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कहानी

समुद्र
सुभाष पंत


उसे लगा प्रधानमंत्री से मिलने के अलावा कोई और चारा नहीं रह गया है और उसने प्रधानमंत्री से मिलने का निश्चय कर लिया। यह कोई गलत बात नहीं थी। वह देश का नागरिक था और देश का नागरिक होने के नाते, जिसने कई मर्तबा संसदें बनाने में हिस्सेदारी निभाई थी, उसे प्रधानमंत्री से मिलने का हक था।

हालाँकि पह पढ़ा-लिखा आदमी नहीं था, पर वह दिलचस्प और जागरूक था। जब भी वह किसी पढ़ी-लिखी सवारी को अपने ताँगे पर ढोता तो बातों-बातों में राजनीति की चर्चा चलाकर हर वक्त देश की नब्ज को अपनी उँगलियों के बीच में रखता था और बराबर उसकी धड़कन महसूस करता रहता था। प्रधानमंत्री के बारे में उसकी लहीम-शहीम राय थी, जो तथ्यों और चर्चाओं पर आधारित थी। जिसका लब्बो-लुआब यही था कि वे गरीबों के बारे में सोचते हैं, क्योंकि वे आदिवासियों के बीच उनकी पोशाकें पहन कर नाचते हैं और आम सभाओं में बराबर उनका जीवन-स्तर उठाने की बात करते हैं।

पर एक परेशानी थी। प्रधानमंत्री से मिलने राजधानी जाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। यूँ अगर उसके पास पैसे होते तो उसे प्रधानमंत्री से मिलने की जरूरत ही न होती, क्योंकि तब उसे उन परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता जिनका वह इस समय कर रहा था। वह इस मंसूबे को अपने भीतर जिलाए उचित अवसर की तलाश करने लगा। उसे उम्मीद थी कि कभी न कभी उसे ऐसा सुयोग अवश्य प्राप्त होगा, जब वह प्रधानमंत्री के सामने खड़ा होगा और बहुत स्पष्ट किंतु विनम्रता के साथ अपनी बात उनसे कह सकेगा और बताएगा कि गरीब आदमी का जिंदा रहना कितना मुश्किल होता जा रहा है।

एक दिन जब वह लस्त-पस्त ताँगे पर बैठा सवारी की तलाश में शहर में घूम रहा था और उसका घोड़ा गरमी से हाँफ रहा था, तो उसने पाया कि शहर में कुछ तब्दीली आ रही है। वह अतिरिक्त रूप से चौकन्ना हो गया और तब्दीली को सूँघने लगा। नगर पालिका के समस्त सफाई कर्मचारी सड़कों की सफाई कर रहे थे और शहर को दुल्हन की तरह चमका रहे थे। जगह-जगह स्वागत द्वार बनाए जा रहे थे। मुख्य सड़क के किनारे चूने की लाइन डाली जा रही थीं बल्लियाँ गाड़ी जा रही थी और उन पर रस्सियाँ बाँध कर जनता के लिए मार्ग बनाए जा रहे थे।

उसने महसूस किया कि जल्दी ही कोई महत्वपूर्ण घटना घटने जा रही है। ताँगे पर बैठे-बैठे ही उसने एक सफाई कर्मचारी से दरयाफ्त किया, "क्यू भाई क्या बात है?"

"अरे! इत्ता भी नई मालूम परधानमंतरी आ रिए हैं।" सफाई कर्मचारी ने कहा और उसकी अज्ञानता पर तरस खाते हुए अचकचाई दृष्टि से उसे देखा।

"हैं हैं क्या कहा? प्रधानमंत्री!" वह उत्तेजना में ताँगे से कूद पड़ा और उसके पास आ कर फुसफुसाया, "कब?"

"अरे इत्ता भी नई मालूम? कल।"

वह तेजी से कूद कर फिर ताँगे पर बैठ गया। उसके पास समय बहुत कम था। प्रधानमंत्री से मिलने का जुगाड़ बैठाना था। उसका दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था, जैसे सीने में रखे अंडे से चूजा निकल आया हो। वह कुछ परेशान भी था। कमस्कम ऐसे वक्त तो प्रधानमंत्री को नहीं आना चहिए था, जिस वक्त उसके जूते फटे हुए थे और उसके पास पहनने को कायदे की एक पोशाक भी नहीं थी।

उसने घोड़े को थपथपाया। उसकी रास फटकारी और चलने के लिए मुँह से 'च्च च्च' की आवाज निकाली, पूँछ मरोड़ी और अंत में माँ-बहन की गाली देते हुए उसकी पीठ पर चाबुक जड़ दी। पर घोड़े की चाल में कोई गुणात्मक अंतर नहीं आया। उसने जिस मरी चाल से चलना शुरू किया था, उसी चाल से चलता रहा। दरअसल घोड़ा कमजोर था ओर बावजूद मालिक के प्यार और झुँझलाहट के वह सिर्फ दुलत्ती झाड़ कर गर्भिणी स्त्री की तरह सुस्ती से चलता था। घोड़ा सुस्त था लेकिन उसका दिमाग बहुत तेजी से काम कर रहा था कि कोई ऐसा सुराग मिल जाए जिसके जरिए प्रधानमंत्री से मिला जा सके।

सहसा उसे सर्किट हाउस के भेंगे बावर्ची खयाल आया, जो उसका दोस्त था। उसकी निगाह में वह खासा महत्वपूर्ण आदमी था। यह तो कुदरत की मार थी कि वह भेंगा था, वरना वह इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण आदमी हो सकता था। उसके हाथ में विभिन्न पकवान बनाने की लाजवाब कला थी और उसका व्यक्तिगत विचार था कि बड़े आदमी, जो महत्वपूर्ण पदों की बंदरबाँट करते हैं, खाने के शौकीन ओर अक्सर पेटू होते हैं। उसका यकीन था कि भेंगा उसकी मदद कर सकता है। प्रधानमंत्री तक उसकी अवश्य पहुँच होगी।

उसने घोड़े की रास सर्किट हाउस की ओर मोड़ दी।

भेंगे बावर्ची से मिलने के बाद जब वह गंदे नाले के किनारे अपने घर लौटकर आया, जहाँ इन दिनों उसने अपना डेरा डाल रखा था, तो वह बहुत प्रसन्न था। कुछ नानुकुर करने के बाद भेंगा इस बात के लिए राजी हो गया था कि वह प्रधानमंत्री से उसकी मुलाकात करवा देगा। उसमें एक बेचैनी भरा उत्साह था और वह महसूस कर रहा था कि पीड़ा और यंत्रणा की यह अंतिम रात है। अगले दिन का सूरज उसके लिए मुक्ति का संदेश लाने वाला है। उसे विश्वास था कि प्रधानमंत्री उसकी बात सुन कर द्रवित हो जाएँगे और उसके लिए कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। वह उत्तेजना में तब तक मुट्ठियाँ बंद करते और खोलते हुए चक्कर काटता रहा जब तक वह थक नहीं गया। दरअसल, भविष्य की सुखद कल्पनाओं का जाल इतना मोहक था कि वह उसमें उलझ गया था। इन कल्पनाओं में डूबने-उतराने के अलावा इस वक्त करने को उसके पास कुछ भी नहीं था। लेकिन जैसे ही वह थक कर चारपाई पर बैठा, जिसे चारपाई कहा जाना मुश्किल था, वैसे ही उसे खयाल आया कि वह अपने जूते साफ कर सकता है। उसने उछल कर तुरंत अपने जूते उतार दिए और एक मोटे कपड़े से उन्हें रगड़ने लगा। लेकिन उन पर इतनी गर्द और कीच जमी थी कि वे साफ नहीं हो रहे थे। आखिर तंग आकर उसने जूते पानी में धो दिए और उन्हें उल्टा करके रख दिया ताकि वे वक्त से सूख सकें।

उसकी बातूनी पत्नी, जो काफी देर से उसकी ऊलजलूल हरकतें देख रही थी, इस बात से भड़क गई, "जुत्ते भी कभी पानी में धोए जाते हैं? अक्कल के पीछे तो लट्ठ लेकर पड़े रहते हो। ऐसा बौड़म आदमी मेरी किस्मत में ही लिक्खा था। दो-चार ऐसे मानुस धरती पर हो जाएँ तो धरती माता की कोख धन्य हो जाए।"

पत्नी की इस व्यर्थ की पंगेबाजी से उसे गुस्सा आ सकता था। किंतु इस समय उसका मूड बहुत बढ़िया था, इसलिए उसे गुस्सा नहीं आया बल्कि वह अतिरिक्त रूप से शालीन हो गया। "मालूम है," उसने कहा, "जूते पानी में साफ नही किए जाते। पालिस नहीं थी और जूते साफ करना जरूरी था। कल परधानमंतरी से मिलना है इसलिए..."

पत्नी का व्यवहार एकदम बदल गया। वह चिड़िया की तरह फुदक कर उसके पास आई और फुसफुसाई, "पर हमारे जैसे छोटे आदमी परधानमंतरी से कैसे मिल सकते हैं?"

"भेंगा बावर्ची मिलवाएगा।"

"भेंगा बावर्ची!" पत्नी का चेहरा एकदम तिड़क गया, "उस गप्पी और काहिल की बात का यकीन करते हो। उसकी औरत मुझे एक दिन रो-रोकर बता रही थी कि वह बेहद निकम्मा है। कई महीने पहले उसने भेंगे से नमक मँगवाया था, जो वह आज तक नहीं लाया। खैर, यह बात झूठी भी हो सकती है, क्योंकि औरतों को झूठ बोलने की बीमारी होती है। पर मेरी बात तो झूठी नहीं है। भेंगे ने मुझसे कहा था - भाभी एक दिन तुझे अपने हाथ का बना मुर्गा खिलाऊँगा। अगर मेरी याददास्त धोका नहीं दे रही, तो इस बात को पाँच साल हो गए। अब तक तो खिलाया नहीं मुए ने। वो आदमी तुम्हें परधानमंतरी से मिलवा देगा। तुम्हारी बुद्धि तो भरस्ट हो गई है। दस बरस के बच्चे में तुमसे जियादा अक्कल होती है।"

वह भेंगे के सम्मान के विरुद्ध कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। वह पत्नी की बात सुनकर भड़क गया, "अच्छा है भेंगे ने तेरी जैसी बदसूरत और दिमागचाटू औरत को मुर्गा नहीं खिलाया, वर्ना मुर्गे का परलोक भी बिगड़ जाता। इस बात से पता चलता है कि वह आदमी कितना अकलमंद है।"

पत्नी गुस्से से तमक गई लेकिन अपने गुस्से को भीतर ही भीतर पीकर वह वह पीछे लौटने को मुड़ी।

"कल के लिए एक जोड़ी कपड़ा तैयार कर देना।"

लौटते हुए पत्नी ने प्रहार किया, "तन पर कैदे का कपड़ है? अरे कफन पर कपड़ा जुड़ जाए तो गनीमत।"

वह चुप हो गया। बेकार में विवाद बढ़ाने की उसकी मंशा नहीं थी। वह झुक कर अपने जूते टटोलने लगा कि वे कल तक सूख जाएँगे या नहीं?

रात गहरा कर उतर आई थी। हालाँकि वह आँखें बंद किए पड़ा था और लगातार कोशिश कर रहा था कि उसे नींद आ जाए, ताकि प्रधानमंत्री से मिलते समय चुस्त-दुरुस्त और तरोताजा दिखाई पड़े, पर उसे नींद नहीं आ रही थी। आखिर हार कर उसने आँखें खोल दीं। सिर पर चादर की तरह सलेटी आसमान तना हुआ था, जिसमें उसके खिलाफ साजिश करते तारे झकझका रहे थे। एक कोने में चाँद लटका हुआ था, लगता था कच्चे धागे में बँधी हँसिया है।

यक-ब-यक खामोश आतंक उसकी अँतड़ियों में उतर आया। उसने घबराकर करवट बदल ली। झिंगली खाट पर उसकी औरत लेटी थी। गुमसुम। पीपल के पेड़ की डरावनी परछाई डरावनी शक्ल में उसके ऊपर पड़ रही थी। पीछे गंदा नाला खदबदा रहा था। औरत की चारपाई से सटकर दूसरी चारपाई पर उसकी जवान बेटी सोई हुई थी। उसकी धोती घुटनों तक सरकी हुई थी और उसकी नंगी पिंडलियाँ बेशरमी से फैली हुई थीं। वह अपराधबोध से भर गया और परिवार की सुरक्षा के लिए गंभीर रूप से चिंतित हो गया। यह उसका फर्ज था कि परिवार के लिए एक छत बनाता। पर हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी वह तमाम जिंदगी वैसा नहीं कर पाया। बल्कि हुआ यह कि वह मेहनत करता रहा और उसके हाथ से चीजें खिसकती रहीं। साइकिल थी, वह बिकी। पत्नी के चाँदी के गहने बिके। पीतल के पुराने बर्तन बिके। अंत तक आते-आते एक किराए की छत थी, वह भी छिन गई और वह पीपल गाछ के नीचे डेरा डालने को विवश हो गया।

उसने फिर करवट बदली। शैड के सामने ताँगा था, जिसके पहियों की सारी चूले ढीली पड़ गई थीं और जगह-जगह से गद्दियाँ उधड़ गई थीं। पास ही घोड़ा खड़ा था। हड्डियों का पिंजर। दधीची-सा, मूक प्राणी। अपना दुख नहीं बता सकता। छत छिन जाने का जितना दुख उसे है, घोड़े को भी उससे कम नहीं। एकदम उदास हो गया है। घास भी मरे दिल से खाता है। आखिर वह भी तो परिवार का सदस्य है, बल्कि वह तो इतना आवश्यक और महत्वपूर्ण है कि उसी के सहारे परिवार का खटारा घिसट रहा है।

उसने जकड़ कर अपनी आँखें बंद कर लीं और सोचने लगा कि कल प्रधानमंत्री से मुलाकात होगी तो वह कैसे पेश आएगा। काफी देर तक वह इस परेशानी में झूलता रहा कि जब उसे प्रधानमंत्री बुलाएँगे तो वह जूते समेत उस कमरे में जाएगा या जूते उतार कर, जो भव्य और शालीन होगा। दरअसल किसी बड़े आदमी से कभी उसका साबका नहीं पड़ा था। उसे यह नहीं मालूम था कि ऐसे मौक पर कैसा व्यवहार किया जाता है। उसने बहुत बारीकी और विस्तार से दोनों पहलुओं पर सोचा पर किसी ठोस निर्णय तक नहीं पहुँच पाया और लगातार उलझता चला गया। अंत में झुँझला कर उसने मौके और हालात के अनुसार इस मामले में कोई कदम उठाने के लिए अपना निश्चय स्थगित कर दिया। वैसे इस मामले में वह अपनी औरत से भी राय ले लेना चहता था, लेकिन वो निराशाजनक रुख अपनाए हुए थी, इसलिए उसने उससे बात करना ठीक नहीं समझा।

प्रधानमंत्री उसे अंदर बुलाएँगे तो वह झुक कर विनम्रता के साथ नमस्कार करेगा। हालाँकि कीमती कालीन में उसके पैर धँसे हुए होंगे, फिर भी मौका हुआ तो वह उनके पैर छू लेगा और कोशिश करेगा कि ऐसा करते हुए वह गिर न पड़े।

वे उसे बैठने को कहेंगे।

पर वह नहीं बैठेगा और आभार प्रकट करते हुए खड़ा रहेगा। वह अपनी औकात जानता है। उसे कोई मुगालता नहीं है।

इसके बाद वह अपनी बात शुरू करेगा - "आगे बात यह है माननिय परधानमंतरी जी कि गुलाम एक ताँगे वाला है। गुलाम का नाम रघुवा है। ये नाम सुनकर हुजूर के कानों को तकलीफ हुई होगी। मुझे भी अपने नाम के कारन कई मर्तबा या कहूँ, अक्सर-क्या कहते हैं उसे - हाँ याद आया, सरमिंदगी झेलनी पड़ती है। लेकिन साब ये तो माँ-बाप का दिया नाम है। वे भी मेरी तरह बेपढ़े, सरीफ और गरीब थे। आप गरीब-परवर हैं और बराबर गरीबों का खियाल रखते हैं। इस बरस पंदरा अगस्त को मैंने पान की दुकान पर आपका भासन सुना था। भासन इतना बढ़िया था कि मैं बीड़ी लेना ही भूल गया था। उसमें गरीबों के बारे में भौत बाते कही गई थीं। लेकिन हुजूर उसमें ताँगे वालों का कोई जिकर नहीं था। गुस्ताकी माफ हो हुजूर, आपने उनके बारे में कभी सोचा ही नहीं। उनके दुख भौत बड़े हैं और वे महँगाई की मार से बुरी तरह पिस रहे हैं।

"हुजूर का ये गुलाम कभी सिर पर कुर्ला बाँधे, लकदक पोसाक में ताँगे पर निकलता था, जिसे तेल से नहाया-सा चिकना घोड़ा अपनी दुलकी चाल से खींचता था। उसकी दुलकी चाल होर मेरा कुर्ला देखकर जलन के मारे मुहल्ले-पडोस के लोगों को जुकाम हो जाता था। हुजूर ताँगे की सवारी शाही सवारी समझी जाती थी और ताँगे वालों की भी कोई औकात थी। अब उन्हें आदमी कर दरजा भी हासिल नहीं है। तिपहओं और मोटरों ने हमारे कारोबार पर गहरी चोट पहुँचाई है। ये तेज चलते हैं। वाकई ताँगा इनके सामने सुस्त सवारी है। आदमी तेजी पसंद हो गया है। पता नहीं उसे कहाँ जाने की जल्दी है? ताँगे की सवारी को आदमी नीची निगाह से देखने लगे हैं। भूले-भटके कोई सवारी गँठ जाए तो तिपहिए वाले ऐसी छींटाकसी करते हैं कि ताँगे वाला और सवारी दोनों ही सरमिंदा हो जाते हैं, जैसे कोई गलत काम किया जा रहा हो। इसका असर ये हुआ कि धीरे-धीरे इस्टेसन और चैक से हमारे अड्डे उखड़ गए और हम सदर अस्पताल के अड्डे तक सिमट कर रह गए। मरीज अब भी ताँगे की सवारी को पसंद करते हैं। यह सवारी आरामदायक है और घाड़ा अपनी सवारी से पियार करता है। साब ताँगे-घोड़े के पास दिल होता है, जो धड़कता है और अपनी सवारी को महसूस करता है। पर एक अस्पताल सारे ताँगे वालों को सवारियाँ नहीं दे सकता। हमारी हालात ऐसी रंडी की तरह हो गई, जो अपने उतार पर हो और गाहक को रिझाने के लिए अस्लील इसारे करे और गाहक उसे झिड़क दे। अस्पताल से एक तो सवारियाँ कम, ऊपर से बीमार सवारियाँ, जिनसे किराए-भाड़े के लिए जियादा नोंक-झोंक भी नहीं की जा सकती। बीमारों का दिल नरम और कच्चा होता है और उनका लिहाज करना पड़ता है। बहुत कम पैसा मिलता है और चारों ओर नोचनिए बैठे हैं, जिन के दाँत पैने और नाखून लंबे हैं। देखिए न हुजूर, दाना ही कितना महँगा हो गया। घोड़े को दो सेर दाना खिला दिया तो दिन भर की कमाई स्वाह। और घोड़ा दाना नहीं खाएगा तो सवारियाँ खाक ढोएगा। हम तो अपने घोड़े को बच्चे की माफिक पियार करते हैं। जब अधपेटा घोड़ा सवारियाँ ढोता है तो हमारी आतमा झुलस जाती है। हुजूर आपको थोड़ी तकलीफ तो जरूर होगी। जरा चल कर देख लीजिए मेरा घोड़ा कितना कमजोर हो गया है। उसकी एक-एक पसली गिनी जा सकती है। हम तंगदस्त लोग हैं। गुजारिस है कि हुजूर हमारे बारे में सोचें। घोड़े का दाना ही थोड़ा सस्ता करा दें।

"हुजूर का मैंने भौत टैम ले लिया है, लेकिन थोड़ा टैम और लूँगा और थोड़ी-सी बातें अपने बारे में भी कहूँगा। मेरी एक बीवी और एक जवान लड़की है। तीन पीढ़ियों की मेहनत के बाद भी हमारे पास सिर छुपाने के लिए एक अदद छत नहीं है। देश के मालिक होने के नाते आप ऐसा जरूर सोचते होंगे हर परिवार के पास सिर छुपाने के वास्ते एक छत होनी चाहिए। मैंने कहीं सुना था, शैद मेरे दादा ने बताया था कि तीन पीढ़ियों के बाद आदमी की तकदीर बदल जाती है। इस बात को गलत तो नहीं होना चाहिए, पर गलत है। मैंने अपने अनुभव से इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि तकदीर सिरफ अमीर आदमी की बदलती है होर उसे तीन पीढ़ियों का इंतजार नहीं करना पड़ता। वह तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी ब्याती जाती है। अपनी पीढ़ी तो तीन पीढ़ियों के बाद बद से बदतर हो गई। सिर के ऊपर किराए की एक छत थी, वो भी छिन गई। मकान मालिक ने एक दिन सामन बाहर फेंक दिया। बात एकदम नाजायज थी और कानून के खिलाफ थी। हमारी तीन पीढ़ियाँ उस मकान में रहती आई थीं और हम चाहे भूखे रहे हों किराया बराबर पहली को चुकाते रहे हैं। इस बेदखली को कोई जायज नहीं ठहरा सकता। मुझे मालूम है, कानून मेरा साथ देगा। लेकिन हुजूर मैं नियाय पाने के लिए कचैहरी नहीं जा सकता। मेरे पास उसके लिए पैसा नहीं है। कोरट-कचैहरी सिरफ अमीरों के वास्ते है। हुजूर से गुजारिस है कि नियाय सस्ता होना चाहिए जिससे गरीब भी अपना हक पा सकें।

"इन दिनों मैं अपनी औरत और जवान लड़की के साथ गंदे नाले के किनारे पीपल के पेड़ के नीचे टबरे में डेरा डाले हूँ। नगर पालिका किसी भी दिन मुझे बेदखल कर सकती है। यूँ भी सिर पर कायदे की छत न हो और घर में जवान लड़की हो तो अपनी इज्जत बचाना कितना मुस्किल है। जमाने की निगाह ही बेईमान हो गई है। फिर बरसात का मौसम भी आने वाला है। वह तो अपने टैम से आएगा ही। इस बात का लिहाज करके तो रुक नहीं जाएगा कि रघुवा के सिर की छत छिन गई है। हुजूर, जब आसमान दुहत्थड़ मार कर बरसने लगेगा तो मैं अपने परिवार को लेकर कहाँ जाऊँगा?" मैं भौत परेसान हूँ। रात भर नींद नहीं आती। बिनती है कि हुजूर मेरे बारे में सोचें और उन आदमियों को सजा दें जो ऐसे हालात पैदा करते है। आजादी के इत्ते बरस बाद भी ऐसे हालात हैं, तो ये देस के लिए सरम की बात है।

"अंत में हुजूर से परारथना है कि अगर गुलाम के मूँ से कोई ऊँच-नीच बात निकल गई हो तो उसे माफ करें।"

वह करवट बदलता रहा और सोचता रहा। सोचते-सोचते उस समय उसे नींद ने दबोच लिया, जब सुबह होने वाली थी।

प्रधानमंत्री ग्यारह बजे के आस-पास आने वाले थे। सबसे पहले पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ उनकी उनकी मीटिंग थी। इसके बाद अखबार वालों के साथ बात-चीत थी। फिर उन्हें जनता के मुलाकातियों से मुलाकात करनी थी। एक बजे लंच लेना था। आध घंटे आरामा। दो बजे आसपास पैवेलियन में आम सभा में भाषण देना था।

वह दस बजे ही सर्किट पहुँच गया। वहाँ के माहैल में चुस्ती थी। पुलिस के सिपाही चौकन्ने थे और गुप्तचर विभाग वाले सादे लिबास में मुस्तैदी के साथ घूम रहे थे। दस बजे ही वहाँ आदमियों के थक्के के थक्के जुड़ गए थे। वह पुलिस के इतने सारे अफसरों को एक साथ देखकर दहशत से भर गया। उसके जूते सीले और पोशाक भद्दी थी। वह खुद ही महसूस कर रहा था कि उसकी स्थिति संदेहास्पद है। अपनी इस मानसिकता से उभरने के लिए वह होंठ गोल करके सीटी बजाने लगा। उसने भेंगे बावर्ची को ढूँढ़ने की कोशिश की। वह उसे कहीं दिखाई नहीं पड़ा। सर्किट हाउस के भीतर उससे मिलने जाना संभव नहीं था। वहाँ सुरक्षा का कड़ा पहरा था। उसने कोशिश की लेकिन उसे डाँट कर भगा दिया गया। कुछ देर वह इस उम्मीदा के सहारे इधर-उधर टहलता रहा कि भेंगा उसकी खोजबीन के लिए बाहर आएगा। भेंगा नहीं आया तो वह उस लाइन में खड़ा हो गया जहाँ मुलाकाती खड़े थे और एक अफसर उनसे पूछताछ के बाद जरूरत के हिसाब से मुलाकात का समय तय कर रहा था।

तलाशी लेने के बाद उससे पूछा गया, "नाम?"

"रघुवा।"

"काम?"

"ताँगे वाला।"

"पता?"

"कोई पता नहीं।"

अफसर ने घूर कर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों का संदेह सुर्ख हो गया। उसने चिढ़ कर कहा, "आखिर कहीं न कहीं तो कोई घर होगा?"

"जी, कोई घर नहीं है।"

अफसर हैरानी में पड़ गया। एक ऐसा आदमी जिसका कोई घर न हो वह देश के प्रधापमंत्री से कैसे मिल सकता है। उसने कहा, "तू प्रधानमंत्री से नहीं मिल सकता।"

"मेहरबानी करें हुजूर मेरा उनसे मिलना भौत जरूरी है।"

"अच्छा ठीक है, एमएलए से चिट्ठी लिखवा कर ला।"

"मैं किसी एमले-फेमले को नहीं जानता।"

अफसर ने उसे धमकाकर लाइन से बाहर कर दिया।

वह निराशा में गरदन झुकाए और मन ही मन अफसर को गालियाँ देता सर्किट हाउस के गेट से बाहर निकल आया, जहाँ उसका ताँगा खड़ा था और उदास घोड़े के पास खड़ा होकर बीड़ी फूँकने लगा। अब वह बेहद उत्तेजना के साथ प्रधानमंत्री का इंतजार कर रहा था। उसने तय कर लिया था कि वह उनके सुरक्षा कवच को चीरकर उनसे मिलेगा और अपनी बात बताएगा। आखिर वह भी इस देश का नागरिक है... बाँसों के झुरमुट से खुशबू भरी ठंडी हवा चल रही थी। इंतजार करते करते उसकी आँखें भारी होने लगी। तबीयत हुई, प्रधानमंत्री के आने तक कमर सीधी कर ले। वह उचक कर ताँगे की पिछली सीट पर लेट गया और लेटे-लेटे सो गया।

तीन बजे के करीब किसी ने उसे झकझोर कर जगाया। वह अचकचाकर उठ बैठा। "क्या परधानमंतरी आ गए?"

सामने भेंगा था। वह उसे देख रहा था, पर लगा घोड़े को ताक रहा है। "परधानमंतरी आकर चले गए। तेरा भाग ही खराब है। मैं तुझे ढूँढ़ता रहा। मुझे क्या मालूम था कि तू यहाँ सोया पड़ा है। मैं तुझे उनसे मिलवा देता। वे मुझे जानते हैं। उन्होंने एक बार मेरे हाथ से बने मुरगे की तारीफ की थी। इस समय उनका परोगराम आमसभा में भाषण देने का है। वहाँ से राजधानी चले जाएँगे। बीड़ी तो निकाल जरा।"

उसने भेंगे की तरफ नहीं देखा। उछलकर ताँगे की अगली सीट पर बैठ गया और घोड़े की रास पैवेलियन की ओर मोड़ दी।

प्रधानमंत्री भाषण दे रहे थे। पैवेलियन आदमी-औरतों, पुलिस और गुप्तचरों से खचाखच भरा हुआ था।

वह भीड़ के इस ओर ताँगे से कूद कर खड़ा हो गया और सोचने लगा प्रधानमंत्री से कैसे मिला जा सकता है?

वह अभी सोच ही रहा था कि प्रधानमंत्री ने कोई ऐसी महत्व की बात कही कि जनता उत्साहित होकर उनकी जय-जयकार करने लगी। चारों ओर से इतना शोर मचा कि उसका घोड़ा बिदक गया। हालाँकि उसे बिदकना नहीं चाहिए था, जय-जयकार देश के प्रधानमंत्री का हो रहा था और घोड़ा भी इसी देश में रहता था। लेकिन अधभूखा रहने के कारण वह कमजोर था और उसकी सहनशक्ति समाप्त हो गई थी। वह बौखलाकर ताँगे समेत बग्टुट भागा। एक दीवार से टकराकर गिरा और मर गया।

वह दौड़कर घोड़े के पास गया। उसका अंतिम सहारा भी टूट चुका था। उसके सारे रास्ते घुप्प अँधेरे में खो गए थे और अब उसका प्रधानमंत्री से मिलना ज्यादा जरूरी हो गया था। यूँ, वह प्रधानमंत्री से हरजाना भी वसूल कर सकता था, क्योंकि उन्हें इतने महत्व का आदमी होकर ऐसी बात कहने का हक नहीं था, जिसके पीछे बुनियाद न हो पर जिससे भीड़ मासूम उत्साह में भर कर जय-जयकार करने लगे और उसके शोर से उसका घोड़ा बिदक कर दौड़े और दीवार से टकराकर मर जाए। हालाँकि उसकी ऐसी मंशा नहीं थी। वह उनसे मिलकर सिर्फ हालात की जानकारी देना चाहता था ताकि वे उनके बारे में सोच सकें...

उसने निगाह उठाकर प्रधानमंत्री की ओर देखा। वे धूप में मृगतृष्णा की तरह दिखाई पड़ रहे थे। उनके सिर पर छाता तना हुआ था, जिसे एक नहीं कई कीमती हाथों ने थाम रखा था। उसके और उनके बीच सुरक्षा दलों, चापलूसों, लालफीताशाहों का समुद्र फैला हुआ था। जिसके एक ओर प्रधानमंत्री थे, दूसरी ओर वह था, उसका मरा हुआ घोड़ा था और उसके जैसे लोग थे। उस समुद्र को लाँघकर प्रधानमंत्री के पास पहुँचना असंभव था। यह भी मुमकिन नहीं था कि प्रधानमंत्री ही उस समुद्र को लाँघकर उसके पास पहुँच सकें...


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