप खुद समझ सकते हैं...

दरअसल थे तो वे सीनियर ऑप्रेटर ही। लेकिन बात कुछ ऐसी हुई कि... पिता ने ही मुझे बताया था, हँसते हुए।

शासन की ओर से एक आदेश हुआ था कि उन सभी ऑपरेटर को, जिन्होंने मशीनचालक का कोई विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है, एक जाँच समिति के सामने इंटरव्यू दे कर प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा। नगर का कोई भी ऑपरेटर विधिवत रूप से प्रशिक्षित नहीं था। उन्होंने तो पंडितजी की शागिर्दी में ही मशीन चलाने का काम सीखा था। सभी के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगीं और वे अपने भविष्य के प्रति चिंतित हो गए। सिवा पिता के जो खलीफा बने घूम रहे थे। आखिर क्या तो पूछ लेंगे? सिने-मशीन की रग-रग के साथ उनका ऐसा रिश्ता था, जैसा कभी अपनी औरत के साथ भी नहीं हो सका... वे हर दिन उसे चालू करने से पहले उसकी घूप-बत्ती करते थे...

लेकिन आश्चर्य यह हुआ कि इस साक्षात्कार में जहाँ नगर के सभी ऑपरेटर जो पिता के कभी न कभी शागिर्द रह चुके थे और वे भी जो इतने लद्धड़ थे कि अपनी आँख की कीच भी साफ नहीं कर सकते थे पास हो गए थे और इतने तेजस्वी पिता फेल।

फे़ल क्यों हुए? यह बात आज तक उनकी समझ में नहीं आई। उन्होंने तो पूछे गए सवाल का सही जवाब दिया था।

उनसे उस साक्षत्कार में पूछा गया था कि केबिन के दो दरवाजे हैं, एक पूरब की तरफ और दूसरा पच्छिम की। केबिन में पूरब की ओर से आग लग जाए तो तुम क्या करोगे?

यह सवाल बहुत सादा था जिसका जवाब कोई नासमझ बच्चा भी दे सकता था, उनके व्यक्तित्व के अनुरूप तो खैर यह कतई था ही नहीं। उन्होंने बहुत अन्यमनस्कता से किंतु विवेकसम्मत और घोर मानवीय उत्तर दिया था कि वे अपनी हिफाजत के लिए पच्छिम के दरवाजे से भाग जाएँगे। उनके इस जवाब से कमीटी के थोबड़े लटक गए थे और उसने उन्हें फेल कर दिया था।

''स्सालों ने मुझे फेल क्यों किया?'' पिता ने हँसते हुए मुझसे पूछा था।

''आपका जवाब होना चाहिए था कि मैं भागूँगा नहीं बल्कि आग बुझाने की कोशिश करूँगा।''

''लेकिन यह झूठ होता। एक ऐसा आदमी जिसके सिर पर कच्चा कुनबा हो और उसके घर की छत तूफान में उड़ने के लिए हर समय उतावली रहती हो, वह जोखिम उठाकर आग बुझाएगा कि बच्चों के लिए अपनी जान बचाने का उपाय करेगा। जवाब दो, आदमी बड़ा है कि मशीन और हिफाजत किस की होनी चाहिए...?''

उनका तर्क वजनदार और शायद सही भी था लेकिन वे फेल कर दिए गए थे और इसी के साथ उनके व्यवसायिक जीवन का पतन शुरू हुआ था। उनकी शानदार सेवा को ध्यान में रखते हुए उनकी तनख्वाह तो कम नहीं की गई लेकिन उनके सहायक रग्घू को, जो हिटर पर उनका खाना गरम करता था, सीनियर ऑप्रेटर बना दिया गया क्योंकि वह उस इंटरव्यू में पास हुआ था और उन्हें उसके अधीन सहायक। सहायक बन कर वे रग्घू को हिटर पर खाना गरम करके खिलाने लगे थे। इस हादसे का उन पर क्या असर हुआ होगा? हमें यह कभी पता नहीं चल सका। वे बहुत सहज आदमी थे, निष्कपट और मुँहफट लेकिन उनके भीतर के दर्द को समझ पाना दुष्कर था। दरअसल दुखों को चुपचाप अपनी आत्मा में पी लेने का उनमें अद्भुत माद्दा था। वे शिवजी की तरह गरलपान करके सहज रह सकते थे...

बात तब की है जब मैं काफी छोटा था, हालाँकि हमारे घर में बच्चे कभी छोटे नहीं होते थे। माँ के शब्द डाका डालकर बच्चों से उनका बचपन छीन लेते थे। घर में किसी के साथ ऐसी बात रही हो या न रही हो, लेकिन मेरे साथ तो ऐसा ही कुछ था क्योंकि मैं घर का बड़ा बेटा था, जिसे उसकी गिरती हुई दीवारें थामनी थी। मेरा बचपन कब और कहाँ खो गया था, इसका मुझे कभी पता ही नहीं चला। माँ मेरे लिए कभी माँ नहीं हो सकी और न पिता कभी पिता नहीं हो सके हालाँकि उनके प्रति मेरे भीतर एक हमदर्दी का तरल-सा भाव था और उनके संघर्षों के लिए मेरे मन में हर समय एक अपराध-बोध-सा रहता। गरीबी में जिंदगी गुजारना मेरे खयाल से शायद इतना मुश्किल नहीं होता, जितना अपराध-बोध के साथ जीना, जबकि आप अपराधी नहीं होते।

उन दिनों घर गुल्लो की महक से महकता था। उसकी उम्र चार साल की थी पर उसका जादू घर के सिर पर चढ़कर बोलता था। वह इतनी मोहक और सुहावनी थी कि उसने आसन्न संकटों पर अपने सम्मोहन का झीना, कोमल और सुनहरा आवरण फैला दिया था। पिता की तो वह आत्मा में बस गई थी। सुबह जब वे नगरपालिका के बम्बे से पानी भरते तब भी वह उनके कंधे पर शान से सवार रहती। खाना खाते समय पता ही नहीं चलता था कि पिता उसे खाना खिला रहे होते या वह अपनी नन्हीं उँगलियों से पिता को खाना खिला रही होती। हालाँकि हमारी आर्थिक स्थिति के लिहाज से यह कतई शोभनीय नहीं था, पर उसके लिए एक चाँदी की पतली-सी पाजेब गढ़वाई गई थी, जिसे अपनी आदत के अनुसार माँ ने भीड़ वक्त के लिए सँभाल कर नहीं रख लिया था, वह गुल्लो के पैरों में बजती रहती थी।

दिन में तो वह एकदम ठीक थी और उसकी शरारतों से घर चहक रहा था, लेकिन शाम को वह एकाएक सुस्त हो गई, उसकी आँखें झिपने लगीं और अकस्मात उसके गुलाबी चेहरे पर राख की एक परत-सी फैल गई। माँ उसकी हालत देखकर एकाएक बहुत गंभीर हो गई और उसने उसे अपनी गोद में दुबका लिया। घर एकाएक बहुत उदास हो गया। एक बेचैन किस्म की चुप्पी छा गई, जिसमें सिर्फ हमारी धड़कनें थी और माँ के प्रार्थना में हिलते होंठ थे।

हमारे धर में मौत कुछ इसी तरह आती थी। दबे पैर। चुपचाप।

इससे पहले चार मौतें हो चुकी थीं, जिनकी मुझे हल्की-सी याद थी। ये सब माँ की गोद में हुई थीं, उसकी प्रार्थनाओं के दौरान। फिर भी प्रार्थनाओं से उसका विश्वास कभी नहीं डिगा। उसे उम्मीद रहती कि आँसू भरे हृदय की सच्ची प्रार्थनाएँ मौत का रास्ता रोक सकती हैं... शायद आर्थिक लाचारी में प्रार्थनाएँ ही उसका एकमात्र और सम्मानजनक विकल्प था। वह पलक भी नहीं झपक रही थी। उसने कभी मुझे बताया था कि माँ के जागते हुए मौत उससे उसके बच्चे को छीनने की हिम्मत नहीं करती... वह माँ की झपकी का इंतजार करती है। पिछले चार बच्चे उसकी झपकी के दौरान ही मौत ने उससे छीने थे। इस बार वह यह गलती करने को कतई तैयार नहीं थी और उसकी आँखें काँच के मारतोल की तरह पारदर्शी पर थिर थीं।

लेकिन गुल्लो की हालत लगातार गिर रही थी। जब चम्मच से उसके गले में दूध डालने के बाद वापस लौट गया तो अपनी उम्र के बावजूद मुझे लगा कि वह अब हमारे हाथ से जाने वाली है। मैं पूजा स्थल पर कड़ुए तेल का दिया जलाकर भाव विह्वल स्वर में हनुमानजी को सुमरने लगा, हालाँकि दर्जा पाँच की बोर्ड की परीक्षा में उन्होंने मुझे धोखा दे दिया था, श्रद्धा के साथ हनुमानचालिसा का पाठ करने के बाद भी परीक्षा में मुझसे लँगड़ी भिन्न का सवाल हल नहीं हुआ था। फिर भी मुझे विश्वास था कि सूरज को गेंद की तरह निगल सकनेवाले हनुमानजी मेरी प्रार्थना अवश्य सुनेंगे और गुल्लो के प्राणों की रक्षा कर लेंगे... बस सच्चे मन से प्रार्थना करनी होगी। यह प्रार्थना मैंने बदन के सिहरन भरे ओज और छलकती आँखों की करुणा के साथ की थी। ऐसा आस्था, विश्वास, करुणा और ओज से भरी प्रार्थना मैं इसके बाद कभी नहीं कर सका। लेकिन मेरी प्रार्थना के बाद भी गुल्लो की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।

रात को पिता लौटे तो उन्होंने गुल्लो की हालत देखकर पूजा-स्थल से राख की एक चुटकी निकालकर कोई मंत्र पढ़ा, जिससे उनका शरीर जूड़ी के मरीज की तरह काँपने लगा। मंत्र पढ़कर उनकी आँखों में एक चमक आई और वे बोले, ''कोई ऊपरी छाया थी, उसे मैंने अपनी मंत्र की शक्ति से भगा दिया है। गुल्लो बस पाँच मिनट में ठीक होती है।'' उन्होंने उसके माथे पर राख का टीका लगाया और मुँह खोलकर थोड़ी-सी राख उसकी जीभ पर रख दी।

बिमारी का इलाज हमारे यहाँ ऐसे ही किया जाता था। पूजा की मंत्रसिद्ध राख से। डाक्टरों पर पिता का विश्वास नहीं था। अगर रहा भी होगा तो हमारी आर्थिक स्थिति में हमारे यहाँ उनके लिए कोई जगह नहीं थी।

पिता की मंत्रसिद्ध राख गुल्लो के किसी काम नहीं आई और उसकी हालत लगातार गिरती चली गई। सुबह तक उसका शरीर ऐसा हो गया मानो वह राख हो। विश्वास की क्षीण रेखा अगर कहीं टिकी थी तो सिर्फ इस बात पर कि उस राख में अभी तपिश थी। माँ सुबकने लगी तो पिता ने कहा, ''अरे रोती क्यों हो? सब ठीक हो जाएगा। हमने आज तक कभी किसी का बुरा नहीं किया, फिर हमारा बुरा क्यों होगा।''

''तुम्हारे इस झूठे विश्वास पर मैं अपने चार बच्चे खो चुकी हूँ।'' माँ ने विद्रोह कर दिया। यह शायद पिता के विरुद्ध माँ का पहला और अंतिम विद्रोह था...

पता नहीं वे इसे जान गए थे या नहीं, लेकिन उन्होंने माँ को तसल्ली देते हुए कहा था, ''अच्छा ठीक है, बड़े अस्पताल चलते हैं। कुछ रुपये होंग तेरे पास...''

माँ ने बिना कुछ कहे झुककर चुपचाप गुल्लो के पैर में बँधी पायल खोलकर पिता के हाथ में टिका दी थी। गुल्लो की पायल बेचकर हम उसे अस्पताल ले गए थे। लेकिन हमारा सारा संघर्ष किसी काम नहीं आ सका। अस्पताल उसे नहीं बचा सका। उसे डिप्थिरिया हो गया था। छोटे से समय में सारा खेल खत्म हो गया।

आगे आगे गुल्लो की लाश थामें पिता थे, जिनके चेहरे पर अपनी सबसे प्रिय के खो जाने का कोई मलाल नहीं था, उनके पीछे सिर झुकाए मैं था और मेरे पीछे एकदम टूटी, पस्त और अवसन्न माँ थी और हम अस्पताल से घर तक का रास्ता पैदल तय कर रहे थे। मैं उनकी इस निर्ममता से बुरी तरह से बौखला गया था और तमाम उम्र उनके इस निर्दयी चेहरे को नहीं भूल सका था। लेकिन यह निर्ममता नहीं, दुखों को चुपचाप पी सकने का उनका अद्भुत चरित्र था।

''लेकिन मैं वह पुल कभी पार नहीं कर सका। आदमी पूरी हिम्मत और मेहनत से काम करे और फिर भी उससे पुल पार न हो तो उसकी कोई वजह तो जरूर होनी चाहिए...'' उन्होंने आगे कहा और उनके चेहरे की झुर्रियाँ थरथराने लगीं।

''हाँ, वजह तो जरूर है।'' मैंने जवाब दिया।

''क्या तू उसे जानता है?'' उन्होंने पूछा।

''जानता तो हूँ, लेकिन...''

''मैं उसे जानना चाहता हूँ जिससे मैं इस विश्वास के साथ मर सकूँ कि जो पुल मैं पार नहीं कर सका उसे कभी मेरा बेटा पार कर लेगा...''

''आपने ही कभी मुझे बताया था कि...'' मैंने झिझकते हुए कहा और फिर सहसा चुप होकर उनका चेहरा देखने लगा जहाँ अब सिर्फ उनका चेहरा ही नहीं, उनके जैसे पता नहीं कितने चेहरे थे। और शायद जो मैं बताने जा रहा था, वह सिर्फ पिता का सच नहीं उन सभी चेहरों का सच था, जो इस समय उनके चेहरे पर चस्पा थे। लेकिन पिता को अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव को बहुत सहजता और शांति के साथ पूरा करना चाहिए, यह सोचकर मैं रुक गया।

''क्या बताया था मैंने?'' उन्होंने आतुरता से पूछा, ''यह जानकर मेरा बोझ हल्का हो जाएगा।''

''आपको एक का पहाड़ा नहीं आता। यही वजह है कि आप उस पुल को पार नहीं कर सके, जिसे आप पार करना चाहते थे।''

यह निर्मम सच्चाई कभी उन्होंने ही मुझे बताई थी।

वे पढ़ाई में बहुत होशियार थे। अपने शिक्षाकाल में हर वक्त पढ़ते ही रहते थे। खेल के मैदान से उनका कोई वास्ता नहीं था। उनके साथी खेलते लेकिन वे पढ़ते रहते। शिक्षक उनके भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त रहते और उन्हें उदाहरण की तरह पेश करते। बात तब की है जब वे दर्जा चार में थे और स्कूल का इंस्पेक्टर मुआयने पर आया था। उनके सामने पिता को स्कूल के सर्वाधिक योग्य और चमकीले छात्र की तरह प्रस्तुत किया गया था। दर्जा चार का यह बच्चा हमारे विद्यालय का सबसे होनहार, विनम्र और आज्ञाकारी लड़का है। इसे बीस तक पहाड़े, अद्धे, पौने, सवय्ये, डेढ़े वगैरह याद हैं।

इंस्पेक्टर ने बेसिक प्राइमरी पाठशाला के इस होनहार छात्र की ओर प्रशंसित दृष्टि के साथ देखा, जिसकी आँखों में कीच जमा थी, बाल साही के बालों की तरह नुकीले थे, कमीज-निकर मुचड़े हुए थे और पैर नंगे थे।

''तू बीस तक पहाड़े, अद्धे, पौने, सवय्ये, डेढ़े जानता है।''

''जी श्रीमान।''

वे मुस्कराते हुए बोले, ''शाबास, अच्छा तो बेटे एक का पहाड़ा सुना।''

स्कूल की निगाह उन पर टिकी हुई थी और कान उनसे एक का पहाड़ा सुनने को आतुर थे। लेकिन यह क्या उनके मुँह से तो आवाज ही नहीं निकल रही थी।

''नहीं आता?''

''श्रीमानजी एक का पहाड़ा तो कभी स्कूल में सिखाया ही नहीं गया।''

इस शर्मनाक वाकये के बाद पिता ने पहाड़े की अनेक पुस्तकों में एक का पहाड़ा खोजा। वह उन्हें कहीं नहीं मिला। वे तमाम उम्र इसे नहीं सीख सके जिस वजह से वे उस पुल को पार नहीं कर सके जिसे वे पार करना चाहते थे।

''तेरी ये बात तो सही है। मुझे एक का पहाड़ा कभी नहीं आया। यह किताबों में भी नहीं मिलता और न हमारे वक्त इसे स्कूल में पढ़ाया जाता था। पर क्या तू इसे जानता है?''

''हाँ, मैं इसे जानता हूँ। बहुत आसान है। एक इकम एक, एक दुनी दो, एक तीए तीन...'' मैंने गर्वीली चमक और नई पीढ़ी की पिछली पीढ़ी पर विजया के उल्लास के साथ कहा।

उनकी आँखें, जो फटे दूध की तरह गदला गई थीं, कुछ देर तक मेरे चेहरे पर टिकी रहीं। फिर उन्होंने बहुत आहिस्ता से कहा, ''नहीं एक का पहाड़ा तो तुझे भी नहीं आया। तूने जो सुनाया यह तो गिनती है, पहाड़ा नहीं...'' इस दरम्यान उनकी आँख एक बार भी नहीं झपकी थी, लेकिन उनका स्वर आखिर तक आते आते पूरी तरह टूट गया था...


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