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कहानी

जहाज
दुर्गेश सिंह


संभावना है कि कहानी पढ़ते वक्त आपको सारी बातें रूमानी लगें। यकीन मानिए ऐसी ही रही थी हमारी जिंदगी। कहानी को कहानी की तरह पढ़े तो तकलीफ नहीं होगी। साहित्य और सरोकार की तलाश में आप उसे उसी स्तर पर पाएँगे जहाँ से हम अपने परिवार के दरवाजे की सिटकनी चढ़ाते हुए चरसी रात की चादर ताने प्रेम और रतजगे करते हैं।

तब दो अलग जिंदगियों का मिलना हुआ था कमरा नंबर 105 में। अब एक ही जिंदगी बची है। साढ़े तीन सौ कमरे रहे होंगे टर्नर हॉस्टल में। अब एक भी नहीं है। महज पाँच साल पहले की बात। न जाने बब्बू। भय्या कहाँ गए, हमारा पेट वही पालते थे। बाद में सुना था कि होंडा सिटी से चलने वाले हमारे प्रिसिंपल ने उन्हें पढ़े-लिखे मास्टरों को पानी पिलाने का काम सौंप दिया था। पुराने पियक्कड़ तो मेस तक पहुँच जाते थे लेकिन नए जहाजों के कमरे तक खाना वही पहुँचा देते थे। जहाज कॉलेज में नई एंट्री को कहा जाता था। जैसे - ए जहाज तनि कमे उड़ा।

आलोक नाम था उसका, जो बाद में उसकी सूरत के आधार पर मुन्ना में तब्दील हो गया था। कमरा नंबर 105 में उसका बिस्तर पहले आया था। जुलाई की ही एक ऐसी रात बारिश झकाझक शुरू हो गई थी। सभी जहाजों को लैंड हुए गिनती के सात दिन भी नहीं हुए थे। जहाजों के कमरे पर हुई दस्तकों के बाद तकरीबन दो सौ युवा कच्छा बनियान पहले बाहर निकले। कतारबद्ध हम सभी जहाज बारी आने पर टेक-ऑफ का इंतजार कर रहे थे। पहले एक मेज आई। फिर एक छोटी सी रंगीन टीवी, जो देखने में ही अश्लील लग रही थी। मेज पर टीवी और उसके बगल में वीसीआर, उम्मीद है हम नाम नहीं भूलें होंगे। एक काले रंग का सीनियर हाथ में एक कैसेट उठाकर बोला - बच्चों, यह है ब्लू फिल्म। उस कालिए ने कैसेट वीसीआर में खोंस दी और टीवी ऑन। कई जहाजों की स्ट्रेट फैंटेसी का तो न्यू ईयर था उस दिन। उसके बाद शुरू हुआ पॉस बटन दबाकर रतिक्रिया में लीन गोरे लोगों पर ग्रुप डिस्कशन और पर्सनल इंटर्व्यू का दौर। सही जवाब देनेवाले जहाजों को एक केला इनाम में देकर तुरंत टॉयलेट जाने को कहा जाता था। इस तरह अड़ियल जहाजों को छोड़कर सब लैंड हो चुके थे। उन अड़ियलों में से ही एक था आलोक।

क्रिश्चियन कॉलेज था। वार्डन थॉमस अब्राहम हिंदी बोले जाने पर ऐसे सुनते थे जैसे इलाहाबाद और जौनपुर के बीच पड़ने वाले जंघई जंक्शन पर रेलवे एनाउंसमेंट सुन रहे हों। हॉस्टल से बाहर जाते समय जहाज उन्हें थामस सर नमस्ते के बजाय मादर... नमस्ते कहकर निकल जाते। वो हँसकर अँग्रेजी में जवाब देते 'गुड मार्निंग'। भाषा अच्छी थी लेकिन उन दिनों हम पर उतनी हावी नहीं थी कि हमें गालियाँ भी उसी भाषा की अच्छी लगें। थॉमस की बीवी को देखकर सभी जहाज क्रैश हो जाते थे। ऐसा सीनियर्स का कहना था कि थॉमस की वाइफ सभी हॉस्टलर्स को लाइन देती है। माल एक, लाइन सबको, इस बात पर परिचर्चा को बेवकूफाना समझा जाता था। क्योंकि तब तक शायद ही किसी जहाज ने 'गुनाहों का देवता' पढ़ा था। हालाँकि बाद में अधिकतर जहाज सुधाओं के प्यार में हाईजैक होकर चंदर बनने लगे थे।

सूबे में किसी बहन जी की सरकार बनी थी। कमाल की बात थी कि बच्चे, जवान, बूढ़े सब उनको बहन जी ही कहकर बुलाते थे। कोई उन्हें माँ-बेटी समान नहीं समझ सकता था। भाई तो सब पहले कई बार सुन चुके थे लेकिन बहनगिरी की कहानी नई थी। पूरा शहर नीली झंडियों से पट गया था। एक मुस्लिम नेता के भाई ने युवा विधायक को पूरे शहर भर में दौड़ाकर गोलियाँ मारी थी। उस विधायक ने बारह दिन पहले ही प्रेम विवाह किया था। शहर का माहौल खराब हो गया था। हम सहम गए थे। जीवन ज्योति अस्पताल की डॉक्टरनी ने तो विधायक को भर्ती तक नहीं किया था। विधायक सिविल लाइंस, मुट्ठीगंज और कीडगंज के इलाकों में तड़प कर मर गया था। बात लखनऊ तक पहुँची थी। बहन जी इलाहाबाद आईं थी और सीबीआई जाँच की माँग करके वापस चली गईं। बाद में उस विधायक की विधवा पत्नी चुनाव लड़ी और हार गई थी। करेली में पीएसी लग गई थी। आलोक अपनी हीरो होंडा लेकर उस मुस्लिम नेता के घर चला गया था। शर्त यह थी कि है कोई माई का लाल है जो दंगा वाली जगह जा सकता है। आलोक के वापस आने पर सभी जहाजों ने उससे पूछा था कि क्या हुआ? तो उसने अपनी पीठ खोलकर दिखा दी थी। शर्ट के नीचे चमड़ी लटक रही थी, हम वापस उसे जीवन ज्योति ले गए। उसी डॉक्टरनी ने फिर उसे भर्ती करने से मना कर दिया। एक जहाज ने देसी कट्टा डॉक्टरनी की नाभि से सटा दिया। आलोक ठीक हो गया। कट्टे से जुड़ी कहानी आगे भी जारी रहेगी।

सारे जहाजों को क्लास से छूटने के बाद कोई न कोई असाइनमेंट दिया जाता था। उस दिन संजय लीला भंसाली की देवदास रिलीज हुई थी। हमसे कहा गया कि बिना टिकट खरीदे पिक्चर देखकर आना है। टिकट ब्लैक करने वाला शक्ल से ही निहायती काँइयाँ लग रहा था। हमने एक टिकट का दाम पूछा तो उसने कहा सौ। संजय लीला भंसाली तब तक हम दिल दे चुके सनम से सेलीब्रिटी डायरेक्टर बन चुके थे। उनका यह स्टेटस हमको देवदास देखने पर मजबूर कर रहा था। शाहरुख खान की हकलाती जबान सिर चढ़कर नशा कर गई थी; बाबू जी ने कहा घर छोड़ दो, माँ ने कहा पारो छोड़ दो, एक दिन लोग कहेंगे कि दुनिया छोड़ दो। बांदा से आया अनूप बीच में ही बोल पड़ा 'मो ना अइसे दुनिया छोड़ब'। हमने उस ब्लैक टिकटर से सारी टिकटें छीन ली थी। पैर फैलाकर बॉलकनी में बैठ देवदास का श्राद्ध वाला सीन देख रहे थे। कुछ जहाज तो रोने लगे कि कोई अपना ही श्राद्ध कैसे करवा सकता है। तभी पुलिस का एक कांस्टेबल आया - बाहर चलिए। पचास लोगों को पैदल थाने ले जाया गया। दो घंटे थाने में बिठाया गया, थानेदार मोहन किशोर एक नंबर का टाइम पास था। पहले वह आज तक न्यूज चैनल ट्यून कर अपनी आराम कुर्सी पर घंटों सोता रहा। फिर जब उसके अर्दली ने उसको जगाया तो उसने हमारे भविष्य के बारे में इतनी सारी चिंताएँ कर डाली कि हमारा मन हल्का हो गया। हम सभी अपने-अपने बेहद कम बचे दिमागों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद कॅरियर को लेकर निश्चिंत हो गए थे। लिखित बयान देने पर हम सभी को छोड़ा जाने लगा और आलोक फिर से अड़ गया। उसका साथ देने के लिए नेता इन वेटिंग राजेश पांडे भी खड़े हो गए। आलोक और राजेश को अगले दिन सुबह छोड़ा गया। सभी के घर खत भेजे गए कि क्यों न फला को कॉलेज से निष्कासित कर दिया जाए। खत राजेश पांडे के घर नहीं पहुँचा, गाँव का पोस्ट मास्टर 'गोवा - स्पिरिट ऑव स्मूदनेस' की बलि चढ़ चुका था। हालाँकि वह गोवा गया नहीं था लेकिन गोवा को उसने उस दिन महसूस किया जब पांडे की दी हुई दारू अँतड़ियों को चीरते हुई निकली थी। गोवा उत्तर प्रदेश में नहीं मिलती। मध्य-प्रदेश की सीमा से सटे आस-पास के जिलों में वह रीवा के रास्ते आती है। बिलकुल प्राची रॉय की तरह सब पर छा जाती है।

प्राची रॉय की वजह से ही बक्सर और प्लासी का युद्ध भी हमें रोचक लगता था। वो अधिकतर स्लीवलेस पहनकर आती, हम उनके खुरदुरे अंडरआर्म्स को निहारते हुए मध्यकालीन विलासी राजा सा महसूस करने लगते। प्राची रॉय और हमारे दरम्यान एचओडी रहीम जिंदादिल हमेशा आ जाते। उनकी जिंदादिली को देखकर सड़क पर भौंकते कुत्ते भी आँय-आँय करते सोने का नाटक करने लगते। वो साइकिल वाले रिक्शे पर सवार होकर डिपार्टमेंट के सामने आकर उतरती। रिक्शा वाला माहवारी पर बँधा था। उनके उतरने के बाद हममे से कोई एक उसी रिक्शे पर प्राची रॉय की खुशबू को फील करते हुए गेट के बाहर तक जाता था। जहाजों को सख्त हिदायत थी कि वे किसी डेलीगेसी वाले से दोस्ती न करें। लड़कियों से कर सकते हैं। रेसीडेंशियल इलाकों में किराए पर घर लेकर रहने वालों को डेलीगेसी वाला कहा जाता था। मिड टर्म अभी तीन महीने दूर थे। जहाजों से उम्मीद की जाती थी कि वे पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता हैं। चुनावी मौसम में जहाजों के अधिकार क्षेत्र बाँट दिए जाते थे। हैंडसम और इंटेलिजेंट टाइप्स, लड़कियों को हैंडिल करते। अनूप सिंह प्रकार के लोगों को ट्रक रोककर चंदा वसूली में लगा दिया जाता था। आलोक की बुत बने रहने की आदत की वजह से लोग उसे साइको समझने लगे थे। कुछ लोग सस्ते नारे लिखने में लगे रहते। जैसे - चार चवन्नी थाली में, अपोजिशन नाली में। एक और झेलिए - भय्या जीत के अईंहैं जय हो, भय्या लड्डू खियैंहे जय हो, भय्या पास करिहैं जय हो, भय्या माल देवैं‍इहे जय हो।

खुशबूदार पर्चियाँ छपती थी। कॉलेज के ठीक सामने टेंट लगता था। यूनिवर्सिटी का एक मठाधीश हॉस्टल को स्पांसर करता। दूसरा डेलीगेसी को। यहाँ कोई विचारधारा काम नहीं काम करती थी। विचार को धार बनाकर बहा देने वाले ही यूइंग क्रिश्चियन कालेज का चुनाव जीतते थे, ऐसा कहना था कि अवनीश मिश्रा का।

अवनीश मिश्रा नए जहाजों के शौकीन माने जाते थे। जहाजों को पहले से ही आगाह कर दिया जाता था कि ठोंकू पंडित से दूर रहना। पचपन की उम्र तक भी शादी नहीं की थी अवनीश मिश्रा ने। देश के सबसे पुराने कालेजों में से एक इस कालेज से अवनीश मिश्रा का संबंध काफी पुराना था। लोगों का कहना था कि हर साल चुनाव में हॉस्टलर्स की चुनावी फंडिंग अवनीश मिश्रा ही करते हैं। बदले में सिर्फ उन्हे मुँहमाँगा जहाज चाहिए होता है। मंजूर हुआ तो पैसा पास अन्यथा, वे कई जिलों से आए ऐसे कई जहाजों में से एक जहाज खोजते थे जो फिल्मी सपना देखता हो। अवनीश मिश्र उसको पूरा शहर अपनी स्कूटर से घुमाते थे। सिविल लाइन्स में खाना खिलाते थे । पैलेस सिनेमा की बॉलकनी में पिक्चर दिखाते थे। लड़कियाँ पटाने के लिए नुस्खे बताते थे।

हेवेन्स गार्डन का पावडर खरीदते थे। जीन्स जंक्शन से कार्गो पैंट खरीदते थे, पनामा का पहला कश लेते हुए कंगारू कैसे गटकी जाए, यह सब अवनीश मिश्र ही बताते थे। एक खेतिहर परिवार से आया लड़का खुद को फरदीन खान समझने लगता। जैसे ही लड़का खुशहाल सा होने लगता वे उससे तड़ से वही रेयर ऑव द रेयरेस्ट चीज माँग बैठते। उस दिन विनय सिंह पटेल नाम का एक जहाज दौड़ता हुआ आलोक के पास आया था और पीछे-पीछे अवनीश मिश्र भी लगे चले आए थे। अवनीश मिश्र के सिर पर आलोक ने 'बी एंड के' की बनी हुई र्इंट दे मारी थी। बी एंड के का पूरा नाम बच्चन एंड कंपनी था जिसका अमिताभ बच्चन से सीधा संबंध था। अल्लापुर में रहने वाले खुरभुर राम यादव काला पत्थर देखकर इतने भावुक हो गए कि अपने तबेले का नाम बी एंड के रख दिया। अमिताभ बच्चन जब इलाहाबाद से चुनाव लड़े तो खुरभुर ने महीना भर अल्लापुर में मुफ्त में दूध बाँटा। अमिताभ का सबको पता है लेकिन खुरभुर का हम बता रहे हैं। धंधा चौपट हुआ तो उन्होंने ईंट बनाना शुरू किया जिसकी प्रेरणा उन्हें मजबूर से मिली थी। धंधा चल निकला, इलाहाबाद में खुरभुर की बी एंड के कंपनी का नाम हो गया। लोग यह तक कहते हैं कि बंबई की बरसात में एक बार उन्होंने अमिताभ के बंगले प्रतीक्षा की एक दीवार ढहने की खबर सुनी थी। पाँच ट्राली ईंट लेकर मुंबई से सटे ठाणे जिले तक वे पहुँच गए थे लेकिन ट्रैफिक पुलिस के जवानों ने उन्हें आगे जाने नहीं दिया। ठाणे के ही एक खाड़ी में पूरी ईंटें गिरवा दी और ऐसा मान लिया कि वे बहकर प्रतीक्षा तक पहुँच जाएँगी। खुरभुर अक्सर गंगा माई के ब्रिज पर से गुजरते हुए लोगों को सिक्के फेंकते देख चुके थे।

आलोक के इस कदम ने हमारी लुटिया डुबो दी। अवनीश मिश्र ने पैसा डेलीगेसी पर लगा दिया और हम चुनाव हार गए। हम चुनाव हारकर अपने टेंट में ही खड़े थे कि तभी सामने से नवनिर्वाचित अध्यक्ष की रैली निकली। आलोक ने गोली चला दी जो अध्यक्ष को बगल से छूकर निकल गई। हम भाग खड़े हुए और प्रॉक्टर की रेड में सीनियर्स को हॉस्टल से निकाल दिया गया। मिड टर्म में अभी भी दो महीने बचे थे। वह इतवार की बनावटी दोपहर थी जब छह फीट दो इंच का विवेक अपने साथ पूर्णिमा को लेकर हॉस्टल पहली बार आया। वह उसकी दोस्त थी, ऐसा वह कहता था। दोनों पूरी रात कमरे में बंद रहे। विवेक का रूममेट रीडिंग रूम में पढ़ता रहा, बाद में वहीं पाँच फीट ऊँची टेबल पर सो गया। सुबह हमारी नींद उसकी चीख से खुली। वह टेबल से गिर गया था। वारदात स्थल पर उसका हाथ जींस के अंदर टेढ़ी अवस्था में पाया गया। सब उस पर हँसे थे और पूर्णिमा डिसगस्टिंग कहकर विवेक के कमरे में फिर से सोने चली गई थी। प्राचीन इतिहास का छात्र विवेक पूरे साल पूर्णिमा के शरीर का भूगोल का पता करता रहा।

समय आया, जब हम सबके अंदर का दिल बच्चा होने से मना करने गला था। परीक्षाएँ नजदीक आने के बावजूद प्यार का फीवर हावी होने लगा था। कुछ जहाज हॉस्टल आना बंद कर चुके थे। वे शाम होते ही अपनी प्रेमिकाओं के घर रोमिला थापर की किताबें पढ़ने चले जाते थे। पढ़ते क्या थे, ये बताने की जरूरत न थी लेकिन गर्लफ्रेंड धर्म का पालन करने वाले अधिकतर जहाज मिड टर्म में पास हो गए। राजेश पांडे मिड टर्म परीक्षा में फेल हो गए। अनूप अगले चुनाव पर आने वाले खर्चों की जानकारी देने नैनी सेंट्रल जेल चला गया था। 307 में बिताए गए तीन महीनों में उसने गजब की दाढ़ी बढ़ा ली थी। राजेश पांडे ने तो नकली मार्कशीट का इंतजाम तक कर लिया था अवनीश मिश्रा के मार्फत। जब हमने उसे हेय दृष्टि से देखा तो उसने रेयर ऑव द रेयरेस्ट चीज के सुरक्षित होने की बात कही। आलोक का पास होना किसी को समझ में नहीं आया। छुट्टियाँ अपने घरों पर बिताकर आने के बाद सबने आलोक का बदला रूप देखा। उसे शायद किसी लड़की से प्यार हो गया था। वह हम सबसे प्यार करने लगा था और एट पीएम पीने लगा था। उसके पैसों से हमने पहली बार ग्रीन लेबल पी थी। जिसके बारे में चियर्स करते समय उसने कहा था कि अपना लेबल ग्रीन लेबल। दूसरी साल हम सीनियर जहाज हो गए थे। हममें से कुछ ने तो मैच्योरिटी झलकाने के लिए अग्रवाल चश्मे वाले के यहाँ से पॉवर वाले दिखने वाले चश्मे भी खरीद लिए थे।

राजेश पांडे ने धीरूभाई अंबानी की गाल पर रखी उँगली को गंभीरता से लेते हुए कर लो दुनिया मुट्ठी में करने की ठान ली थी। मानसून के आने से ठीक पहले ही रिलायंस के मानसून हंगामे का फायदा उठा लिया। गाजीपुर जिले के लोगों का भविष्य इंश्योर करने वाले पिता को बेटे का भविष्य का अंदाजा न हुआ। महीने के पंद्रह सौ में पाँच सौ वह मुट्ठी खोलकर कभी न खुलने वाली मुट्ठी में डाल देता था। पैसे की कमी होने पर हमसे उधार ले लेता था। कीडगंज की मोबाइल रिचार्ज करने वाली दुकान पर उसका प्रजेंस ऑव माइंड देखकर हम उसको बिना कुछ कहे उधार दे देते थे। हुआ यूँ था कि रिचार्ज कूपन लेने राजेश पांडे दुकान पर पहुँचा। दुकान में दकानदार का सिर खा जाने वाली भीड़ थी। राजेश के ठीक आगे वाला भगत अपना कार्ड स्क्रैच कर रहा था। इससे पहले कि वह चौदह अंकों की डिजिट डायल करने से पहले स्टार और हैज के बीच के सर्विस प्रोवाइडर के तीन अंक डायल करता, राजेश पांडे वह काम की-पैड पर अनमने तरीके से कर चुके थे। इस तरह उसके चौदह अंक बारी-बारी से देख डायल करने से पहले राजेश अपना मोबाइल जेब में डाल चुके थे। दिमागी रूप से खत्म हो चुके दुकानदार और ग्राहक के झगड़ों के बीच राजेश पांडे कब खिसक लेते किसी को पता भी न चलता था। राजेश पांडे का खिसकना हम सबके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हुआ करता था। उनके खिसकने के किस्से हमारे बीच गुरू घंटाल के किस्सों जितने चर्चित हुआ करते थे। संगीत सिनेमा में प्रियदर्शन की सदा की तरह कोई रीमेक की हुई फिल्म 'हलचल' चल रही थी। इंटरवल से ठीक पहले करीना की दादी पान खाकर बॉलकनी में आई कि तभी हमारे सामने वाली कतार में बैठे एक इलाहाबादी बकैत ने कहा 'ले अरशद वारसी पे थूकिस'। बक्सर से आईएएस बनने आए गौरव ने कहा ऐ भाई, आगे-आगे न बोलिए ना। गौरव सिनेमा को सब्जेक्ट मानकर चलता था, कोई और ऑब्जेक्ट उन दोनों के बीच में आए, यह उसको बर्दाश्त नहीं था। खैर, पलटकर बकैत ने कहा - कस अमे, तुमको का पिराबलम है। राजेश पांडे रजनीकांत वाली स्टाइल में अपनी सीट से उठे और बकैत की कनपटी पर एक चाँटा रख दिया। बयालीस किलो वाले राजेश पांडे के चाँटे का पॉवर यामाहा आर एक्स हंड्रेड जैसा निकला। बहता खून देखकर टिकट चेक करने वालों ने मेन गेट लॉक कर दिया। थियेटर कंपाऊंड में पेलम-पेलाई जारी रही। अस्तबल लॉज के रहनुमा कहे जाने वाले भूपेंद्र सिंह अपनी पार्टी लेकर थिएटर के सामने से सही वक्त पर निकले। अस्तबल लॉज की भी अपनी एक अलग कहानी थी। कोई रसूखदार पंडा था जिसने तीन माले की इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर कुछ मरियल से दिखने वाले घोड़े पाल रखे थे। घोड़ों के लीद की खुशबू दूसरे माले पर रहने वाले स्टूडेंट्स के कमरों तक जाती थी चूँकि पढ़ना उनका उद्देश्य नहीं था इस वजह से गंदगी कोई खास मैटर नहीं था उनके लिए। भूपेंद्र सिंह की पर्सनैलिटी गजब की थी। उनकी संगत में आते ही जिंदगी आसान सी लगने लगती। भूपेंद्र सिंह का कान्फिडेंस देखकर अस्तबल लॉज के लड़कों का स्वप्नदोष भी कैटरीना कैफ से कम के स्तर पर नहीं होता। अस्तबल लॉज और भूपेंद्र सिंह की जोड़ी दसियों साल पुरानी थी। बीए पार्ट वन में लगातार पाँच साल फेल होने के बाद घर से पैसे मिलने बंद हो गए थे। इलाहाबादी संघर्षों ने उन्हें गजब का डीलर बना दिया था। बुलट से चलते, वॉन ह्यूजन की पैंट पहनते और अमीषा पटेल का पोस्टर अपने बिस्तर के नीचे रखते। उस लॉज के दस-बीस कमरों में रहने वालों के लिए भी अपने बिस्तरों के नीचे किसी न किसी कमसिन अदाकारा के पोस्टर रखना अनिवार्य हो जाता था।

संजय राय अस्तबल लॉज और भूपेंद्र सिंह के सबसे खास छर्रो में से एक था। हवा में उड़ने का शौक भी उसे अस्तबल लॉज की वजह से ही लगा था। यहाँ फिर से देसी कट्टे का जिक्र करना अनिवार्य हो जाता है। किसी कमजोर जहाज को हड़काने के लिए वह अपने जींस में उसे खोंसकर निकला लेकिन कट्टा आत्मघाती साबित हुआ। अंदर ही मिसफायर हो गया और गोटियाँ जॉकी की अंडरवियर में बिखर गईं। तिस पर ताव इतना कि हस्पताल ले जाते वक्त जहाज को घूरते हुए संजय राय ने कहा - रुक एइजे, तोरी महतारी क भो...। इतना कहने के साथ ही एक तेज झोंका आया और संजय राय के निजी अंगों को ढकने वाला तौलिया हवा की सैर करने चला गया। भूपेंद्र सिंह ने अपने सिर पर बँधे गमछे से राय साहब की आबरू बचाई थी उस दिन। सब कहीं न कहीं 'यूनीक' थे लेकिन हम सबके भविष्य का पता किसी को न था। हम जो करने इलाहाबाद आए थे वही नहीं कर रहे थे। दूसरे साल के चुनाव नजदीक आ गए थे, अनूप सिंह हॉस्टल को रिप्रजेंट कर रहे थे। पचास बार लिखकर रटने के बाद भी अनूप की फाइनल स्पीच प्रभावी नहीं रही। किसी भी तरह से हमें इस बार का चुनाव जीतना ही था और हम जैसे-तैसे जीत भी गए। सेकंड ईयर की फाइनल परीक्षाओं के बाद राजेश पांडे का साथ हमसे छूट गया था, वो पिछली क्लास में ही रह गए थे। मसखरापन और मासूमियत हममें से एक-एक कर जाने लगी थी। वजह किसी को नहीं पता थी। आलोक और नेहा का रिश्ता पूरे कॉलेज के सामने खुली किताब सा हो गया था। बिलकुल प्रियंका गांधी की ट्रू कापी लगती थी नेहा बॉब कट बालों में। ऐसा आलोक एट पीएम के नशे में बोलता था। दोनों एक दूसरे के साथ बैठ घंटों सीढ़ियों पर बात करते, हमको जलन होती थी लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं था। तीसरा साल बीतने को था, हम सब अपने आगे की कक्षाओं में दाखिले के लिए नए कॅरियर सपनों में तलाशने लगे थे। हममें से कोई भी जेएनयू के नीचे की सोचता तक नहीं था। लेकिन गया सिर्फ अंजनि कुमार सिंह, जो एक नंबर का एरोगेंट था। आज उसका किसी को पता नहीं है, क्या पता कहीं आम हिंदुस्तानी की तरह छद्म मार्क्सवाद के चक्कर में न पड़ गया हो। दिन आ गया था, जब हम अपनी तीन सालों की दुनिया को हँसी-खुशी उजाड़ने लगे थे। तख्ते्, कुर्सी-मेज, पंखे और गैस चूल्हे को औने-पौने दाम में बेच हम सब बारी-बारी से इलाहाबाद शहर से रवाना होने लगे। जो बच गए थे उन्होंने मुटठीगंज और कीडंगज की गलियों को छोड़कर कटरा चौराहे का रुख कर लिया था। कहा जाता है कि इलाहाबाद में जिंदगी देखनी है तो कटरा चौराहे पर शाम को चले आइए। संजय राय भी उनमें से एक था। राजेश पांडे नए जहाजों में दोस्त तलाशने लगे थे। कुछ दिल्ली, कुछ मुंबई तो कुछ अपने घरों को चले गए थे। अपने घरों को लौटने वालों में विपिन था जो आज भी गाँव में शीतकालीन टूर्नामेंट का कप्तान है और रामलीला में चंदा वसूलने वाला सीनियर कार्यकर्ता है।इलाहाबाद क्या छूटा हमसे हमारी पुरानी जिंदगियाँ ही छूट गई। नया जीवन, नया दोस्त और नया शहर सब हमको इतने अच्छे लगने लगे कि हम पुरानी सारी चीजों को बारी-बारी से भूलने लगे। सरकार, पॉलिटिक्स, सिस्टम और सरोकार हमारे लिए ना के बराबर मायने रखते थे। लेकिन इलाहाबाद से निकलने के बाद हमें अपनी कमियाँ पता लगने लगी। इलाहाबाद हमारे पीछे छूट गया था या फिर इलाहाबाद ने हमको आगे ढकेल दिया था। आलोक से एक साल जूनियर थी नेहा और फर्राटेदार अँग्रेजी बोलती थी। आलोक को इसका कोई कॉम्प्लेक्स नहीं था। एक सरकारी अधिकारी पिता का इकलौता बेटा था आलोक।

बात 2006 के मार्च महीने की है, मार्च बीतने बीतने को था और चेचक ने पूरे पूर्वी उत्त‍र प्रदेश में कहर मचा रखा था। हम सबके घरों के नंबर कॉलेज की डायरेक्टरी से निकाले गए और लैंडलाइन नंबरों पर कॉलेज प्रशासन की तरफ से गए फोन घनघना उठे। सबको एक हफ्ते के अंदर कॉलेज प्रशासन को रिपोर्ट करने को कहा गया। न हमको और न ही हमारे घरवालों को समझ में आया कि कालेज खत्म होने के एक साल बाद हमें दुबारा इलाहाबाद वापस क्यों बुला रहा है। राजेश, संजय राय, गौरव सिंह, अनूप, भूपेंद्र सिंह, विनय सिंह पटेल और भी कई जहाज जिनके घर फोन गया था, कालेज पहुँच गए थे। हमें कालेज प्रशासन की तरफ से मुट्ठीगंज थाने पहुँचने को कहा गया। मोहन किशोर प्रमोट होकर सी.ओ. बन चुके थे। राजेश पांडे को आते ही उन्होंने नेता जी कहकर संबोधित किया था। इसी संबोधन के बाद राजेश के अंदर कुछ ताकत आई तो उसने मोहन किशोर से पूछ ही लिया कि हमें यहाँ आखिरकार बुलाया क्यों गया है। मोहन किशोर ने कहा कि आलोक सिंह गौड़ ने आत्महत्या कर ली है। आप सबके बयान दर्ज करने हैं। जितने लोगों को यहाँ बुलाया गया है, उन सभी के नाम 25 पन्नों वाली सुसाडड नोट में हैं। थाने के बगल वाले कबूतरखाने से गेंहू चबाकर कबूतरों का एक झुंड फर्र से आकाश में उड़ा। हमारा मौन टूटा। अर्दली पढ़ता जा रहा था और हम सुनते जा रहे थे। मादर... मैं मर नहीं रहा हूँ, तुम सब मुझे मार रहे हो। रूममेट पांडे विष्णु मित्रम को जींस लाने भेज दिया है, कोठापार्चा वाले जींस जंक्शन पर। उसी पुराने म्यूजिक सिस्टम की बीट फिर से बढ़ा दी है। याद करना हम फेक बर्थडे्ज पर कितना हंगामा काटते थे उसका वॉल्यूम बढ़ाकर। रस्सी कल ही खरीद ली थी। छोटे बालों वाली प्रियंका गांधी ने मेरी मार ली है। एक हजार बार हाथ जोड़ चुका हूँ। लेकिन अब बात करना भी पसंद नहीं करती। पासआउट होने के बाद सिर्फ उसी की वजह से इलाहाबाद रुका रहा। जिंदगी कांप्लीकेटेड हो गई है। एट पीएम भी अच्छी नहीं लगती। कटघर वाले कमरे से यमुना की तरफ खुलने वाली खिड़की से तंग हवा आती है। दम घुटता है। कुछ भी ऐसा नहीं बचा, जिससे मन बहलाया जा सके। रूममेट एक नंबर का फट्टू है, मेरे कहने से चबाई जा रही राजश्री भी थूक देता है। आई हेट हिम एंड आई हेट माइसेल्फ। तुम सब कायर हो जो मौत के इंतजार में जीवन जी रहे हो। मेरा अंत सिर्फ मेरा होगा। उसमें कोई भी भागीदार नहीं होगा। मेरे मरने के बाद मेरी सीडी डीलक्स मोटरसाइकिल को नेहा के घर के सामने फूँक दिया जाए। जीवन को दिया जाने वाला सबसे बड़ा धोखा मौत है। और हाँ यह बात सत्य है कि मौत से पहले आदमी को बीती बातें याद आती हैं, मुझे याद आ रही हैं। एक फिल्म चल रही है, जिसमें कुछ लोग स्वार्थवश रो रहे हैं। अट्टहास करती नेहा है। मोहन किशोर का अर्दली रूटीन की तरह उस आत्महत्या पत्र को पढ़ता जा रहा था। हममें से सभी अलग मनःस्थितियों का शिकार होते जा रहे थे। पूरे 25 पन्नों को पढ़ने में उस साधारण से अतिविशिष्ट में तब्दील हो रहे अर्दली को दस मिनट से अधिक का समय नहीं लगा। मोहन किशोर राजेश की तरफ देखते हुए ने पूछा - नेता जी, क्या फैसला किया जाए। राजेश पांडे - सर, हम क्या बताएँ, हमारी तरफ देखते हुए।

राजेश पांडे को देखकर कोई भी कह सकता था कि दुनिया के सबसे दुखी व्यक्ति की संकल्पना उसके वर्तमान रेखाचित्र को देखकर आसानी से की जा सकती है। जिस तरह से हँसी-खुशी की तलाश में आए दिन नए-नए अमरीकी हथकंडों को हिंदुस्तानी अपना रहे थे, उससे लगता था कि वह दिन दूर नहीं जब उदास चेहरे वाले आदमी के खिलाफ अदालतों में मुकदमा दर्ज होने लगे। हमारी पूरी डिटेल्स लेकर हमें थाने एक हफ्ते तक आने के लिए कहकर इलाहाबाद से बाहर ना जाने के लिए कहकर थाने से बाहर जाने की अनुमति दे दी गई। बैरंग थाने से बाहर आकर हमने मुंडा की दुकान पर जाने का निर्णय लिया। हम भीड़ भरे गउघाट चौराहे पर खुद को अकेला पा रहे थे। हमने चाय पी और बतियाते रहे। राजेश पांडे यारों की उस टोली में से कब गायब हुआ, पता नहीं चला। वह थाने की तरफ बेतहाशा भाग रहा था। आलोक की सीडी डीलक्स थाना परिसर में वैसे ही खड़ी थी। सच्ची यार हमने बहुत मजे किए थे। उसने किक मारते ही बाइक राजरूपपुर की तरफ मोड़ दी। नेहा के घर के सामने हमने नारेबाजी के साथ बाइक ही नहीं अपनी आत्माओं में भी आग लगा दी। पुलिस की जीप में हम सब बैठकर जा रहे थे, आलोक हमारे साथ था। बिलकुल उस परिंदे की तरह जो जहाज बनकर नहीं रहना चाहते थे। उड़ना चाहते थे, खुली, हरहराती हवा में। पैदल जाते वक्त हमारे कदमों की ताल भौतिकी की अनुनाद थियरी को मात दे रही थी, फिर भले ही फार्मूले के सत्यापन के लिए तारों के सहारे लटके नैनी ब्रिज का सहारा क्यो न लिया जाता। जॉनसेनगंज में जमे बिक्रम के धुएँ जैसी परतें हमारे सीने से छँटने लगी थी। सब साफ हो रहा था, पवित्र और छलकता हुआ बिलकुल गंगा मैया के पानी की तरह।


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