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कहानी

नई पगडंडियाँ
रजनी गुप्त


कितनी बड़ी पहेली है ये जीवन भी, कभी अनकहे, अनजाने में ही इतनी सारी खुशियाँ मिल जाएँ जिन्हें ठीक से सहेजा-सँभाला ही न जा सके तो कभी ऐसे महीन उलझे रेशे जिन्हें आँख गड़ाकर देखते रहने से भी कैसे भी सुलझाया ही न जा सके। जरूर दिव्यांश के माँ-बाप के बीच कुछ ऐसा अप्रत्याशित घटा है जिसे किसी से शेयर करने का मन ही नहीं किया होगा। वह खुद भी कहाँ बता पाती है अपने बारे में दिव्यांश को अपने जीवन का पूरा सच? कोई भी नहीं बता पाता जीवन की विद्रूप हकीकतें, वे रहस्यमय अँधेरे पन्ने, गले में ही घुटकर रह गई चीखें और वे काली रातें जब लगातार खामोशी से चलते रहते जानलेवा अलक्षित युद्ध और इन सबके बीच पिसते मासूम बच्चे की आँखों में पल-पल पनपते, मिटते नए-नए सपने जिन्हें वक्त बेरहमी से नोंच-काटकर फेंक देता। उदासी की बर्फ अनायास कब, कैसे जमा हो जाती जो पिघलने का नाम ही न ले।

रोज की तरह सुबह होनी थी, हुई। नेहा ने धीमे कदमों से बाहर की तरफ जाते दिव्यांश को देखा तो देखती रह गई। क्या हो गया है इसे, इतना लुटा-पिटा चेहरा, मुड़े हुए बाल और बेतरतीब दाढ़ी भरा-पीला चेहरा।

'दिव्यांश, स्टॉप, प्लीज वेट,' वह तेज कदमों से उसकी तरफ बढ़ी और निस्तेज चेहरा देखकर अनजान किस्म का डर रगों में व्याप गया - 'दिव्यांश, एनी मिसहैपनिंग? प्लीज, लेट मी नो।'

कहते हुए उसने दिव्यांश की हथेली को अपने हाथ में लिया तो भल-भल आँसू भरी आँखों से उसने नेहा की तरफ दयनीय नजरों से देखा - 'आई लॉस्ट एवरीथिंग, कुछ नहीं बचा जिंदगी में अब, प्लीज लीव मी एलोन...'

'स्टॉप इट, हुआ क्या, पहले ये तो बताओ... नेहा ने पूरी ताकत से दिव्यांश को धक्का देते हुए कैंपस की सड़क के किनारे बने चाय के ढाबे तक ले गई फिर लगभग धकियाते हुए मुख्य सड़क पर तेज कदमों से चलते हुए बोली - 'आज हम लंच के बाद दफ्तर जाएँगे। चलो, इस समय चलें कहीं?' फिर बिना उसके जवाब का इंतजार किए वे गेस्ट हाउस के आउटडोर की तरफ मुड़ गए। अचानक आसमान ने हल्के नीले के पूरी बाँहों का स्वेटरनुमा परिधान पहन लिया जिसके बीचोंबीच पीले रंग की धारियों से तिलक लगा दिया गया हो जैसे। पैर घसीटते हुए चल रहे था वो। माहौल में पसरी उमस को हल्की हवा के झोंके राहत पहुँचा रहे थे। नवंबर माह में सर्दी के हल्के टुकड़े यहाँ-वहाँ अपनी मौजूदगी दर्शाने लगे।

    'नेहा, आई लॉस्ट माई फादर...
         'पर कब, कहाँ, क्या हुआ था?'

'ना, वो मरा नहीं है, जिंदा है वो कमीना। भस्मासुर कभी नहीं मरते, पर मेरे लिए तो मर गया मेरा बाप। उसने दूसरा ब्याह रचा लिया। साला, नालायक, कमीना, कुत्ता, औरतखेार... ममा का आकलन कितना सही निकला। वो कहती थी - देखना, जिस दिन भी इसे मौका मिलेगा, ये जरूर किसी न किसी औरत को उठा लाएगा।' खुद से लड़ते-लड़ते वह थोड़ा पस्त, हो गया था सो बड़ी मेहनत से बाँधा गया सब्र का बाँध अनायास भच्च से टूट गया - 'पता है, किससे की उसने शादी? कैन यू इमेजिन? अपने से 20 साल छोटी किसी तलाकशुदा औरत से शादी रचा लाया है मेरा बाप। सोचो जरा, कितनी गिरी हुई सोच वाला निकला वो और मुझे तो पता तक नहीं चलने दिया, ममा ने कब दोनों आपसी रजामंदी से तलाक ले लिया था सो कानून अलग होने के बाद वो आजाद साँड़ की तरह लार चुआते, यहाँ-वहाँ मुँह मारते डकारने लगा था पापी कहीं का, सुअर की औलाद...'

'मगर दिव्यांश, ये बात तो तुम काफी पहले बता चुके हो कि वे सालों से अलग-अलग रह रहे हैं यानी उनमें बनती नहीं थी सो इसमें इतना ज्यादा डिस्टर्ब होने की क्या जरूरत है?' वह सधे ढंग से बोल रही थी।

'सही कह रही हो तुम मगर पता नहीं क्यों, ऐसा लगता था जैसे उम्मीद का कोई धागा हिला सा है। अभी भी आस लगी थी जैसे शायद वे लोग उम्र के इस आखिरी मोड़ पर फिर से एक साथ रहने लगेंगे, यू नो, बाप के रिटायर होने में महज 4 साल ही तो बचे हैं... जबकि ममा के पूरे 9 साल। मेरे पास ममा का नहीं, कजिन का फोन आया था नेहा... मैंने सोचा, वहाँ पहुँचते ही तुम्हें खबर कर दूँगा फिर मन ही नहीं हुआ, यू कैन अंडरस्टैंड।'

'ममा ठीक है?'

'नेहा, मानना पड़ेगा, ममा सचमुच बहुत स्ट्रांग लेडी है। वैरी डेयरिंग एंड बोल्ड इन रियल सेंस, मुझे देखते ही हँसने हुए बोल पड़ी - 'अपनी नई माँ को देखने आया है न तू?' फिर मुझे सांत्वना देते हुए बोली - 'जरा भी परेशान मत होना दिवि, अभी मैं हूँ न? मेरी जो भी चल-अचल संपत्ति है, तेरी ही तो है, सब तेरे नाम। तू काहे को इतना तनाव लेता है दिवि?'

'मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिए, न, एक भी पैसा नहीं चाहिए, न आपसे, न उस दुष्ट से। मैं खुद ठीक-ठाक कमा लेता हूँ कि कायदे की जिंदगी अपने बूते जी सकता हूँ।' मगर मेरी आवाज अनायास भर्राने लगी तो ममा ने गले लगा लिया और पुचकारते हुए बोली - 'बेटा, ये तो होना ही था, आज नहीं तो कल। वैसे भी उनके बारे में हम तो ऐसी-वैसी बातें सालों से सुनते आ रहे हैं सो हम इसके लिए मानसिक रूप से तैयार थे ही। सालों से तलाश चल रही थी और अब जाकर उसे कोई मिल पाई पर तू काहे को इतना घबराया हुआ है? ऐसी खबरों से तू प्रभावित होगा, इसी वजह से तुझे उसकी हरकतों के बारे में नहीं बताती थी बेटा, पर तू है कि बिन बताए ऐसे अचानक बौखलाकर दफ्तर से लौट आया? किसी को खबर की?'

'नहीं की, कर दूँगा। माँ, मेरा क्या होगा? किसी दिन आपको भी कोई ऐसे ही मिल गया तो आप भी कर लेंगी न?' बिना उनकी बातें सुने वो अपनी रौ में बोलता चला गया।

'अरे, तो बस इसी वजह से तू इतना परेशान है? ऐ दिव्यांश, अगर मुझे यही सब करना होता तो कब का कर चुकी होती। मुझे कुछ और करना है जीवन में। शादी-ब्याह की उम्र नहीं रही मेरी, हाँ रिटायर होने के बाद चैलेंजिग बच्चों के लिए स्कूल जरूर खोलने की योजना है मेरी, उसी में खपा दूँगी खुद को, बस जीने का मकसद मिल जाएगा। पगला दिव्यांश, तू करेगा शादी और मैं बनूँगी अच्छी सी सासू माँ...

'तो क्या उस बुड्डे की उम्र है शादी करने की?'वह बौखलाकर भड़क गया।

'देख बेटा, आदमी औरत के बीच का सबसे बड़ा फर्क यही है। एक 55, 60 या 70 साल का आदमी भी 20 साल से लेकर किसी भी उम्र की लड़की को लोलुप नजरों से ताकेगा, उसे पाने के ख्वाब बुनेगा मगर 50 से ऊपर की औरत किसी 20 या 25 साल के लड़के को देखेगी तो ममतालु नजरों से ही देखेगी। इसमें कोई दो राय नहीं। यू गॉट माई प्वाइंट?'

'ममा, आपको जब ये सब पता था तो पहले क्यों नहीं बताया मुझे?'

'क्या‍ फायदा? तेरी पढ़ाई में खामखाँ हर्जा होता। देख दिवि, ऐसी बातें या घटनाएँ जीवन में आती-जाती रहती मगर करियर मील का ऐसा पत्थर है जिस तक एक उम्र विशेष तक ही पहुँचना होता है। पिछली बार जब तू उनके पास गया था, तो तुझसे तो कोई चर्चा नहीं की न इस बारे में?'

'नहीं, एकदम नहीं। बस, वही आपके बारे में कुरेद-कुरेदकर पूछते रहे - 'तेरी माँ दूजा ब्याह कर लेंगी जरूर, देख लेना, बस यही रट लगाए रहे सो मेरा मूड चौपट हो गया और उसी रात मैं वर्क प्लेस पर लौट गया था।'

दिव्यांश नेहा से सब बातें विस्तार से करते-करते जैसे ही रुका कि नेहा बोल पड़ी - 'दिव्यांश, न तो हर आदमी एक जैसा होता है और न हर औरत एक जैसी। तू इस बात से निश्चिंत रह कि तेरी ममा नहीं करने वाली ये शादी-फादी के प्रपंच। कतई नहीं। पर हाँ, तेरी ममा इतनी वैलेंस्ड कैसे रह सकती हैं, सचमुच आश्चर्य की बात है। सचमुच ग्रेट हैं वो। आई एडमायर हर।'

'ऐसी भी ग्रेट नहीं, उनके भी कई दोस्त, हैं, हाँ... वह तुनकता हुआ फट पड़ा।

'सो व्हाट दिव्यांश? जॉब में हैं तो ये सब नॉर्मल है। तुम भी, टिपिकल मर्दो की तरह सोचने लगे क्या? दिस इज रांग। तो दिव्यांश, इसमें इतना हाय-तौबा मचाने की क्या तुक है? न ही तुम्हें इतना उदास या डिप्रैस होने की जरूरत है। सच-सच बता, कहीं बाप की दौलत पर तो नजरें नहीं थीं न?' वह उसे जान-बूझकर छेड़ने लगी।

'क्या नेहा, इतना गिरा हुआ, इतनी घटिया सोच का समझती हो मुझे? उससे मतलब रखने का तो कभी सोचना ही नहीं। भूल जाऊँगा कि एक बाप भी है मेरा, आई हेट हिम...'

'जस्ट जोकिंग यार, चिढ़ा रही हूँ, आई नो यू वैल... रिलैक्स यार।'

'पता नहीं क्यों, जब से ये सुना है, जीवन के प्रति अजीब तरह की विरक्त, ऊब या वितृष्णा सी होने लगी।'

'नेहा, यहाँ हम सब अकेले हैं, यहाँ कोई किसी के लिए नहीं ठहरकर नहीं सोचता, सब रिश्ते-नाते झूठे हैं, नकली हैं, पाखंड हैं, बावजूद इन सचाइयों के बाप से जुड़ी घटनाएँ धड़ाधड़ ऐसे याद आती जा रहीं जैसे किसी अपने के मरने के बाद उससे जुड़े सारे प्रसंग एक-एक करके आँखों में फिल्मी रील की तरह घूमती रहती। किसी रिश्ते की मौत शायद इसे ही कहते होंगे।' वह एक-एक शब्द पर जोर देकर नाप-तौल कर बोलता जा रहा था मगर एक-एक शब्द इतना वजनदार था कि बोलना बहुत भारी पड़ रहा हो।'

'पर कोई रिश्ता पूरी तरह शायद कभी नहीं मरता, यहाँ तक कि मरे हुए के साथ जी लिए गए पल कितनी शिद्दत से याद आते रहते।'

'पता नहीं, सच क्या है मगर मैं कितना अकेला पड़ गया हूँ नेहा। वहाँ ममा की नौकरी है और यहाँ मैं अकेला, दो अलग-अलग जीवन, अलग-अलग विवशताओं में जीने की जद्दोजहद कर रहे हैं। ये जीना भी कोई जीना है, यहीं, इस कैंपस को देखो, अपने आस-पास के सभी लोग कितनी शानदार जिंदगियाँ जी रहे हैं, एक बदनसीब हमीं हैं जिन्हें ये दिन देखने बदे थे तकदीर में।'तभी उसका मोबाइल घुनघुनाने लगा, दादी का फोन है, उसने नेहा को इशारा किया तो उसने उठाने का आग्रह किया सो उसने बेमन से कान से लगा लिया।

'देख बेटा, ध्यान से सुन। फोन मत रखना, तुझे इस बूढ़ी दादी की कसम। तेरे बाप पर तो कभी मेरा वश चलता नहीं था, न ही उसने कभी मेरी बात सुनी। तेरे दादा की मौत पर जब तेरी माँ यहाँ नहीं आई तभी से तेरे बाप ने ठान लिया था, चाहे जो हो जाए, इसके साथ तो कभी नहीं रहना।'

'मगर हमें क्यों सुना रही आप ये बातें? फोन रखता हूँ,'

'बेटा, एक आखिरी बात सुन ले, यहाँ गोरखपुर की हवेली मैंने तेरे नाम लिख दी है, सारी जमीन भी तेरी है। तेरा बाप जिस चुड़ैल को ले आया है, सो वो जाने, उसका काम जाने मगर मैं मर जाऊँ तो मुझे आग देने तो तू आएगा न? बोल बेटे?'

बोलते-बोलते वे फोन पर ही भरभराकर रोने लगी। कैसे-कैसे रिश्ते होते हैं इस दुनिया में। कितने जटिल, कितने उलझे और आपस में गुत्थमगुत्था कि न तो इन्हें एक उँगली से पकड़कर सुलझाया जा सके, न दोनों हाथों से सुलझाकर परे किया जा सके। अनगिनत रिश्तों के रेशमी रेशे कई लोगों की हथेलियों से लेकर रूह तक को जोड़े रखते। एक वह है जो इन सबको काटकर महज अपने ही बारे में सोचे जा रहा है।

'दिव्यांश, मैं हूँ न तेरे साथ, हमेशा, हमेशा के लिए, यू कैन ट्रस्ट मी, कहते हुए नेहा ने उसकी दोनों हथेलियों को अपनी हथेलियों से जोड़ते हुए प्यार भरी नजरों से देखते हुए बोली - 'हमारे साथ ऐसी-वैसी दुर्घटना नहीं होगी, कभी भी, वादा रहा।'

'हू नोज? कोई भविष्यवक्ता तो हो नहीं?'

'वक्त ही इसका जवाब देगा पर चलो, अब मूड ठीक करो। हम मूवी देखने चलेंगे। चेंज हो जाएगा। भूख भी लगी है मुझे,

'कहीं भी जाने का एकदम मन नहीं है नेहा... समझ सकती हो तुम इसे।'

'बस कर रोना-धोना, चल उठ यहाँ से।' वह उसे लगभग घसीटते हुए कहने लगी।

शाम के अँधेरे में दो साए आपस में सिमटते, सिकुड़ते, मिलते, एकाकार होते गए। दिव्यांश के भीतर की हताशा इतनी गहरी कि पुरानी मीठी यादें भी उसके भीतर की टूटन को जोड़ नहीं पा रही थी। बचपन से लेकर अब तक की असंख्य घटनाएँ एक-एक करके याद आतीं और वेग से रुलाई फूट पड़ती' जानती हो नेहा, कई बार तो मैं जान-बूझकर पापा की हाँ में हाँ मिलाते हुए उनका पक्ष ले लेता ताकि वे खुश हो जाएँ। ममा तो अपनी है ही सो उन्हें मैं जल्दी से मना ही लेता था। सच तो ये है कि उन्हें कभी हमसे सच्चा प्यार था ही नहीं, न ही कोई कमिटमेंट, न कभी कॉलेज में पेरेंट्स मीटिंग में आए, न कभी आम बच्चों की तरह हम साथ-साथ मूवी देखने गए और न ही उनके पास हमारे लिए समय बचता। उनके कान हर वक्त मोबाइल पर लगे रहते। सुबह 9 से रात 9 तक वे दफ्तर और घर लौटते ही आए दिन किसी न किसी बात पर माँ से होती बहसें...

'दिव्यांश, हम मैरीकॉम देखने चल रहे हैं, बेमन से ही सही, तुम सो जाना वहाँ, हाँ...

'लौटना कब तक?'

'मैंने बात कर ली है, गेट खुला रहेगा।'

मूवी चलती रही। करियर, घर गृहस्थी, बच्चो और खेल पर केंद्रित मूवी में स्त्री जीवन केंद्र में था। नेहा, मूवी बहुत मन लगाकर देख रही थी पर दिव्यांश के भीतर चल रहे थे कई चित्र, अपना बचपन, कालोनी के दोस्त, अपनी पढ़ाई, पापा-ममा का अलग-अलग शहरों में तबादला और अब ये तमाशा। 55 साल से ऊपर के बूढ़े बाप ने 35 साल की औरत से शादी कर ली, इतना शौक चर्राया नालायक को, गालियाँ थी कि गले तक भर-भराकर आतीं, अपनी बेचैनी और असहायता से संत्रस्त रहा। उबलता रहा अंत लगातार। चैन कैसे भी नहीं पड़ रहा था।

रात घिरते ही दिव्यांश के लंबे-लंबे फोन कॉल्स आने शुरू हो जाते। वह उसे शादी के लिए आए दिन कन्विंस करता रहता - मसलन, मेरी ममा से मिल लो। मैंने उन्हें तुम्हारे बारे में सब बता दिया है, नेहा, तुम्हारी चुप्पी जानलेवा लगती है। कुछ तो बोलो न।'

'दिव्यांश, अभी इतने जल्दी इस मुद्दे पर शादी का फैसला नहीं ले पा रही। वजह पता ही है, अगले महीने यूएस निकलने की प्लानिंग है फिर 6 महीने शायद वहीं फँसी रहूँ।' एक-एक शब्द नपा तुला था।

'ओके नेहा, एज यू विश... वह पस्त आवाज में बोलता।

नेहा को लगता, बेशक दिव्यांश ने उसके सूने जीवन को भरा है। लड़कों के प्रति उसके पूर्वाग्रह को तोड़ा है। वह मेरा सबसे प्यारा, सबसे भरासेमंद दोस्त है जिसके सामने वह अपने जीवन के कैसे भी पन्ने बड़ी आसानी से खोल सकती है मगर यही सब तो नीतिका के साथ भी हुआ था। शुरू में दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते। घंटों एक-दूसरे की कंपनी में मस्त रहते। एक-दूसरे की तरफ देखते हुए न जाने किस दुनिया में खोए रहते मगर शादी के ठीक 6 महीने बाद अंदरूनी तनाव शुरू हो गए। कभी वह कहता - नीतिका, अमुक-अमुक से क्यों इतनी अंतरंगता से बतियाती हो या अमुक के साथ वह अकेले ऑफिसियल यात्रा पर न जाए। जब‍ कि फुर्र-फुर्र उड़ान भरने वाली नीतिका को इतनी बंदिशें भला कैसे बर्दाश्त होतीं। फिर नीतिका अपने माँ-बाप की एकलौती औलाद सो माँ-बाप पैसों की हनक दिखाकर दवाब बनाने लगे - 'शादी में पूरे 20 लाख खर्च किए थे। तुम्हारे माँ-बाप ने सीधे 25 लाख वसूल लिए और हमारी कमाऊ लड़की थी, फिर भी दहेज माँगा गया हमसे, सुनते ही वह और भड़क पड़ता। माँ-बाप की दखलंदाजी उसे जरा भी बर्दाश्त नहीं थी सो जल्द ही मामला कोर्ट-कचहरी तक पहुँच गया। कैसे-कैसे लांछन लगाए गए तब एक-दूसरे पर - ये लड़की कहती है, बच्चा पैदा नहीं करना। बच्चे के लिए करियर दाँव पर नहीं लगा सकती। इसे अपनी आजादी पसंद है तो फिर शादी करके मेरी जिंदगी बर्बाद क्यों की। फिर सामानों की सूची तैयार की गई और बड़े भद्दे तरीके से वे अलग-अलग हुए‍। कितनी फजीहत हुई और जगहँसाई भी - प्रेम-विवाहों का यही हश्र होता है, यानी चार दिन की चाँदनी।

वह अपने वर्क प्लेस पर देखती, उसके दोस्त आए दिन प्रेम के बनते-बिगड़ते चटपटे किस्से सुनाते रहते जिन्हें सुनकर ऐसा लगता जैसे उनके साझे सपने, ख्वाबों या चाहतों की दुनिया कतई एक नहीं होती लेकिन वे खामखाह इसी भ्रम में गोल-गोल घूमते रहते एक ही केंद्र पर। जैसे कि आभासी दुनिया की रंगीनियत को देखते हुए ऐसा लगता जैसे यही सच है सो हमारी सोए भाव जग जाते जब कि हकीकत का एक चेहरा यह भी है कि हम सबके पास एक-दूसरे के लिए समय ही कहाँ है। वे कई बार अलग-अलग शहरों में रहने की मजबूरी ढोते मगर माया की तिलिस्मी दुनिया उन्हें पल-पल रिझाती, भरमाती, विस्मित और पुलकित करती सो उनके रास्ते कितने ही अलग-अलग क्यों न हों मगर मंजिल उनकी वही है यानी ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का जुनून। सो चमचमाती बिल्डिंग की चकाचौंधी करियर की कामयाबी को पाने-छूने के भ्रम में ऐसे कपल दिन-रात पसीना बहाते रहते। वे ऐसा करते रहने के लिए अभिशप्त हैं शायद।

ये सब सुनकर नेहा का दिल बैठने लगता। यहाँ किसी के पास एक-दूसरे के लिए न उतना समय बचा, न वैसा लगाव। एक हमारे माँ-बाप की जिंदगी कि पापा हर बात पर माँ को किसी न किसी बात पर डाँट-डपट देते, उलाहना देने से कभी नहीं चूकते पर ऐसे मौकों पर नेहा माँ के लिए ढाल बनकर खड़ी हो जाती पर नेहा को यह भी लगता कि उसे अपनी माँ की तरह जज्बा तो नहीं होना बल्कि अपना मुकाम हासिल करके ही वह अपनी सुविधा व सहूलियत के मुताबिक खूब सोच-समझकर सेटल होगी। सीपी की बातें रह-रहकर रिमाएंड होने लगीं। कैसे बेलाग अंदाज में बोल रही थी - हम एक-दूसरे से उतने चिपकू टाइप हसबैंड-वाइफ नहीं है। हमें अपनी-अपनी जिंदगी चलाना आता है। हम इसके आदी हो चुके हैं। तो क्या वह भी यही सब कर सकेगी, अभी वह इस सोच में डूबी थी कि ममा का फोन आ गया - 'क्या बेटा, कहाँ हो, दो दिन से फोन ही नहीं किया, अपनी ममा को भूल गई?'

'बस करने की सोच ही रही थी। ठीक हूँ, आप बताओ...

'कैसा है दिव्यांश? कहीं तू फिर से कन्फ्यूज तो नहीं होने लगीं? पहले तो तू दिव्यांश की खूब बातें करती थी, अब क्या उससे दोस्ती टूट गई? तू ही पसंद कर ले किसी को, हमें कोई ऐतराज नहीं...'

'ममा, मेरी कलीग ने जल्दबाजी में जिस लड़के से शादी की थी, जानना चाहती थी, उसका क्या हश्र हुआ? सब खत्म हो गया उसका और वह डिप्रैशन में चली गई। तो, अब ऐसी जल्दबाजी मुझे नहीं है। करियर में ठीक से सेटल होने के बाद मैं भी साफ शब्दों में अपनी शर्ते रखूँगी और इन पर जो खरा उतरेगा, तभी सोचेंगे।'

'बेटा, शादी तो जीवन भर का बंधन होता है, कोई कांट्रेक्ट थोड़े ही है?' वे उल्टा‍ सवाल पूछने लगती।

'न, एकदम गलत बाद। मैं नहीं मानती किसी ऐसे बंधन को कि किसी पति नामक प्राणी के लिए हम अपनी समूची जिंदगी बदल डालें या फिर ताजिंदगी आपकी तरह कदम-कदम पर समझौते करते फिरें। नो, ममा, मैं अपनी आजादी पसंद करती हूँ, इसे किसी कीमत पर नहीं जाने दूँगी।'

'परफेक्शन कहाँ किसे मिल पाता है, थोड़े बहुत समझौते तो सबको करने पड़ते।' वे कन्विंस करने के मूड में थीं।

'कतई समझौते करना मंजूर नहीं ममा। अच्छा, अपने दिल से पूछकर एक बात का जवाब दो, आपने सारी जिंदगी लगा दी पापा को समझने में मगर क्या उन्हें पूरी तरह समझ पाई? नहीं न?'

'नेहा, पुरुष का नजरिया नहीं बदलता औरत को लेकर। एक बात ध्यान से सुन, किसी की भी तुलना अपने पापा से करना ठीक बात नहीं। हरेक का स्वभाव, व्यवहार या पर्सनैलिटी एक जैसी तो नहीं होती। सबमें खूबियाँ-खमियाँ दोनों होतीं। तू है कि बेवजह हमें हर जगह बीच में घसीट लाती। नेहा, पहले से ही किसी को लेकर मन में कोई धारणा मत पाल। प्यार व विश्वास से जीना सीखना पड़ता है।'

'अच्छा ममा, प्रवचन देना बंद करो।'

'सुन, दिव्यांश से तेरी गहरी दोस्ती' थी, समझदार लगता है वह, फिर क्या हो गया?'

'पहले कभी ऐसा जरूर लगता था जैसे हम एक राह के राही हैं मगर शायद हम अनजाने में ही स्वाँग रच रहे थे। पता नहीं क्यों, शायद हम एक-दूसरे को उतना समझ नहीं पाए, प्लीज लीव दिस टॉपिक...

'एक समय बाद अकेलापन काटने दौड़ता है, याद है न? अपने जमाने की मशहूर अदाकारा परवीन बॉबी का क्या हश्र हुआ था? एक समय के बाद कितनी भी कामयाबी क्यों न हो मगर...

'ममा, एक गुड न्यूज देनी थी, मुझे कुछ महीने के लिए यूएस जाना है, एक नया प्रोजेक्ट मिल रहा है...' बीच में बात काटते हुए वह बोल पड़ी।

'नेहा, वहाँ रहने-खाने का इंतजाम वगैरा?'

'सब हो गया। मेरे प्रोफाइल से मैचिंग लड़का पसंद आया तो जरूर कर लेंगे पर डोंट वरी ममा, अभी तो पूरा करियर पड़ा है, फिर ऐसे मौके बार-बार नहीं मिलते।'

'ठीक है नेहा, अपना ध्यान रखना। जहाँ से काम करने की ऊर्जा मिलती रहे या जिसकी नजरों में तुम्हारे लिए कद्र हो, वहीं संबंध करना सार्थक होता है, बाय बेटा।'

फोन पर माँ से बातें करके नेहा इधर-उधर के पेड़-पौधे देखने लगी। कहीं कोई चेहरा दूर-दूर तक नहीं दिखता जो इतना अपना सा लगे कि जिसे याद करके उसके भीतर कुछ उगने-पनपने लगे। बेशक दिव्यांश से गहरी दोस्ती दो साल से है मगर बात-बात पर जिस तरह की पाबंदियों की बाड़ वह लगाने लगता, सुनते ही उसका फैसला हिलने लगता। धीरे-धीरे उसकी असलियत खुलने लगी। पहले जिन बातों को वह बेरहमी से परे झटक देता, अब उन्हीं बातों को तूल देने लगा और अपनी बात को कन्विंस करने के लिए वही उल्टे सीधे कुतर्क, परंपराओं का ढपली राग अलापने लगता। समय बीतने के साथ-साथ अनुभव गहराते जाते तभी तो अनुभवों को एक बड़ी पूँजी कहा जाता।

'हम इस रिश्ते में जितने करीब होने में मुझे कंफर्ट लगेगा, बस उससे ज्यादा नहीं।' बोलकर वह खामोश हो गई और बेरहमी से फोन काट दिया। उसे लड़कों की लार टपकाती कामुक बातें कभी रास नहीं आई। पहले भी उसे तमाम लड़कों से दोस्ती इसी वजह से खत्म करनी पड़ी कि वे जल्द ही देह के स्तर पर उतर कर घटिया बातें करने लगते। वही पैने-पंजे दिखाने वाले लाल-लाल कामुक आँखों उसके सामने नमूदार हो जाती। उसे इस बात से भयंकर चिढ़ होती जब उसके तथाकथित दोस्त ही उसे महज मादा की निगाह से देखने लगते। किस किसका नाम याद रखे वह? आखिर कब तक वह इन लार टपकाने वालों की बुरी नजरों का सामना करती रहेगी? और क्यों भला? आखिर क्यूँ कर लड़का-लड़की महज अच्छे दोस्त बनकर नहीं रह सकते? सवाल शेर की तरह पूरा जबड़ा खोले उसे निगल जाने के लिए तैयार थे। ये आस्ती‍न के ऐसे साँप हैं जो दोस्त बनकर महज हमें डसने के लिए तैयार खड़े हैं सो इनसे एक निश्चित दूरी बनानी जरूरी है।

ऐसे भावुक लमहों में नेहा को अपने पापा की बातें याद आ जातीं। सबके सब दोहरे मानदंडों वाले, सामने कुछ और पीठ पीछे कुछ और। अनायास माँ की सूत्र बातें दुहराने लगी - 'दोस्ती और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रेम को कभी इतना बड़ा स्पेस मत देना जिसके चलते करियर से समझौता करना पड़े। स्वावलंबन सबसे मजबूत, सबसे जरूरी सीढ़ी है जिसके बगैर सब कुछ आधा-अधूरा, फीका और बेजान। अपने ब्रीदिंग स्पेस की केंद्र कर। अपना साथ पकड़। बलों में बल, अपना बल। तो कभी दुकेले की तलब महसूस नहीं होगी।'

'ममा, फिलहाल शादी मेरी प्रियारटी लिस्ट में कहीं नहीं। आप जानती तो हो, सालों की मेहनत के बाद मैंने ये मुकाम हासिल किया है, ये खूबसूरत बड़ा फ्लैट, बड़ी सी होंडासिटी कार और ये बेशुमार हवाई यात्राएँ, वाकई अब मैं अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से भरपूर जीना चाहती हूँ। अपनी शर्तो पर जीना पसंद है मुझे। ऐसे में शादी करके हजार बंदिशों की बाड़ लगाकर खामखाह के झमेले क्यूँ पालूँ? शादी के बाद कोई मेरे पैसे या समूचे जीवन पर कब्जा जमाने वाले टिपिकल टाइप पति की दरकार कतई नहीं। ये सब रिस्क उठाने का टाइम ही कहाँ है मेरे पास? नो, नो, अभी तो ऐसा सोच भी नहीं सकती, टू विजी...' नेहा ने दो-टूक लहजे में अपनी माँ के जलते सवालों पर बेरहमी से ढेर सारा पानी उड़ेल दिया।

'अरे ममा, मेरी सीनियर है, 35 की हो चुकी है। टीवी चैनल पर शानदार ओहदे पर हैं मगर अभी तक सिंगल। मेरे पूछने पर तपाक से बोल पड़ी - 'यार, ये जिंदगी अब रास आने लगी है। न कोई रोक-टोक, न डिस्टरबेंस, और न दस तरह के झमेले... अरे वही, रसोई से लेकर बेबी सँभालने तक, कांट अफोर्ड? वैसे मैं ढेर सारी सुविधाओं का लुत्फ उठा रही हूँ, ऐसे में शादी करके हजार बंदिशों में बंधकर खामखाह रिस्क क्यों लें?'

'खेत में गेहूँ की पकी फलियों को समय रहते काटकर घर पर न रखो तो पके-पके ही खेत पर बालियाँ नीचे मुँह करके सूखकर झड़ जाएँगी न? यानी धूप, पानी, बरसात में तपकर नीच माटी में मिल जाएँगी तो हमारे हत्थे क्या आएगा?'

'आपकी ये हाई-फाई टाइप बातें मेरी समझ में नहीं आ रही ममा। मैं जो समझ पा रही वो ये कि जमीन पर गिरी सूखी बालियाँ फिर से उग सकती हैं जमीन से, नहीं क्या?' उसने उनके तर्क पर प्रतिवाद किया।

'तुझे क्या लगता है कि तेरी जैसी पढ़ी-लिखी प्रोफेशनल लड़कियों की निजी जिंदगी नहीं होती क्या? माना कि तुम लोगों का बढ़ता कॉन्फिडेंस बहुत बड़ी चीज है, खास तौर पर जिस तरह से तुम लोग बड़ी से बड़ी कंपनी की नौकरी को यूँ एक झटके में किसी भी पल छोड़ने का फैसला ले लेते। हमारे जमाने में हम तो ऐसा सोच भी नहीं सकते थे। सुखद आश्चर्य कि तुम लोगों को फिर से नई जॉब मिल भी जाती, ये कॉन्फिडेंस देखकर तसल्ली होती मुझे और थोड़ा गुमान भी पर क्या यही सब कुछ है? माँ की आवाज में अनजाना सा डर या असुरक्षा व्याप जाती।

'माना कि यही सब कुछ नहीं है पर मेरी एक दोस्त थी जो कितने स्टायलिश ढंग से रहती थी। आज वह एक बड़ी नामी कंपनी में सीनियर ओहदे पर भी है पर उसकी शादी भी नहीं चल पाई। अब भी आए दिन उसकी माँ रिश्ते भेजती रहतीं पर उसकी कड़ी शर्ते सुनकर लड़के भाग जाते... हाँ... सच्ची में, बोलते हुए हँसी आ गई उसे।

'क्या वे उसे शादी के बाद काम नहीं करने देंगे? बस इसी वजह से या कुछ और?' माँ ने चिंता जताई।

'ममा, बात इतनी सरल नहीं है जितना आप सोच रही है। हमारी आजादी किसी भी कीमत पर नहीं छिननी चाहिए बस, लड़के के कहे मुताबिक कठपुतली की तरह नाचना हमारी फितरत में नहीं रहा। अब हमारे लिए शादी के मायने पूरी तरह बदल चुके हैं। हाँ, हमारी प्रॉयरिटीज बदल गई है। हमारी दोस्तों का साफ कहना है कि हमारी निजता व आजादी किसी कीमत पर नहीं छिननी चाहिए, न ही लड़के की हर बात में हाँ में हाँ मिलाना हमारी फितरत में है। ममा, मेरी कलीग ने जल्दबाजी में जिस लड़के से शादी की, आजकल उसकी पर्सनल लाइफ बेहद डिस्टर्ब चल रही। डिप्रैशन का इलाज चल रहा उसका। हाँ, अरे, ऐसे क्या‍ देख रही हो, सच कह रही। यकीन करो मेरा...

'पर नेहा, जरूरत से ज्यादा चूजी मत बन। पहले से ही किसी रिश्ते को शर्तो में बाँध देगी तो ऐसे कैसे काम चलेगा? परफेक्शन कहाँ-किसे मिल पाता?' माँ ने आखिरी बात जल्दी-जल्दी कह दी ये सोचकर पता नहीं ये कब पूरी बात सुने बिना कहीं उठकर चल दे या कुछ और करने लगे या फिर से बात को टालते हुए कह दे - प्लीज लीव दिस टॉपिक।

'प्यार व विश्वास से जीना सीखना पड़ता है हम सबको। तेरे तमाम दोस्त भी 30 पार कर चुके होंगे, है न?' बात को बीच में काटते हुए हमेशा की तरह वह बोल पड़ी - 'अच्छा ममा, ये सब बातें फिर कभी, अभी तो मुझे निकलना है, हमारे कुछ पुराने दोस्तों के साथ शहर के बाहर बने हिमाद्रि रिसॉर्ट में आज गेट-टुगेदर पार्टी है जहाँ हम सारी रात बातें करेंगे सो कल शाम तक आ पाएँगे, आप वेट मत करना प्लीज, लौटने की खबर मैं फोन करके बता दूँगी। ओके ममा, वाय।'

बिना जवाब की प्रतीक्षा किए वह कार की चाबी झुलाते हुए बाहर निकल चुकी थी मगर नई पगडंडियों पर चलते उन सधे कदमों की धमक अभी भी कानों में दूर बजती घंटी की तरह गूँज रही है।


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हिंदी समय में रजनी गुप्त की रचनाएँ