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कहानी

भगवान की लाठी
विश्वंभर मिश्रा


आज उसे यकीन हो गया था कि ईश्वर हैं, न्याय है। सभी को उसके पाप की सजा मिल सकती है। इस घोर कलयुग में भी कोई ईश्वरीय न्याय से बच नहीं सकता। चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो? ऊपर वाले की लाठी हर पापी के सर पर प्रहार कर सकती है, वह भी बेअवाज। भले, इसमें देर हो सकता है, अंधेर नहीं। आज घटी एक घटना ने दुबारा से ऊपर वाले के न्याय तंत्र पर उसका भरोसा जगा दिया था।

दरअसल, आज सुबह उसके बॉस के केबिन में दो युवक धड़धड़ाते घुस आए थे। जब वह बॉस को अकाउंट के बारे में कुछ जानकारी दे रहा था। उन युवकों ने केबिन में घुसते ही बॉस को भद्दी-भद्दी गालियाँ देनी शुरू कर दीं। गालियों के बीच उनमें से एक ने कहा, 'साले भैया का फोन क्यों नहीं उठाता... गाँड़ में आशीष मित्तल, सुरेश अग्रवाल और हरेराम पांडेय की तरह चार गोलियाँ लगेंगी तो समझ में आएगी।' एक युवक ने तो पिस्तौल लहराते हुए बॉस के बाल पकड़ लिए थे। वह उसे रोकना चाहता था मगर डर के मारे वह बुत बना खड़ा रहा। शेर की मानिंद दबंग दिखने वाले उसके बॉस भींगी बिल्ली बन गए थे तो उसकी बिसात क्या थी? अपनी आँखों के सामने उन्हें असहाय और निरीह देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी। लेकिन डर भी था कि यदि वह बाहर चला गया तो बॉस ज्यादा बुरा मान सकते हैं, उन्हें संकट में छोड़कर जाने के लिए। अब तक दूसरे युवक ने अपना मोबाइल किसी को लगाकर बॉस को पकड़ा दिया था। दूसरी ओर से क्या बोला जा रहा है यह तो उसे सुनाई नहीं पड़ रहा था, मगर बॉस, 'जी... जी... हाँ... हाँ' के सिवाय कुछ नहीं बोल रहे थे। बॉस की स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी, जैसे उनका फोन आने पर ऑफिस के किसी भी कर्मचारी की होती है। चाहे उसका ओहदा कुछ भी क्यों न हो? कुछ देर बात करने के बाद युवक को बॉस ने मोबाइल लौटा दिया। उसने मोबाइल पर कुछ बात की, फोन काटा, मोबाइल जेब के हवाले करते हुए बॉस से मुखातिब होते हुए बोला, 'समझ गए न... जो बोला गया है, वह करो नहीं तो इसी ऑफिस में तुम्हारा फोटो टँग जाएगा... माला के साथ...' बोलकर वह मुस्कुराया मानो, अपने डायलाग पर खुद खुश हों। पहले युवक ने कहा कि, 'आगे से फोन उठाना नहीं तो... दुनिया से ही उठा देंगे...' यह कहकर दोनों चलते बने। दोनों के जाने के बाद बॉस दरवाजा बंदकर अपने केबिन में काफी देर तक बैठे रहे हैं - चुपचाप, गुमसुम, अकेले। इस दौरान वह किसी का फोन उठा रहे थे कि नहीं उसे पता नहीं चला। ऑफिस में किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है?

उसने भी डर के मारे किसी को कुछ नहीं बताया। ऑफिस में वह भी ऐसे बैठे रहा मानो उसे साँप सूँघ गया हों। उसकी आँखों के आगे सारा दृश्य नाच रहा था। उन युवकों के आशीष मित्तल, सुरेश अग्रवाल और हरेराम पांडेय के जिक्र से उसे समझने में देर नहीं लगी कि वे जेल में बंद माफिया सरगना विनोद सिंह के गुर्गें थे। क्योंकि इनकी हत्या उसने ही कराई थी। विनोद शहर के अपराध जगत का बेताज बादशाह बनकर उभर रहा था। उस पर हत्या और रंगदारी के दर्जनों मामले में चल रहे थे। वह समझ गया था कि उसके बॉस पर उसकी कुदृष्टि पड़ चुकी है।

थोड़ी देर बाद उसे बॉस ने अपने केबिन में सीनियर अकाउंटेंट बागची को बुलाया था और उसे दो दिनों के भीतर दस लाख कैश विभिन्न खातों से निकालने का निर्देश दिया था। वे भुनभुना रहे थे कि इतने कैश की जरूरत क्या है? लेकिन, उसे समझने में देर नहीं लगी थी कि विनोद सिंह चेक तो लेगा नहीं।

बॉस की दुर्दशा और सर्वशक्तिमान होने की छवि उसके सामने ढह गई। शहर के चंद सबसे रईस, प्रभावशाली और प्रतिष्ठित लोगों में शुमार किए जाते है उसके बॉस एम. एन. चौधरी। इतने ऊँचे संपर्क वाली हस्ती को कोई इस तरह से जलील भी कर सकता है, यह उसके लिए कल्पनातीत था। शहर में उनका रुतबा था। रेडक्रास, सिटीजन फोरम समेत कई संस्थाओं के संरक्षक तो लायंस क्लब, रोटरी क्लब के विभिन्न पदों को वे सुशोभित कर चुके थे। आए दिन सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बतौर मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, सम्मानित अतिथि शामिल होते ही रहते। जहाँ उनकी बगल में मंत्री, एस.पी., डी.सी. बैठते। अखबारों में नित्य उनके फोटो छपते। अपने स्कूलों के जलसों में भी वे दिग्गजों को गेस्ट बनाकर बुलाते रहते। कोई नया अधिकारी आया तो उसके अभिनंदन के बहाने उससे परिचय कर लेते। जिसका सदुपयोग-दुरुपयोग समय-समय पर वे करते हैं। हालाँकि ऐसे ही थोड़े संस्था वाले उन्हें अतिथि बनाते हैं। इसके लिए चार-पाँच हजार उनसे डोनेशन लेते हैं। चेक बनाने या नगद देने के कारण वह यह सब जानता है। खैर, इससे क्या... दूसरों की नजर में उनकी इज्जत तो बढ़ जाती।

कई तरह के उनके कारोबार थे। दो फैक्टरियाँ, एक गाड़ी का शोरूम तथा तीन अँग्रेजी स्कूल। हर तरफ से पैसा बरस रहे थे। नए स्कूल और फैक्टरी के लिए जमीन भी वे देख रहे थे। और प्रभाव के क्या कहना? उसी की बस्ती के रहने वाले मनोज ने उसे एक बार बताया था कि कैसे उनके शोरूम में बाइक रिपेयरिंग के लिए देने पर उसमें पुराने पार्ट्स लगा दिए गए थे। शिकायत करने पर उससे मारपीट भी कर्मचारियों ने की थी। थाने पर एक परिचित नेता को लेकर वह शिकायत करने गया था। लिखित शिकायत लेने के बाद मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बाद में पता चला कि पुलिस के किसी बड़े अधिकारी ने मामले को तूल न देने का निर्देश थानेदार को दिया था। जिनकी सिफारिश पर कुछ बच्चों का अपने स्कूल में उन्होंने एडमिशन करवाया था। उस नेता ने भी हाथ खड़े कर दिए, क्योंकि वे पार्टी के डोनर हैं, बड़े नेताओं से उनके मधुर संबंध है। उसी नेता के सुझाव पर उसने अखबारों में अपने साथ हुई धोखाधड़ी की शिकायत की थी। मगर अखबार वालों ने उन्हें अपना विज्ञापनदाता कहते हुए खबर छापने से मना कर दिया था।

उनके प्रभाव और पहुँच के किस्से यहीं नहीं खत्म होते। अपने स्कूलों में री-एडमिशन, बिल्डिंग चार्ज के नाम पर वसूली करते। हर साल फीस बढ़ा देते, कोर्स की किताबें बदल देते। कुछेक संगठनों द्वारा हर साल थोड़ा-बहुत विरोध होता मगर उनकी लूट जारी रहती। अखबारों में भी उनके खिलाफ कुछ न छपता। निजी अँग्रेजी स्कूलों की ज्यादतियों की खबरें छपती भी तो उसमें उनका क्या किसी का नाम नहीं आता। मानो, ज्यादती करने वाले दूसरे ग्रहों के प्राणी हों। पत्रकारों के भी हर स्कूल में दो-तीन एडमिशन करवाने के कोटे सालाना कोटे फिक्स थे। पिछले पाँच सालों में स्कूल की फीस दोगुनी हो गई थी। और इस दौरान उसका वेतन पाँच हजार से साढ़े सात हजार रुपये हुआ था। अपने बेटे और बेटी को अपनी तरह न बनने देने के इरादे से उसने उनका दाखिला उनके ही स्कूल में करवा दिया था। एक बार रियायत के लिए कुछ कहा था तो उनका जवाब था, 'सस्ते स्कूल भी तो शहर में, उसी स्कूल में पढ़ाना क्या जरूरी है... क्यों वहाँ एडमिशन कराया था।' खून का घूँट पीकर वह रह गया था। सोचा था बोलूँ कि, 'क्या पता था तब कि हर साल स्कूल की फीस बढ़ा दी जाएगी।' कोर्स की किताबें बदल देना तो सीधे-सीधे डकैती थी। पाँचवी में पढ़ने वाले उसके बेटे की किताबें दूसरे साल चौथी में पढ़ने वाली उसकी बेटी के काम न आता। कहाँ तो उसके समय में एक ही किताब से कई-कई पीढ़ियाँ पढ़ जाती। कुछ किताबों के तो एक-दो चैप्टरों में हेर-फेरकर के नया बना दिया जाता। खुलेआम उसके बॉस ने लूट मचा रखी थी। मगर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है, क्योंकि कानूनी तौर पर ये सब गलत नहीं था। था भी तो उसे साबित नहीं किया जा सकता था।

रईसों से रंगदारी वसूलने वाले विनोद सिंह के पीछे जेल में था। वह घोषित अपराधी था। जबकि आम लोगों को लूटने वाले उसके बॉस जाने माने समाजसेवी थे... सारे धतकरम कर के भी बिल्कुल पाक-साफ।

स्कूल जाते ही उसका खून खोलने लगता। मगर, वह बेबस था। सोचता भगवान क्या ये सब देख नहीं रहे हैं? सारे हाकिम-हुक्कामों से उनकी दोस्ती थी, भला कौन उन्हें रोकेगा? वह तो हार मान बैठा था। लेकिन आज घटी घटना से यकीन हो गया था भगवान के हाथ लंबे हैं। विनोद सिंह जैस लोगों को वह लाठी के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। जिनके जरिए वह उसके बॉस जैसे लोगों को सजा दे सकता है। गलत तरीके से कमाई उनके पैसे के पीछे अभी वह पड़ा है। इसके पीछे जरूर ईश्वरीय प्रेरणा होगी। कल को उनका पाप न रुका तो अनकी जान के पीछे भी वह पड़ सकता है। फिर अपने पैसे लूटे जाने का जो दुख उसके जैसे हजारों अभिभावकों को होता रहा हैं; विनोद सिंह को दस लाख हराम में देने खयाल से ही उस दुख को वे महसूस कर रहे होंगे। वह यह सोचकर मुस्कुरा उठा - न्याय आज भी जिंदा है।


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हिंदी समय में विश्वंभर मिश्रा की रचनाएँ