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कविता

अहा! क्या सुंदर देश हमारा
प्रदीप शुक्ल


मानवता को
भईय्या हमने
पीट पीट कर मारा
अहा! क्या सुंदर देश हमारा
ये वो धरती
जहाँ रोज
हम विष की बेलें बोते
दो मुट्ठी चावल की खातिर
भूखे बच्चे रोते
सूरज को भी
सता रहा है
रोज यहाँ अँधियारा
अहा! क्या सुंदर देश हमारा

गंगा जमुना
कावेरी को
हमने खूब निचोड़ा
जहर बचा है उनमें ज्यादा
पानी है अब थोड़ा
उन्हें साफ
करने का पैसा
हमने खूब डकारा
अहा! क्या सुंदर देश हमारा

राजा यहाँ
बोलते केवल
बस चुनाव की भाषा
हमको उनसे थी, भक्तों पर
कुछ लगाम की आशा
जुम्मन की
आँखों में
चमका, टूटा हुआ सितारा
अहा! क्या सुंदर देश हमारा
 


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